रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

August 2011
 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari

हम जानते हैं

हर इंसान में

सरकार होती है

एक दिन के लिए

जिम्‍मा मिले तो

आश्‍वस्‍त करता हूं

दर्द की परछाइयाँ

भूली-बिसरी बात होगी

बदल जायेगी

सत्‍ता की परिभाषा

नहीं होगी

घोटाले बाज की बेल

अन्‍ना को जेल

संसद, सांसदों की नही

जनता की होगी

जन के अधिकारों की

अब नही कटौती होगी

होने को कुछ भी हो सकता है ?

हे राम !

अलविदा भाजपा

या कांग्रेस

बेमानी लोकशाही

जब लोक के लिए होगी

जनता तब

चुप नहीं होगी।

---

 

-सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

राजसदन- 120/132

बेलदारी लेन, लालबाग

लखनऊ

मो0ः 9415508695

image

  तुम्हारे आलीशान बंगले की 

रखवाली करता हुआ मेरा चाचा 

केवल तुम्हें अच्छी लगने के कारण

तुम्हारे हरम में आजन्म कुँआरी बैठी मेरी बुआ 

गली-गली तुम्हारी विरुदावली 

गाता हुआ मेरा मामा 

तुम्हारी आलीशान कोठी 

और कोठे का मुनीम 

मेरा मौसिया

तुम्हारी मीठी-मीठी  बातों में आकर 

बेगार कर रहे नौकर-चाकर हों या 

वसीयत करके घर बैठे हुए मेरे पिता

लगता है सब के सब बौरा गए हैं 

सबकेसब सड़क पर हैं मेरे आका!

और,

पूरा कापूरा हरम खाली पड़ा है सरकार!

 

तुम्हारे बहादुर सिपाही बेहद डरे हुए हैं 

उनके मुगलिया पाजामे गीले 

और नाड़े ढीले हो गए हैं 

उनकी संगीनें गमगीन हैं 

इक्कीस तोपों की एक साथ सलामी देने वाले 

तुम्हारे बड़के तोपची तोपोंमें गोलों की ज़गह

अपने-अपने मुँह तोपे पड़े हैं 

तुम्हारे पाले हुए सारे तोते 

या तो खुद उड़ गए हैं या उड़ा दिए गए हैं

'तू कौन है बे! दीवाने खास में..' 

मैं... मैं..! 

 

आपके पवित्र पैरों की गंदी जूती 

बेहद आम से बना खास 

दासानुदास..

सरकार!! 

गुलाम से सूबेदार  

'अच्छा...अच्छा!! 

 

जाओ डराओ,बहलाओ, फुसलाओ चुग्गा डालो   

कुछ भी करो   

पर उन्हें उनकी अपनी पुरानी जगहों पर पहुँचाओ' 

'स्वामी' ! ये पागल हाथी हो रहे हैं 

इतनी ज़ंज़ीरें कहाँ धरी हैं अपने पास  

अब और लंबा नहीं चल पायेगा यह व्यापार 

अब और नहीं बरगला पाओगे सरकार!

image

ग़ज़ल

जो सुने ना प्रजा की हुंकार ।

बिलकुल बहरी है सरकार॥

 

प्रजातंत्र की पीर अपार,

बन गयी ‘अन्‍ना' का दरबार।

 

राज मुकुट सिंहासन डोले,

सुन कर ‘अन्‍ना' की ललकार।

 

डटे रहेंगे डट कर जो हम,

झुक जायेगी ये सरकार।

 

कई साल से सोयी थी जो,

जागी जनता फिर इक बार।

 

उनके तेवर देखे समझा,

क्‍यो पसरा हैं भ्रष्‍टाचार।

 

प्रजातंत्र की हर धमनी में,

हुआ नये खून का फिर संचार।

image

उदासी (हाइकु)

 

