गुरुवार, 21 जुलाई 2011

दीप्ति परमार का आलेख : दलितोद्धारक : भगवान स्वामिनारायण

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गवान स्वामिनारायण का अवतरण उत्तर प्रदेश में अयोध्या के पास छपैया गाँव में विक्रम संवत् 1837 में चैत्र शुक्ला नवमी (इ ़स ़1781ए 3 अप्रैल ) को हुआ। सिर्फ आठ साल की आयु में उन्होंने वेद, उपनिषद, भागवत, रामायण आदि शास्त्रों का अघ्ययन करके काशी में आयोजित पंडित परिषद् के प्रकांड पंडितों के साथ तत्त्वज्ञान की चर्चा करके सबको आश्चर्य चकित कर दिया था। ग्यारह साल की आयु में गृहत्याग करके उन्होंने समग्र भारत एवं नेपाल, भूटान, चीन, बांगलादेश एवं बर्मा के कुछ भागों सहित लगभग 13000 किमी की यात्रा की। अठारह साल की आयु में वन विचरण करते हुए गुजरात में पधारे और बाद में गुजरात को ही अपनी कर्मभूमि बनाकर लगातार अट्ठाईस साल तक इसी भूमि पर धर्म एवं समाज के उत्कर्ष का कार्य किया।

स्वामिनारायण संप्रदाय की स्थापना करने वाले भगवान स्वामिनारायण का कार्य जितना आध्यात्मिक उत्कर्ष का रहा उतना ही सामाजिक उत्कर्ष का भी। इस संप्रदाय ने समाज के उत्कर्ष को ध्यान में रखते हुए अनेक कदम उठाये। भगवान स्वामिनारायण के अद्वितीय प्रदान की टिप्पणी करते हुए गांधीवादी चिंतक किशोरीलाल मशरूवाला ने स्पष्ट किया है- ‘‘ अपने प्रकाश से अनेक के हृदयों को प्रकाशित करनेवाले, काठी, कोली जैसे अनेकों की चौर्यवृत्तियों को चुरा लेनेवाले, लुप्त हुए ब्रह्मचार्याश्रम को पुनः स्थापित करनेवाले, निरंकुश और स्वच्छंदी बने हुए त्यागाश्रम को उज्जवल करनेवाले,पतित हुए गुरुओं एवं आचार्यो के लिए संयम का आदर्श स्थापित करनेवाले,स्त्रियों को समाज तथा संप्रदाय में महत्वपूर्ण स्थान देकर उनकी उन्नति करनेवाले, अहिंदुओं को हिंदू धर्म में शामिल करनेवाले, शूद्रों को आचारशुद्धि सिखाने वाले, साहित्य, संगीत तथा कला के पोषक, अहिंसामय यज्ञ के प्रवर्तक, क्षमाधर्म के उपदेशक, शौच एवं सदाचार के संस्थापक, शुद्ध भक्ति मार्ग और शुद्ध ज्ञानमार्ग के चालक, भागवतधर्म के शिक्षक तथा व्यास सिद्धांत के बोधक सहजानंद स्वामी थे।’’ 1   

भगवान स्वामीनारायण जानते थे कि ज्ञाति और वर्ण भेद समाज के लिए अभिशाप है। इसे मिटाकर इस संप्रदाय ने समाज को सुगठित किया। भगवान स्वामिनारायण द्वारा किये गये अनेक जन-उद्धार के कार्यो में उनके द्वारा हुआ दलितोद्धार का कार्य एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक कार्य है।

