संजय दानी की ग़जल - सहर तो कट जाती है धूप पी पी के, गमों का दरिया सरे-शाम आता है...

कि दस्ते -महबूबा जब जाम आता है, ( महबूबा के हाथों में)
मेरे सर बेलौस इल्ज़ाम आता है।

मुहब्बत के शहर का डाकिया हूं मैं,
कहीं से ख़त मुझको गुमनाम आता है।

सफ़लता का दावा कोई न कर सकता,
इरादा ,मजबूत ही काम आता है।

सहर तो कट जाती है धूप पी पी के,
गमों का दरिया सरे-शाम आता है।

किनारों से दुश्मनी हो गई जब से,
समन्दर से ख़ूब पैग़ाम आता है।

वफ़ाओं की नौकरी में जवानी भर,
हसीनों से दर्दे-अहकाम आता है। (दर्दे- अहकाम - आदेशों का दर्द)

मुझे आलीशान बिस्तर से डर लगता,
सनक की बाहों में आराम आता है।

जहां में ज़ुल्मो सितम बढने लगता जब,
तभी जग में ईसा या राम आता है।

मेरी मां के आंसू थमते नहीं दानी,
ग़ुनाहों में जब मेरा नाम आता है।
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4 टिप्पणियाँ "संजय दानी की ग़जल - सहर तो कट जाती है धूप पी पी के, गमों का दरिया सरे-शाम आता है..."

  1. किनारों से दुश्मनी हो गई जब से,
    समन्दर से ख़ूब पैग़ाम आता है।

    पूरी की पूरी ग़ज़ल ही शानदार है.

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  2. शुक्रिया विजय वर्मा जी।

    उत्तर देंहटाएं

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