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अनीता मिश्र की लघुकथा - माफीनामा

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‘‘तुमसे पचास बार कहा है बिटिया तुम अपने आफिस के लोगों को घर न बुलाया करो।'' दादी ने काफी तैश के साथ अनुराधा से कहा ।

‘‘आफिस के लोग या कोई मुसलमान दोस्‍त........ साफ-साफ क्‍यों नही कहती ?''

हां यह समझ लो मुसलमान हमें पसन्‍द नही है । एक मिनट के विराम के बाद दादी फिर शुरु हो गई ............ ‘‘फ्रिज की बोतल उसे पकड़ा दी मुंह लगाकर कैसे गटर-गटर पानी पी रहा था । अब मुझे सारे बर्तन अगिंयाने पड़ेंगे । तब जाकर शुद्धि होएगी'' चुप रहो दादी, जावेद ने वैसे ही पानी पिया जैसे हम सब लोग पीते हैं दूर से........... पता नही तुम्‍हारा घर, बर्तन सब अपवित्र क्‍यों हो जाता है ।

‘‘देखो बिटिया तुम नये जमाने की हो तुम खाओ उसका झूठन हमारा धर्म बुढ़ापे में नष्‍ट न करों । ससूरे कई कई दिनों नहाते तक नही हैं ..........।''

‘‘बस करो दादी, सौ बार सुन चुकी हूं तुम्‍हारी बेसिर पैर की ये दलीलें'' पैर पटकते हुये अनुराधा वहां से चली गई ।

‘‘अनु तुम्‍हारी दादी मुझे पसन्‍द नहीं करती हैं ? मेरे आने से तुम्‍हारी घर की वाइब्रेशन बदल जाती है ।'' जावेद उसकी तरफ देखे बिना बोल रहा था ।

‘‘जावेद तुम यह सब जानते हुये मुझसे क्‍यों पूछ रहे हो ? मैं खुद शर्मिदा हूं । तुम्‍हारे साथ या किसी भी इंसान के साथ इस तरह के व्‍यवहार से एक चुप्‍पी के बाद अनुराधा ने कहा............. जावेद मैं तुमसे इस तरह की सोच रखने वाले लोगों की तरफ से माफी मांगती हूं इतना कहते हुये अनुराधा ने जावेद के हाथ से गिलास लेकर बचा हुआ सारा पानी पी लिया।

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बहुत अच्छी लगी यह लघु कथा ... सोच बदलनी ही चाहिए

"......अनुराधा ने बचा हुआ पानी पी लिया ........." मेडिकल साइंस की मानें तो संक्रामक रोगों पर अंकुश न हो पाने का एक बहुत बड़ा कारण यह भी है. रोज न जाने कितने नए एंटीबायोटिक्स मार्केट में आ रहे हैं पर रोगों पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा. कुछ दशक पूर्व हमने मान लिया था कि राजयक्ष्मा पर हमने विजय पा ली ...पर आज पहले से भी बदतर हालत है ...कारण है हमारी आधुनिक अवैज्ञानिक सोच. आधुनिकता के चक्कर में हम वैज्ञानिक तथ्यों को भुलाते जा रहे हैं. आप किसी भी अस्पताल के ओपरेशन थियेटर में जा कर देखिये वहाँ छुआछूत के बिना काम ही नहीं चलेगा. छुआछूत में ज़रा भी लापरवाही हुयी नहीं कि सेकेंडरी इन्फेक्शन हुए बिना नहीं रहेगा. बात मुसलमान की नहीं है .......सोशियल एंड कम्म्यूनल हाइजिन की है. इसे समझना पडेगा. जहाँ तक मुसलमान होने का विषय है .....उनकी ओर से एक विचार यह भी है कि भारत को भ्रष्टाचार से मुक्त करने के लिए इसे इस्लामिक देश बना दिया जाना चाहिए....वे इसी लिए धर्मांतरण पर अधिक जोर दे रहे हैं. आपसे निवेदन है कि "हल्लाबोल" पर आयें और कुछ वास्तविकताओं से भिज्ञ हों.

Deepak Mishra Jaipur

Acchi Hai Ye Har ghar Ki Katha Hai.Per Soch Badalni Chahiye

अवश्य ....सोच बदलनी चाहिए. पर उसकी दिशा भी तय की जानी चाहिए. आज़ादी के इतने सालों बाद भी सोच की दिशा तय नहीं हो सकी अभी तक. हम हिन्दू-मुस्लिम का भेद मिटाने पर तुले हैं ...और इसी देश में मुगलिस्तान बनाने की साजिशें चल रही हैं ...यह फिरकापरस्ती की बात नहीं है विदेशी आंकड़े जो बताते हैं वे होश उड़ाने के लिए काफी हैं. हम हिन्दू-मुस्लिम-इसाई के भाई चारे की बात करते हैं और वे केवल और केवल धर्मांतरण की साजिशें करते हैं. कोई उदारवादी हिन्दू यह क्यों नहीं सोचता कि देश की सीमाएं असुरक्षित क्यों हैं ? स्वतन्त्र भारत के कई जिले हिन्दू बहुल से इसाई बहुल और मुस्लिम बहुल कैसे हो गए ? दादी की सोच को पुरातन पंथी कह देना सहज है पर दादी की दूरदर्शिता को पहचान पाना सबके वश के बात नहीं है. खेद है कि वैचारिक रूप से हम और हमारी नयी पीढी कितनी भटकी हुयी है. कथा लेखिका यह स्पष्ट करने की कृपा करें कि क्या जावेद का जूठा पानी पीने से ही हम उदारवादी हो जायेंगे ? यह कैसी उदारता है जो मेडिकली एक एब्यूज्मेंट भी है और आर्ष परम्पराओं का उपहास भी. हम कट्टरता की बात नहीं करते पर इस्लाम के नाम पर पूरे विश्व में जो भी हो रहा है उससे अपनी सुरक्षा की बात तो कर ही सकते हैं. अनीता जी ! शायद आपने किसी दंगे को नहीं झेला है कभी.....शायद मुसलमानों द्वारा हिन्दू लड़कियों के बलात्कार अभियान से अनभिज्ञ हैं आप......शायद इससे भी अनभिज्ञ हैं आप कि भारत को इस्लामिक कंट्री बनाने के लिए क्या-क्या षडयंत्र किये जा रहे हैं. और आप हैं कि जावेद का जूठा पानी अनुराधा को पिलाकर एक खोखली, अवैज्ञानिक, और अव्यावहारिक महानता को मंडित कर रही हैं.

...kaushlendra jee mai aapke vicharo se bilkul bhi sahemat nai hu.....mujhe lagta hai aapko bhi apni soch badlni chahiye....aap dadi ke sath anuradha ke doprdarshita ko bhi samjhe ..baat joota pani peene ke nahi hai ..pani prateek hai...baat soch todne ke hai.....story mujhe achi lagi...

शिखा जी ! ब्लॉग एक खुला मंच है जहां हर किसी का सहमत होना अनिवार्य नहीं है. सब सहमत होते तो विमर्श कैसे हो पाता. हो सकता है कि इस विमर्श के माध्यम से हम या आप अपनी सोच को बदलने में समर्थ हो सकें. मूल बात पर आते हैं ....मुझे पता है कि यह लघु कथा एक फिक्शन है जिसमें सारी बातें प्रतीकों के माध्यम से ही कही गयीं हैं. पर ये प्रतीक ही हैं जो हमारे विचारों को अभिव्यक्त करते हैं. लेखन एक ऐसा अभिलेख है जिसके प्रत्येक शब्द पर समालोचना होती है. कोई भी कथा पाठक पर हकीकत जैसा ही प्रभाव डालती है. चलिए अब आप मुझे बताइये कि मुझे अपने किस विचार को बदलने की आवश्यकता है ? क्या वैचारिक परिवर्तन के लिए जूठा पानी पीना उचित है ? (ध्यान रखियेगा, प्रतीक निर्दुष्ट होना चाहिए.) यहाँ किस प्रकार का वैचारिक परिवर्तन अभीष्ट है ? क्या मानवीय भाईचारे की स्थापना के मूल्य पर मुस्लिम षडयंत्रों की उपेक्षा कर देनी चाहिए ? अनुराधा की दूरदर्शिता को स्पष्ट करिए भला ...इसका लक्ष्य क्या है ?
शिखा जी ! यवन प्रवेश के समय गुजरात के राजा आम्भिदेव ने इसी उदारता के कारण उनका विरोध नहीं किया और आज हालत यह है कि देश के तीन टुकड़े तो हमारे आपके देखते-देखते हो चुके हैं ....देश का पूर्वांचल ईसाई बहुल होने के कारण पृथक राष्ट्र के लिए कमर कस कर तैयार है. उत्तरी भाग इस्लामिक कारीडोर बनने की और अग्रसर है .... और यह हो रहा है धर्म के नाम पर. आप कैसी दूरदर्शिता देख रही हैं अनुराधा के कृत्य में ? क्या यह कि अभी इस देश के और भी कई टुकड़े हो जाने चाहिए , उदारवादिता के खोखले आदर्श के लिए ? गांधी की उदारवादिता ने इस देश में जो बीज बो दिए हैं उनके खूनी फल खाने के लिए यह देश बाध्य है.....अब और उदार वादिता इस देश को सह्य नहीं होगी. आप यदि कभी हिन्दू-मुस्लिम दंगे की शिकार नहीं हुयी हैं तो मेरी भावनाओं की गहराई को समझ नहीं सकेंगी.

कहानी है तो बड़ी सुहानी!! उससे भी बड़ा है वह प्रतीक कि कैसे सोच बदली जाती है। भला किसी को कुछ ज्यादा ही स्वच्छता शुद्धता का ध्यान रखनें का व्यक्तिगत अधिकार किसने दिया?

अगर हम सफाई और हाइजिन पसंद है, और हमारे मित्र की आदतें गंदे रहनें में है। तो हमारे मित्र की आदतें सुधारने की बजाय सोच हमारी बदलनी चाहिए? कमाल है? हमें स्वच्छता त्याग कर मित्र के गंदले में घुल जाना चाहिए। जूठा पानी पीने की तरह!!

Anita G Ap ke dwara Rachi hui ye Laghu Katha "Mafinama" Bahut Sundar hai Bhagwan ne to is shrishty ki sanrachna ki hai, insan banaya hai insan ne sarhade banayi aur insan ko un sarhado me dharm ke nam par vibhajit kar diya hume apni ye soch badalni chahiye .....

Anita G Ap ke dwara Rachi hui ye Laghu Katha "Mafinama" Bahut Sundar hai Bhagwan ne to is shrishty ki sanrachna ki hai, insan banaya hai insan ne sarhade banayi aur insan ko un sarhado me dharm ke nam par vibhajit kar diya hume apni ye soch badalni chahiye .....

धर्मांधता एक ऐसा मनोतंत्र है जो विज्ञान के सामने जब हारता तो उसकी तमाम उपलब्धियों की व्याख्या अपने हिसाब से कर लेता है। जैसे अगर कोई कहे कि सूरज के सामने जल अर्पण (पानी गिराने नहीं...!!!) से अब तक क्या लाभ हुआ है या क्या लाभ होता है तो जवाब यह आता है कि सूरज की रोशनी जब गिरते हुए जल (पानी नहीं...!) की धार को पार करके शरीर पर पड़ता है तो बड़ा फायदा पहुंचाता है। यानी मेडिकल साइंस को यह घोषणा कर देनी चाहिए कि किसी भी रोगी को सुबह उठ कर सूरज को जल अर्पित करना चाहिए। लेकिन वे लोग क्या करें जिनके धर्म में सूरज को यह हैसियत प्राप्त नहीं है और सूरज केवल प्रकृति का एक उपादान है? लेकिन खैर... व्यवस्था ने अपने बनाए रखने के लिए जितने उपाय किए हैं, उनमें से एक यह भी है कि जहां विज्ञान और तर्क की बात की जाए, वहां आस्था के ही वैज्ञानिक होने की मुनादी करना शुरू कर दो।

बचा हुआ पानी, यानी जूठा पानी। जूठा पानी पीना, यानी खुद को उस व्यक्ति से निम्न हैसियत का स्वीकार, जिसके पीने से पानी बचा रह गया। इस निम्न या उच्च हैसियत का विज्ञान समाज के किस वर्ग का हित साधता रहा है और कितना वैज्ञानिक है, इसे शायद केवल वही लोग समझते हैं, जो अपनी उच्च हैसियत के फर्जी गुरूर में जीते हैं और किसी भी कीमत पर उसे बनाए रखना चाहते हैं।

ससुरे कई दिनों तक नहाते नहीं हैं; चार-चार शादियां करते हैं; पाकिस्तान के जीतने पर तालियां बजाते हैं; गंदगी में जीते-खाते हैं... आदि-आदि-आदि-आदि... ये सारी अंधताएं दादी के ऐसे ही दुराग्रहों के फार्मूलों से पैदा हुई हैं। वे कौन-से कारण हैं कि किसी जावेद के बोतल से दूर से भी पानी पीने के बाद दादी को सारे बर्तन अगियाने पड़ते हैं? क्या अगियाने के बाद वह बर्तन इतना शुद्ध हो जाता है कि उसमें दादी फिर से पानी पी सकती है और घर में गंगाजल छिड़कने से वह पवित्र हो जाता है? सजीव तो सजीव, निर्जीव चीजों के भी पवित्र और अपवित्र होने के विज्ञान के पीछे कौन-सा मनोविज्ञान काम करता है?