महात्मा गांधी, सयाजीराव गायकवाड, दुर्गाराम महेता, मणिशंकर रत्नाजी, ज्योतिराव फूले और बी आर शिंदे तथा र्डा बाबा साहब आम्बेडकर के आगमन के कई साल पहले भगवान स्वामिनारायण ने दलितों के उद्धार का कार्य प्रारंभ कर दिया था। इस दृष्टि से भारत के ही नहीं विश्व के प्रथम दलितोद्धारक एवं समाज सुधारक भगवान स्वामिनारायण ही ठहरते हैं। अंग्रेजों का शासन काल होने के कारण उनके साथ आये पादरी तथा उससे प्रभावित धर्म सुधारकों के साथ भगवान स्वामिनारायण की कार्य पद्धति की तुलना करते हुए एम सी पारेख लिखते हैं-‘‘ अन्य सुधारकों और भगवान स्वामिनारायण के बीच भेद यह है कि जब और सुधारक एक या दूसरी तरह पाश्चात्य जगत की असरों से ग्रसित होकर लोगों को प्रभावित करते तब वे (भगवान स्वामिनारायण) किसी भी विदेशी प्रभाव से मुक्त रहकर पूर्व के सुधारकों और उपदेशकों की तरह मानसिक एवं आध्यात्मिक रूप से संपूर्ण भारतीय थे। इस कारण वे अपने समय के सुधारकों में अद्वितीय बने रहे हैं, क्योंकि उनमें हमें सबसे अधिक शुद्धता और मूल रूप में हिन्दुत्व के ही दर्शन होते हैं ’’ 2

भगवान स्वामिनारायण की मौजूदगी में ही सन् 1823 में लंदन से प्रकाशित ‘एशियाटिक जर्नल’ में भगवान स्वामिनारायण द्वारा किये गये आमूल परिवर्तनों को इन शब्दों में रेखांकित किया गया है- ‘‘ उनके पूरे जीवन काल में उनके विस्तार में सबसे कुशाग्र लोग होते हुए भी उन्हें (अंग्रेजों के धर्म प्रचारकों को) भी उनके (भगवान स्वामिनारायण के) जाति समतुलन की व्यवस्था से आश्चर्य होता था और वे मानते है कि उनके उपदेश लोगों के मूल्य परिवर्तन विषयक विचारों में जबरदस्त असर पैदा कर रहे हैं।’’ 3  

भगवान स्वामिनारायण के अनेक आयामी जन उद्धार के महाकार्यों में उनके द्वारा किया गया दलितोद्धारक का कार्य अनूठा एवं अद्वितीय है। उन्होंने दलितोद्धारक के रूप में कुछ ऐसे विचार प्रस्तुत किये जो आज भी प्रेरक एवं सटीक हैं। उनकी दीर्घ द्दष्टि ने दलितों को एक ऐसी वैचारिक भूमि प्रदान की जिससे आचार शुद्धि धर्म नियम की द्दष्टि से वे ब्राह्मणों को भी पीछे छोड़ गये। ऐसे प्रसंगो के उदाहरणों से संप्रदाय का इतिहास भरा पड़ा है।

समाज सुधारक एवं दलितोद्धारक के रूप में भगवान स्वामिनारायण द्वारा की गयी क्रांति शांत थी उसमें आक्रोश, उद्वेग नहीं शांत शास्त्रीय अभिगम था। श्रीहरि ने वर्णाश्रम व्यवस्था की शृंखला तोड़ने के बदले समाज को एक नयी राह दिखायी। श्रीहरि के विचार थे -‘‘ जन्म से निम्न हो उसे कर्म से क्यों श्रेष्ठ नहीं बनाया जा सकता ?’’ संस्कार द्वारा श्रेष्ठ वर्ण में पहुँचने की प्राचीन परंपरा जो भारतीय मध्यकालीन समय में विलुप्त हो चुकी थी उसे भगवान स्वामिनारायण ने अपनाकर अपने समय में एक नयी वैचारिक क्रांति की। इस वैचारिक क्रांति को शब्द देते हुए किशोरीलाल मशरूवाला लिखते है- ‘‘निम्न जातियों को सुसंस्कृत बनाने की भगवान स्वामिनारायण की पद्धति अलग थी। उनके विचार उच्च जातियों को निम्न जातियों के साथ मिलाकर उच्च जातियों में निम्न संस्कार फैलाना नहीं था, बल्कि निम्न जातियों को उँचा उठाकर उनमें उच्च जाति के संस्कार सिंचन करना था। इसलिए उन्होंने हरिजन,मोची,खेत मजदूर और मुसलमान तक को भी शुद्ध ब्राह्मण जैसी जीवन शैली सीखा दी।’’ 4 