1

छोड़ो उदासी

कि नदिया भी प्यासी

मिले न जल

2

बीता है आज

रीता बहुत कुछ

भरेगा कल

3

मूँदो न नैना

देखो इधर भी

धारा तरल

4

दूर नभ में

चुप तारा अकेला

खोजे मीत को

5

रजनी-वधू

आँचल में समेटे

मधु प्रीत को

6

तेरी उदासी

मुझ पर है भारी

स्मित बिखेरो

7

छाई उदासी

मन-मरुभूमि में

अँखियाँ प्यासी

8

बाट है सूनी

नहीं आया बटोही

व्यथा है दूनी

9

कुछ न सूझे

गुमसुम आँगन

भीगा है मन

10

मन में क्या है ?

मन ही नहीं जाने

किए जतन

11

तारे गिनते

सब रातें कटतीं

नींद उड़ी है

12

किससे पूछें-

हो सुधियों से तर

हूक उठी क्यों ?

-0-

‘‘जाही विधि राखे राम, ताही विधि रहिए’’ वाक्य को तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में जिस सन्दर्भ में कहा है उसमें प्राणी मात्र की एक निरीहता ही प्रकट होती है किन्तु यदि इसकी गहराई में उतरा जाए तो सभी प्राणी हजार झंझटों से सहज ही बच सकते हैं।

जाही विधि राखे राम,राम यानि आपका संरक्षक, आपका रोजगार दाता, आपका पड़ोसी या फिर आपका एक्स वाई जेड...

ये एक ऐसी पंक्ति है जो आपको कदम-कदम पर संरक्षा प्रदान करेगी,आपके अशाान्त मन को शीतलता प्रदान करेगी और आपको अनेक झंझटों से मुक्ति दिला देगी। इस बात के एक नहीं अनेक उदाहरण आपके आस-पास ही नहीं चहुँ ओर बिखरे पड़े हैं।

अब देखिए, आपने अपने घर के बाहर दीवार के सहारे बार-बार उग आने वाली घास एवं गंदगी से निजात पाने के लिए अपने घर के सामने पक्का फर्स बनवा दिया। ‘‘वाह क्या बात है, बहुत सुन्दर लग रहा है अब तो घर के सामने’’, देखने वालों ने प्रशंसा की तो आपकी आत्मा भी बाग-बाग हो उठी। कुछ दिन बाद आपने अपने घर के सामने पक्के बनवाए फर्स पर अपनी मोटर साईकिल खड़ी करने का आनंद भी उठाना शुरु कर दिया। मगर आपकी आत्मा में एक चीत्कार तब उठने लगी जब आपके पड़ोसी श्री लट्ठछाप चौधरी साहब ने अपना कीच में सना बदबूदार ट्रैक्टर आपके सामने के फर्स पर खड़ा करना शुरु कर दिया। ट्रैक्टर खड़ा होने पर इतनी जगह भी नहीं बची कि आपकी मोटर साईकिल भी खड़ी हो सके। साथ ही घर के आगे गंदगी का साम्राज्य स्थापित हुआ सो अलग से।

अब आप क्या करेंगे यदि पड़ोसी समझदार हुए तो आपकी बात रखने के लिए आगे से ट्रैक्टर वहाँ नहीं खड़ा करेंगे और यदि पड़ोसी को पंचायत का फैसला सिर माथे पै पर ‘‘पनारों वही गिरैगौ’’ वाली कहावत पसंद हो तो....तो फिर आप अपना संतुलन खोना शुरु कर देंगे। अपने मुखारबिन्द से यदि गालियाँ उच्चारित करेंगे तो पड़ोसी धर्म की और अधिक हानि होगी और फिर पड़ोसी को छींक आने या जुकाम होने पर भी आपका ही हाथ नजर आएगा। यदि आप पड़ोसी की तुलना में धन-बल में 19 हुए तो पड़ोसी आपको अनेक बहानों से सताने में कोई कसर बाकी नहीं रखेगा। फिर आपका रक्तचाप उच्च हो जाएगा। आप समय कुसमय डाक्टर, वैद्यों के चक्कर लगाना शुरु कर देंगे और फिर किसी दिन अचानक ही ऊपर वारे को प्यारे हो जाऐंगे। तो भई, ऐसे में सारी विषमताओं से बचने का एक ही सीधा सा सरल सा उपाय है- मन में तसल्ली कि‘‘ जाही विधि राखे पड़ोसी, ताहि विधि रहिए’’ , इस वाक्य के सोचते ही देखिए दिल को कैसी शीतलता एवं शान्ति प्राप्त होती है। और यदि ना भी हो तो आप पड़ोसी का कौन सा ट्रैक्टर उखाड़ लेंगे।