बहरहाल, बचा हुआ पानी पीने से कोई संक्रामक रोग दूसरे में फैल सकता है। लेकिन एंटीबायोटिक्स से लेकर दुनिया की तमाम महान खोजों के बावजूद अगर रोगों पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा तो उसमें कितने रोगों के बेलगाम होने के लिए जावेद के ग्लास में बचा हुआ पानी पीना है? अगर कोई अनुराधा अपने भाई-बंधु-दोस्त-पिता अनुराग के ग्लास में बचा हुआ पानी पी लेती है तो वहां यह "संक्रामक-फार्मूला" काम क्यों नहीं करता, बल्कि में इसे लेकर कोई सवाल भी क्यों नहीं उठते? राजयक्ष्मा पर विजय पा लेने का भरम क्यों टूट गया? उसके लिए किस जावेद के ग्लास में बचा हुआ पानी जिम्मेदार है? (हिंदू "वैज्ञानिकता" (दादी का विज्ञान) यही कहती है कि दुनिया के सभी जावेद को टीबी है और वह पानी पीते हुए जानबूझ कर उसमें अपने टीबी के जीवाणु छोड़ देता है, ताकि अनुराधा को टीबी हो जाए...)

अगर कोई सोच अवैज्ञानिक है तो वह आधुनिक कैसे हुई? क्या धर्म की सीमाओं को धता बता कर किसी जावेद को इंसान मानना एक अवैज्ञानिक सोच है? जावेद के ग्लास में बचे पानी के बरक्स संक्रामक रोगों और अस्पताल के ऑपरेशन थियेटर के छुआछूत के उदाहरण पर पता नहीं हंसा जाए या रोया जाए। इसके बाद कौशलेंद्र जी जब कहते हैं कि बात मुसलमान की नहीं है... सोशल एंड कम्युनल हाइजिन की है- तो आखिरकार वे पूरी तरह खुल जाते हैं और उनके "वैज्ञानिक सोच" का झीना पर्दा भी शीशे की तरह पारदर्शी हो जाता है।

इसके बाद वह शीशा भी टूट जाता है जब वे "उनकी ओर से..." जैसे जुमले के साथ भारत के इस्लामी देश बना दिए जाने के प्रति अपना डर जाहिर करते हैं। जब कोई बात "उनकी ओर से..." हो रही है, तो वहां किसी "अपने" के लिए गुंजाईश ही कहां बची? जहां तक धर्मांतरण का भय है, तो इस हिंदू कहे जाने वाले समाज की अस्सी फीसदी से ज्यादा आबादी की जो सामाजिक हैसियत है, उसमें उन्हें केवल हिंदुत्व नहीं, दुनिया के तमाम मजहबों को खारिज़ कर देना चाहिए। धर्मांतरण से डरने वाले लोग सिर्फ वे हैं, जिनकी सामाजिक सत्ता इन्हीं अस्सी फीसदी से ज्यादा आबादी के बूते कायम रहती है। दुनिया के तमाम धर्म एक ही काम करते हैं- इंसान और इंसान को एक दूसरे से अलग कर देना, बांट देना...। और जो धर्म इंसान को खंड-खंड में बांट कर रख देता है, उसे सचेत रूप से खारिज़ करने की जरूरत है।

कहानी अच्छी है, अनिता बधाई की पात्र हैं। लेकिन दादी की सोच तो बहुत पहले बदल चुकी हैं। ऐसी दादी से मेरी कभी मुलाकात नहीं। मैं जिन दादियों से मिला हूं वो तो आओ रे अब्दुल तुम भी दो कौर ले लो... कहती हैं। ख़ैर, कहानी उस सामाजिक संस्कार को तोड़ने के लिए उद्वेलित तो करती ही है, जहां अभी भी धर्म के नाम पर कट्टरता और दूसरे धर्म के लोगों के प्रति घृणा जैसा भव बजबजा रहा है।

कौशलेंद्र जी जैसे लोग अब भी इसलिए अफसोस में जी रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि आज़ादी के इतने सालों बाद भी यहां सोच की (हिंदू) दिशा तय नहीं सकी है। इनके जैसे डरे हुए लोग दरअसल डरे हुए दिखते हैं, लेकिन होते नहीं हैं। ये ठगी का एक ऐसा तरीका है जिसके जरिए एक बड़े समुदाय के भीतर पैदा करके सामाजिक सत्ताएं अपनी तमाम बर्बरताओं को जायज करार देती रहती हैं। इन्हीं ठग-विज्ञान के कर्ताधर्ताओं के चिल्लाते-चिल्लाते गुजरात से लेकर अमेरिका तक मानकों के रूप में कायम हो जाता है और ऐसे लोग उसके बाद भी छाती पीटते हुए रुदाली गाते हैं कि देश को मुगलिस्तान बनाने की साजिशें चल रही हैं। विदेशी अध्ययनों में यह कहां बताया गया है कि इस देश के सामाजिक सत्ताधीशों की सत्ता की कुर्सी के पाए अब ढीले होने वाले हैं? नब्बे के दशक की शुरुआत में जो दिखा था, उस पर तो विजय पा लिया गया है! एक डरे हुए देश की सीमाएं हमेशा असुरक्षित रहती हैं। हिंदू बहुल इलाकों के ईसाई या मुस्लिम बहुल होने का सर्टिफिकेट पेश करने के लिए विदेशी नहीं, खालिस देसी आंकड़े ही देख लेने की जरूरत है और मेरा खयाल है, ऐसे झूठ का जवाब देने की भी जरूरत नहीं है।

दादी की सोच इतना दूरदर्शी है कि उसकी दूरदर्शिता को उनके सबसे पास रहने वाले लोग भी नहीं पहचान पाए और जावेद के ग्लास में बचा हुआ पानी पी लिया। नई पीढ़ी अगर भटकी हुई है तो मेरी कामना है कि उसे इसी राह पर और ज्यादा भटकते हुए और आगे जाना होगा। हां, केवल उदार होने के लिए नहीं, खुद को आईने में देख कर इंसान कहने के लिए भी। यह किसी पिछड़े और सड़ांध मारते हुए दिमाग में ही पल-बढ़ सकता है कि जावेद के ग्लास का बचा हुआ पानी पीकर अनुराधा खत्म हो जाती है। गुजरात जैसे "मिसाल" के बाद भी कोई हिंदुओं को दंगे का दर्द झेलने की दुहाई देता है, सैंकड़ों युवतियों को सिर्फ उनके मुसलमान होने के चलते बलात्कार किए जाने या किसी गर्भवती का पेट चीर कर उसके बच्चे को जिंदा आग में झोंक देने के तथ्य से आंख चुराता है तो उस पर तरस खाइए। हिंदुत्व, इस्लाम या ईसाइयत या किसी और धर्म के नाम पर विश्व में जो हो रहा है, उसे मोतियाबिंदी आंखों से देखने की नहीं, सही-सलामत आंखों से देखने की जरूरत है। वरना इसी तरह जिंदगी भर अपनी सुरक्षा को डरते रहना होगा, क्योंकि ऐसे लोग डरने के ही लायक हैं। और इसके बाद कौशलेंद्र महोदय ने जो कहा है, उस अंधता का जवाब देना दरअसल मूर्खता ही साबित होगी। इस "वैज्ञानिकता" से लैस तर्क-ओ-असबाब के लिए कौशलेंद्र महोदय को ढेर सारी "बधाई...!!!"

अगर जावेद को इंसान मानने के लिए किसी संक्रामक रोग या इनफेक्शन का खतरा उठाना पड़ता है, तो खुद को किसी भी कसौटी पर इंसान मानने वाले को यह "खतरा" उठाना पड़ेगा...। वरना वह हिंदू है, मुसलमान है, इसाई है, ब्राह्मण है, यादव है- कुछ भी है, लेकिन किसी भी हाल में इंसान नहीं है।

Deepak Mishra Jaipur

abhi Ek Sharve hua 1000000 Logo per ,to Pata Chala ki india ke top ten bhajn me 6 Shahir ne lekhe hai 4 Shakeel ke hai. 10 ke 10 Bhajan Mahbub khan ki filmo me hai, 10 ke 10 bhajan Rafi ji ne Gaye hai 10 ki 10 Filmo Me noushad ka Sangeet hai 10 ke 10 bhajan Dilip Kumar (yusuf Khan) per Filmaye Gaye Hai ,esliye Kaheta Hu.Such Badlni Chahiye

जहाँ अनीतियाँ मिश्रित हो जाएँ, घुल जाएँ .... वही तो आज की आधुनिकता है. :)
यदि अनीता मिश्र जी ने कौशलेन्द्र जी के पश्नों के उत्तर दे दिए तो ... बात आगे बढ़े...
मुझे प्रतीक्षा है... उनके उत्तरों की.... मैं भी तैयार हूँ... लगातार नज़र है.
.. ज़रा मंदिर होकर आता हूँ.

शेष जी की एक ही बात से सहमत हूँ कि "जो धर्म इंसान को खंड-खंड में बांट कर रख देता है, उसे सचेत रूप से खारिज़ करने की जरूरत है।"
शेष जी की शेष बातों से न तो सहमत हूँ और न उनका उत्तर देने की आवश्यकता समझता हूँ. क्योंकि उनकी भाषा शालीनता को त्याग कर विग्रह्य संभाषा की ओर बढ़ चली है. प्रतीत होता है कि वे विमर्श करने नहीं वाकयुद्ध करने आये हैं ....और युद्ध करना मेरे संस्कारों में नहीं है. कथा लेखिका ने अभी तक अपना कोई मंतव्य नहीं दिया है इसका अर्थ यह है कि वे इस विषय पर विमर्श की इच्छुक नहीं हैं.

यहाँ पर बात बड़ी सहज है किन्तु कई लोग असहज हो रहे है.बात जूठा पानी पीने की नहीं बात सिर्फ लोगों की सोच बदलने की है.मेरा मानना है की व्यक्ति को व्यक्ति के रूप में देखो इंसान पहले इंसान है फिर वो धर्मो के वर्गीकरण का शिकार है.यह लघुकथा यही सन्देश दे रही है कि जब हम इंसान बन के आये है तो इंसान ही रहने दो.

shekhar

अगर बात सोच बदलने की ही है तो कहानिया हमेशा हिन्दुओ की सोच बदलने वाली ही क्यों होती है, जबकि मैंने ऐसी दादी आज तक नहीं देखी, लेकिन ऐसी मुस्लिम बंधू देखे है जिन पर होली के रंग का एक कतरा भी गिर जाये तो मरने मारने पर उतारू हो जाते है, समझ नहीं आता सोच बदलने की प्रतीकात्मक कहानियो में सोच हिन्दुओ की ही क्यों बदली जाती है

बेनामी

अगर बात सोच बदलने की ही है तो कहानिया हमेशा हिन्दुओ की सोच बदलने वाली ही क्यों होती है, जबकि मैंने ऐसी दादी आज तक नहीं देखी, लेकिन ऐसी मुस्लिम बंधू देखे है जिन पर होली के रंग का एक कतरा भी गिर जाये तो मरने मारने पर उतारू हो जाते है, समझ नहीं आता सोच बदलने की प्रतीकात्मक कहानियो में सोच हिन्दुओ की ही क्यों बदली जाती है

आप का बलाँग मूझे पढ कर आच्चछा लगा , मैं बी एक बलाँग खोली हू
लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/

मै नइ हु आप सब का सपोट chheya
joint my follower

The people, who commented as literate, nationalist, rationalist as well as savior of a particular religion, make feel themselves trapped into description of symbols only or commenting for the sake of comment. The lady writer, I believe and feel, has written honestly after empathizing the feelings of the characters and situation of the story. No matter, it's fiction or true story.
The way, in which story was written, gives a feeling of synchronized flow and fluency of words used.

