रविवार, 31 जुलाई 2011

मालिनी गौतम की कविता - काव्य कोकिला

मैं हूँ औरत,

सर से पाँव तक औरत,

पालने में ही घिस-घिस कर

पिला दी जाती है मुझे घुट्टी

मेरे औरत होने की,

उसी पल से मुझे

कर दिया जाता है विभक्त

अलग-अलग भूमिकाओं में,

बना दिया जाता है मुझे

नाजुक…कोमल…लचीली

 

ताकि मैं जिंदगी भर

उगती रहूँ

उधार के आँगन में,

पनपती रहूँ

अमर बेल बनकर

किसी न किसी तने का सहारा लिये,

कुछ भी तो नहीं होता मेरा अपना

न जड़ें...न आँगन ...और न आसमान....

 

मुझे भी बनना है

टट्टार तने वाला वृक्ष

जिसकी कोटरों में

पंछी करते हों किल्लोल,

मेरी शाखाओं,पत्तियों और कोंपलों को

आकाश में फैलाकर

मैं घूँट-घूँट पीना चाहती हूँ

उजाले को,

आसमान से बरसते प्रकाश में

एकाकार होकर

लद जाना चाहती हूँ फूलों से,

सुरीली आवाज में

गाना चाहती हूँ गीत

मेरी आजादी के,

जमीन के साथ-साथ

आसमान में भी

पसारना चाहती हूँ मेरी जड़ें,.....

 

लेकिन........मेरी फैलती हुई जड़ें

शायद हिला देती हैं

उनके सिंहासनों को.....,

मेरे आजादी के गीत

शायद उँडेलते हैं

गरम-गरम सीसा

उनके कानों में....

तभी तो घोंट दी जाती है

मेरी आवाज,...

..........................

सदियों पहले भी,

एक थेरियस ने किया था

बलात्कार फिलोमेला का

काट डाली थी उसकी जबान.

अपने देवत्व के बलबूते पर

बना दिया था उसे ‘काव्य-कोकिला’

.............बिना जीभ की ‘काव्य-कोकिला’

........................................

.............................................

सिलसिला आज भी जारी है

आज भी मैं हूँ

जीभ बिना की कोकिला

ताकि यूँ ही सदियों तक गाती रहूँ

और कोई न कर सके अर्थघटन

मेरे काव्य का...

 

डॉ मालिनी गौतम

4 blogger-facebook:

  1. dil ko gaharaai tak chhune vaali kavita. nari ka ek aisa roop, kitani vedan huee hogi aapako is kavita ke sabdon ko jodane men, padhane vale hi is dariya men bahate chale jate hain, unhe pata bhi nahin chalta hai ki ve kaun se ghat ke kinare ja lage hain.

    उत्तर देंहटाएं
  2. प्रस्फुटन की पीड़ा स्वाभाविक है .............पर मुक्ति असंभव नहीं.
    यह भी देखना होगा की घुट्टी पिलाने वालों की मानसिकता में परिवर्तन क्यों नहीं हो पा रहा है.
    यह मात्र कविता नहीं .......बर्फ हुए आंसुओं का हिम शैल भी है ....इस हिमशैल को नमन ....
    कैसे पिघलेगा हिम शैल .........?
    यह सामूहिक चिंतन और क्रियान्वयन का प्रश्न है....

    उत्तर देंहटाएं
  3. नारी स्वतंत्रता की भावनाओं से ओत प्रोत एक सार्थक कविता के लिये
    मलिनी जी को बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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