प्रभुदयाल श्रीवास्तव की हास्य व्यंग्य कविता - भ्रष्टाचारीजी की आरती

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भ्रष्टाचारी-जी की आरती

तेरी हर रोज विजय होवे
हे भ्रष्ट तुम्हारी जै होवे|


दिन दूनी रात चौगुनी अब
ये रिश्वत बढ़ती जाती है
नेता अफसर बाबू की तिकड़ी
मिलजुलकर ही खाती है
धोती कुरता टोपी वाले
जब नेताजी बन जाते हैं
ये बिना किसी डर दहशत के
ये रिश्वत लप-लप खाते हैं
खाने पीने में हर नेता
संपूर्ण तरह निर्भय होवे|


तुम चारा तारकोल सड़कें
यूं खड़े खड़े खा जाते हो
अरबों खरबों डालर यूं ही
तुम मिनटों में पा जाते हो
पुलों बांध नहरों में भी तुम
गोता रोज लगाते हो
हीरे मोती मानिक पन्ना
तुम खोज खोज कर लाते हो
ये खोज तुम्हारी हे प्रियतम
नित नूतन नव अभिनव होवे|


जब घर से दफ्तर जाते हो
मोटी रिश्वत पा जाते हो
जब तक न अच्छी रकम मिले
तुम फाइल‌ नहीं सरकाते हो
तुम पेड़ लगाने में खाते
कटवाने में भी खा जाते
तुम कर्ज दिलाने में खाते
पटवाने में कुछ पा जाते
रात तुम्हारी सुंदर हो
और दिवस पूर्ण सुखमय होवे|


दाल चावल गेहूं दालों में
कंकड़ तुम मिल‌वाते हो
धनिया में लीद मिर्च में रेती
मिला मिला खिल‌वाते हो
नकली पानी नकली दारू
तुम दुनिया को पिलवाते हो
सत्ता को अपनी मर्जी से
आगे पीछे चलवाते हो
सदा पक्ष मे तेरे ही
हे भ्रष्ट देव निर्णय होवे|


ये भ्रष्टाचार सनातन है
हम सदियों से खाते आये
काम किया तो बक्शीसें
हम बदले में पाते आये
राजा रानी के समय प्रजा को
बहुत इनामें मिलती थीं
काम करो थोड़ा सा भी
ढेरों सौगातें मिलती थीं
यह परम्परा निभती जाये
जनगण मन मंगलमय होवे|


वैसे तो अंतर्यामी हो
तुम पद के लोलुप कामी हॊ
तुम तस्कर हो तुम गुंडे हो
कहते हैं डाकू नामी हो
तुम बच्चों को हर लाते हो
तुम वृद्धों को उठवा लाते
और फिरौती लेकर के
तुम लाखों यूं ही पा जाते
तेरी निष्ठा पर दुनियां को
न किसी तरह संशय होवे|


तुम थल में भी इतराते हो
और जल में भी लहराते हो
जब भी मर्जी होती फौरन
तुम अंबर में उड़ जाते हो
तुमने अरबों खरबों डालर
रखवाये हैं स्विस बैंकों में
कभी कभी रखवा देते
बोरों में गद्दों टेंकों में
सुर ताल तुम्हारे ठीक रहें
सरगम की सुंदर लय होवे।

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1 टिप्पणी "प्रभुदयाल श्रीवास्तव की हास्य व्यंग्य कविता - भ्रष्टाचारीजी की आरती"

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