सिखाजी ये कैसी सोच बदले नि बात कर रही है जिसमे आप अपनी दादी को जो की आपकी सुभचिंतक है. उनका उपमान उन्हीके घर में कोई कर रहा है और आपको सोच बदले की बात कर रहीं है. वाकई सोच बदलनी चाहिए नहीं बदल चुकी है. शेषजी, अकबर महफ़ूज़ आलम रिज़वी, और बाकि लोग अब कहानी को थोडा बदल कर पढ़ें यहाँ लड़की मुस्लिम है और लड़का है जावेद की जगह पर जतिन (एक हिंदू) है. क्या आगे कि कहानी अब भी वही होगी.. मेरे कुछ सवाल है इसका जवाब है किशी के पास



मंदिरों के फंड मुसलमानों और ईसाईयों के कल्याण केल्लिये क्यों खर्च किया जाता है ? जब कि वे अपने पैसा मुक्त रूप से कही पर खर्च कर सकते है |



घोधरा कांड को आंधी तूफ़ान की तरह जब नही तब उडाया जाता है | जब कश्मीर से ४ लाख हिन्दुओ का सफाया किया गया | इसकी याद क्यों नही आती है ?

१९४७ में, जब भारत का विभाजन हुआ तो पाकिस्तान में हिन्दुओ कि जनसँख्या २४ % थी | आज १% के बराबर नही है | पूर्वी पाकिस्तान ( बंगलादेश) में हिन्दुओ कि जनसँख्या ३०% थी, आज लगभग ७% है | लापता हिन्दुओ का क्या हुआ ? क्या हिन्दुओ के लिए मानवाधिकार नही है ?

इसके विपरीत, भारत में मुस्लिम जनसँख्या १९५१ में १०.४% थी और आज १८% से ऊपर है | जबकि हिंदू कि जनसँख्या ८७.२०% थी जो २०११ में ८०% रह गयी है | क्या किसी राजनीतिक ने मुसलमानों से परिवार नियोजन के बारे कहा है ?

अब्दुल रहमान अंतुले को प्रसिद्द सिद्धि विनायक मंदिर प्रभादेवी मुम्बई का ट्रस्टी बनाया गया था | क्या एक हिंदू ( खासकर मुलायम या लालू ) कभी मस्जिद या मदरसा के ट्रस्टी बन सकते है ?

डॉ. प्रवीण तोगडिया को कमजोर आधार पर कई बार गिरफ्तार किया गया है | क्या जमा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी को जो आईएसआई होने का दावा और भारत विभाजन की वकालत करने वाले को कभी गिरफ्तार किया गया है ?

जब हज यात्रियों को सब्सिडी दी जाती है तो हिंदू को अमरनाथ और कैलाश मानसरोवर तीर्थ यात्रा के लिए टैक्स क्यों ?

अरबी भाषा को प्रमोट करने के लिए सरकार पैसे खर्च कर रही है | लेकिन संस्कृत पर क्यों नही ? क्या अरबी भाषा, संस्कृत के तुलना में अधिक राष्ट्रीय है ?

क्या आप को लगता है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश रहेगा यदि मुसलमानों का बहुमत हो जाय तो ?

हॉउस आफ कामंस, आस्ट्रेलिया संसद और ह्वाईट हॉउस आदि में जब दीपावली और जन्माष्टमी मनाया जाता है तो भारत के संसद में क्यों नही मनाया जाता है ? क्या हम संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया कि तुलना में अधिक धर्मनिरपेक्ष है ?

यदि सांप्रदायिक दंगे भारत में आर एस एस, विहिप, बजरंग दल आदि के कारण होता है तो “ पाकिस्तान, तुर्की, अफगानिस्तान, इंडोनेशिया, चेचन्या, चीन, रूस, ब्रिटेन, स्पेन, साईप्रस आदि में किसकी अजह से दंगे होते है ?” जब की वहाँ पर आर एस एस / विहिप नही है |

एक पूर्व राष्ट्रपति, दो पूर्व प्रधानमंत्रियों, साधुओ,और संतो द्वारा कांची के संकराचार्य की गिरफ्तारी के खिलाफ प्रदर्शन किया है | लेकिन मिडिया का कहना है कि “वहाँ बिलकुल कोई विरोध नही हुआ है”| क्या आप को लगता है कि केवल हिंसा ही लोगो की पीड़ा मापने का पैमाना है ?

क्या आप को विश्वास है कि इस्लाम और ईसाईयत को सर्वधर्म समभाव में विश्वास है ? यदि हाँ, तो धर्म रूपांतरण में विश्वास क्यों करते है ?
ईश्वर अल्लाह तेरे नाम – आप मुझे एक मुसलमान दिखाए जो इससे सहमत हो ?

क्या आप को नही लगता है कि “ सेक्युलर मुस्लिम एक मिथ्या नाम है ? एक व्यक्ति या तो सेक्युलर या मुसलमान हो सकता है, दोनों नही ? एक मुस्लिम ( जो केवल अल्लाह में विश्वास करता है) धर्म-निरपेक्ष(कई परमेश्वर में विश्वास) नही हो सकता है |

क्या आप जानते है कि “ तथाकथित धर्मनिरपेक्ष मौलाना वहीदुद्दीन, जब भारतीय सैनिक कारगिल में लड़ रहे थे तो, उनसे सैनिको के लिए प्रार्थना करने को कहा गया तो इंकार कर दिया ? क्योकि भारतीय सैनिक मुसलमानों से लड़ रहे थे ?” ( बाद में सोनिया और प्रियंका ने उसके अंतिम संस्कार में भाग ली थी )

ये कैसे होता है कि “ एक मुस्लिम परिवार मुख्य रूप से हिंदू इलाके में शांति से रहता है, जबकि एक मुस्लिम बस्ती में एक हिंदू परिवार ऐसा करने में सक्षम नही है ?

मुस्लिम बहुत क्षेत्रो में ईसाई मिशिनारिज क्यों नही सामाजिक सेवाए शुरू कराती है ? क्योकि वहाँ निवेश पर पर्याप्त फल नहीं मिलेगा |


एक विधायक, सी. पी. शाजी ने केरल विधानसभा में कहा कि “ वो हाथ काट दिया जायेगा, जो शरियत के एक अक्षर को छुयेगा” | क्या आप इससे सहमत है ?

अयोध्या मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने विश्व हिंदू परिषद पूछताछ की लेकिन बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी या आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड से सवाल नही की? क्या यह सुप्रीम कोर्ट का दुहरा मापदंड नही है ?

जब आप नरेन्द्र मोदी जैसे लोगो से तुच्छ आधार पर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा मांग रहे है तो आप क्यों नही जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री से इस्तीफा माँगते है ? जहां पर हजारों सैनिक आतंकवादियों द्वारा मार दिए गए है और तो और ४ लाख हिन्दुओ का सफाया कर दिया गया है |

जम्मू और कश्मीर का पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला एक ईसाई से शादी किया और वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला एक हिंदू लडकी से शादी करके आनंदित थे, लेकिन जब उसकी बेटी एक हिंदू लड़के से शादी कर ली तो उसका परित्याग कर दिया गया | क्या यही धर्मनिरपेक्षता का पहचान है ?

दिल्ली इमाम सैयद बुखारी के घोषणा थी कि तालिबान सभी मुसलमानों के लिए आदर्श है और ओसामा बिन लादेन नायक ? क्या आप इस धर्मनिरपेक्षता पर विचार करेंगे ?


बंगलादेश में हिंदू लड़किया पीटी जाती है, उनके साथ गैंग रैप किया जाता है | प्रतिदिन मंदिरों को जलने या नष्ट करने कि खबरे पढैते होंगे | क्या हमारे धर्मनिरपेक्षतावादी और मानवाधिकारी कार्यकर्ताओ को इनके लिए आवाज़ नही उठानी चाहिए ? क्या सिर्फ मुसलमानों के लिए ही मानवाधिकार है ?

क्या आप जानते है कि “ इस्लाम राष्ट्रवाद और राष्ट्रिय सीमाओ में विश्वास नही करता है | यह पूरी दुनिया को इस्लाम के तहत दारुल हरब से दारुल इस्लाम तक लाना चाहते है ?

मुहर्रम जुलूस हिंदू बाहुल्य क्षेत्रो से लाया जारहा है लेकिन हिंदू धार्मिक जुलूस मुस्लिम इलाको से अनुमति नही है क्यों ? क्या यह सम्रदायिक बटवारे को स्थायी नही करता है ?


मल्लापुरम ( केरल) में , एक डाक्टर ने पाया कि मुस्लिम महिलाओ कि तीन पीढियां बेटी-१३, माँ-२६ और दादी – ३९ सभी गर्भवती है तथा प्रसव के लिए भारती कराया | क्या आप को भी लगता है कि मुसलमानों के लिए परिवार नियोजन अनावश्यक है ?

२००२ में कर्नाटक सरकार मंदिरों द्वारा प्राप्त ७२ करोड रुपयों में से ५० करोड मदरसों को, १० करोड चर्च को, १० करोड मंदिरों को दिया गया | मदरसो (आतंकवादी कारखाना ) और चर्चो के विकास के लिए हिन्दुओ का पैसा क्या देना चाहिए ?

जब अफगानिस्तान में तालिबान, बुद्ध प्रतिमा को ध्वस्त कर दिया, तो टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा है कि यह बाबरी मस्जिदके विध्वंस की प्रतिक्रिया में था. क्या आप टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा के इस औचित्य से सहमत? जैसे को तैसा के लिए ठीक है? तो फिर तुम क्यों गोधरा कांड की प्रतिक्रिया में गुजरात दंगों की आलोचना करते हो ?

पांडिचेरी में एक मुस्लिम को दफनाने से इनकार कर दिया गया था क्योंकि वह प्रभु मुरुगा के लिए एक मंदिर का निर्माण किया था क्या आप को भी लगता है कि "धर्म एक दूसरे से नफरत नहीं सिखाते हैं"?
१९८९ में कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र में राजीव गाँधी ने घोषणा की कि “ अगर मिजोरम में कांग्रेस सत्ता में आई तो यहाँ बाईबल के अधर पर शिक्षाए दी जायेगी (?)” यदि यह सांप्रदायिक नही है तो क्या है ?

वर्ल्ड मुस्लिम अल्पसंख्य समुदाय के अध्यक्ष, कुवैत के शेख अल सईद युसूफ सयेद हासिम रिफाई को केरल में बिना वीजा के आने कि अनुमति दी गयी थी और उन्हें गिर्गिराफ्तर नही किया गया बल्कि केरल सर्कार के सरकारी दामाद की तरह खातिरदारी कि गयी और लेजाने लाने के लिए सरकारी कार कि व्यवस्था कि गयी थी | क्या यह राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने वाला कार्य है ?


पोप को भारत कि यात्रा को आमंत्रित किया गया था लेकिन नेपाल के राजा महेंद्र को नागपुर में १९६५ में मकरसंक्रांति समारोह में भाग लेने के लिए अनुमति नही दी गयी थी | क्या यही धर्म निरपेक्षता है ?

