बुधवार, 20 जुलाई 2011

आर.वी.सिंह का व्यंग्य - कृपया कष्ट करें!

हिन्दी में आवेदन लिखते समय अपनी पूरी समस्या या मुद्दा बयान करने के पश्चात् जब वांछित कार्रवाई के लिए अनुरोध करने की बात आती है तो हम अक्सर लिखते हैं- कृपया अमुक-अमुक कार्रवाई करने का कष्ट करें। गोया कार्रवाई का होना अपने आप में पर्याप्त नहीं है उसे भी करना होगा, यानी क्रिया के लिए भी क्रिया। इसमें व्याकरणिक विसंगति तो है ही, साथ ही, एक बहुत बड़ा समाज वैज्ञानिक संदर्भ और सिद्धान्त भी छिपा हुआ है। अपने यहाँ कुछ भी सहज रूप से नहीं होता। जो काम खुद ब खुद हो जाना चाहिए, उसे भी कराना पड़ता है। अब आप उस सहज संभाव्य को कैसे कराते हैं यह तो आप खुद समझें। इसके लिए अपने मनीषियों और चिन्तकों ने अपने तईं किसी भी काम को कराने के लिए साम, दाम, दंड और भेद की व्यवस्था की है। इनमें से जो भी आपको रुचे और जँचे उसी को अपना लें और अपना काम करा लें। अंग्रेजों के यहाँ भी इस तरह के प्रावधान हैं, जैसे बाइ हुक ऑर क्रुक।

यों तो आवेदक अपने आवेदन में यह भी लिख सकता है कि श्रीमानजी मेरा यह काम किया जाए। किन्तु ऐसा लिखने से हमारे तंत्र की उस खासियत की अभिव्यंजना नहीं होती, जिसकी ओर हम पाठक का ध्यान दिलाना चाहते हैं। काम कराना तो आवेदक का अभीष्ट होता ही है, लेकिन वह गरीब यह भी जानता है कि अपना तंत्र सीधे-सीधे काम करके राजी नहीं है। उसे जिस काम को करने के लिए सरकार मोटी तनख्वाह देती है, और जिस काम के लिए आवेदक प्रत्यक्ष अथवा परोक्षतया मोटा कर अदा करता है, उस काम को करने में सरकारी कर्मचारी को बड़ा मर्मांतक कष्ट होता है। हिन्दी भाषा-भाषी को इस सनातन पीड़ा का पूरा आभास है। इसलिए वह पहले ही लिख देता है- श्रीमानजी कृपया यह काम करने का कष्ट करें।

यानी आवेदक कहना चाहता है कि मैं जानता हूँ महोदय, कि आपको यह काम करने में बहुत तकलीफ होगी, पर क्या करूँ मेरी मजबूरी है। इसलिए मैं आपसे चिरौरी कर रहा हूँ, विनती कर रहा हूँ कि आप कष्ट उठाकर कृपया यह काम कर दें।

कष्ट शब्द के अनेक निहितार्थ हैं। जब बिना कष्ट उठाए ही हमें पूरी पगार मिलने की गारंटी है, तो हम फालतू में कष्ट-वष्ट के चक्कर में क्यों पड़ें? अपना पूरा तंत्र बस इसी तरह चलता है। आपने अपनी इच्छा और आवश्यकतानुसार काम कराने के लिए हमारे पास आवेदन भेजा है। इससे आपका स्वार्थ सिद्ध होगा। लेकिन साथ ही, आपने यह भी स्वीकार किया है कि आपकी स्वार्थ-सिद्धि की प्रक्रिया में हमें कष्ट होगा। आप का स्वार्थ सधे और हम उसके फेर में कष्ट भोगें, यह तो कोई बात नहीं हुई। इसलिए जहाँ तक वश चलेगा हम काम करेंगे ही नहीं, क्योंकि सरकारी नौकरी हमने ऐश करने के लिए की है, काम करने ओर कष्ट भोगने के लिए नहीं। और यदि हम काम करेंगे भी तो जैसाकि आवेदक ने खुद ही स्वीकार कर लिया है उसकी प्रक्रिया में हमें जो अपरिहार्य कष्ट भोगना होगा, उस कष्ट भोगने के एवज में हमें कुछ तो मिलना चाहिए।

बस इतना-सा समीकरण लोगों की समझ में नहीं आता और वे हाथ धोकर, सत्तू बाँधकर सरकारी तंत्र से लेन-देन की गौरवशाली परंपरा को निर्मूल करने की मुहिम छेड़े बैठे हैं। अपन के राम तो भाषा और साहित्य के विद्यार्थी ठहरे। इसलिए कबीर साहब की सीख का अनुसरण करते हुए अपन सबसे पहले अपनी ही बुराई ढूंढ़ना शुरू करते हैं- बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय। अपन को तो लगता है कि सारी बुराई अपनी मुहावरेदानी में छिपी है। कष्ट करें का मुहावरा ही गलत है। बेहतर होता कि हम निरालाजी की वही शैली अपना लेते जो उन्होंने गुलाब को संबोधित करने के लिए अपनाई थी- अबे, सुन बे गुलाब। भूल मत पाई जो खुशबू, रंग ओ आब। खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट। डाल पर इतराता है कैपिटलिस्ट।

हमारे अदा किए गए कर के धन से वेतन पानेवाला सरकारी कर्मचारी, जिसकी नियुक्ति ही वह काम करने के लिए हो रही है, जिसके लिए हम चिट्ठी लिख रहे हैं। इसमें कष्ट उठाने की क्या बात है? हम हक से क्यों नहीं कहते कि क्लर्क जी, यह काम करो।

दिक्कत यह है कि हमारी पूरी शब्दावली विसंगतियों से भरी हुई है। मसलन आवेदन को ही लें। कष्ट के कंटक-वन से निकले तो हमारा दामन आवेदन की झाड़ी में फंस गया। आवेदन शब्द में ही वेदन निहित है। यानी आवेदन का काम ही है वेदना देना। जो वेदना दे- वह है आवेदन। आपने आवेदन किया और उसके प्रापक को वेदना शुऱू हो गई।

अपने आवेदनों का समाहार करते हुए हम अक्सर लिखते हैं- हम आपके आभारी रहेंगे। सरकारी कर्मचारी के लिए इस आभारी शब्द में भी एक संकेत निहित है। आवेदनकर्ता हमेशा आभारी रहता है- यानी उसकी जेब में हमेशा भार रहता है। कर्मचारी का परम कर्तव्य है कि वह आवेदक को भार-मुक्त करे। फंडा बिलकुल सीधा है- सरकारी कर्मचारी आपकी वजह से कष्ट भोगे, वेदना पाए तो आपको भी अपने धन के भार से मुक्त होने के लिए तैयार रहना चाहिए। कष्ट होने और भ्रष्ट होने, दोनों में गहरा कारण-कार्य संबंध है। इसमें भाषा और साहित्य के विद्यार्थी को भी कोई गुरेज नहीं होना चाहिए। बल्कि प्रसन्न होना चाहिए। देखिए न, इस उक्ति में यमक अलंकार का कितना सुन्दर परिपाक हुआ है!!

--

आर.वी.सिंह/R.V. Singh

ईमेल/email-rvsingh@sidbi.in

2 blogger-facebook:

  1. कृपया कष्ट करे ,.. अच्छा व्यंग रहा ..किन्तु यह सत्य भी है... सुन्दर लेख.

    उत्तर देंहटाएं
  2. सरक-सरक के निसरती, निसर निसोत निवात |
    चर्चा-मंच पे आ जमी, पिछली बीती रात ||

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------