पुरुषोत्तम व्यास की दो कविताएँ


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बहुत-कम लोग खुश होते

बहुत-कम लोग खुश होते

अनुराग में तड़प-तड़प होती

चाहत के उस नगर में

उसकी ही तस्वीर दिखती

पिंजरे मे बंद

तारों की महफिल-सजती है ।

 

टहनियों के हर छोर पर

काटें भरे सुमन खिलते

न चालाकी न चतुराई

बर्बादी के ढोल चारों ओर बजते हैं ।

पर्वतमालाओं से भी ऊँचा

प्रेम

किनारा की तरह वही नजर आता ।

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वह तारा-अकेला

अपनेपन की मुस्कान छोड़-गये

रह-गया वह-तारा अकेला

घोर-सा अंधकार

दीप नही जलते उस-पार

अंधर भी-सील गये

नही दिखता कोई पथ

ह्दय की बस्ती

दर्द का घरौंदा बन गया

छोटी-सी चिनगारी होती

जल-जल जाता सारा विपिन

फिर वही बात पुरानी

रह-गया वह तारा अकेला ....।

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ई-मेल pur_vyas007@yahoo.com

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