पाकिस्तान में छात्रों को शुरू से ही सिखाया जाता है कि हिंदु हमारे दुश्मन हैं, हिंदू से मित्रता कभी नहीं किया जा सकता है काफिरो (हिंदुओं) को मार देना चाहिए. क्या आप को अब भी लगता है कि दोस्ती पाकिस्तान के साथ संभव है?





पूजा में 'संकल्प' "भारत वर्षे , भारत कंडे......... के साथ शुरू होता है ...". ये क्या हैं? क्या आप को अभी भी लगता है कि अध्यात्मवाद और राष्ट्रवाद अलग कर रहे हैं ? ये राष्ट्र की दो आंखें है?

अध्यात्मवाद और राष्ट्रवाद भारत में अविभाज्य हैं.क्या आपको नहीं लगता कि अध्यात्मवाद के बिना भारत बिना आत्मा के एक शरीर की तरह हो जाएगा?

हिंदू धर्म में आप को सुधारको कि संख्या बहुत मिल जायेगी | अन्य धर्मो में क्यों नही पाई जाती है ? क्या इन्हें सुधारने कि जरुरत नही है कि सुधारे हुए है ?

जो लोग झूठा पानी पीनें के प्रतीक को इन्सान को इन्सान मानना कहते है। वे यथार्थ के लोपक है। दादी की मान्यता से जावेद को हेय समझा गया है तो अनुराधा नें समान इन्सानी दर्जा देने के बजाय उसे श्रेष्ठ स्थापित करने का प्रयास किया है। यह क्रूर बदले की भावना प्रदर्शीत करने का तरीका है न कि सोच बदलनें का।

द्वेष पूर्वक प्रतिशोध आक्रोशों से सोचें नहीं बदली जाती। बल्कि जिस सोच को अकारण हेय माना जाता है उस सोच में ऐसा द्वेष-भाव होना उस सोच के हेय होने का प्रमाण है।

अधिकांश हिंदू हमेशा से ही आदर्शमयी आभासी दुनिया में जीने को ही वास्तविकता मानते हैं. यहां लोगों ने बहुत सी आदर्शवादी बातें की लेकिन कौशलेंद्र जी, blogtaknik आदि के द्वारा उठाए गये प्रश्नों का जवाब ना तो लेखिका महोदया की तरफ़ से आया और ना ही उनके समर्थक टिप्पणीकारों द्वारा. सारी की सारी आदर्शवादी बातें मात्र हिंदुओं से ही अपेक्षित हैं...वाह जी वाह..यह कैसी दोहरी मानसिकता है कि "बाम्बे" की कहानी पर तो जगह-जगह मार-काट शुरु हो जाती है, लेकिन "माइ नेम इज खान" को सर माथे पर चढ़ा लिया जाता है... "दा विंसी कोड" पर तो प्रतिबंध लगाना जायज होता है लेकिन हिंदू भावनाओं को आहत करने वाले चलचित्रों, पेंटिंगों को कलाकार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में देखा जाता है.... अगर इन्हीं सब बातों को देखकर हम व्यथित हो जाते हैं, आम हिंदू व्यथित महसूस करता है, और आपको लगता है कि इस सोच को बदलकर आपकी तरह व्यापक सोच वाला बनें...तो हमें नहीं बनना... आपको आदत है, आंख-कान-नाक-मुंह बंद कर इस पापी पेट के लिए सबकुछ अनदेखा करने की...आप करें, आपकी सोच आपको मुबारक...

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दादी के मन में अज्ञानता का निवास था, जिसे सूझ-बूझ के साथ हटाया जा सकता था ! अनुराधा ने जूठा पानी पीकर दादी के प्रति आक्रोश ज़ाहिर किया है ! यह कार्य भावुकता से भरा हुआ है . समाज की सोच बदलने के लिए भावुक होकर नहीं अपितु विवेकपूर्ण आचरण की आवश्यकता ज्यादा है !

कहानी का अंत कुछ इस प्रकार से होना चाहिए था -- " दादी की बात पर आहात होने के बजाये दोनों के मुस्कुराकर दादी को देखा और जावेद ने आगे बढ़कर दादी के चरण स्पर्श किये ! प्रेम ने दादी के ह्रदय को पिघला दिया और उन्होंने स्नेह के साथ जावेद को गले लगा लिया.

किसी का भी जूठा पानी पीना , किसी भी कोण से स्वीकार्य नहीं है ! यह एक भावुकता भरा आचरण है , जिसके द्वारा न तो समाज की , न ही दादी की सोच को बदला जा सकता है.

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@अकबर महफ़ूज़ आलम रिज़वीजी

आप कहते है की कहानी उस सामाजिक संस्कार को तोड़ने के लिए उद्वेलित तो करती ही है, जहां अभी भी धर्म के नाम पर कट्टरता और दूसरे धर्म के लोगों के प्रति घृणा जैसा भव बजबजा रहा है। क्या आप दूसरे धर्मो के प्रति इस कहानी के पात्र अनुराधा के जैसे विचार रखते है.

अब खास आप और आपके समर्थक विचार वाले लोग थोडा बदलाव से कहानी को पढ़ें, जैसे:- इस कहानी में अनुराधा की जगह कोई अर्शिया या तब्सुमं है और जावेद की जगह जतिन या जयेश. अब कृपया टिप्पणी देने की कृपा करें ताकि आपके वास्तविक विचार हम समज सकें

एक फिल्म थी कुर्बान , यद्यपि वो फिल्म सफल नहीं रही परन्तु उस फिल्म ने लव जेहाद को उचित सिद्ध करने की कोशिश की थी और अब शायद इस कहानी से यही प्रयास किया गया है , क्या अगली कहानी में लडकी उस मुस्लिम के साथ जा कर फातिहा पढ़ लेगी ????

muzhe lagta hai ki samay aa gaya hai ki hum ithihas ke kaley panno ko zala kar naye siirey se shuruat karey, hindu ho ya muslim ho ilzam ke daur kabhi khatm nahi hongey, aankh ke badle aankh sari duniya ko andha bana degi, rahi baat muslmano ko badalne ki, to siksha ke pair mazboot banenegy to dono hi samudau samdrudha, sikshit aur khushal hoga. kahani ek pehal hai hindu ladki ki taraf se, meri film thi ek muslaman aadmi ki taraf se, dono oor se zab yeh pehal hogi to samasya zarur hal hogi, aisi ummed hai , insha allah, bhagwan sab theek karega.

शेषजी आपने लिखा है की:- गुजरात जैसे "मिसाल" के बाद भी कोई हिंदुओं को दंगे का दर्द झेलने की दुहाई देता है, सैंकड़ों युवतियों को सिर्फ उनके मुसलमान होने के चलते बलात्कार किए जाने या किसी गर्भवती का पेट चीर कर उसके बच्चे को जिंदा आग में झोंक देने के तथ्य से आंख चुराता है तो उस पर तरस खाइए। हिंदुत्व, इस्लाम या ईसाइयत या किसी और धर्म के नाम पर विश्व में जो हो रहा है, उसे मोतियाबिंदी आंखों से देखने की नहीं, सही-सलामत आंखों से देखने की जरूरत है। शेषजी क्या आपने कभी कश्मीर पर टिपण्णी की है. क्या कभी पाकिस्तान और बांग्लादेश में आज भी हिन्दुओ के साथ जो हो रहा है उस पर टिपण्णी की है. क्या आप कश्मीर में जाकर हिन्दुस्तान का झंडा फहरा सकते है. तो कम से कम गुजरात दंगो का जिंक न करें तो ही अच्छा है. आप को मुसलमानों पर हुए अत्याचार याद आ रहें है. पर क्या आप उसकी वजह गोधरा में ट्रेन में जिन्दा जलाये गएँ लोंग और उनके परिवार वालो का दुःख नहीं दिखता है. गुजरात में मुस्लिम बहुल इलाको में इलेक्ट्रिक मीटर की रीडिंग के लिए भी GEB के कर्मचारी नहीं जा पाते थे. रात तो रात दिन में भी इनके इलाको में जाने में डर लगता था. हर वर्ष रथ यात्रा पर झड़प होना आम बात थी, मुस्लिम बहुल इलाको में आपको कश्मीर जैसा माहोल आसानी से दिख सकता था. पर गोधरा कांड के बाद अब गुजरात में शांति है. आप गुजरात की शांति व्यवस्था, विकास देखे. मोतिया बिंद वाली बात छोडिये और मेरे ऊपर दिए गए सवालों का जवाब दें. जय हिंद, जय भारत..

मुझे लगता है कि "ब्लॉग तकनीक" की बात का जवाब देना अपनी बेवकूफी का विज्ञापन करना होगा। जहां तक सुज्ञ का मानना है कि "जो लोग झूठा पानी पीनें के प्रतीक को इन्सान को इन्सान मानना कहते है। वे यथार्थ के लोपक है" तो जब सुज्ञ जी कहते हैं कि जूठा पानी पीना एक प्रतीक है, तब फिर समस्या क्या है। बदलाव के रास्ते कैसे बनते हैं? महज ग्लास से पानी पीने पर दादी के व्यवहार के बाद जावेद के मन में जितने सवाल खड़े हुए होंगे, अनुराधा के पास उनका जवाब देने का क्या इससे बेहतर रास्ता था कि वह उसके ग्लास में छोड़ा हुआ पानी पीकर उसके सामने एकबारगी यह तस्वीर रख देती कि दादी का मतलब दुनिया नहीं है।

ग्लास में बचा पानी पीना महज एक प्रतीक है, और इसका मतलब यह तो कम से कम यह तो नहीं ही है कि अनुराधा (अनुराधा भी एक प्रतीक ही है) जावेद को खोज-खोज कर उसके ग्लास में बचा पानी पीती रहेगी। अनुराधा ने जावेद को श्रेष्ठ नहीं समझ कर उसे यह बताया कि वह जावेद होने के नाते अनुराधा से अलग प्रकृति का कोई जीव नहीं है।

सोच बदलने का तरीका आज तक न किसी ने आखिरी तौर पर न निश्चित कर दिया है, न यह कभी होगा। किसी भी व्यक्ति के भीतर जब जड़ता के विरुद्ध चेतना जागृत हो जाती है तो वह अपने तरीके से व्यवस्था की जड़ताओं के खिलाफ खड़ा होता है, उसे तोड़ता है। अनुराधा ने यही किया। उसके इस व्यवहार में कहीं भी द्वेष नहीं झलकता। वरना ग्लास में छोड़ा हुआ जो पानी उसने दादी की नजरों से अलग कहीं पी, वह दादी के सामने ऐसा करती। यों भी, दादी एक यहां एक जड़ व्यवस्था की प्रतिनिधि और उदाहरण हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं। यह प्रवृत्ति ब्लॉग तकनीक या ऐसे ही किसी दूसरे व्यक्ति में भी हो सकती है। उसे किसी भी तरह के सूझ-बूझ से दूर नहीं किया जा सकता, जैसा कि "जील" कहती हैं।

अनुराधा ने जूठा पानी पीकर दादी के व्यवहार के प्रति आक्रोश जाहिर किया, यह भावुकता से भरा हुआ होने के बावजूद उसकी जिम्मेदारी भी इसलिए थी, क्योंकि वह "दादी-प्रवृत्ति" से बहुत दूर निकल चुकी है। उसके विवेक ने ही उसे यह तात्कालिक रास्ता सुझाया, जिसके जरिए दादी के व्यवहार से जावेद के मन में उपजी कड़वाहट और दुख को उसने एक झटके में दूर कर दिया। "दादी-प्रवृत्ति" के सामने सिर झुका कर उसे विजय-बोध भले दे दिया जाए, उसका हृदय-परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।

बहरहाल, "किसी का जूठा पानी पीना किसी भी कोण से स्वीकार्य नहीं है या एक भावुकता भरा आचरण है"- जैसी बातें मानने की मानसिकता वाले तमाम लोगों से आग्रह है कि वे शबरी के जूठे बेर राम के खाने के प्रतीक के बारे में अपनी राय जाहिर करें।

ब्लॉग तकनीक महाशय, टिप्पणि के साथ अपना नाम जोड़ते तो जवाब देते और भी अच्छा लगता। ख़ैर, अर्शिया या तबस्सुम हो या अनुराधा.. फर्क नहीं पड़ता। हमारी कई मुस्लिम मित्रों ने हिन्दू लड़कों से प्यार और शादी भी की है। रही बात पानी पीने की तो आपको बता दूं, पानी ही नहीं दांत काटी रोटी भी हमलोग एक-दूसरे की खाते रहे हैं।
वैसे जवाब इसलिए नहीं दे रहा हूं कि आपके प्रश्न महत्वपूर्ण हैं। लेकिन लगा कि आप जिस जंगल में रह रहे हैं, वहां अभी यथार्थ की रोशनी नहीं पहुंची तो सोचा दिया पहुंचा दूं। कूढ़मगज़ मानसिकता और पुरानी सड़ी किताबों और मूर्ख मसीहों के बकवासों से इतर वास्तविक दुनिया को देखें और जीने की कोशिश करें और अगर ऐसा आपके लिए संभव नहीं है... तो फिर हम मात्र संवेदना ही प्रकट कर सकते हैं... हिन्दुस्तानी हैं... हिन्दुस्तान में ही रहिए...नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान और बंग्लादेश मत रटिए...

