शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

हिमकर श्याम की ग़ज़ल

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बस्‍ती दर बस्‍ती भीड़ का छलावा है

बंद हैं खिड़कियां, ज़बाँ पे ताला है

 

बांटी जायें चाहे लाख खै़रातें

जरूरत यहां की सिर्फ एक निवाला है

 

ख़ु़श्क हो गईं नदियां, सिमट गए सागर

और बहती गंगा भी अब एक नाला है

 

जिस्‍म में रूह, रूह में गहराईयां हैं

ख़ामोशी है, बेबसी का हाला है

 

थम गयी बाजारी उमंगों की रफ्‍़तार

सरमायादारी का पिटा दिवाला है

 

बैचेन शहर की ये अजब खु़शलिबासी

ज़श्न है कोई या ग़मों की माला है

 

क्‍यों घबराता तूफां से बलाओं से

देश को हमारे हादसों ने पाला है

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हिमकर श्याम

द्वारा ः एन․ पी․ श्रीवास्‍तव

5, टैगोर हिल रोड, मोराबादी,

रांची ः 8, झारखंड।

3 blogger-facebook:

  1. बैचेन शहर की ये अजब खु़शलिबासी
    ज़श्न है कोई या ग़मों की माला है

    वाह वाह वाह !!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेहतरीन गज़ल , मक्ता तो लाज़वाब है , मुबारकबाद।

    उत्तर देंहटाएं
  3. गम ने क्या खूब जिंदगी में निभाई है
    गम दर गम ने ही तो हिमम्त बढाई है!

    उत्तर देंहटाएं

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