अजय कुमार तिवारी की कविता - नामोनिशान

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रात के गहन निविड़ में,

बेचैनी के वशीभूत,

अचानक,

श्‍मशान की एक कब्र के पास जाकर,

कुछ बुदबुदाता हूँ,

 

उसे सहलाता हूँ,

पास रखी हुई कुदाल,

उठाता हूँ,

खोदना शुरु करता हूँ,

भुरभुरी मिट्‌टी,

खुद जाती है जल्‍दी ही,

 

पर,

नहीं मिलता मेरा सशक्‍त मन,

दफन कर दिया गया था जिसे,

तानाशाहों ने बंदूक के दम पर,

निठारी के नौनिहालों की तरह,

बलात्‍कार और हत्‍या के बाद,

 

नहीं मिलती खोपड़ी, हड्‌डियाँ,

ज्‍वलंत सिद्‌धांतों की,

विचार-नसों और आतों,

के लंबे रेशे,

जो मजबूत थे तांबे के मोटे तारों से,

 

जाने गल गए कैसे,

षड्‌यंत्र है प्रशासकों का,

अवश्‍य डाला है कोई,

तेजाब से भी भयानक,

रसायन,

षड्‌यंत्र से वशीभूत होकर।

 

ताकि नामोनिशान ही मिट जाए,

सदा के लिए।

ताकि अंत हो जाए,

एक युग का,

सदा के लिए।

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अजय कुमार तिवारी

बी-14, डी.ए.वी. स्‍टाफ कालोनी,

जरही, भटगाँव कालरी,

जिला - सरगुजा, छत्‍तीसगढ़

497235

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5 टिप्पणियाँ "अजय कुमार तिवारी की कविता - नामोनिशान"

  1. दर्द बयाँ करती अति उत्तम रचना।
    आपकी रचना आज तेताला पर भी है ज़रा इधर भी नज़र घुमाइये
    http://tetalaa.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  2. सब अपने कुकर्म छुपा चुके हैं..

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुंदर प्रस्तुति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

    उत्तर देंहटाएं
  4. समाज के कुरूप चेहरे का सच ब्याँ करती रचना। धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं

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