जी हाँ जूठा पानी पीना या एक ही थाली में खाना प्यार का द्योतक नहीं बल्कि संभावित संक्रमण को बुलावा देना है. दिव्या जी ( Zeal ) ने अच्छा विकल्प सुझाया है ! फिर भी लघुकथा मन को छूती तो है ही !

शेषजी आप कहते है की "ब्लॉग तकनीक" की बात का जवाब देना अपनी बेवकूफी का विज्ञापन करना होगा। अब मेरा जवाब सुने:- आपको विज्ञापन करने की क्या जरुरत है हम, लोग ऐसे ही समज जायेंगे. बात जड चेतन की है तो आपको एक वास्तविकता दिखाता हू.
आप यहाँ क्लिक करें.

अकबर महफ़ूज़ आलम रिज़वी अगर आप मेरे ऊपर दिए गए प्रश्नों के जवाब रखते हो तो मुजे नाम बताने में कोई तकलीफ नहीं है मेरा नाम है कपिल केसरानी. अब आप मेरे प्रश्नों का जवाब दें. और हाँ अभी आपने जो टाकिया का प्रयोग किया है उसे भूल से भी मुज पर मत आजमाओ. औ आप आगे कहते है की हिन्दुस्तानी हैं... हिन्दुस्तान में ही रहिए...नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान और बंग्लादेश मत रटिए. ठीक है आप हिंदुस्तान से सम्बंधित ही मेरे प्रश्नों का जवाब दें.

@जहां तक सुज्ञ का मानना है कि "जो लोग झूठा पानी पीनें के प्रतीक को इन्सान को इन्सान मानना कहते है। वे यथार्थ के लोपक है" तो जब सुज्ञ जी कहते हैं कि जूठा पानी पीना एक प्रतीक है, तब फिर समस्या क्या है।

शेष जी,

समस्या अभी शेष है। वाकई आप यथार्थ के लोपक ही है। मैने जूठा पानी पीना एक प्रतीक है कहा तो यह भी नहीं समझते कि प्रतीक किस बात का? अनुराधा नें प्रतीक बनाया उसे दादी-द्वेष का, अनुराधा नें प्रतीक बनाया उसे अपनें द्रोह का, अपनी स्वार्थी कानमाओं की विद्रुप विजय का!!

यह वही दुर्गुण है- ईर्ष्या, द्वेष,मनमानी, स्वच्छंदता और विद्रोह!! दुर्गुणों से समाज की मान्यताएं दृढ होती है। परिवर्तन नहीं आता। जिन दुर्गुणों का विद्रोह के नाम समर्थन कर रहे हो।

इस रचना में ऐसा कुछ बुरा नहीं लिखा गया रचना में दोनों पक्ष हैं दादी के ज़माने में धर्म कुछ विशेष मायने रखता था अधिक पूजा पाठ कोई कोई दादी तो अपने घर के लोगों को भी खाते पीते छूने नहीं देती थी पवित्र जल छिड़क के बैठना दूर से उन्हें भोजन देना और न किसी का जूठन खाना न खिलाना आम बात थी अब जमाना बदला है अगर दादी ने पवित्र रहने को कहा कोई बुरा नहीं सब पवित्र रहें नहायें धोएं साफ़ सुथरे रहें साथ बैठें साथ खाएं कोई आपत्ति कहाँ करता है आज होटल स्टेशन सब भरे पड़े हैं -
यहीं पर उस बालिका ने जो भी उसे बुरा लगा उसका प्रतिरोध किया और अब पहले वाली रीति रिवाज बदलने को कहा क्या बुरा हुआ सब का अपना मन मस्तिष्क सोच है एक कुछ बोली दूसरी कुछ -
किसी के साथ बैठ खाना -पीना ठीक है -लेकिन वही जूठन पानी पीना -वही जूठन खाना कतई जायज नहीं आइये रोग से बचें और शुद्ध रहें किसी को हे दृष्टि से न देखें !
विवाद किसी का हल नहीं एकता बहुत जरुरी होती है समाज के लिए -
भ्रमर ५

शुतुरमुर्गी प्रवत्ति लेकर आखिर जाना कहाँ चाहते हैं आप ?? जिन प्रश्नों के उत्तर नहीं होते हैं उनको तो फतवा शैली में ख़ारिज कर रहे हैं शेष जी यदि आप वास्तविकता को देखना नहीं चाहते हैं या देख नहीं रहे हैं तो इससे वास्तविकता बादल नहीं जाएगी इस तरह की "सांप्रदायिक सद्भाव" उत्पन्न करने वाली हर कहानी में लड़की हिन्दू और लड़का मुस्लिम क्यों होता है और किसी हिन्दू सिद्धांत को तोड़ कर ही ""सांप्रदायिक सद्भावना"" स्थापित क्यों की जाती है ??शायद इस लिए की अगर इस्लाम के बारे में कहा जाएगा तो कद और पद तो मिलेगा नहीं हाँ तलवारें और फतवे अवश्य निकल सकते हैं

दादी प्रवृत्ति, इंसानियत ..आदि बड़े बड़े शब्दों का प्रयोग किया गया.....बिना इनका वास्तविक अर्थ जाने...
---वास्तव में कहानीकार की अज्ञानता व अव्यवहारिकता का द्योतक ही है यह कथा....
---झूठा पानी पीना किसी भी प्रकार से उचित है ही नहीं, न हाइजेनिक न चिकित्सकीय द्रष्टि से, न पारिवारिक , व्यावहारिक व व्यक्तिगत दृष्टि से... ...यह भी सही है कि पात्र उलटे क्यों नहीं होते ....आखिर कथाकार ने मुस्लिम परिवार की कथा क्यों नहीं लिखी ...क्योंकि वह उस परिवार, समाज, धर्म, व्यवहार के बारे में स्वयं अज्ञान हैं, उनका ज्ञान सिर्फ तथाकथित आज़ाद ख्याली की सुनी सुनाई बातों पर आधारित है....आजकल आधुनिक दिखने व कहानी छपने व चलने के लिए इस प्रकार की कहानियां लिखने का शौक व चलन होगया है....
---तथाकथित एकता व आधुनिकता के लिए हम स्वास्थ्य, सामाजिक- पारिवारिक संरचना को नहीं छोड़ सकते...दोस्ती व प्यार कोई इतनी बड़ी महत्वपूर्ण क्रिया नहीं है कि आप समाज, परिवार, संस्क्रिरिति,धर्म,स्वास्थ्य सभी को भूल जाएँ...यह वास्तव में स्वार्थ है....प्रगतिशीलता नहीं ..
--- जहां तक मुस्लिम - हिन्दू की बात है...बहुत कुछ कहागया है जो काफी हद तक सही कथन व तथ्य हैं ....
---कौशलेन्द्र जी की सटीक व आवश्यक टिप्पणी पर अनावश्यक आक्षेप किये जा रहे हैं...अब समय आगया है कि हम झूठी प्रगतिशीलता को भूलकर राष्ट्रवाद, स्व-संस्कृति , स्व-धर्म पालन की सोचें...और झूठा पानी पीना बंद करें ....

@ "कूढ़मगज़ मानसिकता और पुरानी सड़ी किताबों और मूर्ख मसीहों के बकवासों से इतर वास्तविक दुनिया को देखें और जीने की कोशिश करें........"
रिज़वी जी !
कूढ़ मगज मानसिकता, पुरानी सड़ी किताबों, मूर्ख मसीहों की बकवासों की सूची दे देते तो सरलता होती. शुभ मानसिकता , बिना सड़ी हुयी ताज़ी किताबों और विद्वान मसीहों की भी सूची संलग्न कर दीजिएगा.
यह बहस एक पक्षीय होती जा रही है...कई लोगों के प्रश्नों पर रहस्यमय मौन कई और प्रश्न खड़े करता है. कपिल केसरानी की एक भी बात का तर्र्क सम्मत उत्तर नहीं दिया गया है.
शेष जी ने तो मुझे सड़ांध मारती हुयी मानसिकता वाला और ठग वैज्ञानिकता की आड़ में लोगों का शोषण करने वाला घोषित कर दिया है ..तो ऐसे अन्तर्यामी के समक्ष मैं क्या बोलूँ ...शेष जी आपको सादर नमन ...कोटि-कोटि नमन .....अनंत नमन ....... देखिये उनके वचन और भाषा की मृदुता ...."ये ठगी का एक ऐसा तरीका है जिसके जरिए एक बड़े समुदाय के भीतर पैदा करके सामाजिक सत्ताएं अपनी तमाम बर्बरताओं को जायज करार देती रहती हैं। ......यह किसी पिछड़े और सड़ांध मारते हुए दिमाग में ही पल-बढ़ सकता है"
दिव्या जी !
गज़ब ! बधाई हो और मेरा बहुत-बहुत आशीर्वाद .....इस कहानी के इतने उत्कृष्ट अंत के लिए. लगता है कहानी लेखन के लिए दिव्या को अपनी गुरू बनाना पडेगा. आज दिल खुश कर दिया आपने. मांगो बालिके ! क्या मांगती हो.....चलिए ब्लैंक चेक पर तथास्तु ! ! !
और अंत में .......कथा लेखिका को बधाई !
इतनी टिप्पणियाँ तो आज तक मेरे किसी भी आलेख या कविता पर नहीं की गयीं. किन्तु नेपथ्य में अंतर्ध्यान हो जाने को क्या आपकी एक रणनीति माना जाय ?

सुज्ञ जी,

आप विद्वता और प्रवाचक रोग से पीड़ित हैं और यथार्थ का इस रोग के चादर से लोप करना चाहते हैं। लेकिन यथार्थ है कि बार-बार सिर उठा कर खड़ा हो जाता है।

अगर आप ही भाषा में बात करूं तो क्या आप इतना भी नहीं समझते कि दादी एक प्रवृत्ति है और वह पांव छूने से नहीं बदल सकती, बल्कि एक ऐसे विजय-भाव से भर कर एक नया विद्रूप पैदा कर दे सकती है, जिससे पार पाना और ज्यादा मुश्किल होगा। और अगर इस प्रवृत्ति को उसकी हैसियत बताने के लिए अनुराधा को द्रोह का प्रतीक बनाया, तो वह एक सही रास्ता था, है। जब आप "यह भी नहीं समझते" का फतवा जारी करते हैं, तो आप ही इस कहानी से खोज लाते कि दादी को अनुराधा के द्वेष के दर्शन कहां हुए। क्या अनुराधा ने दादी को सामने खड़ा करके उसे चिढ़ाते हुए जावेद के ग्लास का बचा पानी पिया? नहीं, बल्कि कहीं बाहर उसने जावेद को यह भरोसा दिलाया कि दादी का मतलब दुनिया नहीं है। यह द्रोह है, और इसे मैं कम से कम जरूरी मानता हूं। उसे द्वेष या स्वार्थी कामनाओं के विद्रूप विजय के रूप में देखने के आप जैसों के अभ्यास ने ही दादी को जिंदा रखा है, वरना एक व्यवस्था के रूप में दादी कब की मर चुकी होती।

और हां सुज्ञ जी, ईर्ष्या, द्वेष, मनमानी, स्वच्छंता के साथ-साथ जब आपको विद्रोह भी उसी पंक्ति की कोई बात लगती है, जरा समझने की कोशिश कीजिएगा परिवर्तन अगर विद्रोह से नहीं आता, तो किससे आता है। दुर्गुण या सदगुण कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसे आखिरी तौर पर किसी ने तय कर दिया हो। यहां आप देख ही रहे हैं कि जावेद के ग्लास का बचा प्रतीक के तौर पर पी लेना बहुत सारे लोगों को कैसा लग रहा है। लेकिन यही सब (शायद आप भी) चुप रहेंगे जब शबरी के जूठे बेर राम के खा लेने का सवाल उठाया जाएगा।

जावेद-अनुराधा प्रसंग से नाराजगी का सिरा बहुत आगे जाता है। यही सिरा तथाकथित हिंदू समाज के उन नब्बे फीसद से ज्यादा लोगों को अछूत बनाए रखता है, जिन्हें अपने स्वार्थों की सत्ता बनाए रखने के लिए तो हिंदू कहा जाता है, लेकिन जैसे ही यह नब्बे फीसद आबादी अपने महज इंसान होने का हक मांगती है तो उन्हें उनकी जाति बता कर औकात दिखा दिया जाता है कि अछूतों का कोई हक नहीं होता। इस बिंदू पर बात अगर आगे जाएगी तो शायद बहुत सारे हिंदू मन को तकलीफ होगी। बहरहाल...