भगवान स्वामिनारायण ने दलितों के उद्धार के लिए नया रचनात्मक अभिगम अपनाया था ‘‘ जाति नहीं, कर्म को बदलो, जाति नहीं स्वयं को बदलो।’’ श्रीहरि ने निम्न पिछड़ी जातियों के लोगों में जो संस्कार सिंचन किया और उनके जीवन में जो आमूल परिवर्तन किया वह आज भी अकल्पनीय लगता है। कविवर न्हानालाल लिखते है-‘‘श्रीजी प्रवर्तित धर्ममार्ग की लाक्षणिकता क्या कही जा सकती है ? यह धर्ममार्ग है आचार स्वच्छता का, विचार स्वच्छता का, आंतर स्वच्छता का सर्वदेशीय अन्तर्बहिर्स्वच्छता का। स्वामिनारायण संप्रदाय याने स्वच्छता का संप्रदाय। उसका उजलापन ही अनोखा है। ’’ भगवान स्वामिनारायण ने काठी, कोली, हरिजन,वाघरी, जुलाहा, शुद्र, खेत मजदूर जैसी निम्न जातियों को सद्गुणी बनाकर उनका नैतिक उत्थान किया। यह भगवान स्वामिनारायण का एक चमत्कार ही था। भगवान स्वामिनारायण द्वारा लोगों के जीवन में आये हुए नैतिक उत्थान को देखकर हिबर ने लिखा है-‘‘उन्होंने (भगवान स्वामिनारायण) अपने शिष्यों को नजदीक से निकल रही किसी भी स्त्री की ओर न देखने की बात कहकर शुद्धता का चरम-बोध दिया था। निम्न स्तर के गाँवो से लेकर शहरों के समग्र विस्तार के शिष्यों ने श्रेष्ठ और अनुशासित बन कर उसे स्वीकार किया है।’’ 5  

गुजरात का राजकीय एवं सांस्कृतिक इतिहास भगवान स्वामिनारायण द्वारा की गयी दलितों की उत्क्रांति की प्रक्रिया को उल्लेखित करते हुए शब्दांकित करता है-‘‘निम्न जातियों में संस्कार एवं मूल्य सिंचन का जो कार्य भगवान स्वामिनारायण ने किया वह अद्वितीय है। निम्न जातियों में उच्च सांस्कृतिक मूल्यों का सिंचन करके उसे उच्च स्थान पर पहुँचाने का कार्य सहजानंद स्वामी के सुधारों में केन्द्र स्थान पर था। ’’ 6 

तत्कालीन समाज में अनेक संघर्षों का सामना करते हुए भगवान स्वामिनारायण ने पीढ़ियों से नर्क जैसी परिस्थितियों में जीवन बिता रही निम्न सामान्य प्रजा में आचार और विचार शुद्धि करके उनके व्यक्तित्व को उन्नत किया। उनके द्वारा किये गये दलितों के उर्ध्वीकरण की प्रक्रिया को यशवंत शुक्ल ‘संस्क्रिटाइझेशन’ कहते है। 7

जिस समय ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ जैसे नारी के सम्माननीय वचन पुस्तक में रह गये थे और सती प्रथा और निर्दोष बालाओं को दूध में डूबोकर मार डालने की कुप्रथा  ने स्त्रियों की अवदशा में कुछ शेष नहीं रहने दिया था, उस समय भगवान स्वामिनारायण ने प्रशंसनीय कार्य किया। सती प्रथा और बालिका को दूध में डुबोकर मार डालने की प्रथा को दूर कर उसे समाज में गौरवपूर्ण जीने का अधिकार दिया। जिस समय में स्त्री शिक्षण की ओर दुर्लक्ष रखा जाता था, उस समय भगवान स्वामिनारायण ने स्त्रियों को साक्षरता के पथ पर अग्रसर किया। जब गुजरात में कन्याशाला की शुरूआत हुई तब प्रथम शिक्षिकाओं के रूप में स्वामिनारायण संप्रदाय की महिलाएँ ही थी।

