सोमवार, 18 जुलाई 2011

दामोदर लाल ‘जांगिड़' की ग़ज़ल

 

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बंट रहा बचपन से फिरता उखड़ा उखड़ा आदमी।

इस कदर टूटा हुआ हैं टुकड़ा टुकड़ा आदमी॥

 

रिश्ता अभिवादन से थोड़ा सा जरा आगे बढ़ा,

रूह से रूखा मिला वो चिकना चुपड़ा आदमी।

 

पूर्वजों ने रीढ़ के बल उठने की कोशिश की,

हो रहा हैं दिन ब दिन क्‍यों फिर से कुबड़ा आदमी।

 

परिवार की परिभाषा बीवी बच्‍चों तक महदूद हैं,

कर रहा हैं हद से ज्‍यादा, दिल को संकड़ा आदमी।

 

मतलबी हैं या हैं कुछ मजबूरियां उसकी कोई,

झुकता हैं बौनों के आगे लम्‍बा तगड़ा आदमी।

 

पाप ,पुण्‍य, स्‍वर्ग का मोह नर्क का डर है उसे,

और धर्म की ब्रह्मपाश बैठा है जकड़ा आदमी।

---

-- दामोदर लाल ‘जांगिड़'

6 blogger-facebook:

  1. पूर्वजों ने रीढ़ के बल उठने की कोशिश की,
    हो रहा हैं दिन ब दिन क्‍यों फिर से कुबड़ा आदमी।


    परिवार की परिभाषा बीवी बच्‍चों तक महदूद हैं,
    कर रहा हैं हद से ज्‍यादा, दिल को संकड़ा आदमी।
    ..Jangid se parichay aur bahut sundar rachna prastuti ke liye aapka bahut bahut aabhar!

    उत्तर देंहटाएं
  2. दामोदर जी,
    वैसे तो आपकी पूरी रचना ही अच्छी है लेकिन इन दो लाइनों की तो बात ही कुछ और है, कि
    मतलबी हैं या हैं कुछ मजबूरियां उसकी कोई,
    झुकता हैं बौनों के आगे लम्‍बा तगड़ा आदमी।
    वाह- वाह, बधाई हो....

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेहद खुबसुरत अभिव्यक्ति ।

    उत्तर देंहटाएं

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