विजय वर्मा की बाल कविताएँ

तितलियाँ और बच्चे
         [१] 

कितनी प्यारी 

तितलियाँ सारी 

फूलों पर  मंडराती 

   इतराती..!

 

विस्तृत- नव में 

विचरण करती.,

पंख फैलाती,

नीचे आती.,

फिर चपला-सी

ओझल हो जाती.

 

आज क्यूँ बेचैन-व्यग्र है?

क्यूँ ग़ुमशुम है इनका मन?

क्या फूलों पर है पहरा बैठा,

या बगिया में अब नहीं सुमन?

 

        [२]

हँसते-खेलते 

छगन-मगन

रखना सहेजकर 

इनका बचपन.

 

ग़ुम है जीवन के 

आप-धापी में ,

बीते हर पल 

पुस्तक-कॉपी में 

पीठ पे बस्ता भारी 

होमवर्क की टेंसन सारी.

 

अगर कुछ पल बच जाता है 

इंटरनेट बुला लेता है.

है मुझे पता,है तुम्हे पता 

बचपन वहां क्या पाता है.

,

-- 

v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

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