दामोदर लाल जांगिड की कविता - शिखण्डी

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शिखण्‍डी

नहीं निज पौत्र पर भी शर चलाते ,

पितामह भीष्‍म किंचित हिचकिचाते ।

वहां तो रुप धर अर्जुन के जैसा ,

खड़ी थी वृहृ्‌नल्‍ला ही तो वो शण्‍डी ।

अरे हां हां अरे हां हां शिखण्‍डी॥

 

अटल थी देवव्रत ही की प्रतिज्ञा ,

नहीं की प्राण मोह में पड़ अवज्ञा ।

सुलाया शर की शय्‍या पर शपथ ने ,

नहीं था वो तेरा पौरुष घमण्‍डी ।

अरे हां हां अरे हां हां शिखण्‍डी॥

 

इतिहास में गंगेय ने सम्‍मान पाया ,

तू सदा लेकिन शिखण्‍डी ही कहाया ।

सुलगती डाह बौनेपन कायर ,

नहीं ऐसे नहीं होती हैं ठण्‍डी ।

अरे हां हां अरे हां हां शिखण्‍डी॥

 

दामोदर लाल जांगिड

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3 टिप्पणियाँ "दामोदर लाल जांगिड की कविता - शिखण्डी"

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