रही बात चिकित्सकीय और हाइजेनिक तर्क पर ग्लास का बचा पानी पीने की, तो अभी तक दुनिया भर के डॉक्टरों ने "फ्रेच किस" को नुकसान नहीं ठहराया है... (वैसे इस पहलू बात करना "अनैतिक" होगा...!!!)

:-)

शेष जी,

मैं आपके मानवीयता के सौहार्दपूर्ण प्रतिभाव को समझ सकता हूँ। मानवीयता के लक्ष्य को प्रेम और मधुर भावो से प्राप्त करने में विश्वास करता हूँ। सद्भावना पूर्ण समझाईस से सार्थक और टिकाऊ सफलता सम्भव है। इसीलिए दृढता से मानता हूँ वैर-विरोध, विद्वेष-विद्रोह बदला-प्रतिशोध से वांछित सफलता नहीं मिलती, और न परिवर्तन आता है। विद्रोह से अनवरत प्रतिविद्रोहपूर्ण परम्परा का सृजन होता है, जो कभी नहीं रूकता। विद्रोह को इसीलिए मैं उन अवगुणों के साथ ही निश्चित करता हूँ। इन प्रतीकों के बारे में मेरा यही कहना था। यदि मेरी प्रस्तुति से संदेश आप तक नहीं पहुंच पा रहा तो कहीं मेरे शब्दों में कमी रह गई।

हां मैं समझ सकता हूँ,कि दादी एक प्रवृत्ति है और वह पांव छूने से नहीं बदल सकती। मैने यह उपाय प्रस्तुत किया ही नहीं था। बल्कि मैं तो मानता हूं कि दादी का ईगो अगर पैर छू लेने से संतुष्ट होता है तो वह ईगो विजय-भाव से विद्रूपता ही पैदा करेगा। यहां भी वही द्वेष प्रतिशोध प्रवृति होगी। जिसका अनुराधा के मामले में मैं विरोध कर रहा हूँ।

विद्वता का तो पता नहीं, पर सदाचार प्रयोजन से सद्विचारों के प्रसार की अतिरेकयुक्त भावना है, आप उसे 'प्रवाचक रोग से पीड़ित' कहते है। मैं नहीं जानता यह रोग है, रोगी कब जानता है वह मानसिक रोगी है। पर मुझे तो यह रोग रास आ गया है। किन्तु इस प्रवाचक रोग को अछूत मान कर इससे दूरी रखनें का आपको पूर्ण अधिकार है।

सुज्ञ जी
आपके प्रतिउत्तर से आपके संतुलित व्यक्तित्व का भान हुआ... लाजवाब कर देने वाली शैली... अद्भुत.
अगर तार्किकता भी संक्रामक रोग कही जाए तो ऐसे रोगियों का सत्संग मैं भी करना चाहूँगा.

@"लेकिन यही सब (शायद आप भी) चुप रहेंगे जब शबरी के जूठे बेर राम के खा लेने का सवाल उठाया जाएगा।"

आपनें बिलकुल सही सोचा कि इस मामले में चुप ही रहेंगे। वास्तव में तो इस प्रसंग की इतनी व्याख्याएं हो चुकि है कि कुछ भी कहना विरोधाभास पैदा करना होगा। इस प्रसंग को जिसने भी चाहा अपने विचारों को पुष्ठ करने के लिए उपयोग किया। कौन जान पाया है शबरी का मन या राम का भाव? और उस समय की वस्तुस्थिति?

आपकी इस बात असहमति की गुंजाईश ही नहीं कि "सदभावनापूर्ण समझाईश से सार्थक और टिकाऊ सफलता संभव है... वैर-विरोध, विद्वेष(पूर्ण)-विद्रोह, बदला प्रतिशोध से वांछित सफलता नहीं मिलती और न परिवर्तन आता है।"

लेकिन जब आप कहते हैं कि "विद्रोह से अनवरत प्रतिविद्रोहपूर्ण परंपरा का सृजन होता है, जो कभी नहीं रुकता..." और इसके बाद आप विद्रोह को "अवगुणों के साथ" निश्चित करते हैं तो यहां यह कहना चाहूंगा कि किसी विद्रोह का उस हालत में अवगुण हो जाना लाजिमी है, जब वह पुरानी व्यवस्था से मुक्ति के बाद फिर से एक ऐसे यथास्थितिवाद का निर्माण कर दे जिसमें सभी चीजें जड़ हो जाएं और व्यक्ति की मानवीय स्वतंत्रता फिर से बाधित होने लगे। इस तरह एक विद्रोह जब अपने मकसद से भटकता है और फिर से एक स्वार्थपूर्ण दमनकारी व्यवस्था का निर्माण करता है, उसी समय वह एक नए विद्रोह की जमीन तैयार कर देता है। उसके फूटने में चाहे जितना वक्त लगे।

विद्रोह अपने आप में किसी भी वैसी तमाम जड़ हो चुकी स्थितियों से निकलने की छटपटाहट का नतीजा है, जिसमें प्रगति की आकांक्षाएं तक अवरुद्ध हो जाती हैं या कर दी जाती हैं। इस लिहाज से विद्रोह तो किसी भी प्रगतिकामी समाज के लिए एक अनिवार्य प्रक्रिया है और इसे कुछ समय तक के लिए दबा भले दिया जाए, रोका नहीं जा सकता। सामाजिक विकास के क्रम में वाद-प्रतिवाद-वाद एक स्वाभाविक क्रम है और यह मानव-समुदाय के सबसे ज्यादा बुद्धिमान जीव होने का नतीजा है।

शेष, "विद्वता या प्रवाचक रोग से पीड़ित" होने का मेरा बेवकूफाना जुमला आपके "यह भी नहीं समझते" की स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी। इसे अपना बेवकूफाना जुमला कह चुका हूं, इसलिए इससे ज्यादा क्या कहना। अपनी बात मानवीय तरीके से रख सकने के "रोग" से किसी भी प्यार होना चाहिए। आप देख रहे होंगे कि बहुत सारे "हिंदू" मन की उत्तेजक ध्वनियां मेरे लिए उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं रही जिसका जवाब देना या उन पर बात करना मैं जरूरी समझूं तो इसलिए कि मैं बात करने को ही बदलाव का रास्ता मानता हूं। विद्वेषपूर्ण युद्ध आपके निष्कर्ष "वैर-विरोध, विद्वेष(पूर्ण)-विद्रोह, बदला प्रतिशोध से वांछित सफलता नहीं मिलती और न परिवर्तन आता है" तक ले जाता है।

इस लिहाज से देखें तो अनुराधा ने विद्रोह किया, लेकिन इसके लिए उसने अगर दादी के सोच पर सीधा हमला न कर एक दूसरे रास्ते से नई व्यवस्था रचने की कोशिश की जिसमें जावेद से सदभावनापूर्ण गुजारिश थी कि दादी का खयाल तुम्हारे बारे में चाहे जो हो, मैं तुम्हें दादी की निगाह से नहीं देखती... तो वहां वह दादी को बिना असुविधा में डाले जावेद के मन में एक भरोसा पैदा कर रही थी।

बहरहाल... दुनिया है तो चलती रहेगी... इसका खयाल रखने की कोशिश करता हूं कि मेरे अधिकार से किसी के भी अधिकारों या स्वतंत्रता का हनन न हो...

zeenat

yahan pr itni bhs ho rhi hai ek story ke peeche....... muslims ko kosne vaale, bura batane vaale apni mtality ko show kr rhe hain....agr muslims itne hi kharb hain aur unhone hamesha india me bura kiya hinduo ke sath to kyu nhi aap tajmahal ko gira dete kyu shaan se puri duniya ko dehkte ho ki hamara hai taj mahal ..kyu nhi aap sb ajmer sharif ki dargaah ko mita dete....jahan pr sbse zyda hindu hi jate ziyarat ke liye..........history ki baate bolna bht aasan hai......kya jb dange hote hain to sirf hindu hi maara jata hai muslim nhi.........aap khte hain muslim aatankvaadi hai to aisi baate krne vaala meri nzr me aatankvaadi hai..... bomb aur gun se falaye jane vaale aatank se zyda khtrnaak aatank log aapni zuban se phala rhe hain......

शेष जी,

आपकी टिप्पणी से लगता है, आपके 'विद्रोह' वाली विचारधारा का शमन नहीं हो पाया। अब इस चर्चा का अंत आना चाहिए। आप विद्वेष युक्त विद्रोह की विचारधारा पर दृढ स्थित है,और रहें। पर अब यह न कहें कि मैं आपको यथा्स्थितिवाद की तरफ धकेल रहा हूँ।

@-इस लिहाज से देखें तो अनुराधा ने विद्रोह किया, लेकिन इसके लिए उसने अगर दादी के सोच पर सीधा हमला न कर एक दूसरे रास्ते से नई व्यवस्था रचने की कोशिश की जिसमें जावेद से सदभावनापूर्ण गुजारिश थी कि दादी का खयाल तुम्हारे बारे में चाहे जो हो, मैं तुम्हें दादी की निगाह से नहीं देखती... तो वहां वह दादी को बिना असुविधा में डाले जावेद के मन में एक भरोसा पैदा कर रही थी।

यह भी देखें कि नए युग के अनुसार दादी में सहृदयता भी है। वह मित्रता को ऑफ़िस तक रखने की अनुमति देती है, उसे इस को घर तक खींच लाने से एतराज है। घर वह अपने तरीके से जीना चाहती है। कहीं तो उसे अपने व्यक्तिगत विचारों के साथ जीने का हक हो। अगर अनुराधा का दादी के सोच पर सीधा हमला नहीं था तो वह किस की सोच को सबक देना चाहती थी। जावेद के साथ ही घर से निकल कर जावेद के प्रति सहानुभुति प्रकट कर चुकि थी।
जावेद जब यह कहता है -‘‘अनु तुम्‍हारी दादी मुझे पसन्‍द नहीं करती हैं ?" तब उसे मात्र दादी द्वारा ही नापसन्द किए जाने का अफसोस है जबकि अनु के विषय में वह फुल-कॉन्फिडेंट है। तो पुनः जूठा पानी पीकर भरोसा दिलानें की आवश्यकता कहां से आन पडी? यह तो स्पष्ठ कामनाओं की गुलामी की इंतेहा है। अनुराधा में बड़े भोलेपन से(अनु! तुम्‍हारी दादी मुझे पसन्‍द नहीं करती हैं)विद्रोह और आक्रोश भर दिया गया है।

