मंगलवार, 26 जुलाई 2011

दीप्ति परमार का आलेख : नारी विमर्श और नारी लेखन के सरोकार

आदिकाल से लेकर वर्तमान समय तक नारी पर चिंतन और बहस हो रही है। यह एक ऐसा चिंतन और बहस है जो निरंतर चलती ही आ रही है जो कभी थमने का नाम नहीं लेती। समाज का वह कौन सा द्दष्टिकोण है जो नारी को हमेशा केन्द्र में रखता है। सृष्टि के प्रारंभ से लेकर आज तक नारी एक ओर जगत जननी के रूप में तो दूसरी ओर रति के रूप में अधिक चित्रित होती रही है। इतना जरूर है कि आदि और आज में अंतर अवश्य दिखाई देता है।

पिछले दो दशकों से हिन्दी कथा साहित्य के क्षेत्र में सर्वाधिक चर्चित विषय रहा है नारी विमर्श और नारी लेखन। नारी ने जब कलम उठाकर अपनी दास्तान लिखना प्रारंभ किया तो इसे नाम मिला नारी विमर्श और नारी लेखन। समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे पुरुषवर्ग ने कहा कि यह नारी लेखन नारी की समस्या को अभिव्यक्त करता है। नारी समस्या समाज की समस्या से अलग कैसे हो गयी ? नारी को दूसरा दर्जा देने की द्दष्टि सदियों से देखी जा रही है। इसी कारण कुछ समीक्षकों ने नारी लेखन को भी दूसरे दर्जे पर रखा। नारी को दबाकर कुचलकर नियंत्रण में रखने की सदियों से काम कर रही पुरुष मानसिकता आज भी अपनी जगह कायम है। राजतंत्र में राजा अपने लिए सोलह हजार रानियाँ रख सकता था। प्रजातंत्र का क्लिंटन व्हाइट हाउस में मोनिका लेविंस्की से यौनाचार कर सकता है। तो कभी किसी जेसिका की जिद को समाप्त करने के लिए उन पर सहज भाव से गोलियां दाग दी जाती है। रुचिका और आरुषि जैसी युवतियों की अपने खिलाफ उठानेवाली आवाज को हमेशा-हमेशा के लिए दबा दिया जाता है। ऐसी प्रसिद्ध घटनाओं के साथ-साथ रोजमर्रा की जिन्दगी में नारी के साथ होनेवाले अत्याचार आम बात बन गयी है। क्या यह सिर्फ नारी की ही समस्या है, समाज की नहीं ?

नारी विमर्श को लेकर यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि नारी विमर्श नारी के लिए ही सुरक्षित क्षेत्र है या पुरुष लेखकों की भागीदारी की संभावना यहाँ बनती है। कुछ अपवादों को छोड़कर यह बात जोर देकर कही जा रही है कि नारी विमर्श नारी के लिए सुरक्षित क्षेत्र है एवं पुरुषों के लिए उनमें कोई स्थान नहीं है। यह बात सर्व विदित है कि पुरुषों ने नारी पर हो रहे अत्याचारों को शब्द अवश्य दिये है किन्तु वे अक्सर यह स्वीकार करने से कतराते है कि नारी पर अत्याचार करनेवाले पुरुष है। बस केवल नारी को अबला बताने और सिद्ध करने में ही उनका पुरुषत्त्व लग गया। जैसे ‘समर्पण का सेवा सार’ कहकर प्रसाद जी उस सामंती रूप को प्रोत्साहित करते है जो अपनी सारी आकांक्षाओं को पुरुष के चरणों पर समर्पित कर देती है, अपने व्यक्तित्व को पुरुष के महान व्यक्तित्व में गला धुला देती है।

