शनिवार, 16 जुलाई 2011

कृष्ण गोपाल सिन्हा की कहानी - संकल्प

एक लम्बे अरसे के बाद राघव ने रंजना को देखा तो खुशी के साथ उसके मन में कुछ कुतूहल भी हो रहा था. दस साल पहले के मुकाबले रंजना के रंग रूप में बदलाव तो आया था पर अब वह ज़्यादा भद्र और परिपक्व लग रही थी. किसी की पूरी ज़िंदगी का पांचवा, छठा या सातवां हिस्सा होता है दस साल. इस दस साल में कब और कैसे रंजना के गले में रुद्राक्ष की माला को जगह मिल गया राघव को समझ में नहीं आ रहा था.

राघव के ज़िंदगी की अब तक के सफ़र में उसका बेहद कष्टपूर्ण बचपन और संघर्षमय युवावस्था शामिल था. वह जब चार साल का था तभी उसके सर से मां बाप का साया उठ चुका था. अपने माँ-बाप का वह इकलौती संतान थी जिसकी देख-भाल और पालन पोषण उसके चाचा ने की थी. उसकी पढ़ाई लिखाई भी उन्ही की देखरेख में हुयी थी. बालक और युवा राघव सचमुच बहुत ही सीधा, सरल, बुद्धिमान और होनहार था और इस बात से उसके चाचा उसकी ओर विशेष ध्यान देते थे. राघव की पढ़ाई पूरी हुयी तो चाचा जी ने उसके घर बसाने की सोची. एक संपन्न परिवार की सुन्दर और पढ़ी लिखी लड़की अनुराधा से शादी भी तय कर दी. सबको लग रहा था कि अब खुशियों की दुनिया के दरवाजे उसके लिए खुलने लगे है . लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था. एक सड़क दुर्घटना में राघव के चाचा जी की मौत हो गयी. राघव ने एक बार अपने पिता को तब खोया था जब उसे पूरा होश नहीं था और अब दूसरी बार अपने पिता तुल्य चाचा को खोने का आघात लगा था.

कुछ समय बाद कुछ रिश्तेदारों और दोस्तों के बहुत समझाने पर बड़ी मुश्किल से बड़े बेमन से वह शादी के लिए सहमत हुआ पर उससे पहले वह अनुराधा से एक बार मिलना और बातें करना चाहता था. वह अनुराधा से मिला तो उसकी बातें सुनकर वह अवाक रह गया. अनुराधा ने उसे बताया कि वह तो खुद शादी के खिलाफ थी पर इसके लिए माँ बाप को मना नहीं पायी थी. अपनी सोच,अपने सपने, अपने लाइफ स्टाइल के बारे में बताते हुए यह काबुल करने में फख्र महसूस हो रहा था कि वह आज़ाद ख्यालों की है और कही एक जगह किसी एक से बंध कर वह नहीं जीना चाहती. उसे यह कहने और बताने में भी शर्म नहीं महसूस नहीं हुयी कि उसने तो पहले से ही कुछ रिश्ते बना और तोड़ भी चुकी है.

अनुराधा से मिलने के बाद राघव ईश्वर को इस बात के लिए धन्यवाद दे रहा था कि वह एक बहुत बड़ी मुसीबत से बच गया और उसकी ज़िंदगी बर्बाद होने से बच गया. किसी और से वह यह सब बिना बताये यह तय कर लिया कि अब शादी करने का कोई सवाल ही नहीं है. इस निर्णय के बाद वह अपनी नौकरी और दोस्तों में इस क़दर राम गया कि कभी शादी की बात सोची ही नहीं और समय अपनी रफ़्तार से निकलता रहा. समय के कितने बड़े अंतराल के बाद वह रंजना के संपर्क में आया, उसने कभी हिसाब नहीं लगाया और अपने वर्तमान को उसने ईश्वर की ही मर्जी मानने लगा.