मानव मानव के प्रति भेद-भाव की सोच तो मुझ में भी है। पर मैं जन्म,जाति,धर्म आधारित भेद भाव नहीं करता,उंच-नीच नहीं मानता। किन्तु आचार विचार आहार और स्वच्छता आधारित भेद-भाव करता हूँ। कदाचारी, निम्न सोच, हिंसाजन्य आहारी, और अकारण गंदे रहने वालों को हीन मानता हूँ। सदाचारी, उत्तम सोच, सात्विक आहारी और आवश्यक शुचिता रखने वालों को श्रेष्ठ मानता हूँ।

@शेष जी ! "बहरहाल... दुनिया है तो चलती रहेगी... इसका खयाल रखने की कोशिश करता हूं कि मेरे अधिकार से किसी के भी अधिकारों या स्वतंत्रता का हनन न हो..."
-सहमत हूँ ..यही होना चाहिए ....यदि सभी ऐसा ही करने लगें तो विवाद ही न हो.
"रही बात चिकित्सकीय और हाइजेनिक तर्क पर ग्लास का बचा पानी पीने की, तो अभी तक दुनिया भर के डॉक्टरों ने "फ्रेच किस" को नुकसान नहीं ठहराया है..."
जूठे पानी के सन्दर्भ में कृपया "droplet infection " के बारे में पढ़ें. हमारे शरीर में मलद्वार की अपेक्षा मुंह कहीं अधिक जीवाणुओं को अपने में बसेरा देता है - यह सुस्थापित सत्य है- देखें "pathology " हमारी म्यूकस मेम्ब्रेन किसी भी infection के प्रति अधिक सुग्राही होती है. यह किसने कह दिया कि फ्रेंचकिस से पायोरिया जैसी बीमारियाँ नहीं हो सकतीं और वह सुरक्षित है ? और अब यह भी बता दूं कि हमें होने वाली व्याधियों में से ८० % व्याधियां हमारे अज्ञानपूर्ण आचरण के परिणामस्वरूप होती हैं. शेष जी! इस विषय में तर्क करने से पूर्व अनुरोध है कि preventive and social hygien नामक पुस्तक का वाचन कर लें तो बहुत सी शंकाओं का स्वतः ही समाधान हो जाएगा.

@ "मानव मानव के प्रति भेद-भाव की सोच तो मुझ में भी है। पर मैं जन्म,जाति,धर्म आधारित भेद भाव नहीं करता,उंच-नीच नहीं मानता। किन्तु आचार विचार आहार और स्वच्छता आधारित भेद-भाव करता हूँ। कदाचारी, निम्न सोच, हिंसाजन्य आहारी, और अकारण गंदे रहने वालों को हीन मानता हूँ। सदाचारी, उत्तम सोच, सात्विक आहारी और आवश्यक शुचिता रखने वालों को श्रेष्ठ मानता हूँ।"
सुज्ञ जी ने लाख टके की बात कह दी है. यह शुचिता रखनी ही पड़ेगी. मनसा-वाचा-कर्मणा ...तीनों ही स्तरों पर. पुराने ज़माने की दादियाँ घर के ही किसी सदस्य को यक्ष्मा होने पर बच्चों को उससे दूर रखती थीं ....आज भी ऐसा ही होता है ...आज तो पढी लिखी बहुएं इसे अच्छी तरह समझती हैं इसलिए मेडिकल isoletion का महत्व उनके लिए विशेष हो गया है. जो लोग अपूर्ण ज्ञान के कारण ऐसा नहीं करते वे infectious disorders को फैलाने का ही काम करते हैं इसी कारण एक टी.बी. का रोगी कमसे कम १५ स्वस्थ्य लोगों को infection दे रहा है ...यह मैं नहीं कह रहा हूँ, विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट है
वस्तुतः , संसार का आधार ही विभेद है ...विभेद के बिना इसका अस्तित्व ही नहीं है. विभिन्न परमाणुओं की संरचनात्मक विभेदता ही इतने तत्वों का कारण है. जहाँ विभेद समाप्त हो जाता है वहाँ तो पदार्थ और ऊर्जा एक रूप होकर लय को प्राप्त हो जाते हैं...यह cosmic involution की स्थिति है . सांसारिक अर्थों में लिया जाय तो भी विभेद समाप्त नहीं किया जा सकता......अन्यथा सभी भारतीय सेवा के पदाधिकारी ही बन जायेंगे. तथापि इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य मनुष्य से घृणा करे. विभेदों का अपना अस्तित्व है ..सारे विभेदों के बाद भी मानवीय उच्चादर्शों की अवहेलना नहीं की जा सकती.

@ तथापि इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य मनुष्य से घृणा करे. विभेदों का अपना अस्तित्व है ..सारे विभेदों के बाद भी मानवीय उच्चादर्शों की अवहेलना नहीं की जा सकती.

अवगुणों अनादर्शों की निंदा घृणा आवश्यक है, मात्र उसके मनुष्य होने से स्वीकार्य नहीं हो सकते। सच्चाई तो यह है कि अवगुण भी सारे मनुष्यों में ही होते है। भेद-विभेद करते हुए त्यागने योग्य और अपनाने योग्य का वर्गीकरण करके समाचरण करना ही होगा।

अपमान भले किसी का न करें, पर योग्य को ही सम्मान दिया जाना चाहिए। मनुष्यता के नाम पर योग्य अयोग्य, उचित अनुचित को एक समान आदर नहीं दिया जा सकता।

किसी भी संक्रामक रोग से ग्रस्त व्यक्ति से आवश्यक बचाव जरूरी है, लेकिन इस कहानी में कहीं भी यह संकेत नहीं मिलता कि जावेद को टीबी, पायरिया या कोई दूसरा रोग है जो ग्लास में बचे पानी के सहारे अनुराधा को लग सकता है। इसलिए तमाम छूत से संबंधित वैज्ञानिक अध्ययनों का हवाला सही होते हुए भी उसे अपने जातीय-धार्मिक पूर्वाग्रहों के पोषण का आधार बनाना सही नहीं है। और यहां तो कम से कम वह दादी के व्यवहार से उपजी आशंका का समाधान करने की कोशिश भर है।

फिर भी, अगर रामकथा में शबरी के जूठे बेर राम खाते हैं, तो उस प्रतीक को क्या कहेंगे? संभव है, अपनी सुविधा के हिसाब इसकी व्याख्याएं पेश की गई हों, लेकिन इस प्रतीक का अपना महत्त्व है।

मेरा खयाल है कि इस कहानी में जावेद का नाम अगर जीतेंद्र होता, न यह कहानी बनती न इस पर विवाद होता। लेकिन बात केवल जावेद की नहीं, हिंदू समाज की तमाम निचली जातियों के साथ छुआछूत, मंदिर में प्रवेश नहीं करने देने, और महज किसी निचली जाति में जन्म लेने के कारण किए जाने वाले भेदभाव और नफरत का मूल आधार क्या है?

विद्रोह का आधार अगर विद्वेष है, तो उसका उन स्थितियों का प्रतिरूप बन जाना तय है जिसके खिलाफ वह उपजा है। लेकिन इस कहानी में अनुराधा का ग्लास का बचा पानी पीना कहीं से भी विद्वेष का परिचायक नहीं है, न जावेद की यह अभिव्यक्ति विद्रोह और आक्रोश भर देने की कोशिश कि "तुम्हारी दादी मुझे पसंद नहीं करती...।" और इसे स्पष्ट कामनाओं की गुलामी कहने पर सहानुभूति जताई जा सकती है।

कदाचार-सदाचार, उत्तम सोच, सात्विक आहार, उचित-अनुचित और शुचिता- ये सब ऐसे शब्द हैं, जिसे सभी लोग अपनी सुविधा के अनुकूल लागू करते हैं और इसकी कोई आखिरी परिभाषा मैं या कोई एक व्यक्ति तय नहीं कर सकता। इसलिए इसे लेकर बहुत ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं। कोई भी जनतांत्रिक व्यक्ति इसमें निजी आजादी का सम्मान करेगा।

@ "कदाचार-सदाचार, उत्तम सोच, सात्विक आहार, उचित-अनुचित और शुचिता- ये सब ऐसे शब्द हैं, जिसे सभी लोग अपनी सुविधा के अनुकूल लागू करते हैं और इसकी कोई आखिरी परिभाषा मैं या कोई एक व्यक्ति तय नहीं कर सकता। इसलिए इसे लेकर बहुत ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं। कोई भी जनतांत्रिक व्यक्ति इसमें निजी आजादी का सम्मान करेगा।"

शेष जी,

कदाचार-सदाचार, उचित-अनुचित की आपकी उपरोक्त सुविधाभोगी परिभाषा के बाद, और इन व्यवहारों का 'जनतांत्रिक व्यक्ति के निजी आजादी का सम्मान'जैसी विचारधारा जानने के बाद, कदाचार-सदाचार, उचित-अनुचित, नैतिक-अनैतिक पर विचार करनें को कुछ भी शेष नहीं रह जाता। इसलिए हमारी तरफ से इस चर्चा के यह अन्तिम शब्द है।

शेष जी ! आपने मेरी टिप्पणी पूरी पढ़े बिना ही अपनी बात कह दी. देखिये मैंने क्या लिखा था - "पुराने ज़माने की दादियाँ घर के ही किसी सदस्य को यक्ष्मा होने पर बच्चों को उससे दूर रखती थीं ...."
इसमें धार्मिक पूर्वाग्रह कहाँ दिखाई दे रहा है आपको ? फिर आप यह भी कहते हैं कि -
"वैज्ञानिक अध्ययनों का हवाला सही होते हुए भी उसे अपने जातीय-धार्मिक पूर्वाग्रहों के पोषण का आधार बनाना सही नहीं है।"
स्पष्ट है कि आप स्वयं ही पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं. जावेद को टी.बी. या पायोरिया होने का कोई उल्लेख कहानी में नहीं होना मात्र आपके तर्क का आधार है . यह एक अदालती तर्क है व्यावहारिक नहीं . आप यह बताइये कि जिसे टी.बी. होती है क्या वह इसकी घोषणा करता फिरता है ...या कि जब वह किसी होटल में जाता है तो वह पहले वहाँ अपने रोग ग्रस्त होने की घोषणा करता है ? वैज्ञानिक तथ्यों को स्वीकार करने के बाद भी आप अपना हठ छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं . इसी प्रकार की हठ व्याप्तता के कारण ही भारत से संक्रामक रोगों का इरेडीकेशन नहीं हो पा रहा है. अथवा क्या आप बता सकते हैं कि इसके और क्या कारण हो सकते हैं ?
मुझे लगता है कि अब इस विषय पर आपसे कोई भी तर्क करना व्यर्थ है. बहरहाल इतना सुनिश्चित हो गया है कि भारत से संक्रामक रोगों का खात्मा फिलहाल आप जैसे लोगों के रहते संभव नहीं है. और इसका प्रमाण है प्रतिवर्ष टी.बी के बढ़ते रोगियों की संख्या. और टी.बी ही क्यों आधुनिक जीवनशैली ( diseases caused by modern life style ) के कारण उत्पन्न होने वाली व्याधियां भी बढ़ती ही जा रही हैं. चलो ...प्रकृति शायद इसी तरह जन संख्या नियंत्रण करना चाहती हो .
श्रीमान जी ! मुस्लिम हमारे भी मित्र हैं, वे हमारे घर में खाना खाते हैं और हम तो उनकी शादी में भी तब खाना खाने जाते थे जब ऐसा प्रचलन में नहीं था. मैं सन १९७० की बात कर रहा हूँ.यह भी बता दूं कि मैं स्वयं उत्तरप्रदेश का ब्राह्मण हूँ. ....और हमारे मित्र यहाँ ही नहीं पाकिस्तान में भी हैं. अभिप्राय यह कि मानवीय सम्बन्ध अपने स्थान पर हैं पर झूठा पानी पीने का प्रतीक किसी भी स्वस्थ्य लचीलेपन का द्योतक नहीं हो सकता.
कमाल है, वैज्ञानिक पृष्ठभूमि के लोग पुरानी परम्पराओं की वकालत कर रहे हैं और जिनका विज्ञान से कोई वास्ता नहीं वे इसका विरोध कर रहे हैं. हम सरकारी हुकुम पर जगह-जगह शिविर लगाकर लोगों को संक्रामक रोगों से बचने के उपाय बता रहे हैं और आप आधुनिकता की आड़ में अनहाइजेनिक लिविंग की वकालत कर रहे हैं ? आप पत्रकार हैं, सरकार को लिखिए कि इस तरह के कार्यक्रम बंद कर दिए जाएँ...क्योंकि इसमें धर्मान्धता की बू आती है.