नारी की पीड़ा और अनुभव की बात नारी ही अधिक प्रामाणिकता से कर सकती है। यह बात महादेवी वर्मा ने ‘श्रृंखला की कड़िया’ में बहुत पहले ही कह दी है ‘‘पुरुष के द्वारा नारी चित्रण अधिक आदर्श बन सकता है, किन्तु यथार्थ के अधिक समीप नहीं। पुरुष के लिए नारीत्व अनुमान है नारी के लिए अनुभव। अतः अपने जीवन का जैसा सजीव चित्र वह हमें दे सकती है वैसा पुरुष बहुत साधना के उपरांत भी शायद दे सकता है।’’ 1 जो पीड़ा नारी ने भोगी है, अनुभव की है उसे वही सार्थक अभिव्यक्ति दे सकती है। जिसने जो अनुभव ही नहीं किया उस परायी पीर पर आप क्या लिख् सकते है ? क्योंकि ‘‘नारी की देह के बारे में बोलना आसान है, खासकर मर्द होकर बोलना आसान है, किन्तु उसकी देह के बारे में उसकी तरह बोलना आसान नहीं। स्त्री के प्रति पुरुष का अनुभव चूँ कि देह और आत्मा के दमन से शुरू होता है, इसलिए अनुभव की एकान्विति संभव नहीं और पुरुष की भूमिका विपक्ष में खड़े होने की हो जाती है। वह बाहर रहने को अभिशप्त है। जैसा हीथ कहते है ‘पुरुष का स्त्रीत्ववाद अन्ततः एक मर्दाना काम ही है।’ स्त्री देह के रूप में स्त्री का अनुभव करना पुरुष के रूप में अनुभव करने से भिन्न होता है। किसी कृति को स्त्री रूप में पढ़ना भी एक अलग पहचान को बनाता है। स्त्रीत्ववाद स्त्री के इन्हीं एकान्तिक अनुभवों का पुरुष लिंगी भाषा से भिन्न भाषा में अभिव्यक्ति का सरोकार है। अब तक की उपलब्ध भाषा पुरुष की भाषा है जिसमें स्त्री की तरह सोचा या अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता है। स्त्री के लेखन को स्त्री विमर्श के रूप में स्थापित करने में वे महिला विशेषांक उल्लेखनीय है जिनमें सिर्फ स्त्री लेखक ही स्थान पा सकी है।’’ 2

नारी विमर्श द्वारा नारी पर हुए अत्याचार और उसकी स्वतंत्रता प्राप्ति के संघर्ष को दर्शाया गया है। ‘‘स्त्री विमर्श स्त्री के अनछुए अनजाने पीड़ा जगत के उद्घाटन के अवसर उपलब्ध करता है, परन्तु उसका उद्देश्य साहित्य एवं जीवन में स्त्री के दोयम दर्जे की स्थिति पर आँसू बहाने और यथास्थिति बनाएँ रखने के स्थान पर उन कारणों की खोज से है जो स्त्री की इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है। वह स्त्री के प्रति होनेवाले शोषण के खिलाफ संघर्ष है। स्त्री के शोषण के सूत्र में जहाँ बच्चों को बेटे और बेटी की तरह अलग-अलग ढंग से बड़ा करने और गलत ढंग से सामाजीकरण से जुडते है, वही प्रजनन व यौन सम्बन्धी शोषण से भी। तुलनात्मक व्यवस्था और आर्थिक परावलम्बन स्त्री के शोषण को गहरा करते है। हमारी सामाजिक संरचना में बदलाव के बिना स्त्री के हिस्से में बेहतरी आना संभव नहीं। ‘स्त्री विमर्श’ स्त्री के स्वंय की स्थिति के बारे में सोचने और निर्णय करने का विमर्श है।’’ 3

हिन्दी कथा जगत में नारी लेखन और पुरुष लेखन काफी चर्चा का विषय बन चुका है। महिला कथाकारों द्वारा जो टिप्पणियाँ की गयी है, उससे दो बाते बहुत साफ तौर पर उभरकर आती है, प्रथम ‘महिला लेखन’, पुरुष लेखन’ जैसे अभिधानों से सभी महिला रचनाकारों को एतराज है और दूसरे प्रायः सभी को यह शिकायत रही है कि मर्दवादी (मृदुला गर्ग का प्रयुक्त शब्द) आलोचना ने महिलाओं द्वारा रचे गये साहित्य का सम्यक मूल्यांकन नहीं किया। इन लेखिकाओं ने बार-बार यह प्रश्न उठाया है कि लिंग भेद के आधार पर ‘महिला लेखन’ और ‘पुरुष लेखन’ विभाजन योग्य है ? उषा प्रियम्वदा से लेकर मृदुला गर्ग, मालती जोशी, चित्रा मुद्गल, चन्द्रकांता, मृणाल पांडे आदि लेखिकाओं ने इस विभाजन को उचित नहीं माना है। ‘इन्डिया टुडे’ के साहित्य वार्षिकी 1996 में ‘आजादी के 50 वर्ष और हिन्दी महिला लेखन’ शीर्षक परिचर्या में अलका सरावगी, कुसुम अंसल, मृदुला गर्ग, चित्रा मुद्गल, नासिरा शर्मा, मंजुल भगत, मृणाल पांडे, महेरुन्निसा परवेज और सूर्यबाला सभी ने एक स्वर में यही बात कही है कि महिला लेखन का सही महत्त्व नहीं आंका गया है।