दस साल पहले तक राघव और रंजना के बीच एक साथ काम करने का रिश्ता होने के अलावा एक दूसरे को अच्छी तरह समझने और एक दूसरे का ध्यान रखने का सम्बन्ध था. रंजना अपने से उम्र में काफी बड़े राघव की बहुत इज्ज़त करती थी और राघव भी उसकी और उसके परिवार की पूरी खबर रखते थे. रंजना और राघव में एक और रिश्ता भी था जिसे उनके अलावा कोई भी नहीं जानता था दरअसल, दोनों ने एक दूसरे की ज़िंदगी में कोई दखल न देने का फैसला किया था फिर भी अपनी हर बात को एक दूसरे से बाँट लेने में संकोच भी नहीं करते थे. राघव ने अपनी तरफ से अपने रिश्तों के बारे में पाबंदियां तय की थी और रंजना को बताये भी थे पर इन मामलों में रंजना गंभीर और संजीदा रहती. दरअसल, दोनों ने ही अपने बीच की नजदीकियों और दूरियों के अपने अपने पैमाने तय कर लिए थे.

रंजना कालेज के दिनों में पढ़ाई में तेज और अपनी फ्रेंड सर्किल में एक्टिव और शोख मानी जाती थी. फैकल्टी के लोग उसके ऊपर ज़्यादा ध्यान देते और वह जब भी किसी को ज़रूरत पड़ती पढ़ाई में उसकी मदद को तैयार रहती. सभी उसकी इज्ज़त करते थे. कुछ लड़के मन ही मन उसे पसंद करने और चाहने भी लगे थे पर वे इसका रंजना से इज़हार करने की हिम्मत नहीं कर सकते थे, रंजना के मन में इमरान और अमरदीप के लिए अलग जगह थी और वह इनका काफी इज्ज़त भी करती थी पर इस बात का कभी भी उन दोनों से या किसी और से कभी ज़िक्र तक नहीं किया था .इमरान और अमरदीप दोनों से ही रंजना की अच्छी दोस्ती हो गयी थी जो बराबर कायम रही और वे दोनों ही रंजना के परिवार के सदस्य की तरह अपने रिश्ते को निभाने में कामयाब भी रहे. इमरान के साथ रंजना का पूरा परिवार ईद की खुशियाँ मनाता तो अमरदीप के साथ गुरुपर्व मनाते और लंगर छकते थे और यह सिलसिला रंजना के लिए शादी के बाद भी चलता रहा और रोहित भी उनके साथ पूरे मन से शामिल रहता.

रंजना ख़ूबसूरत थी, तह्जीबदार थी, मौके की नफासत को समझती थी और कभी किसी को कोई शिकायत का मौक़ा नहीं देती थी. परिवार में उसके माँ बाप और जानने वाले उसकी बड़ी तारीफ़ किया करते थे. उसमें परिवार के लिए कुछ अलग करने का जज्बा भी था. इस खूबी की ज़रूरत तब काम आयी जब उसकी बड़ी बहन संध्या ने शादी से ठीक पहले रोहित से शादी करने से इनकार कर दिया. दरअसल, एक अरसे से संध्या और रोहित एक दूसरे से प्यार करते आ रहे थे और यह बात उन दोनों के परिवार वालों को मालूम था और वे दोनों के रिश्ते के लिए राजी भी थे. सन्धा के इस फैसले से दोनों परिवार के लोग सकते में आ गए थे. रोहित की हालत बहुत बुरी हो गयी और उसने ज़िंदगी से ही तौबा करने की ठान ली और घर वालों को यह बात बता भी दी थी.

इस बात को लेकर रंजना भी परेशान थी. उसे अपनी बहन के इस फैसले की वजह समझ में नहीं आ रही थी . दूसरी ओर उसे रोहित से भी हमदर्दी थी क्योंकि वह उसे बहुत ही सीधा और सुलझा हुआ लगता था. उसने संध्या और रोहित से इस बारे में वजह जानने की भरपूर कोशिश की पर किसी ने कुछ नहीं बताया. संध्या को समझाने की सभी की सारी कोशिशें काम नहीं आयीं. इस बीच रंजना ने फैसला किया कि वह इसका हल निकालेगी और उसने रोहित और अपने परिवार के सामने खुद रोहित से शादी का प्रस्ताव रखा. किसी की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था. संध्या को अपनी बहन के इस क़दम पर कुछ भी नहीं कहना था. रंजना रोहित की बहुत इज्ज़त करती ही थी. रोहित के मन में रंजना के लिए एक अलग जगह और इज्ज़त पहले से ही थी जो अब उसके इस फैसले से और भी बढ़ गयी. इससे रोहित को काफी राहत और सुकून महसूस हुआ.

