शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

रचना श्रीवास्तव की कविता - एक औरत

btagstgond0016 (Mobile)

एक औरत
जब अपने अन्दर खंगालती   है
तो पाती है
टूटी फूटी
इच्छाओं की सड़क ,,
भावनाओं का
उजड़ा बगीचा ,


और
लम्हा लम्हा मरती उसकी
कोशिकाओं  की लाशें  
लेकिन
इन सब के बीच भी
एक गुडिया
बदरंग कपड़ों मे मुस्काती है


ये औरत
टूटती है ,बिखरती है
काँटों से अपने जख्म सीती है
पर इस गुडिया को
खोने नहीं देती 
शायद इसीलिए
तूफान  की गर्जना को
गुनगुनाहट में बदल देती है
औरत

14 blogger-facebook:

  1. औरत का जिंदगी की सच्‍चाई रुला देती है ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. औरत की जिंदगी औप मन: स्थिति का सुंदर चित्रण...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत गहर चिन्तन , मर्मस्पर्शी भाव । रचना की कविताओं में नए विषयों का सन्धान इनकी रचाना धर्मिता को ऊँचाई प्रदान करता है ।

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  4. Samvegansheel kavita jo sochne ko majboor karti hai. Pratyek purush varg ko aaina dikhati hai. Thanks, jagane ke liye...

    उत्तर देंहटाएं
  5. बिल्कुल सही विश्लेषण किया है ...सुन्दर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  6. ज़िन्दगी देती है औरत
    जीवन संवारती है औरत

    उत्तर देंहटाएं
  7. aap sabhi ne kavita ko pasand kiya .mera likhan safal huaa.aapsabhi ka dhnyavad
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  8. औरत के जीवन की मार्मिकता को बयान करती एक हृदयस्पर्शी रचना के लिए मेरी बधाई...।

    प्रियंका

    उत्तर देंहटाएं
  9. मार्मिक प्रस्तुति ||
    बधाई स्वीकारें ||

    उत्तर देंहटाएं
  10. खूसूरत रचना बधाई ! लेकिन आज औरत बहुत आगे निकल चुकी है हाँ गांव में आज भी स्थिति कुछ एसी ही है |

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत भावपूर्ण कविता है--मर्मस्पर्शी.
    बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  12. नारी की पीडा और अनुभव की बात नारी ही अधिक प्रामाणिकता से कर सकती है ।

    उत्तर देंहटाएं
  13. नारी की पीडा और अनुभव की बात नारी ही अधिक प्रामाणिकता से कर सकती है ।

    उत्तर देंहटाएं
  14. dipti ji ,vijay ji ,anant ji,ravikar ji,priyanka ji aap sabhi ka bahut bahut dhnyavad.
    rachana

    उत्तर देंहटाएं

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