गुरुवार, 21 जुलाई 2011

विजय वर्मा की कविता - बुधिया नायक

 

बुधिया नायक की आँखों में 

गरीबी का दर्द है,

दिन-ब-दिन बढ़ता जाए 

ऐसा उसका मर्ज़  है.

 

उसे नहीं मालूम कि

लोकपाल बिल पर  

किसकी-किसकी.

कैसी-कैसी ज़िद है,

पर सरकार गरीबों की सुने 

उसकी ऐसी उम्मीद है.

 

नदी-नालों में मछली फँसी 

तो कलेवा बियारी का जुगाड़  लगा 

वर्ना '' बाबु! घर में खाने को कुछ नाय  है''

मुरहू प्रखंड का यह मछुआरा  असहाय  है.

 

लाल कार्ड बना नहीं,

बी .पी. एल. का लाभ मिल नहीं रहा,

कितने बाबुयों  के पास गया

कितने बड़े साहबों से कहा.

पिछले माह ४००/रु.

बतौर सरकारी मदद मिला जरूर,

पर क्या-क्या इसमें आ पायेगा --

आटा, दाल, नमक, तेल. मसाले, दवा, 

दियासलाई, मोमबत्ती, चुड़ा और गुड़ ?

 

ये गरीब आखिर अपनी बात 

जाकर किससे कहते ?  

अधिकतर प्रखंड में 

बी.डी.ओ.-सी.ओ.नहीं रहते.

--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

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