मंगलवार, 12 जुलाई 2011

एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य - बदनाम होने का सुख

 

सभी ने यह कहावत जरूर सुनी होगी कि “बद अच्छा बदनाम बुरा”। लेकिन यह पुराने जमाने की बात है। जो आज के समय में लागू नहीं होती। अब न बदनामी बुरी होती है और न ही बदनाम। आज बदनाम होने में बड़ा सुख है। इसलिए ही कई लोग जी खोलकर बदनाम होते हैं। और सुख भोगते हैं। वैसे मेरा अपना निजी अनुभव तो कुछ भी नहीं है। फिर भी देख-सुनकर इतना समझ में आ चुका है। और इसी आधार पर अपनी दलीलें पेश कर रहा हूँ। शायद किसी का कल्याण हो जाय। आज के समय में उपरोक्त कहावत का बदला हुआ रूप कुछ इस प्रकार है- “बदनाम भला सदनाम बुरा। बद सबसे अच्छा गुमनाम बुरा”।

आपको यदि कोई शंका हो तो आजमा कर देख लीजिए। कम से कम एक बार ही सही बदनाम होकर देख लीजिए। यदि सुख ना मिला तो कसम खा लीजियेगा। लेकिन सच में ऐसी नौबत ही नहीं आयेगी। विश्वास कीजिए आप भी इसके आदी हो जायेंगे।

आपकी चांदी हो जाएगी। तथा आप पर हँसने वालो की बर्बादी हो जायेगी। आप आगे बढ़ेंगे और वे पीछे हटेंगे। आप का नाम और काम दोनों पेपर में आएगा। साथ में फोटो भी रहेगी। इतना ही नहीं भोली-भाली जनता आपको नेताजी कहेगी।

नेता बनने के लिए बहुत उतावले मत हो जाइए। कम से कम इतना तो ध्यान रखिये कि सबकी किस्मत एक सी नहीं होती। आप किस क्षेत्र में कितना और कैसे बदनाम होते हैं। इसका भी तो असर पड़ेगा । एक ही क्षेत्र के काम के भी दो परिणाम हो सकते हैं। जैसे जब दो लोग कुश्ती लड़ते हैं तो कोई एक ही जीतता है। कुछ भी हो केवल नेतागिरी में ही सुख थोड़े है।

आपके साथ कौन बदनाम होता है अथवा आप किसको बदनाम करते हैं या आपको कौन बदनाम करता है। कभी-कभी यह भी मायने रखता है। इसलिए ही बहुत लोग उपयुक्त साथी के तलाश में रहते हैं। मौका देखकर खुद बदनाम होते हैं और दूसरों को भी बदनाम करते हैं। कई लोग ऐसे अवसरों पर पड़ोसी का खास खयाल रखते हैं। खुद तो सुख पाए और पड़ोसी को तरसाए तो पड़ोसी ही क्या ? जब साथ ही रहना है तो दुःख और सुख भी साथ-साथ क्यों न सहा जाय ? कई लोग तो सुख-दुःख साथ-साथ सहने के लिए कसम भी लेते हैं। दीगर है बाद में साथ ही छोड़ देते हैं ।

बदनामी में सुख ही सुख है। इस राज को समझ व समझा पाना थोड़ा कठिन है। फिर भी प्रयास कर रहा हूँ। अपने से भी किसी का भला हो जाय तो क्या बुरा है ? थोड़ा सा दिमाग पर जोर डालकर सोचिए कि आखिर जो काम करके कोई बदनाम हो जाता है। वही काम अथवा उसी जैसा कोई दूसरा काम करके दूसरे लोग बदनाम क्यों होते हैं ? जैसे जब कोई घूस लेते हुए पकड़ा जाता है, जब कोई किसी के साथ भाग जाता है अथवा जब कोई किसी को भगा ले जाता है या जब कोई नेता किसी घोटाले में फंस जाता है तो चर्चा में आ जाता है। दीगर है कुछ संकीर्ण विचारधारा के लोग कहने लगते हैं कि बदनाम हो गए। लेकिन शर्करा की मिठास तो वही जान सकता है जो उसे चखे। गौर करने वाली बात यह है कि थोड़े दिन बाद कहीं न कहीं यही घटनाएँ फिर घटित होती हैं। यदि बदनामी से वास्तव में दुःख होता तो लोग बार –बार बदनाम क्यों होते ? अब तक बदनामी वाले सारे काम बंद नहीं हो गए होते ? लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है और एक के बाद एक बदनामी वाली घटनाएँ होती रहती हैं। मुझपर विश्वास करने की जरूरत नहीं है। देश-समाज व इतिहास गवाह है।

कुछ विद्वानों का मानना है कि बदनामी की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह स्थायी नहीं होती। जैसे कहा जाता है कि सुख स्थाई नहीं होता। ठीक वैसे ही बदनामी भी स्थायी नहीं होती। धीरे-धीरे पलायन कर जाती है। क्योंकि सुख का ही दूसरा रूप जो ठहरी। इसलिए ही लोग बार-बार बदनाम होते हैं। और आनंद उठाते रहते हैं। साथ ही कहते हैं कि जिंदगी का मजा तो बदनाम होने में ही है।

एक सज्जन का कहना है कि नाम होना चाहिए। चाहे जैसे भी हो। बदनाम होने से जो सुख मिलता है वह बेनाम होने से कई गुना बेहतर होता है। वैसे देखा जाय तो बेनाम कोई होता ही नहीं। जनसंख्या लाख बढ़ी हो पर अभी उतना थोड़े बढ़ी है कि नाम ही न मिले। हाँ काम न मिले यह दूसरी बात है। चैतू, नैतू , अन्टू, सन्टू इत्यादि तमाम नाम आसानी से मिल जाते हैं। नाम की कोई खास दिक्कत अब तक नहीं है। कुछ न कुछ नाम तो सबका होता ही है। दीगर है नाम होकर भी नहीं होता। आज के समय में तो कुत्तों व बिल्लियों आदि का भी नाम होता है। वैसे कुत्तों का बहुत नाम होता है। दाम तो इतना कि इंसान भी बिक जाय।

