शनिवार, 9 जुलाई 2011

त्रिलोक सिंह ठकुरेला के कुछ नवगीत

cloud

नवगीत

शंखनाद के सुर

 

अंधा राजा,

मौन सभासद,

दुःखी हस्‍तिनापुर।

जगह जगह पर

द्यूत-सभा के

मंडप सजे हुए

और पाण्‍डवों के

चेहरों पर

बारह बजे हुए

चीरहरण के लिए

दुःशासन

बार-बार आतुर।

 

भीष्‍म

उचित अनुचित की

गणना करना भूल रहे

विवश प्रजा के सपने

बीच हवा में

झूल रहे

छिपी कुटिलता

चट कर जाती

सच के नव अंकुर।

 

होगा

आने वाले कल में

एक महाभारत

कुटिल कौरवों को

फिर करना होगा

क्षत विक्षत

सुनने में आ रहे

अभी से

शंखनाद के सुर।

 

--

सारा गांव खड़ा

 

रामरती के

घर के आगे

सारा गांव खड़ा।

 

उम्र गयी

पर गया न घर से

दुःखदायी टोटा

नौ दो ग्‍यारह हुए

अन्‍ततः

थाली और लोटा

एकाकीपन

झेल रहा है

कोने रखा घड़ा।

 

कभी नमक से

कभी अलोनी

जैसी थी खा ली

पर भरपेट मिली

जीवन भर

मुखिया की गाली

कौन भला

उसके मुँह लगता

वह लम्‍बा तगड़ा।

 

खून पसीना

एक कर दिये

जीवन भर तरसी,

उसके आँगन

सुख की बदली

कभी नही बरसी,

क्रूर काल का

कठिन हथौड़ा

सिर पर आज पड़ा।

----

 

दिन बहुरेंगे

 

 

सुनो,

पेंशन शुरू हो रही

अम्‍मां जी के दिन बहुरेंगे।

 

रखने लगी

खयाल अधिक ही

बड़ी बहूरानी

सुबह शाम

छोटी रख जाती

सिरहाने पानी

बेटों ने भी

अब यह सोचा

माँ है, मान अधिक देंगे।

 

पोता कहता

पड़ों न अम्‍मां

किसी झमेले में,

अब की बार

तुम्‍हें लेकर

जाऊँगा मेले में,

कई खिलौने

घर लायेंगे,

दोनों कुछ खा पी लेंगे।

 

उधर फोन पर

उनकी बेटी

जैसे झूल गयी

बोली - अम्‍मां!

क्‍या अपनी बेटी को

भूल गयी

लड़कों को तो

सब देते है

क्‍या बेटी को कुछ समझेंगे।

 

-

सीता डरी हुई

 

 

पर्ण कुटी के पास

दशानन,

सीता डरी हुई।

 

स्‍वर्ण-मृगों के

मोहजाल में

राम चले जाते

लक्ष्‍मण को

पीछे दौड़ाते

दुनिया के नाते,

उधर कपट से

मारीचों की

वाणी भरी हुई

 

छद्‌म आवरण पहन

कुटिलता

फैलाती झोली,

वाग्‍जाल में

उलझ रही हैं

सीताऐं भोली,

विश्‍वासों की

मानस-काया तो

अधमरी हुई ।

 

हो भविष्‍य के पन्‍नों पर

ऐसा

कोई कल हो,

व्‍याघ्र दृष्‍टि की

लोलुपता का

कोई तो हल हो,

अभी व्‍यवस्‍था

दुष्‍ट जनों की ही

सहचरी हुई।

---

 

- त्रिलोक सिंह ठकुरेला

बंगला सं.-एल 99,

रेलवे चिकित्‍सालय के सामने

आबूरोड-307026 (राजस्‍थान)

मो-9460714267

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