पड़ोसी धर्म पर बात चली तो बताता चलूँ कि इस पृथ्वी लोक पर पड़ोसियों की जितनी वैरायटी प्रभु ने पैदा करके भेजी हैं उतनी तो शायद ही किसी की हों। भाँति-भाँति के पड़ोसी भाँति-भाँति की सोच।

अब देखिए अपने शर्मा जी को ही देखिए। बेचारे इतने भोले और इतने भले हैं कि बस पूछो ही मत....हर समय अपने अड़ोसी-पड़ोसी कुठारसिंह और फावड़ासिंह का ख्याल रखते हैं और इसलिए अपने किचिन-गार्डन में उगी साग-सब्जियाँ तोड़-तोड़ कर पड़ोसियों को बांटते रहते हैं । कभी लौकी, कभी तोरई तो कभी पालक और मैथी। लेकिन कुठारसिंह और फावड़ासिंह की मेहरबानी देखिए कि कुछ दिन तक शर्मा जी ने इनके यहाँ ये सब चीजें नहीं पहुँचाईं तो उनकी पत्नियों ने एक दिन शर्मा जी के किचिन गार्डन में घुसकर लौकी-तोरई आदि की सारी बेल ही उखाड़ फैंकी कहते हुए कि ‘‘इनपें जब फल ही नाँय आय रहे तो काहे कूँ जगह घेर रखी है बेकार।’’

शाम को शर्मा जी ने अपने बच्चों की चिल्ल पौं और किचिन गार्डन की सफाई देखी तो उफन पड़े पर पड़ोसी कुठार सिंह व फावड़ा सिंह के कुठार और फावड़े के स्मरण ने उन्हें सद्बुद्धि प्रदान की और वे ये सोचकर तसल्ली कर गए कि चलो देर सबेर किचिन गार्डन की सफाई तो करनी ही थी। पड़ोसियों ने ही हाथ बंटा दिया। कितने अच्छे पड़ोसी है और फिर मनुष्य की क्या चलती है। जाही विधि राखे....

सेठ मुलायम के पड़ोसी कठोरसिंह ने अपने घर के सामने, घर निर्माण के दौरान बचे अध्दा-रोड़ा और कूड़े- कचरे को इकट्ठा करके सेठ मुलायम के घर के सामने डलवा दिया। देखकर सेठ मुलायम व उनके बीवी बच्चे पहले तो खूब तिलमिलाए पर कठोर सिंह के बन्दूकछाप व्यवहार को स्मरण कर उनकी झुरझुरी छूटने लगी तो उन्होंने अपने मन और बच्चों को समझा दिया- ‘‘अरे, क्यों शोर करते हो, देखो घर के आगे अब इतना ऊँचा हो गया है कि अपनी गाड़ी जिसे घर ऊँचा होने के कारण बाहर असुरक्षित तरीके से रखना पड़ता था अब घर के अन्दर पोर्च में खड़ी हो जाया करेगी।’’

खुद गिट्टी मिट्टी डलवाते तो बेकार में ही पैसा खर्च करना पड़ता। वाह! ऊपर वारे तेरी बड़ी मेहरबानी। जाही विधि राखे.... सोचते ही मुलायम सेठ के सीने में पिपरमेंट जैसी ठण्डक पड़ गई।

