रविवार, 31 जुलाई 2011

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की तीन कविताएँ

1


कुछ बात करें चुपके चुपके
 
अमराई में चल छुपके
कुछ बात करें चुपके चुपके।


चल नव किसलय को छूलेंगे
डाली पर बैठे झूलेंगे
एक पुष्प बनूं इच्छा मेरी
हम हंसते हंसते फूलेंगे
चल सन्नाटों में देखेंगे
एक दूजे के मन में घुसके।
 
चल इंद्र धनुष हो जायें हम
सत रंगों में खो जायें हम
बस रोम रोम में सांसों के
कुछ प्रणय बीज बो आयें हम
अरमान लुटायें चल चलके
आंखों में बैठे जो दुबके।
 
बिजली चमके लपके झपके
अंबर से जल टप् टप् टपके
पर पवन उड़ा देता बादल
विटप लगा देते ठुमके
अब हम भी किसी बगीचे में
चल मिलें कहीं छुपते छुपते।

2


नव कुंज को अभिसार दो
 
नृत्य नूपुर पैर में फिर बांध लो
कल्प वल्ली रूप धर

अभिव्यक्ति का अवतार लो।
 
रस रंग से हो पल्ल्वित
तन यूं संवारों राग से
मंथर मलज बन बह चलो
मन सींचलो अनुराग से
नव किसलयों को चूमलो
नव कुंज को अभिसार दो।
 
रक्त वर्णी पुष्प कोई प्यार
तुमसे मांगता है
प्यार में सब कुछ लुटाकर
हार तुमसे मांगता है
बन मलय मद मस्त होकर
पुष्प पर मन वार दो।
 
फिर पलाशों के गगन में
आग सी जलने लगी है
रस रगों की वाटिका
मांग अब भरने लगी है
गीत को संसार दो
संगीत को मनुहार दो।


 

3


सुबह सुबह ही भूल गये
 
शीश महल बन पलकों पर
इतराये सारी रात
सुबह सुबह ही भूल गये
हम सपनों वाली बात।


कहने को तो पैर हमारे
चढ़े जा रहे सीढ़ी पर
किंतु सदी की आँखे छलकी
बहुत आज की पीढ़ीपर
डूब रही गंदले पोखर में
अब पर्वत की जात।


लगा दिये हैं हर चौखट पर
यूं प्रकाश के दरवाजे
शंख फूंककर इंकलाब के
बजे रोशनी के बाजे
अंधों के घर दे आये हम
सूरज की सौगात।


ऊंचे अपने आप हो रहे
रूखे होकर वृक्ष
घूम रहे आवारा हॊकर
लोकतंत्र के यक्ष
तोड़लिये अपने हाथों से
हमने अपने हाथ।


धार नदी की मोड़ी थी
हमने सागर की ओर
किश्ती बनकर तैर गये
उसमें उदगम के चोर
लहरों को ही बांध दिया
तट ने लंगर के साथ।

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2 blogger-facebook:

  1. बहुत अच्छी कवितायें , इनमें से तीसरी कविता मुझे सबसे अच्छी लगी ।

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