एक राज की बात और है। कुछ लोगों का कहना है कि वास्तव में बदनामी होती ही नहीं है। मतलब बदनामी का अस्तित्व ही नहीं है। बदनामी लोगों का वहम है। फिर भी कुछ लोग नाहक ही बदनामी से डरते हैं। जैसे दार्शनिक विद्वान कहते हैं कि कोई चीज सुंदर अथवा असुंदर नहीं होती। सुंदरता तो लोगों की दृष्टि में होती है। वैसे ही बदनामी भी लोगों की दृष्टि में ही होती है। मान लीजिए होती भी है तो हुआ करे। क्योकि इससे सुख जो मिलता है। सुख के लिए तो लोग क्या-क्या नहीं करते ? ऐसे में यदि बदनाम होने से ही काम बन जाय तो क्यों न बदनाम हुआ जाय ? कई लोग इसी सिद्धांत को अमल में लाते हैं।

बदनामी से वही लोग डरते हैं। जिनका मन संकीर्ण होता है तथा जो सिर्फ चने बेचते रहना चाहते हैं। क्योंकि उनके बाप-दादा आदि ने भी यही किया था। जो समझदार होते हैं वे खुलकर बदनाम होते हैं। बदनाम होने के बाद पार्टी देते हैं। भाषण देते हैं। फोटो खिंचवाते हैं। छोटे से लेकर बहुत बड़े-बड़े लोग अब तक बदनाम हो चुके हैं। जिनमें अनेकों नेता-अभिनेता तथा संत-महंत तक भी शामिल हैं। आजकल तो इसमें बहुत तेजी आ गई है।

जिसके समझ में एक बार यह राज आ जाता है। वह किसी का भी नहीं सुनता। एक लड़की थी। उसकी मम्मी रोज समझाती कि बेटी कोई ऐसा-वैसा कदम न उठाना कि घर की बदनामी हो। बेटी ने वैसा ही कदम उठा लिया। क्योंकि उसे राज पता था। अब वह ‘मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए’ वाला गीत गाती है। और मम्मी सिर पर घर उठाये रहती हैं जबकि उन्हें पहले कदम उठाने में ही आपत्ति थी।

बाप बेटे से कहता कि बेटा कुछ भी ऐसा न करना जिससे दुबारा जेल जाना पड़े। बड़ी बदनामी होगी। लड़का कहता कि कितने ही लोग जेल जाकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बन गए। उनका गौरव बढ़ गया। आज उसी जेल से आपका गौरव घटता है। जरा सोचिए आज नेता लोग तो खुद गिरफ्तारी देते हैं। बेटे को सारा राज पता था। इसलिए वह कहता कि एक बार मैं जेल काट आया हूँ। हमें कोई गम नहीं है। कौन समझाये कि जेल लोहे और ईंट की बनी होती है। कोई मूली-गाजर थोड़े है। इसलिए उसे काटना तो आसान नहीं है। लोग वर्षों तक जेल काटते रह जाते हैं। लेकिन वहाँ से भागना अथवा जेल तोड़ना उतना मुश्किल नहीं होता। क्योंकि अक्सर सुनने में आता रहता है कि कैदी जेल तोड़कर भाग गया। जेल काटने के तुरंत बाद भागने की जरूरत नहीं रहती। कुछ दिन के बाद यह नौबत आ सकती है। और सुना है अक्सर आती है।

लोग कहते हैं कि सरकार भ्रष्ट है। अब बताइये यही वह बिरली सरकार है जो भ्रष्ट है कि इसके पहले वाली सरकारों में भी कभी भ्रष्टाचार था अथवा नहीं। यदि पहले भी था तो आज क्यों है ? कारण बदनाम होने से सुख मिलता है। नेता जी का कहना है कि अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो भूखों मर जायेंगे। क्योंकि जनता की भूख खाकर हमारी भूख बहुत बढ़ गई है। और मैं भूखा रहूँ तो जनता हमें माफ नहीं करेगी। अगली बार हम अवश्य हार जायेंगे। इसलिए ही ऐसा कदम उठाना पड़ता है। जेल का भी गम नहीं है। देश अपना, सरकार अपनी तो जेल अपना। जेल में भी अपना खेल चलता रहता है। वहाँ भी अपने मेल वाले हैं। बाहर से भी मिलने वाले और अंदर तो मिलते ही हैं।

कहाँ तक बताएँ। अब इतना ही कहना है कि जिसको बदनाम होना हो वह यथा शीघ्र हो जाए। कहीं ऐसा न हो कि जब तक मूड बने तब तक दूसरे लोग बदनामी के सारे तौर-तरीकों व नुस्खों का पेटेंट करा चुके हों। जिस तरह से लोग बदनाम हो रहे हैं यानी बदनाम होने की घटनाएँ बढ़ रही हैं, उससे तो यही लगता है। और अब तो और जहमत है क्योंकि राज का खुलासा हो चुका है। किसी की सुनना मत। क्योंकि यह जरूरी नहीं है कि जो दवा एक आदमी को सूट नहीं करती वह आपको भी सूट नहीं करेगी। जरूरत है तो बस किस्मत आजमाने की।

---------

डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र.)।

http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

*********

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------