ज़िंदगी के इस मोड़ पर आकर रंजना में धीरे-धीरे एक यह बदलाव आने लगा कि वह पहले की तरह शोख और चंचल रहने के बजाय अब संजीदा और गंभीर रहने लगी थी. वह अपने में आये इस बदलाव को रोहित और अपने घर वालों को महसूस नहीं होने देना चाहती थी. संध्या की शादी कही और तय हुयी और शादी की रस्म पूरी होने पर वह अपने ससुराल चली गयी. कुछ समय बाद रंजना की पढ़ाई पूरी होने के बाद रोहित से उसकी शादी हो गयी और वह भी अपने ससुराल चली गयी. शादी के दो साल बाद रंजना की गोद भरी और रोहित पिता बन गए. रंजना और रोहित के घर वालों के अलावा इमरान और अमरदीप ने भी जमकर खुशियाँ मनाई.

रंजना अपने परिवार में रम जाने के साथ साथ ऑफिस के काम काज में भी पूरी दिलचस्पी लेती और अपने ऑफिसरों और कलीग्स के बीच अपनी एक अलग पहचान बना ली थी. सब कुछ सामान्य और सहज था पर कब और कैसे रंजना नवीन के नजदीक आने लगी, यह उसे भी समझ में नहीं आ रहा था. इससे पहले की उनकी नजदीकियां किसी तरह के सम्बन्ध में बदलती, रंजना ने अपने को संभाल लिया रोहित को रंजना पर पूरा भरोसा था इसीलिए उसने रंजना से दफ्तर के लोगों से मेलजोल होने और बढ़ाने पर उसने कभी कोई सवाल नहीं किया. . इसी बीच रंजना के ऑफिस में एक नए मैनेजर राघव ने ज्वाइन किया. थोड़े ही समय में उन्होंने रंजना के काम को देखा और लोगो से भी उसकी तारीफ़ सुनी तो काफी खुश हुए. धीरे-धीरे उनका भरोसा रंजना पर बढ़ाता गया और उसकी जिम्मेदारियां भी बढ़ने लगी . अब हर बात में रंजना और हर काम में रंजना को पूछा और खोजा जाने लगा.

इसी बीच रंजना राघव के संपर्क में आयी तो दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह समझने लगे थे . राघव कभी-कभी रंजना के घर . भी जाता और रोहित से मिलकर उसे अच्छा भी लगता था. .किसी तरह की कमी नहीं होने देता था. रोहित जानता था कि रंजना और राघव के बीच ऑफिस में अच्छी अंडरस्टैंडिंग है.. कभी भी उसके मन में इन दोनों के संबंधों को लेकर किसी तरह के शक या संदेह की बात नहीं आयी. इसकी ख़ास वजह पति -पत्नी के बीच की अच्छी समझ थी.

कभी-कभी रंजना और राघव के बीच बातों का सिलसिला ऐसा होता कि उम्र का फासला कोई

मायने ही नहीं रखता था. राघव की आदत थी कि वह रंजना की हर ज़रूरतों के बारे में पूछता और उसका ध्यान रखता था. राघव की तरह रंजना भी उसका ध्यान तो रखती थी पर उसकी हर ज़रूरतों के बारे में न पूछती और न ही जानना ही चाहती थी. दोनों के बीच नजदीकियों की शायद यही वजह थी. कभी-कभी काम के सिलसिले में वे एक साथ बाहर भी जाते थे. एक दूसरे से वे काफी खुले थे और यह सब उनके आपस में तय किये गए पैमानों के मुताबिक़ ही होता था.

वक़्त को भले ही सब कुछ पता हो पर आदमी ज़िंदगी में आने वाले मोड़ और बदलाव को भांपने और जानने में पूरी तरह नाकाम रहता है. रंजना और राघव भी इस फलसफे के घेरे से बाहर नहीं थे. रंजना को याद हो न हो पर राघव को यह बात याद रखने और कसक देने वाली थी जब किसी बात चीत के दौरान रंजना ने कहा था कि वह अच्छा खाती है , अच्छा पहनती है और इसके अलावा उसे क्या चाहिए. राघव रंजना की इस बात को लेकर बहुत परेशान रहता पर न कुछ पूछ सकता था और न ही कुछ कर ही सकता था.

