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ऋता शेखर ‘मधु’ की बाल कविता - शिशु बेचारा

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बाल कविता

शिशु बेचारा

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मैं बेचारा बेबस शिशु

सबके हाथों की कठपुतली

मैं वह करुं जो सब चाहें

कोई न समझे मैं क्या चाहूँ।

 

दादू का मै प्यारा पोता

समझते हैं वह मुझको तोता

दादा बोलो दादी बोलो

खुद तोता बन रट लगाते

मैं ना बोलूँ तो सर खुजाते।

 

सुबह सवेरे दादी आती

ना चाहूँ तो भी उठाती

घंटों बैठी मालिश करती

शरीर मोड़ व्यायाम कराती

यह बात मुझे जरा नहीं भाती।

 

ममा उठते ही दूध बनाती

खाओ पिओ का राग सुनाती

पेट है मेरा छोटा सा

उसको वह नाद समझती

मैं ना खाउँ रुआँसी हो जाती

सुबक सुबक सबको बतलाती।

 

पापा मुझको विद्वान समझते

न्यूटन आर्किमिडिज बताते

चेकोस्लाविया मुझको बुलवाते

मैं नासमझ आँखें झपकाता

अपनी नासमझी पर वह खिसियाते।

 

चाचा मुझको गेंद समझते

झट से ऊपर उछला देते

मेरा दिल धक्-धक् हो जाता

उनका दिल गद्-गद् हो जाता।

 

भइया मेरा बड़ा ही नटखट

खिलौने लेकर भागता सरपट

देख ममा को छुप जाता झटपट

मेरी उससे रहती है खटपट।

 

सबसे प्यारी मेरी बहना

बैठ बगल में मुझे निहारती

कोमल हाथों से मुझे सहलाती

मेरी किलकारी पर खूब मुसकाती

मेरी मूक भाषा समझती

अपनी मरज़ी नहीं है थोपती।

 

दीदी को देख मेरा दिल गाता

“ फूलों का तारों का

सबका कहना है

एक हजा़रों में

मेरी बहना है।”

 

--

ऋता शेखर मधु

जन्म- ३ जुलाई,

पटना,बिहार।

शिक्षा- एम एस सी{वनस्पति शास्त्र}, बी एड.

पटना,बिहार।

रुचि- अध्यापन एवं लेखन

प्रकाशन-इंटरनेट पत्रिका पर कुछ रचनाएँ प्रकाशित

1) अनुभूति - हाइकु

2) हिन्दी हाइकु - हाइकु एवं ३ हाइगा

 

हाइगा का प्रेरणा स्रोत- http://hindihaiku.wordpress.com/

 

हाइगाजापानी पेण्टिंग की एक शैली है,जिसका शाब्दिक अर्थ है-चित्र-कविता हाइगा दो शब्दों के जोड़ से बना है …” हाइ” = कविता या हाइकु + “गा” = रंगचित्र ( चित्रकला ) । हाइगा की शुरुआत १७ शताब्दी में जापान में हुई । हाइगा में तीन तत्व होते हैं – रंगचित्र + हाइकु कविता + सुलेख ।रंगचित्र चाहे हाइकु के बिम्ब न भी बता रहा हो लेकिन इस दोनों में घनिष्ट संबंध होता है । उस जमाने में हाइगा रंग - ब्रुश से बनाया जाता था । लेकिन आज डिजिटल फोटोग्राफी जैसी आधुनिक विधा से हाइगा लिखा जाता है !

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु’-डॉ हरदीप कौर सन्धु

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अबोध बाल मन की व्यथा का क्या खूब चित्रण किया है|
अब मैं जब भी बच्चों के साथ खेलूँगा तो मुझे आपकी कविता
याद आएगी और मैं उसके मन की बातों को समझ सकूँगा|

एक सार्थक और अच्छी बाल-कविता, मधु जी को बधाई।

बहुत प्यारे शब्दों के कोमल तन्तुओं में बँधी और शिशु-मन के भावों को उकेरती हृदयहारी कविता ।

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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