मंगलवार, 12 जुलाई 2011

संजय दानी की ग़जल - सहर तो कट जाती है धूप पी पी के, गमों का दरिया सरे-शाम आता है...

कि दस्ते -महबूबा जब जाम आता है, ( महबूबा के हाथों में)
मेरे सर बेलौस इल्ज़ाम आता है।

मुहब्बत के शहर का डाकिया हूं मैं,
कहीं से ख़त मुझको गुमनाम आता है।

सफ़लता का दावा कोई न कर सकता,
इरादा ,मजबूत ही काम आता है।

सहर तो कट जाती है धूप पी पी के,
गमों का दरिया सरे-शाम आता है।

किनारों से दुश्मनी हो गई जब से,
समन्दर से ख़ूब पैग़ाम आता है।

वफ़ाओं की नौकरी में जवानी भर,
हसीनों से दर्दे-अहकाम आता है। (दर्दे- अहकाम - आदेशों का दर्द)

मुझे आलीशान बिस्तर से डर लगता,
सनक की बाहों में आराम आता है।

जहां में ज़ुल्मो सितम बढने लगता जब,
तभी जग में ईसा या राम आता है।

मेरी मां के आंसू थमते नहीं दानी,
ग़ुनाहों में जब मेरा नाम आता है।
---

4 blogger-facebook:

  1. किनारों से दुश्मनी हो गई जब से,
    समन्दर से ख़ूब पैग़ाम आता है।

    पूरी की पूरी ग़ज़ल ही शानदार है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. शुक्रिया विजय वर्मा जी।

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------