बुधवार, 6 जुलाई 2011

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की कविता - मेरा अस्तित्व

मेरा अस्तित्व


   सवाल पेट का न होता
   तो क्या मैं वहां होता
   जहां आज हूं?


आकाश के नीचे
   आम्र कुंज और
    उन्हीं में से एक
   अनचीन्हे पेड़ के नीचे
   टिका रहा मेरा बिखरा हुआ वजूद
   किसी फटे कटे नोट की तरह


   हांथों पर टिकीं अंगुलियों के
   पोर गिनते लम्हों की गिनती
   जीवन के पल वर्षों में
   तब्दील होने को अभिशप्त
   आकांक्षाओं की बर्फ
   किसी हिम शिखर से आकर
   टपकती रही
    मेरी आशाओं के ताजमहल पर


   मेरे भीतर का शिवलिंग
  पता नहीँ कितना तड़फा
   गंगाजल की चाहत में
   किसी बाज पक्षी के डैने तले
   काट काटकर मेरा मांस
   काटकर चील कौओं को
   खिलाने की परंपरा यथावत है


   विवेचना में खाली होता रहा
   मेरे शरीर का भरा पूरा ढांचा
   खून की कुछ बूंदें हैं बाकी
   जो गिरवी हैं तुम्हारे अधिकार के
   गिरवीघर में
    बस वहीं खड़ा हूं
    जहां मुझे नहीं होना चाहिये
    पेट के लिये मारा मारा फिरता
    आज वहां हूं
    जहां मुझे नहीं होना चाहिये था|

4 blogger-facebook:

  1. बेहतरीन अभिव्यक्ति , बधाई।

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    उत्तर
    1. अभिव्यक्ति के लिये धन्यवाद‌

      हटाएं
  2. har ek vyakti ka dukh aapki kavita me guth kar rah gaya hai

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. अभिव्यक्ति के लिये धन्यवाद‌

      हटाएं

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