शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

जीतेन्द्र चौधरी का व्यंग्य : हिन्दुस्तान अमरीका बन जाए तो कैसा होगा!

जीतेन्द्र चौधरी

गर अपना हिन्दुस्तान अमरीका बन जाय तो कैसा रहे? अब आइडिया तो बहुत सारे हैं, लेकिन यहां मैं सीमित ही दूंगा. और कोई फुरसतिया होता तो पाँच पन्ने तो लिख ही डालता, लिखेगा भी, लेकिन हम ठहरे कंजूस सिन्धी माढूं, लिहाजा इत्ते से ही काम चलाओ, हाँ तो लो भैया, अब झेलो.

जीवनशैली : सबसे पहले जीवनशैली की बात कर ली जाए. बहुत सारे बदलाव आ जाएंगे. काम वाली गंगू बाई, अपनी टोयोटा कार को बाहर पार्किंग मे खड़ी करके, बर्तन मांजने आएगी. सारा काम घन्टे के हिसाब से होगा, पैमेन्ट भी हफ़्ते-हफ़्ते लेगी, वो भी बैंक एकाउन्ट ट्रान्सफ़र से. अब तो उसकी तरफ़ मुस्कराकर देख भी नहीं सकते, छेड़ना तो बहुत दूर की बात है, नहीं तो दन्न से सेक्स उत्पीड़न का केस ठोंक देगी. फिर लगे रहो, काटते रहो अदालत के आनलाइन चक्कर. बच्चे भी मां-बाप के पैर वगैरह छूना छोड़कर हाय हैलो करेंगे. अपनी गर्लफ्रेन्ड/ब्वाय फ्रेन्ड को घर लायेंगे और बड़ों से कहेंगे, प्राइवेसी प्लीज. बुजुर्गवार बेचारे, पार्क में जाकर अपने हमउम्र साथियों से दुखड़े रोएंगे या छत पर जाकर लैपटाप से अपनी व्यथा कथा अपने ब्लॉग मे लिखेंगे. अब बच्चे बड़ों को सिर्फ़ इन्फार्म करेंगे, आज्ञा नही लिया करेंगे. उदाहरण के लिए आपकी जवान बेटी फोन करके बताएगी कि वह किसके साथ और कहाँ जा रही है और देर रात घर लौटेगी.

बड़े तो बड़े, मजाल है जो छोटे बच्चे पर आपने हाथ भी उठाया, तुरन्त ही पुलिस (नम्बर ९११) को फोन करके मजमा इकट्ठा कर देंगे. वो दिन गए जब आप पड़ोसी से घन्टों बतियाया करते थे, अब तो एक एक शब्द सम्भल सम्भल कर बोलना होता है. पता नहीं कौन-सी बात किसको बुरी लग जाए और वो आप पर चढ़ बैठे. अलबत्ता एक फायदा ज़रूर हो जाएगा, पड़ोसी और रिश्तेदार बिना फोन किए आपके घर नही आएंगे. अगर गाँव से कोई आ भी गया तो उसको फ्रिज में क्या क्या रखा है, फोन पर खाना कैसे आर्डर करते हैं, बताकर आप तो निकल लेंगे, आपकी ज़रूरी मीटिंग जो होगी. पड़ोसी भी बार-बार चाय की पत्ती और प्याज/आलू मांगने नहीं आएगा, आए भी क्यों, गली नुक्कड़ पर वालमार्ट जो खुल गए होंगे.

खानपान : अब समोसे के साथ चटनी की जगह हॉट- सास या मायोनीज डिप मिला करेगा. अब समोसे भी एक अमेरिकन कम्पनी ‘खा-खा-खा’ ने पेटेन्ट करवा लिए है. अब समोसे के ऊपर खा-खा-खा के प्रतीक चिह्न यानि लोगो (लालू) का होना ज़रूरी है, साइज और डायमीटर वगैरह सब फिक्स है, मजाल है जो आपने इसमें अपनी तरफ़ से खुरपैंच करने की कोशिश की. इस कम्पनी के वकीलों की टीम बस इसी काम मे जुटी है, सारी जिन्दगी की जमा पूँजी से हाथ धो बैठोगे. पिज्जा बर्गर काहे नही खाते, वैसे भी अब एक के साथ दो फ्री मिलते हैं. वैसे भी समोसे बहुत महंगे मिलते हैं, फिर हाइजीन का भी लफ़ड़ा है. वैसे किसी डॉक्टर ने तो कहा नही कि समोसे खाओ, बड़े आए समोसे खाने वाले.