"माफीनामा" कहानी की आखिरी पंक्ति यह है- "जावेद, मैं तुमसे इस तरह की सोच रखने वाले लोगों की तरफ से माफी मांगती हूं। इतना कहते हुए अनुराधा ने जावेद के हाथ से गिलास लेकर बचा हुआ सारा पानी पी लिया।"

हैरानी की बात है कि आप तमाम लोग इस कहानी की इस पंक्ति की व्याख्या अपने मन-मुताबिक करके अपने कथित तर्क परोस रहे हैं। एकतरफा तौर पर अनुराधा की इस पहल को आपलोग अपनी सुविधानुसार द्वेषपूर्ण घोषित करके आखिर साबित क्या करना चाहते हैं? पहले तो आपलोगों को जूठा पानी और इस प्रसंग के क्रम में जावेद के "हाथ से ग्लास लेकर" बचा हुआ पानी पी जाने में फर्क करना चाहिए। यहां अनुराधा जब सचेत तौर पर न केवल ग्लास का पानी पीकर जावेद की आशंका को एक झटके में जड़-मूल से खत्म कर देती है, बल्कि दादी की तरह की सोच रखने वालों की ओर से जावेद से माफी मांगती है, तो वह निज से ऊपर उठ कर इस तरह की जड़ता की व्यापकता में जाती है। यहां उसकी विनम्रता और अपनी मानवीयता के उदाहरण प्रकट रूप में भी दिखने के बावजूद अगर इसे कदाचार, अ-उत्तम सोच या शुचिता की कसौटी पर विफल बताया जाता है, तो सचमुच इस चर्चा का अंत हो जाना चाहिए।

मेरे गाय का मांस नहीं खाने का तथाकथित सदाचार अगर तमाम गैर-हिंदू समुदायों के लिए सदाचार नहीं है, तो क्या वे सभी कदाचारी हो गए। गाय का मांस खाने वाले अगर मुसलमान हैं, तो ईसाई भी हैं। अगर बौद्धों ने गाय की महत्ता नहीं बताई होती तो पता नहीं ब्राह्मण-भोज की शान के लिए गऊ-मांस को सबसे उत्तम माने जाने की परंपरा कब तक चलती रहती और गाएं बची भी होती या नहीं...। कदाचार-सदाचार या शुचिता जैसे शब्द देश-काल और अनिवार्यता के तकाजे के हिसाब से तय होते हैं, इसे लेकर रूढ़ होने का नतीजा सिर्फ खुद को दुख पहुंचाता है। इससे ज्यादा कुछ नहीं...।

बहरहाल, अंधभक्ति के सामने तर्क की गुंजाईश नहीं... ।

अगर समूचे जीव-जगत में मनुष्य अपनी बुद्धि के कारण हमेशा सामाजिक विकास के क्रम में आगे ही बढ़ता रहा है और मानवीयता की खोज में लगा रहा है, तो अनुराधा ने यहां भी वही कोशिश की है। उसे द्वेषपूर्ण व्यवहार ठहराना दरअसल दादी के रूप में एक ऐसी जड़ व्यवस्था को सही ठहराना है, जिसमें जावेद-तत्त्व के अलावा हिंदू कहे जाने वाले इस समाज की तमाम निचली जातियों को सिर्फ किसी खास जाति में जन्म लेने के कारण हेय होने का प्रमाण-पत्र दे दिया जाता है। लेकिन यह प्रश्न आप सभी के लिए बेकार के प्रश्न हैं, क्योंकि दुनिया के तमाम सामाजिक-सामुदायिक भेदभाव का विज्ञान दरअसल महज कुछ लोगों के श्रेष्ठता की विशेष सुविधा की साजिश पर टिका हुआ है। और इस साजिश में जनतंत्र और निजी आजादी जैसी चीजें अगर पचासी फीसद लोगों के हक में कोई मायने नहीं रखतीं तो इसे समझना बहुत मुश्किल नहीं है।

और कौशलेंद्र जी, पहले आप अपने ही सबसे ऊपर के दो-तीन टिप्पणियों में व्यक्त की गई "हिंदू-चिंता" से मुक्त हो लें, फिर किसी के ग्लास का पानी लेकर पी जाने के बाद होने वाले यक्ष्मा या किसी दूसरे संक्रामक रोगों के बारे में चिंता जाहिर करें...। तब शायद मैं आपकी बातों से सहमत हो जाऊं।

आपको यह घोषणा करने की जरूरत पड़ती है कि आप उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण हैं। इस लिहाज से आप यह भी कहना चाहते होंगे कि आप पवित्र हैं और सर्वश्रेष्ठ भी... लेकिन पता नहीं, इस तरह की जातीय चेतना के साथ इंसान कैसे हुआ जाता है...!!!

मैं घोषित तौर पर नास्तिक हूं और किसी भी धर्म के दायरे मेरी नजर में पाखंड के सिवा कुछ नहीं। धर्म इंसान को जोड़ने का नहीं, बांटने का जरिया है। जब तक इस धर्म या परंपराओं के सड़ांधों पर गर्व किया जाता रहेगा, इस जड़ मानसिकता से छुटकारा मिलना मुमकिन नहीं जिसमें अनुराधा की पहल को ऐसे उम्मीद की किरण के तौर पर देखा जाए जिसमें जावेद या अनुराधा सिर्फ इंसान होते हैं, मुसलमान या हिंदू नहीं...।

@"लेकिन पता नहीं, इस तरह की जातीय चेतना के साथ इंसान कैसे हुआ जाता है...!!!"
तो श्रीमान शेष जी ! आपके द्वारा यह घोषित कर दिया गया है कि मैं इंसानों की श्रेणी में नहीं आता. आश्चर्य ! यह जानकर भी आप अभी तक एक गैर इंसान से बहस करते रहे ? आप की बहस में यह ध्वनित होता रहा है की दूसरों के प्रति हीनता का बोध जातीय जड़ता का द्य्योतक है. आप मेरे प्रति प्रयुक्त अपनी भाषा और उसके भाव का अवलोकन करें, आपने बार बार मुझे हीन प्रमाणित करने का प्रयास किया है ...सडांध मारते मस्तिष्क का प्रतिनिधित्व करने वाला बताया .....छद्म वैज्ञानिकता की आड़ में शोषक बताया ..... यह किस प्रगतिशीलता का द्योतक है ?

मुझे स्वयं के ब्राह्मण होने की घोषणा किस सन्दर्भ में करनी पड़ी यह स्पष्ट नहीं हो सका क्या ? १९७० के दशक में यदि मैं किसी मुसलमान के घर शादी में भोजन के लिए जाता हूँ तो इसे क्या आप जातीय जड़ता की श्रेणी में रखते हैं ?

" .................इस लिहाज से आप यह भी कहना चाहते होंगे कि आप पवित्र हैं और सर्वश्रेष्ठ भी" - आपका व्यंग्य समझता हूँ मैं ......किन्तु यदि आप इस बहस में प्रयुक्त अपनी कठोर भाषा पर ध्यान दें और मेरे मंतव्य को समझने की चेष्टा करें तो आपको इतने उग्र होने की आवश्यकता नहीं होगी.

यह मेरी अंतिम टिप्पणी है. आपको सादर नमन !

पुनः आने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ शेष जी ! आपने मुझे हिंदू चिंता से मुक्त होने की सलाह दी ..पर क्यों ? क्या हिन्दू चिंता करना अपराध या पाप है ? यदि यह अपराध है तो मैं करता रहूँगा .आपको स्वयं के हिन्दू स्थान में जन्म लेने का हीन बोध हो सकता है .....मुझे नहीं है...इसलिए मुझे इससे मुक्त होने की कोई आवश्यकता नहीं.

कौशलेंद्र जी, यों तो मैंने सोचा था कि जो लोग मानते हैं कि संस्कृति कोई ऐसी ठहरी हुई और जड़ चीज है जिसके आखिरी मानक तय कर दिए गए हैं और उससे आगे जाना अपराध है, उनके साथ बहसबाजी का कोई लाभ नहीं। लेकिन कुछ लोगों की ओर से ऐसे सवाल आए थे जिन पर बात की जा सकती थी। खैर...

मैं फिर यह कहना चाहूंगा कि हिंदू समाज की सबसे बड़ी एकमात्र "खासियत" जाति का जो स्वरूप है, उसमें कोई भी व्यक्ति अगर जातीय दंभ से पीड़ित है, तो उसका इंसान होना असंभव है। इस श्रेष्ठता का मनोविज्ञान उन हजारों-लाखों लोगों को महज इसलिए हेय मानता है क्योंकि उन्होंने फर्जी तरीके से निर्धारित की गई वर्णक्रम पर आधारित जाति-व्यवस्था में निचली जातियों में जन्म लिया होता है। एक इंसान से सिर्फ जातीय आधार पर नफरत करने वाला व्यक्ति इंसान नहीं हो सकता, यह मेरी घोषणा है। कम से कम मैं ऐसा मानता हूं।

मेरी भाषा आपको इसलिए हीन प्रमाणित करने वाली लगेगी, क्योंकि मेरी बातों से श्रेष्ठता की ग्रंथि बाधित होती है। सिर्फ दंभ से बचने की जरूरत है, वरना जवाब देना कहीं से भी गलत नहीं है। कई बार जवाब देने की भाषा सत्ता-प्रतिष्ठानों को इसलिए बुरी लगती है, क्योंकि सिर झुका कर सब कुछ चुपचाप मान लेने के बजाय कोई बोल रहा होता है। यही बोलना व्यवस्था की असली परेशानी होती है। वह अपने शासितों को चुप देखना चाहती है। मेरी भाषा इसीलिए परेशान करने वाली लगी होगी।

बहरहाल, मैं अब भी कहता हूं कि वैज्ञानिकता की आड़ में अंधविश्वासों का पोषण निश्चित तौर पर एक व्यापक समाज के प्रति ठगी है और इसका हर जगह विरोध होना चाहिए। अगर १९७० के दशक में आप किसी मुसलमान के घर शादी में भोजन के लिए जाते हैं और आज चालीस साल बाद भी आपको अपने ब्राह्मणत्व की घोषणा करनी पड़ती है तो सोचिएगा कि इसे किस जातीय जड़ता की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। बहुत सारे लोगों के लिए "हिंदू-चिंता" निश्चित रूप से गर्व की बात होगी, लेकिन उनके लिए, जिनकी सामाजिक हैसियत इस चिंता से श्रेष्ठ बनी रहती है। उन तमाम लोगों के लिए हिंदुत्व की चिंता में घुलना निश्चित तौर पर अपराध या पाप है, जिन्हें सदियों से हिंदू होने के नाम पर छला गया है और सिर्फ जन्म के कारण हेय या नीच मान लिया गया। यह केवल हिंदुत्व की त्रासदी नहीं है, सभी धर्मों ने अपने-अपने दायरे में ये धतकर्म निर्धारित किए हुए हैं और उनके शिकार लोगों को हर हाल में इससे मुक्त होने की जरूरत है, इस ठगी से मुक्त होने की जरूरत है।

आपका भी सादर नमन...

:-)

बेनामी

भारत को गुलाम सिकन्दर,गोरी या अन्ग्रेजो ने नही,बल्कि पोरस,जयचन्द या मीर जाफ़रो ने बनाया था
एसे ही कुछ् नासमझो की बाते यहा नज़र आ रही है

बेनामी

बस मैं तो इतना जानता हूँ की इन लड़कियो के चलते ही हिन्दूसभ्यता नहीं बचेगी एक दिन ..इन लड़कियो का क्या है आज हिन्दू है कल जिससे शादी करेंगी उसी धर्म को अपना लेंगी ....सुन्ना तो हम मर्दों को हैकि सब हिजड़े है.....इन लड़कियो के चक्कर में न पदों...अपना काम करो मर्दों....इनको मुसलमानो के घर जाने दो

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