सुरेन्द्र अग्निहोत्री की कविता

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उम्‍मीदें,

आकांक्षाएं,

चिंताएं!

आखिर ऐसा क्‍या कर दिया

उन्‍होंने,

हमसे हमारी स्‍वाधीनता छीन कर?

 

योजनाबद्ध ढंग से

हमें कुसंस्‍कारित कर दिया

फिलहाल हम

पीठ बहुत मुस्‍तैदी से थपथपा रहे

यह कर्म और धर्म है

झूठ पर झूठ गढ़ते चले जा रहे

 

असली चिन्‍ता

उत्‍थान में बुनियादी आधार

संभवामि युगे-युगे की गहरी अनुगूँज

अधर्म के हाथों

अपमानित किया जाता है धर्म...।

 

गौतम, महावीर, शंकराचार्य, तुलसी, कबीर

बगैर किसी हथियार के

आदिम पाश्‍विकताओं के बीच फैलाया

इस पुकार को न समझना

सुनकर अनसुनी करना

सभ्‍यता के नाम पर असभ्‍यता को सहना

अन्‍याय और अत्‍याचार पर आँखें मूदे रहना

 

यह न वैदिक ऋषियों को रहा मंजूर

न हम स्‍वीकार सकते हुजूर

पश्‍चिमी सभ्‍यता का शैतान

घृतराष्‍ट्र की सभा में भले ही बने महान।

 

-सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

राजसदन-120/132

बेलदारी लेन,

लालबाग, लखनऊ

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1 टिप्पणी "सुरेन्द्र अग्निहोत्री की कविता"

  1. सार्थक समसामयिक कविता के लिये सुरेन्द्र जी को बधाई

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