बुधवार, 13 जुलाई 2011

हिमकर श्‍याम की कविता - जीवन पर कैसा कहर?

DSCN3714 (Mobile)

जीवन पर कैसा कहर ?

जीवन पर कैसा कहर
खुली मौत की डगर

आह! कितना दर्द
कैसी ये वेदना ?
पीड़ा का क्षण कैसा ?
कम पड़ती संवेदना
कहे दर्द का कारवां
चेतना, तू गयी कहां
मौत का अदेखा सफर
जिन्‍दगी को लगी नजर

थम गयी रफ्‍तार
मची चीख-पुकार
दांतों तले ऊंगलियां
भिंची रहीं मुटि्‌ठयां
बुझ गये कई चिराग
सूनी कई कलाइयां
अलग राहों के राही
हादसों के हमसफर
कितनी भयावह रात
ये खामोशी, आघात
ये चीत्‍कार-किसके?
जर्द चेहरे किसके?
सर्द लाशें किसकी?
कैसी ये लाचारियां?
कैसी ये मजबूरियां?
जख्‍मों का कैसा लश्‍कर

ये दर्द और मातम
ये राहत और मरहम
बस सियासी ऐलान
कितनी सस्‍ती जान
सफर दर सफर
हादसे दर हादसे
अब थमे ये सिलसिला
ये दहशत भरा सफर                                


 

हिमकर श्‍याम

द्वारा ः एन. पी. श्रीवास्‍तव
5, टैगोर हिल रोड, मोराबादी,
रांची ः 8, झारखंड।

4 blogger-facebook:

  1. हिमकर जी! आपने तो जमा दिया...

    उत्तर देंहटाएं
  2. "थम गयी रफ्‍तार
    मची चीख-पुकार
    दांतों तले ऊंगलियां
    भिंची रहीं मुटि्‌ठयां
    बुझ गये कई चिराग
    सूनी कई कलाइयां
    अलग राहों के राही
    हादसों के हमसफर
    कितनी भयावह रात
    ये खामोशी, आघात
    ये चीत्‍कार-किसके?
    जर्द चेहरे किसके?
    सर्द लाशें किसकी?
    कैसी ये लाचारियां?
    कैसी ये मजबूरियां?"

    क्या मार्मिक चित्रण , उफ़

    उत्तर देंहटाएं
  3. अमूल्य प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. उम्मीद है यह स्नेह आगे भी मिलता रहेगा. धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं

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