एक और किस्सा आपको सुनाता हूँ, कुछ विभागों में जितने चतुर-चालाक होते हैं अधिकारी, उनसे भी अधिक चंट- चालाक हो जाते हैं उनके मातहत। रामलखनवा जब दूर-दराज के अपने इलाके से इस विभाग में नौकरी करने आया तो बेचारा बहुत ही सीधा-सादा प्राणी था। किसी के भी छल को समझता ही नहीं था। उसके सरल व्यवहार को देखकर उसके बॉस मल्होत्रा जी ने उसे अपने घर पर काम करने के लिए रख लिया। अजी वेतन पर थोड़े ही, वैसे ही, वैसे ही याने वैसे ही, विभागीय साहब का विभागीय घरेलू कर्मचारी।

अब रामलखनवा सुबह ही पाँच बजे साहब के बंगला पर बाँग देने लगा और सिंक में पड़े रातभर के उनके जूठे बर्तनों को धो-पौंछ कर रखने के बाद पूरे बंगले में झाड़ू-पौछा भी लगाने लगा। फिर मेमसाब द्वारा बनाऐ खाने को टिफिन में सजा कर साहब के साथ साइट पर पहुँच जाता। कभी-कभार दोपहर में साब के बीबी- बच्चों के कपड़े भी धोने लगा। साब इसके एवज में उसको खूब यात्रा-भत्ता आदि दिलवाते।

मल्होत्रा साहब ही नहीं उनकी बीबी व बच्चे भी रामलखनवा की सेवा से आनंदित थे। ये बात रामलखनवा को भी महसूस हो गई थी सो वह भी खूब दबा कर भत्ता भरता। साब का दौरा जहाँ-जहाँ भी होता, रामलखनवा जाए या ना जाए उसका भी भत्ता जरूर भरा जाता और इस तरह रामलखनवा और साब दोनों ने मिलकर विभाग की खूब ही सेवा की। इतना ही नहीं साइट पर दिन-रात रगड़े जा रहे कर्मचारियों के प्रशंसनीय कार्य को देखने व समझने के लिए तो साब को अन्य मातहतों, बाबू आदि की आँखों का च़श्मा पहनना पड़ता, पर रामलखनवा के प्रशंसात्मक कार्य के लिए उन्होंने विभाग से अनेक बार पुरस्कार दिलवाए।

धीरे-धीरे रामलखनवा साब और मेमसाब की संगति में और भी बहुत सी चतुराइयाँ सीख गया था। सो उसने होली पर अपने गांव घर जाने की योजना बनाई लेकिन रामलखनवा इतना भी जान गया था कि साब, मेमसाब और बच्चे, उसकी बैसाखियों पर इतने निर्भर हो गए हैं कि वे उसे दो दिन की छुट्टी भी मु़श्किल से देंगे।

फिर क्या किया जाए

रामलखनवा का दिमाग अब लोटपोट के चाचा चौधरी की तरह चलने लगा था। सो उसने एक तरीका खोज ही लिया उसने दो दिन के लिए काम करने हेतु अपने सहकर्मी रामखिलावनवा को पटाया और मेमसाब के पास ले गया। रोनी सी सूरत बनाई और मेमसाब से दो दिन की छुट्टी लेने की बात कही।

‘‘क्यों, क्यों लखनवा, दो दिन की छुट्टी का क्या करोगे’- मेमसाब को जैसे 440 वोल्ट का झटका लगा हो। उनकी आँखो के सामने घर के वे तमाम काम जिन्हें रामलखनवा करता है, की सोचते ही अंधेरा छाने लगा। मेमसाब के मन की द़शा अन्दर ही अन्दर समझते हुए रामलखनवा ने अपनी मजबूरी बताई-