नारी विमर्श और नारी लेखन पर विचार विमर्श करने पर यह प्रश्न अवश्य उठता है कि क्या सार्थक लेखन में महिला लेखन और पुरुष लेखन की विभाजन रेखा ठीक है ? इतना अवश्य अनुभव किया जा सकता है कि महिला लेखन के सरोकार कुछ रूप में अलग अवश्य है। महिला लेखन स्त्री की लड़ाई में उसकी सामाजिक पहचान पुरुष के समकक्ष स्थापित करने में, पुरुष शासित समाज में उसके लिए बनाए गये बंधनो, पृथक नैतिक मान्यताओं, उसके सेविका रूप में चले आते रहने के खिलाफ एक दुर्घर्ष संघर्ष में अपनी भागीदारी सही तरीके से निभाता है। डॉ ़पुष्पपाल सिंह ने महिला लेखन के वैशिष्ट को अपने शब्दों में इस प्रकार अभिव्यक्ति दी है। ‘‘किसी भी लेखिका की रचना को पढ़ जाइए, उसमें एक खास किस्म का नारी बोध है जो यह एहसास देता है कि इस अनुभव को रचनात्मक स्तर पर उठाना केवल उसी के बूते की बात थी। इस सार्थक लेखन की एक से एक नयी प्रकाशित होनेवाली चीज पढ़ जाइए। यह अनुभूति होती है कि अभी नारी के इस तथाकथित सीमित वृत में कितना कुछ अनजाना और अनचीन्हा पड़ा हुआ है। कहीं एक दूसरे से चुराया अनुभव नहीं कहीं कोई ‘रिपीटीशन’ (दुहराव) नहीं, फिर भी सर्वथा नया अनुभव। जैसे रोज घर के कोने अंतरो में छिपे जाले ये अत्यंत सुविधा से निकाल सकती है, उसी प्रकार इसी अनुभव वृत से रोज कुछ न कुछ नया निकलकर आ रहा है। उसका कारण यही है कि उसका अनुभव संसार बढ़ रहा है। उसकी विजन बढ़ रही है जिसके साथ ही उसके सरोकार, सामाजिक चिन्ताएँ एक दूसरे किस्म की ही रही है। यह अनुभव वृत का सिमटना नहीं, अपितु एक विशिष्ट संदर्भ में उसका बहुआयामी हो जाना है।’’

हिन्दी कथा साहित्य में महिला लेखिकाओं ने अपनी उत्कृष्ट कृतियों द्वारा साहित्य के उच्चशिखर पर अपना कदम रख दिया है। उषा प्रियम्वदा (‘पचपन खम्भे लाल दिवार’ और ‘रुकोगी नहीं राधिका’), मन्नु भंडेरी (‘आपका बंटी’), शशीप्रभा शास्त्री (‘नावें और सीढ़िया), मृदुला गर्ग (‘उसके हिस्से की धूप’ और ‘कठ गुलाब’), प्रभा खेतान (‘छिन्नमस्ता’ और ‘पीली आंधी’), मैत्रेयी पुष्पा (‘इदन्नम’,‘चाक’, और ‘अल्मा कबूतरी’), कृष्णा सोबती (‘मित्रो मरजानी’ और ‘सूरजमुखी अंधेरे के’), ममता कालिया (‘बेघर’), अलका सरावगी (‘कलिकथा वाया बाइपास’), नासीरा शर्मा (‘ठीकरे की मंगनी’ और ‘शाल्मली’), राजी शेठ (‘तत्सम्’), कुसुम अंसल (‘अपनी अपनी यात्रा’), क्षमा शर्मा (‘परछाई, ‘अन्नपूर्णा’), मृणाल पांडेय (लड़कियाँ), चित्रा मुद्गल (‘आवां’) आदि लेखिकाएँ स्त्री विमर्श को सुविचारित रूप में कथा साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्त कर रही है। नारी जीवन की विसंगतियों और विडम्बनाओं का उसके जीवन के विविध पहलुओं से प्रस्तुत करता यह साहित्य नारी जीवन के अंधेरे कोनों में जाकर सर्च लाइट की तरह आर पार देखने का जोखिम उठा रहा है।

