शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

विवेक ओझा की कविता - कल हुई थी बारिश...

vivek ojha
कल हुई थी बारिश,
लोग कह रहे थे.
इस मौसम में कैसे,
दरिया बह रहे थे…
 
बन चुकी थी जब आदत,
लोगों की, ठिठुरने की.
ना जाने कैसे इतने गर्म,
दरिया बह रहे थे…
 
तब हंस पड़ा में, बाहर से,
भीतर तो कुछ और ही था.
बोला कुछ ना सोचो उल्टा-सीधा,
ये पानी नहीं है, जो बह रहा था..
 
अचरज करना तो स्वाभाविक था, उनका
पानी को पानी नहीं कह रहा था मैं,
तो फिर क्या है ये, तुम्हीं बता दो,
अब उनके प्रश्न बह रहे थे…
 
टूटा है मुझ पर, गम, बेरहम
छोड़ गये सब लोग अकेला.
रो रहे थे बादल, मेरी हालत पर,
बूँदें नही थी वो, आँसू बह रहे थे…
 
अबतक, रुक चुकी थी बारिश,
जा चुके थे वी लोग भी.
अच्छी कविता लिखी है तुमने, मेरे दोस्त कह रहे थे,
दरिया अब मेरी आँखो से बह रहे थे…
---
Vivek ojha
Email- vojha786@yahoo.com
facebook- www.fb.me/viveksrkojha
Read my works at- viveksrkojha.blogspot.com

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------