‘‘बात जि है न मेमसाब् कें घरवारी बीमार चलि रही है। अब आप जानौ हो मेमसाब के गांमुन में वैद्य, डाक्टर तो होवे नांय या तें मैं आपतें छुट्टी लें के जि गयौ और घरवारी कूं लैं के जि आयौ। हियां देखभाल हूँ ठीक है जावेगी घरवारी की। और ठीक है कें मेमसाब आपके औरु कामनु में हूँ हाथ बटाय दौ करैगी।

‘‘अरे वाह! तू तो बहुत ही चतुर हो गया है रे रामलखनवा’’

मेमसाब के मुख से अपनी प्रशंसा सुनकर रामलखनवा मन ही मन प्रमुदित हुआ।

पर मेमसाब को अचानक बिच्छू ने डंक मारा हो, वो चीख पड़ी-‘‘वो तो सब ठीक है, पर इन दो दिनों में घर का सारा काम काज कौन करेगा’

रामलखनवा इसके लिए पहले से ही तैयार होकर गया था सो उसने साथ लेकर आए रामखिलावन की ओर इशारा कर दिया-

मेमसाब हम आपकी परेशानी जानै है याहीं तें जा रामखिलावन कूं अपने संग लात रहे। द्वै दिन जि आपके सब काम करेगौ।’’

अंधे को क्या चाहिए, दो आँखे, मेमसाब ने रामलखनवा की छुट्टी की स्वीकृति पर अपनी मोहर लगा दी पर साथ में हिदायत भी दे दी कि साब को जरूर बता देना।

वैसे तो होम मिनिस्टर के अप्रूवल के बाद अच्छे-अच्छे अफसरों की हिम्मत नहीं होती कि वे उसे नकार दें ये बात रामलखनवा इतने दिन में खूब जान गया था। फिर भी उसने साब से भी दो दिन की छुट्टी की बात बता दी। साब ने छुट्टी अप्रूव्ड करने से पूर्व रामलखनवा को एक बार फिर से चेताया कि उसने मेमसाब से पूछ तो लिया है नहीं तो घर में महाभारत करा दे कहीं।

साब के अन्दर ही अन्दर डर रहे दिल की कल्पना कर रामलखनवा मुस्कराया-

‘‘जी साब, आप कौनू चिन्ता ना करी। हम मेमसाब तें पैले ही पूछि कें आवत रहे।’’

छुट्टी स्वीकृत होते ही मन में मुदित होता रामलखनवा अपने गांव चला गया। इधर रामखिलावनवा ने साब और मेमसाब की नाक में दम कर दिया। कभी साहब लोगों के घर पर उसने काम किया तो था नहीं सो घर व दफ्तर का कोई भी काम वह ठीक से नहीं कर पाया। दो दिन में ही साब और मेमसाब ने तौबा कर ली। मेमसाब होममिनिस्टर की हैसियत से साब पर बिगड़ी, साब ने भी छुट्टी पर उनके अप्रूवल की उन्हें याद दिलाई।

खैर किसी तरह दो दिन बीत गए और तीसरा दिन आते ही साब और मेमसाब ने रामलखनवा के आने का इन्तजार करना शुरू कर दिया और इसी तरह तीसरा दिन भी बीत गया पर रामलखनवा नहीं लौटा तो नहीं लौटा। अब तो साब और मेमसाब दोनों को झुंझलाहट शुरु हुई ,पर कर भी क्या सकते थे। चौथे दिन भी रामलखनवा के आने के इन्तजार में बीत गया पाँचवा भी और ऐसे करते-करते पूरे 30 दिन तक रामलखनवा नहीं लौटा। न कोई सूचना ही दी। न ही छुट्टी ही भर कर भेजी।

अब तो मेमसाब को घर के काम करने में दौरे पड़ने लगे। साब का रक्तचाप भी बढ़ गया और उन्होने रामलखनवा के आते ही उसे नौकरी से निकाल बाहर करने का ऐलान कर दिया।