इसी तरह एक बार राघव ने रंजना से पूछा कि बिना देखे देख लेना, बिना छुए छू लेना और बिना दिए पा लेना क्या हो सकता है. रंजना ने फ़ौरन कहा .'अहसास' और इस बात को अपने ज़हन से वह निकाल नहीं पायी. एक दिन राघव के मन की कसक और रंजना के मन के अहसास ने उस पैमाने को छलका ही दिया जिसे पूरे जतन से दोनों ने संभाल कर रखा था. दोनों में से किसी को कुछ समझ में नहीं आया कि यह सब कैसे हुआ . दोनों के लिए अनजाने में अनचाहा सा था सब कुछ. न कोई किसी से कुछ कह सकता था न पूछ ही सकता था. दोनों के बीच की दीवार कब और कैसे गिरी , तूफ़ान कब और कैसे आया, बिजली कब और कैसे कौंधी, समंदर ने कैसे उन्हें अपने में समो लिया, दोनों ही नहीं समझ पाए. दोनों जिन नयी गहराइयों तक डूबे थे ,जिन नयी ऊंचाईयों को महसूस किया था वह इससे पहले न सोचा था न जाना था. लहरें तो पहले भी महसूस हुयी थी पर इस बार लहरों का पूरा समंदर ही उनमें समा गया था. उन्होंने पूरा ब्रह्माण्ड अपने अन्दर महसूस किया था. किसने क्या खोया और किसने क्या पाया यह सवाल बेमानी लग रहा था. दरअसल न तो किसी ने कुछ खोया था जब कि दोनों को लग रहा था कि उन्होंने पाया ही पाया है. किसने ज़्यादा या किसने कम पाया, यह भी बेमानी इसलिए था क्योंकि दोनों को ही यह लग रहा था कि उसे एक दूसरे से ज़्यादा ही मिला है. दोनों के चहरे पर सुकून था, संतोष था, संतृप्ति थी, किसी बड़े उपलब्धि का गर्व था. काफी देर तक दोनों एक दूसरे से कुछ सुनने का इंतज़ार करते रहे , किसी ने न कुछ कहा न कुछ पूछा. दोनों का मौन ही एक दूसरे के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति कर रहे थे. रंजना कुछ खाने पीने के इंतजाम में जुट गयी. राघव कभी रंजना को. तो कभी अपनी हथेलियों को निहारने लगा.

रंजना के चहरे पर एक नयी चमक, चाल में एक नयी मस्ती और व्यवहार में बढ़ी हुयी सौम्यता और स्निग्धता महसूस की जाने लगी थी. पंद्रह साल के वैवाहिक जीवन में उसे कुछ होने और पाने का अहसास अब हर पल महसूस होता . राघव के लिए अब उसके मन में पहले से ज़्यादा सम्मान ने जगह बना लिया था. ज़ल्द ही उसे अहसास हुआ कि वह दूसरी बार माँ बनने जा रही थी. रोहित से पहले यह बात वह राघव को बताना चाहती थी पर खुद पर उसने काबू रखा और कुछ समय बाद किसी और से शेयर करने या खबर होने से पहले राघव को बता ही दिया. राघव ने महसूस किया कि रंजना बहुत खुश थी. वह भी बहुत खुश हुआ और रंजना को माँ बनने की बधाई भी दी. रंजना ने जब रोहित को यह बात बतायी तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. दस साल के बेटे को जब यह बात बतायी गयी तो वह इस बात से बहुत खुश हुआ कि अब उसे भैया कहने वाला आयेगा.

राघव बस रंजना को उसके और उसके होने वाले बच्चे पर पूरा ध्यान देने की बातें करता. रंजना ही यह जानती थी कि उसे यह तोहफा राघव ने ही दिया है पर यह बात उसने अभी राघव को ज़ाहिर नहीं की थी. इस बीच किसी वजह से राघव को यह शहर छोड़ना पड़ रहा था. अच्छे ओहदे पर वह कुछ समय के लिए विदेश जा रहा था. रंजना को यह अच्छा तो नहीं लग रहा था पर वह इसमें कोई अड़चन नहीं आने देना चाहती थी. संयोग से राघव का जाना कुछ समय के लिए टल गया. रंजना खुश हुयी. ज़िंदगी में अब तक उसे किससे क्या मिला यह वही जानती थी और अब वो अपनी ज़िंदगी से बहुत प्यार करने लगी थी.