चिकित्सा : वो दिन गए जब आप टहलते हुए मोहल्ले के डॉक्टर के क्लीनिक मे जाकर सरदर्द की दवाई ले आते थे. अब अगर आप डॉक्टर के पास जाते हैं, भले ही आपको हल्का-सा पीठदर्द हो, पूरे टेस्ट होंगे, जिनकी रिपोर्ट तीन दिन बाद आएगी, डाकटर खुद दो बार आपको पूर्ण रूप से चैकिंग करेगा, फिर जाकर आपको दवाई मिलेगी. आप कहेंगे कि मेडिकल स्टोर से ले आएंगे, अमां यार किस जमाने की बात कर रहे हो, अब सिर्फ़ एक या दो मेडिकल स्टोर की चेन्स है, वहाँ पर भी आपको दवाई बिना डॉक्टर की पर्ची के नहीं मिलने वाली. लगे रहो... और डॉक्टर के यहाँ जाने के लिए इस पैरा को फिर से पढ़ो. आप कहोगे आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक... सब कुछ बिक गया है, सारी कम्पनियां अपने हिसाब से चलती हैं. वहाँ पर तो पहले आपकी केस स्टडी होगी, फिर दवाई के लिए सोचेंगे वे लोग. डॉक्टर भी आजकल, बहुत टेन्शन में हैं, किसी ने गलत आप्रेशन किया नहीं कि लोग दन्न से अदालत मे घसीट लेते हैं. लेने के देने पड़ जाते हैं.

आप कहेंगे कि योगा, ध्यान कर लेंगे? नही भाई उसके लिए भी आपको पैसे देने पड़ेंगे. स्वामी ध्यानदेव के पोते ने अपनी दादा की सारी योग विद्या एक चीनी कम्पनी को बेच दी और खुद सेन्ट किट्स के पास एक द्वीप खरीदकर ऐशोआराम की जिन्दगी बिता रहा था, सुना है पिछले दिनों एक छींक आने से उसकी मौत हो गयी. चीनी कम्पनी ने इस योगा/ध्यान को पेटेन्ट करा लिया है, अब आप बिना इसकी फीस दिए, कुछ भी नहीं कर सकते. इसलिए अपना क्रेडिट कार्ड निकालो, स्वाइप करो, फिर करो जी भर के योगाभ्यास, वो भी सिर्फ़ आधा घन्टा, नहीं तो दोबारा क्रेडिट कार्ड स्वाइप... समझे ना?

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता : अब आपको अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतन्त्रता मिली हुई है, आप कहेंगे तो वो हमें पहले भी मिली हुई थी. जब हम भारत में रहते हुए नारद को गालिया देते थे, तब तो किसी ने हमें नहीं रोेका. वो भी तो अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता थी. अरे नहीं भाई, वो बात और थी, नारद तो अपने ही थे, इसलिए गालियां सुन लिए थे, बाहर के किसी को सुनाते तो वो भी अभिव्यक्ति की शाब्दिक और शारीरिक स्वतन्त्रता का पाठ पढ़ाता. लेकिन अब आप किसी को भी गरिया सकते हैं, चाहे प्रधानमन्त्री, अरे वो तो अब है ही नहीं, मतलब राष्ट्रपति हो या कोई पुलिस आफिसर. टीशर्ट पर राष्ट्रीय झंडा हो या पैंटी या जूते के सोल पर, कोई कुछ नहीं कहेगा. अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता है भई. अब तो कई लोगों का तकिया कलाम ही क़...त्त् हो गया है, हर व्यक्ति बस देखो इसी शब्द के संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, विश्लेषण और अलंकार प्रयोग करता दिखाई देता है.

वित्तीय स्वावलम्बन : अब आप फाइनेन्श्यली इन्डिपेन्डेन्ट हो गए हैं, आप भी पिताजी भी. अब पिताजी आपको पालते- पोसते नहीं, स्कूल पूरा करते ही, घर से लात पड़ती है, आप खुद पढ़ो खुद कमाओ. स्कूल तक भी इसलिए पढ़ाया कि सरकार फीस भरती है, नहीं तो वो भी सोचते, यहाँ अपनी जान को लाले पड़े हैं तुमको कहाँ से खिलाएं? वो दिन गए जब आप पिताजी से पैसे लेकर धन्धे में डुबोते थे, अब पिताजी भी क्रेडिट कार्ड की किश्तों मे पूरे हो जाते हैं और आप भी. दोनों स्वावलम्बी हो गए हैं. अगर किश्त ना दे सके तो, कोई दिक्कत नहीं, दूसरी क्रेडिट कार्ड कम्पनी लोन देगी ना इस किश्त का पैमेन्ट करने के लिए. लगे रहो मुन्ना भाई, लोन ले, खा पी और मौज कर.

वैसे तो अनेक प्वाइन्ट थे लिखने को, लेकिन फिलहाल इतने से ही काम चलाईये. आखिरी में यही सवाल मन में गूंज रहा था कि क्या सचमुच अपना भारत अमरीका नहीं होता जा रहा है? आपका क्या कहना है?

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साभार - गर्भनाल जुलाई 2011

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