इकत्तींसवे दिन रामलखनवा अपने गांव से अकेला ही लौटा और सीधा अपनी कुटिया में गया। तसल्ली से सारा सामान कुटिया में रखा और बेफिक्र हो सो रहा। दूसरे दिन दैनिक क्रियाओं से निवृत हो रामलखनवा सीधा मच्छी फाटक पहुँच गया। वहाँ से उसने तीस अंडे रखने के लिए एक सुन्दर सी टोकरी खरीदी और फिर उसमें द़ेसी मुर्गी के तीस अण्डे लगवा लिए और बस जैसे ही साब घर से दफ्तर को निकले रामलखनवा टोकरी को हाथ में लटकाए सीधा पहुँचा मेमसाब के पास।

मेमसाब के सामने पहॅुचकर एक अच्छा सा सलूट मारा फिर अण्डों की टोकरी को सामने डायनिंग टेबल पर जाकर रख दिया।

पहले तो मेमसाब को बहुत गुस्सा आया पर टोकरी की ओर देखकर उन्होंने रामलखनवा की ओर देखा। रामलखनवा उनकी आँखों के भाव को पढ़ते हुए बोल पड़ा-‘‘मेमसाब इसमें देसी मुर्गी के 30 अण्डे रहे।’’

अण्डे की टोकरी डायनिंग टेबल पर सजा कर रामलखनवा अपनी कुटिया में जाकर बेफिक्री से फिर से सो गया।

शाम को साब दफ्तर से लौटे तो डायनिंग टेबल पर बड़ी सी टोकरी में अण्डे देखकर आ़श्चर्य चकित रह गए-

‘‘अरे, आप तो शापिंग भी कर आई आज। बड़ी जल्दी।’’

‘‘मैं नहीं ये अण्डे रामलखनवा लाया है’’-मेमसाब ने रहस्य पर से पर्दा हटाया तो साब एकसाथ आ़चर्य से उछल पड़े- अच्छा! रामलखन आ गया और साब ने पिछले तीस दिनों में होम मिनिस्टर की जलालत भरी बातों का स्मरण व उसका अन्त हुआ जान राहत की सांस ली। उन्होंने रामलखनवा को उसके घर से बुलवाया।

रामलखनवा भी इसी इन्तजार में था सो दौड़ा-दौड़ा साब के सामने प़ेा हुआ।

आमना-सामना होते ही साब ने रामलखनवा को इतने दिन तक गोल हो जाने के लिए लताड़ना शुरु किया तो चतुर रामलखनवा ने बताया कि साब बात जि भई कि बूं अपना भाई है न, उसका गांव में मुर्गी फार्मवा है। हमने सोची कें अब आए हैं तो साब कूं कम से कम देसी मुर्गी के 30 अण्डे तौ लैत ही चले। अब आप ही बताओ साब, द़ेाी मुर्गी एक दिना में दैवे हू तो एक ही अण्डा है न, याही तैं हमकूं देर है गई साब।

देसी मुर्गी के अण्डों ने रामलखनवा की सारी गल्तियां माफ करा दीं। और साब ने बाबू से कहकर रामलखनवा की पिछले 30 दिन की हाजिरी सही करने का आदेश कर दिया। रामलखनवा भी अब पिछले 30 दिन में साब के दौरा नोट करने में जुट गया ताकि अपना भत्ता भर सकै।

जाही विधि राखै बॉस.......