रंजना के गोद में एक सुन्दर सी बिटिया आयी. सभी बहुत खुश हुए. राघव से रंजना मिली तो कभी अपनी गोद में बेटी को देखती तो कभी राघव को देख रही थी. राघव उसके चेहरे पर आयी इस नयी खुशी को देखकर बेहद खुश था . मौक़ा पाकर रंजना ने उसे बताया की उसे अपनी ज़िंदगी में नए अहसासात और नयी खुशियां उन्हीं से मिली है और यह भी बताया कि यह खूबसूरत उपहार उसकी गोद में उन्हीं की दी हुयी नेमत है. रंजना ने कहा कि उसकी ज़िंदगी को खुशियों और बहारों से उन्होंने ही भरा है और यह बात भी सिर्फ वे दोनों ही जानते है. राघव की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे, क्या पूछे. अब उसे उन दोनों से अलग होना बहुत मुश्किल लगने लगा. वह रंजना से इस हद तक जुड़ जाएगा, बंध जाएगा, न सोचा था न जानता ही था पर यह अच्छा लग रहा था. रंजना ने उसे समझाया , उसे अपनी और अपनी नयी मेहमान का वास्ता देकर इस बात के लिए तैयार किया कि इस बंधन को वह अपनी ताक़त बनाए जिससे उसे भी ताक़त मिलेगी. वह नर्सिंग होम से घर आयी और एक हफ्ते बाद राघव को विदेश के लिए विदा किया.

दोनों के बीच संपर्क और बात चीत का सिलसिला चलता रहा. विदेश में उसका स्टे बढ़ाता गया और इस तरह साल दर साल बीतने लगा. रंजना के साथ रोहित, अमन और अंशिका थे पर राघव तो वहा बिलकुल अकेला ही था. अंशिका नाम राघव ने दिया था. रोहित से भी बातें होती रहती. जब भी रंजना राघव से आने के बारे में बातें करती तो राघव अपने ढंग से उसे समझाया करता . इस बीच रंजना की सोच तो पहले जैसी ही थी पर उसके जीने के अंदाज़ में बदलाव ज़रूर आ रहा था. रंजना अपना पूरा ध्यान अपने दोनों बच्चों पर देती थी. रोहित और उसके बीच के सम्बन्ध सतही तौर पर तो सामान्य थे पर रंजना को यह लगने लगा था कि उन दोनों के संबंधों की एक कड़ी राघव भी बन गया था. ऐसा उसे इसलिए लगता था क्योंकि जब भी रोहित के साथ होती तो राघव को अपने अहसासों से अलग नहीं कर पाती थी. कुछ समय तक तो ऐसा चलता आ रहा पर धीरे-धीरे रंजना को लगने लगा कि इस तरह वो रोहित के साथ न्याय नहीं कर रही है जब कि रोहित अब रंजना को पहले से ज़्यादा खुश और एक्टिव महसूस करता था और उसे यह अच्छा भी लगता था. रंजना एक अजीब तरह की कशमकश महसूस करती. केवल रोहित से उसे खुशी तब तक नहीं मिलती जब तक उसे राघव के पास होने का अहसास उसका साथ नहीं देता. अब उसे डर भी लगने लगा कि कहीं अनजाने में कुछ ऐसा न हो जिससे उसके मन की सच्चाई का अनुमान रोहित को हो जाय. शायद इसलिए भी अब रोहित के प्रति उसके व्यवहार में बदलाव आने लगा और धीरे-धीरे वह कोई बहाना बनाकर रोहित से दूर रहने लगी. मगर वह इस बात का भी ध्यान रखती थी कि उसके इस बदले हुए व्यवहार से रोहित पर कोई असर न पड़े और वह अकेलेपन या खालीपन महसूस करे. इसीलिये उसकी सारी ज़रूरतों पर वह ध्यान देती थी और भावनात्मक रूप से उसे सहारा और साथ देने की भी कोशिश करती थी.

अपने प्रयास में वह कामयाब रही. सब कुछ उसका रहन- सहन, बात-व्यवहार पहले जैसा ही रहा. उसकी सोच और व्यवहार में जो बदलाव आया भी था उसका ताल्लुक बस रोहित और राघव से था ज़रूर पर उसने किसी को बतलाया नहीं. वह पहले जैसी ही खुश थी. इस तरह समय बीतता रहा. जब समय को पंख लग जाते हैं तो उसके छोटे या लम्बे होने का अहसास कभी होता है और कभी नहीं भी होता. राघव के जब वापिस आने का समय हुआ तो उसके गए दस साल पूरे हो रहे थे. उसके आने की खबर से सभी बहुत खुश थे.

