शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की कविताएँ

 

हास्य व्यंग्य‌

काके लागूं पांव

 

एक तरफ है प्रेमिका एक तरफ घर नार‌

काके लागूं पांव मैं दुविधा में हूं यार।

 

सात चकरियां फेरकर मैं आई हूं नाथ‌

पंडित ने निश्चित किया जीवन भर का साथ।

 

पत्नी की यह बात तो है सौ प्रतिशत सत्य‌

रात दिवस सेवा करे बिना चूक के नित्य।

 

दुनिया ने इस बात को सदा किया स्वीकार‌

पति के पाकिट पर प्रथम पत्नी का अधिकार।

 

तन मन धन में पति के पत्नी भागीदार‌

पति का घर संसार ही पत्नी का संसार। 

 

दुनिया ने इस बात को सदा किया स्वीकार‌

पति के पाकिट पर प्रथम पत्नी का अधिकार।

 

तन मन धन में पति के पत्नी भागीदार‌

पति का घर संसार ही पत्नी का संसार।

 

इधर प्रेमिका कह रही बचपन से ही यार‌

खुल्लम खुल्ला कर रही थी मैं तुमसे प्यार।

 

कदम कदम पर मैं रही सदा तुम्हारे साथ‌

कई कई घंटों बैठकर इश्क किया है नाथ।

 

घरवालों की आंख में झोंकी कितनी धूल‌

किया प्यार तुमसे प्रिय क्या थी मेरी भूल।

 

टांग खिंचाई का प्रिय प्रथम मेरा अधिकार‌

सर्वश्रेष्ठ माना गया पहला पहला प्यार।

 

प्यार किया मुझसे सनम शादी दूजे संग‌

दिल की मुहरी आपकी क्यों प्रिय इतनी तंग।

 

इधर हाल मेरा हुआ जाता है बेहाल‌

कैसे सुर में सुर मिले और ताल में ताल।

 

दो पाटन के बीच में पिसा जा रहा यार‌

काके लागूं पांव मैं दुविधा में हूं यार।

 

नियम कायदे बदल दो हे जग पालन हार‌

शरणागति दे दो प्रभु आया तेरे द्वार।

 

पत्नी के संग प्रेमिका रहे पुरुष के साथ‌

ऐसा संशोधन करो सब कुछ तेरे हाथ।

 

इस पर हल्ला हो रहा करें विरोधी शोर‌

एक पत्नी के पक्ष में सभी दे रहे जोर।

 

बीबी के पग कमल में सदा मिला है स्वर्ग‌

यह सच्चाई जान ले पत्नी पीड़ित वर्ग।

 

किंतु प्रेमिका ने किया सदा मलहम का काम‌

प्रेमी के दुख दर्द में बन जाती है बाम।

 

इस कारण ये मांग है हे जग के दातार‌

दोनों को हक एक सा दे दो प्रभु करतार।

 

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युवाओं पर भार

बड़े नहीं कर पा रहे मां की साज संवार‌

फिर युवकों पर आ पड़ा आज देश का भार।

 

फैला चारों ओर है कैसा भ्रष्टाचार‌

उसे मिटाने के लिये के लिये युवकों हो तैयार।

 

बिना सिफारिश घूस के नहीं बन रहे काम‌

रिश्वत-खोरों को युवक बतला दो अंजाम।

 

महिलाओं पर हो रहे पल पल अत्याचार‌

युवकों आगे बढ़ करो इसका फिर प्रतिकार।

 

क्यों दहेज बलि चढ़ रही नव वधुओं की रोज‌

दर्ज नहीं करवा रहे क्यों इसका प्रतिरोध।

 

वही जमाना चल रहा वही भेड़ की चाल‌

महिलाओं को समझता है उपभोगी माल।

 

जो कहते हैं नारियाँ हैं बिक्री का माल‌

इस पर क्यों करते नहीं युवकों कभी सवाल।

 

भूख गरीबी से कई मरते हैं प्रतिरोज‌

उनके बारे में युवक आगे बढ़ कुछ सोच।

 

रक्षा की है‍ देश की युवकों ने दे प्राण‌

आजादी दिलवा गया युवकों का बलिदान।

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2 blogger-facebook:

  1. sakshi dixit3:40 pm

    mujhe aapki kavitae bhut bahut achchhi lagati hai aur main aapki kavita jarur padti hu

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेनामी7:03 pm

    साक्षीजी धन्यवाद आपने प्रतिक्रिया दी
    प्रभुदयाल श्रीवास्तव‌

    उत्तर देंहटाएं

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