नारी विमर्श को केन्द्र में रखकर इन लेखिकाओं द्वारा सर्जित साहित्य का प्रमुख सरोकार नारी का अपने पक्ष में खुद लड़ना और खुद खड़ा होना रहा है। क्योंकि जब तक यह लड़ाई अपनी ओर से नहीं लड़ी जायेगी नारी के पक्ष में नहीं आयेगी। मित्रो (मित्रो मरजानी), प्रिया (छिन्नमस्ता), स्मिता, नमिता,मरियन (कठ गुलाब) आदि इसके सशक्त उदाहरण है।

पिछले दो दशकों से नारी विमर्श को प्रस्तुत करनेवाली उत्कृष्ट रचनाएँ सामने आ रही है। इन लेखिकाओं के लेखन के केन्द्र में नारी की भयावह समस्याएँ है, पितृसतात्मक मर्यादा की तीखी आलोचना है, जिसने नारी का भरपूर खुला शोषण किया है। समकालीन गीतांजलि श्री, चित्रा मुद्गल, मैत्रेयी पुष्पा, मृदुला गर्ग, नासिरा शर्मा, मृणाल पाण्डेय आदि की लेखनी से नारी मुक्ति के लिए जो फीड बैक आ रही है वह अवश्य ही नारी समाज की चेतना का विकास कर सकेगी। हालाँकि इस दिशा में उसे एक लंबी यात्रा करनी होगी।

संदर्भ- 1 श्रंखला की कडियाँ- महादेवी वर्मा, पृष्ठ- 66 2 स्त्री चिंतन की चुनौतियाँ- रेखा कस्तवार, पृष्ठ- 20 3 वही पृष्ठ- 25

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-डॉ ़ दीप्ति बी परमार एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी -विभाग, आर ़ आर ़पटेल महिला महाविद्यालय, सौराष्ट्र विश्वविद्यालय, राजकोट

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  1. "स्त्री के लेखन को स्त्री विमर्श के रूप में स्थापित करने में वे महिला विशेषांक उल्लेखनीय है जिनमें सिर्फ स्त्री लेखक ही स्थान पा सकी है"

    ---प्रश्न यह है कि आप क्यों स्त्री -पुरुष को अलग अलग करके देखना चाहती हैं...वे रथ के दो पहिये हैं उन्हें समग्र रूप से देखना चाहिए... क्यों आप पुरुष लेखकों को महिला विशेषांक में स्थान देने से डरती हैं .....यह एक प्रकार से समस्या-समन्वय से भागना हुआ....

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  2. आधुनिक साहित्‍य में नारी विमर्श सर्वाधिक चर्चित विषय रहा है । महिला कथाकारों की सामाजिक जीवन व व्‍यक्तिगत जीवन से जुडे प्रश्‍नों के साथ, साहसिक अभिव्‍यक्ति जहां समाज में स्‍त्री की स्थिति को स्‍पष्‍ट करती है, वहीं आने वाली पीढी का मार्ग प्रशस्‍त करती नजर आती है । कविता और कथा साहित्‍य में विशेष पहचान बनाने के बाद वर्तमान में आत्‍मकथा लेखन में महिलाएं अपनी साहसिक अभिव्‍यक्ति के लिए चर्चा में हैं । विमर्शात्‍मक स्‍त्री लेखन उन्‍नीसवीं सदी की शुरुआत से ही चला आ रहा है, किन्‍तु उसमें आया बदलाव सराहनीय है । लेखिकाओं की प्रारम्भिक पुरुष विरोधी मानसिकता में परिवर्तन आया है । उन्‍नीसवीं सदी के उतरार्ध व बीसवीं सदी के पूवार्ध के महिला लेखन में स्‍त्री का विषय पुरुष न होकर सामाजिक रूढियां रही, पितृसत्तात्‍मक सामाजिक व्‍यवस्‍था में मुक्ति की आकांक्षा को लेखिकाओं ने अपना विषय बनाया जो कि सराहनीय प्रयास है ।
    दीप्ति जी नारी विमर्श और नारी लेखन के बारे में रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी प्रदान करने के लिए धन्‍यवाद, शोधार्थियों और शोध निर्देशकों के लिए भी यह जानकारी महत्‍वपूर्ण है ।

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  3. ओम प्रकाश शर्मा4:58 pm

    आपका लेख आईने के समान लगा जो वास्‍तविकता के काफी लिकट है । बहुत बहुत बधाई --ओम प्रकाश शर्मा, राजभाषा प्रमुख, आन्‍ध्रा बैंक, प्रधान कार्यालय, हैदराबाद ।

    उत्तर देंहटाएं

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