इतिहास के पन्नों पर द्दष्टिपात करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि भगवान स्वामिनारायण द्वारा किये गये इस दिव्य कार्य ने तत्कालीन राजकीय, सामाजिक,धार्मिक अंधकारपूर्ण स्थिति में उजाला फैला दिया। निष्कुलानंद स्वामी के शब्दों में-                          ‘‘ आनंद आप्यो अति घणो रे, आ समा मां अलबेल                           दुर्बल  ना  दुःख  कापिया रे, न  जोइ  जात  कजात                                                         पुरुषोत्तम प्रगटी रे। ’’ आज भी भगवान स्वामिनारायण के शिष्यों और संतों द्वारा दलितों के समग्र विकास का अद्भुत कार्य हो रहा है।

संदर्भ-  1  स्वामिनारायण संप्रदाय- किशोरीलाल मशरूवाला, पृष्ठ- 59  2 श्री स्वामिनारायण-  एम सी पारेख, पृष्ठ- 92  3  एशियाटिक जर्नल,फस्ट सीरिझ, लंदन,1923, पृष्ठ-348  4   स्वामिनारायण संप्रदाय- किशोरीलाल मशरूवाला, पृष्ठ-63 5  नेरेटिव आफ जर्नी थ्रु द अपर प्रोविन्सीस आफ इंडिया फ्रोम कलकत्ता टु मुंबई- 1824.25    वाल्यूम 2, रिजिनाल्ड हीबर, पृष्ठ- 107 6  गुजरात नो राजकीय अने सांस्कृतिक इतिहास, मराठा काल, पृष्ठ-318ए 319 7   इतिहास ना संदर्भ मां स्वामिनारायण संप्रदाय नुं प्रदान- लेख से, यशवंत शुक्ल पृष्ठ- 126  

---  डॉ दीप्ति बी  परमार एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी-विभाग, आर ़आर ़पटेल महिला महाविद्यालय, सौराष्ट्र विश्वविद्यालय, राजकोट

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  1. सरक-सरक के निसरती, निसर निसोत निवात |
    चर्चा-मंच पे आ जमी, पिछली बीती रात ||

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  2. भगवान स्‍वामिनारायण का सामाजिक उत्‍थान का कार्य समग्र विश्‍व के लिए प्रेरणा स्‍त्रोत है । उन्‍हों ने आचार शुद्धि,चरित्र शुद्धि,नैतिकता,स्‍वच्‍छता व्‍यवहार आदि को महत्ता प्रदान की है । उनका यह संदेश केवल संप्रदाय तक सीमित न रहकर समग्र मानव जाति के लिए प्रेरक है । भगवान स्‍वामिनारायण ने सामाजिक उत्‍थान का यह कार्य ऐसे समय में किया जब भारत वर्ष की धार्मिक,सामाजिक,एवं राजनीतिक स्थिति शोचनीय थी । ऐसी विकट परिस्थिति में भगवान स्‍वामिनारायण ने लोगों का सही दिशा निर्देशन किया । एक तरह से उन्‍होंने नि:शस्‍त्र क्रांति की थी । भगवान स्‍वामिनारायण का विशुद्ध व्‍यक्तित्‍व और समाज कल्‍याण की भावना ने नवयुग के निर्माण की नींव रखी ।
    डा.दिप्तिजी ने सामाजिक उत्‍थान में भगवान स्‍वामिनारायण के योगदान को प्रस्‍तुत कर प्रशंशनीय कार्य किया है । इसी संदर्भ में डा. दिप्तिजी का 'ताप्तिलोक'के 16 जुलाई 2008 के अंक में छपा आलेख 'सर्वजीवहितावह ग्रंथ:शिक्षापत्री' उल्‍लेखनीय है ।

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  3. सुन्दर लेख....
    मुझे गर्व है कि मैं प्रभु स्वामी नारायण के जन्मस्थल-जनपद गोंडा का निवासी हूँ |

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