----

डॉ. दिनेश पाठक शशि

28,सारंग विहार,

मथुरा-281006

वेब साइट - www.drdineshpathakshashi.blogspot.com

drdinesh57@gmail.com

dr_dinesh_pathak@yahoo.com

और ख़्वाब देखना मना है

जागते रहो,

अपनी आँखों मे उगंलियाँ डाल कर

क्योंकि सोने में खतरा है

ख्वाब देखने का,

और ख़्वाब देखना मना है ।

हो सकता है, तुम्हें डर हो

अपनी मौत से,

पर यहाँ तो खतरा है ज़िन्दगी से,

मौत के बाद,

कम से कम नहीं कोई रहेगा

रक्त का हिसाब

और प्यार की कीमत लेने वाला

नहीं कोई मिलेगा

जो परंपराओं को लाकर

करा सके तुम्हारा मुँह बन्द

सोचो मत,

सोचने से खतरा है सच बोलने का

और सच बोलने वाले को

या तो दे दिया जाता है ज़हर

या चढ़ा दिया जाता है सूली पर ।

चलते रहो,

खड़े होने में खतरा है

किसी साजिश के शिकार होने का

और साजिश नहीं देखती

इंसान की नीयत ।

अपनी इच्छाऒं को सूली पर टांग कर

सूअर की तरह खाओ मैला

तो देखो ज़िन्दगी कितनी आसान है,

चिल्लाओ मत ,

नक्कारखानें की तूती

अन्धेरे के जुगनूँ

ज़िन्दगी ऐसे नहीं गुजरती .......!

----

 

प्रेम पानी है

प्रेम अब भी है दिलों में

धड़कन की तरह

प्रेम कंपकपाते होंठों पे आते हैं

लरजते बोल की तरह

पेड़ों की कोंपलें बन

फूट पड़ते हैं प्रेम

प्रेम के सहारे मॉ पाल जाती है

बच्चों को,

प्रेम के सहारे बुढ़ा जाती है मॉं

प्रेम के सहारे ही बाप सह लेता है

सारे अपमान

प्रेम के सहारे बिता दी तुमने

सारी जवानी

प्रेम के सहारे ही लोग

बिना पतवार पार कर जाते हैं नदी

प्रेम के सहारे ही नदियाँ

समा जाती है समन्दर में

प्रेम को मत रोको

प्रेम पानी है

ढ़ूंढ लेगा खुद रास्ता अपना।

--

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव

५/२ ए रामानन्द नगर

अल्लापुर, इलाहाबाद

रामदीन

अर्द्ध-सत्‍य

मिटती है सब रार, मिटाने वाला चाहिए।

मिटता है अत्‍याचार, मिटाने वाला चाहिए।

जादू की जब छड़ी चलाये, जनता अपने दम पर।

दूध छठी का याद दिलाये, जनमत अपने दम पर।

पानी भरते बड़े-बड़े हैं, अनशन वाला चाहिए।

मिटती है सब रार, मिटाने वाला चाहिए।

 

लोकतंत्र की मर्यादा को, तार-तार फिर करते क्‍यों ?

शैतानों की बनी जेल में, जन-सेवक को भरते क्‍यों ?

क्‍यों ऐसी गुस्‍ताखी कर दी, बताने वाला चाहिए।

गधे पंजीरी ना खा पायें, कुछ ऐसा करना चाहिए।

मिटती है सब रार, मिटाने वाला चाहिए।

 

' पद्‌मश्री को ना जाने क्‍यों, कैसे भ्रष्‍ट बता डाला ?

'' पद्‌मविभूषित एक फकीर को, अपराधी सा जेल में डाला।

एक यती संयमी पुरूष ने, अब तो सस्‍ते में धो डाला।

अभी समय है अब भी चेतो, खुद अपनी ना कब्र खोदना।

बहुत दुखी जनता आक्रोशित, बंद करो ये नाटक करना।

 

सुबह को बंदी, शाम रिहाई, ऐसा क्‍या मिल गया बहाना ?

