मंगलवार, 26 जुलाई 2011

दामोदर लाल जांगिड़ का गीत - मैंने अपना पहला पहला गीत लिखा है..

damodar lal jangid

मैंने अपना पहला पहला गीत लिखा है

 

इस गीत की गदराई देह आधार नहीं है।

या उन्‍मादित यौवन इसका सार नहीं है॥

मेरे गीत की महा पात्र एक मजदूरिन है,

सतत संधर्षों के गिरवी उसका जीवन है।

 

फटी औढ़नी में भी सौ पैबंद लगे हैं।

नहीं केंचुली की थिगली के तार सगे हैं।

सूखे होंठों पर पपड़ी की परतें जमीं हैं।

धूल सने हैं बाल महकती जुल्‍फ नहीं है।

 

नहीं कहीं श्रृंगार न रस जैसा कुछ इसमें,

घूप, परिश्रम, गंघ पसीने की है जिसमें॥

बस थोड़ा सा ढ़र्रे के विपरीत लिखा है।

मैंने अपना पहला पहला गीत लिखा है॥

 

यह गीत महफिलों में गाने जैसा ना होगा,

जिस पे थिरके पांव स्‍वत वैसा ना होगा।

ना यहां विरह की हूक मिलन पीर जगाती,

अक्‍सर सपनों भी डायन भूख सताती।

 

मिल जाए भर पेट वही दिन पर्व यहां है,

श्रम के बदले पा लेना ही गर्व जहां है।

सदा भूख से लड़ने का प्रयास हुआ है,

बस दो जून की रोटी सबसे बड़ी दुआ है।

 

दुुबली पतली चंद हड्डियों को भी तोडीं,

मगर अभावों से लड़ने की जिद छोड़ी।

नहीं कल्‍पना तनिक, यथार्त लिखा है,

मैंने अपना पहला पहला गीत लिखा है

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दामोदर लाल जांगिड़

3 blogger-facebook:

  1. वरिष्ठ जनों के स्वाभिमान को अभिव्यक्त कराती शानदार कविता है |

    उत्तर देंहटाएं
  2. नहीं कल्‍पना तनिक, यथातथनीत लिखा है
    मैंने अपना पहला पहला गीत लिखा है

    उत्तर देंहटाएं

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