बुधवार, 13 जुलाई 2011

पुरुषोत्तम व्यास की बरसाती कविता


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सोच रहा मैं

 

बरस पड़ो-मेघों जैसा

नव सा गीत ,

नव सी कविता,

लिख दो धरा  पर ।

 

एक नन्हीं-सी बूंद बनकर

घर बनाओ सुंदर से सुमनों में

बरसों-चारों ओर,

रिमझिम बौछारों जैसा ।

 

हरियाली- चारों -ओर

भोर की प्यारी-सी लाली हों,

अरणी में जब बरसूं ,

जलधि का उपजे अनुराग ।

 

इद्रधनुष के रंगों जैसा,

जीवन हो रंगीन,

पखों की फड़-फड़ाहट

गूंजे सारे उपवन में ।

 

मोर की सुंदरता संग ,

नाच रहा मेरा मन ।

ऊँची-पर्वतमालाओं से

बह रहा मेरा मन ।

 

 

चूम-पुष्पों की क्यारियों को,

ले रंग-रंग के पंख ।

छुप जाओ घने से वृक्ष में

गाओ मीठा-सा गीत ।।

 

 

सुंदर-सा होगा सरोवर,

कंच होगें-चारों ओर ।

बैठे के उस पनघट पर

नील कंच-सा महसूस करूँ ।

 

कंच, कंच चारों ओर

सुंदर सी नन्हीं-सी बूँद ।

उन पल्लव पर बूँदे से

लिखी होगी प्रणय कथा ।

 

पंख फैलाए उड़ जाओ

भ्रमण करूँ नगर नगर ।

मीठी-सी अनुभूतियों को

महसूस करूँ डगर-डगर ।।

 

बन जाओ चातक पक्षी,

प्यास बुझाओ स्वाती नक्षत्र में ।

उस तृप्त अनुभूति की,

कविता गाऊँ जगभर में ।।

 

 

विरह नहीं वहाँ प्रेम नही ,

हर पत्थर नहीं होता पारस ।

तिनकों के घोसले में

प्रीत के बिखरे नव सुमन ।।

 

पर्वतमालाऐं चारों ओर

सुंदर-सा वह सरोवर ।

आ जाते प्यासे पक्षी,

अपनी तृष्णा बुझा  जाते ।।

 

 

 

लाल-लाल चारों ओर मेघ,

एक –तारा नहीं दिख रहा ।

जुगनू की चमक भरी कविता

गूंज रही चारों –  ओर ।।

 

तस्वीर-थी अतिसुंदर,

रंग भी मनभावन –से ।

ह्दय के हर-भाव ने ,

जगह अपनी पाई थी ।।

 

अनुपम संग था आत्मा का,

बह रही सरिता की धारा ।

देख रहा उस नगर को ,

जिसे किसी ने लूट लिया ।।

 

शाम ढले आ जाते ,

मधुर मिलन के स्वप्न ।

स्वप्न और भाग्य में,

कितना होता हैं अंतर ।।

 

होती नहीं पूर्ण अभिलाषा,

एकांकी-सा यह जीवन ।

छुई-मुई मालूम होने पर,

हर कोई छू – जाता ,

सोचा रहा मैं ।।

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  1. वर्षा ऋतू का एहसास लिए अत्यंत सुहावनी कविता है ये.....

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