राघव वापिस आया तो अंशिका दस साल पुरी कर चुकी थी. अमन बड़ा हो गया था. रोहित पहले से ज्यादा संजीदा और गंभीर लगने लगा था. रंजना के चहरे पर पहले से ज़्यादा चमक थी. उसकी पर्सनैलिटी में निखार आ गया था. उसे राघव भी पहले से ज़्यादा आकर्षक लग रहे लग रहे थे. उसके चहरे पर तेज और बढ़ गया था. उसके लहजे में अब वजन बढ़ गया था. जो सबसे बड़ा परिवर्तन राघव को लगा वह था उसके गले में रुद्राक्ष की माला जिससे उसके व्यक्तित्व में और निखार आ गया था. उसके मन में राघव के लिए सम्मान और जगह दोनों ही बढ़ गया था. राघव उसे एक सम्पूर्ण पुरुष होने के अलावा एक विलक्षण व्यक्तित्व मानने लगी थी. अमन ने तो पहले ही उन्हें देखा था और अपनापन भी पाया था और अंशिका ने तो बस सुना ही था, देखी और मिली तो ऐसा नहीं लगा कि वह उन्हें पहले से नहीं जानती और मिली थी. राघव को उससे मिलकर कैसा महसूस हुआ होगा यह राघव के अलावा रंजना भी समझ रही थी.

राघव के मन में रंजना को लेकर कुछ सवाल उठ रहे थे. वह इस बारे में रंजना से कुछ कहता उससे पहले ही मौक़ा पाकर उसने राघव को बताया कि अंशिका के जनम के बाद वह कभी भी उसे अपने से अलग नहीं कर पायी . उसने स्वीकार किया कि जब कभी वह रोहित के साथ होती तो राघव को नहीं भूल पाती थी. दरअसल , वह राघव को मन से कभी अलग नहीं कर पायी और फिर काफी कोशिश के बाद भी जब वह नाकामयाब रही तो उसने तय किया कि वह रोहित के साथ अपने रिश्ते को नए ढंग से देखेगी और जीयेगी .

रंजना ने स्वीकार किया कि उसने एक संकल्प के रूप में रुद्राक्ष धारण किया है. इस संकल्प के दो पहलू थे. एक ओर वह चाहती थी कि राघव के प्रति सम्मान और समर्पण का संकल्प उसका संबल बने और दूसरी ओर वह उसी मन से रोहित से पत्नी के रूप में जुडी भी रहना चाहती थी और इसके लिए भी उसे ताक़त की ज़रूरत थी. मन की शान्ति और तन की मर्यादा के लिए ही उसे स्वामी जी ने यह माला मन्त्र के रूप में दिया था जो अब उसके गले की शोभा बढाने के अलावा उसके समर्पण और निष्ठा का प्रतीक था.

रंजना की बातें राघव को बहुत अच्छी लगी. अपने मन की बात भी वह उसके सामने रखने को आतुर था ही इसलिए कहने लगा कि उसके मन पर किसी तरह का बोझ नहीं रहना चाहिए . राघव खुद यह मानता था कि ज़िदगी में अनजाने में कुछ अनचाहा हो भी जाए और उसे लेकर मन में कोई पश्चाताप, ग्लानि या क्षोभ न हो तो वह गुनाह नहीं है. संयोग से रंजना की सोच राघव की सोच जैसी ही थी.

रंजना और राघव को एक दूसरे पर पूरा भरोसा था,गर्व था,एक दूसरे को अपनी ताक़त समझते थे, कमजोरी नहीं. रोहित और रंजना के परिवार का ही वे एक हिस्सा बन चुके थे. दोनों बच्चे रोहित और रंजना के अलावा राघव से भी भरपूर प्यार और दुलार पाते थे. राघव को कभी ऐसा नहीं लगा कि वह अकेला है. सभी के लिए ज़िंदगी खूबसूरत थी, दुनियाँ ख़ुशनुमा थी.

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  1. शब्दों और कथानक पर सशक्त पकड--
    अनवरत बहती हुई समझदारी या स्वार्थ भरी कथा --
    अनिर्णय की स्थिति || सभी खुश तो मेरे दुखी होने का कोई कारण भी नहीं |

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