मंगलवार, 12 जुलाई 2011

हरदीप कौर संधु की एक चोका*

स्वर्ग-का-फूल-गुलमोहर

{गुलमोहर - चोका}*


गुलमोहर

है राज-आभरण**

स्वर्ग-का-फूल***

फर्न जैसी पत्तियाँ

झिलमिलाती

बड़े गुच्छों में फूल

फूलों से सजा

ये दिखता है जैसे

हो दावानल !

दहकते हैं फूल

आग के जैसे

सहते हैं जब ये

सूर्य का ताप

वो फूलों का दुशाला

लाल-नारंगी

ओढ़कर सहता

भीषण गर्मी

दे आँखों को ठंडक

आए शबाब

यूँ गर्मी में निखार

पेड़ों पर बहार !

--

 

*[चोका=जापानी लम्बी कविता, जिसमें 5+7……के क्रम में कविता लिखी जाती है और अंत में एक ताँका [5+7-5+7+7] जोड़ दिया जाता है ।

**संस्कृत में इसका नाम 'राज-आभरण' है, जिसका अर्थ राजसी आभूषणों से सजा हुआ वृक्ष है।

***फ्रांसीसियों ने गुलमोहर को 'स्वर्ग का फूल' नाम दिया है!

---

डॉ. हरदीप कौर सन्धु 

(सिडनी - आस्ट्रेलिया )

8 blogger-facebook:

  1. वाह ...बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस गुलमोहर के क्या कहने ... बहुत लाजवाब प्रस्तुति है .. और चोका विधा की जानकारी के लिए शुक्रिया ..

    उत्तर देंहटाएं
  3. ये फूल और पेड़, सदा ही मेरा मन खींच अपने पास रख लेते हैं....

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच

    उत्तर देंहटाएं
  5. मेरी कविता [चोका]पर अपने विचारों से अवगत कराने के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार।
    इसी तरह स्नेह बनाएं रखें।

    उत्तर देंहटाएं
  6. गुलमोहर पर इतना सुन्दर शब्द चित्र में बँधा चोका हरदीप जी ! आपकी यह रचना बहुत खूब सूरत है ।

    उत्तर देंहटाएं

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