बदकिस्‍मत सा दर-दर भटके, रमदसुआ, पगला, दीवाना।

मान प्रतिष्‍ठा भारत जन की पुनः बचानी चाहिए।

बचेगा प्‍यारा देष हमारा, बचाने वाला चाहिए।

मिटता है अत्‍याचार, मिटाने वाला चाहिए।

मिटती है सब रार, मिटाने वाला चाहिए।

 

' पद्‌मश्री-1990

'' पद्‌मविभूषण-1992

----

रामदीन,

जे-431, इन्‍द्रलोक कालोनी,

कृष्‍णानगर, लखनऊ-23

जैसा कि आप जानते हैं, पत्‍नियां जो हैं, वे जब पति के घर आती हैं तब भी बीमार होती हैं और जब जाती हैं तब भी बीमार होती हैं । पत्‍नी या बीवी का बीमार होना एक ऐसा कटु सत्‍य है जिसे हर एक को भोगना पड़ता है । करेले के रस की तरह बीबी की बीमारी का स्‍वाद सभी को कसेला लगता है । मगर इसे भोगे बिना इस असार संसार में गुजारा नहीं है । जो सुखी पति होते हैं वे भी पत्‍नी की बीमारी के नाम से ही दुखी हो जाते हैं । यदि मैं कवि या शायर होता तो पत्‍नी की बीमारी पर शेर या कविता या गजल या नज्‍म लिखता मगर चूंकि मैं कवि या शायर नहीं हूं अतः श्रीमान्‌ की सेवा में यह व्‍यंग्‍य प्रस्‍तुत कर रहा हूं ।

पत्‍नियों के शरीर में कहीं एक कमर नाम की चीज होती है जो शादी से पूर्व क्षीणकटि कहलाती है, मगर कुछ समय बाद कमरा बन जाती है ! सारी परेशानियों की जड़ यहीं से शुरू होती है। सुबह-सुबह उठ कर आप भगवान का नाम लेना चाहते हैं, मगर तभी भागवान आकर मासूम-सी सूचना देती है कि उनके कमर में दर्द है । इस छोटे से वाक्‍य से पारिवारिक राजनीति में भीषण तूफान आ जाता है । नाश्‍ता कौन बनायेगा, बच्‍चों को कौन तैयार करेगा । खाने, बर्तन तथा कपड़ों का क्‍या होगा आदि आदि समस्‍याएं विकराल रूप धारण कर लेती हैं । इन सबसे पहले कमर के दर्द की चिकित्‍सा पर भी विचार किया जाता है चूंकि हर पति आधे से ज्‍यादा डाक्‍टर भी होता है सो सर्वप्रथम वह अपनी पत्‍नी की कमर का इलाज करने का असफल प्रयास करता है। इस कारण मर्ज जो है, वह लगातार बढ़ता ही जाता हैं । पत्‍नी की कमर का दर्द या तो ठीक ही नहीं होता या फिर उस समय बिल्‍कुल ठीक हो जाता है जब पीहर से आधा दर्जन मेहमान आने की सूचना प्राप्‍त होती है । उन दिनों पत्‍नी जिस तेजी ओर समझदारी से काम करती है तब लगता है, काश ये हर दिन ऐसे ही काम करे । मगर पीहर के मेहमानों के जाने के बाद वही ढाक के तीन पात ।

बीबी की बीमारी का एक और अहम मसला है और वो है दवा का खाना या खिलाना । बाजवक्‍त पति लोगों की यह नैतिक जिम्‍मेदारी मानी जाती है कि वो दफ्‍तर जाते वक्‍त और आते ही पत्‍नी से पूछे कि दवा खा ली या नहीं यदि हो सके तो दवा स्‍वयं अपने हाथ से खिलायें । दफ्‍तर से भी फोन पर पूछें कि माबदोलत की तबियत कैसी है । दवा समय से खा लें वगैरह वगैरह । पथ्‍य और परहेज की पूरी जानकारी रखनी पड़ती है, खाबिन्‍द को बल्‍कि कई बार तो हालत यह होती है कि पति जो है वो पत्‍नी की बीमारी का सर्वश्रेष्‍ठ विशेषज्ञ बन जाता है ।

कुछ बीमारीयां जनानी होती है मगर उनके इलाज मरदाना होते हैं । इधर विज्ञान की तरक्‍की की बदौलत इन जनाना बीमारियों की जांचों में हजारों रूपये फूंके जाते हैं और विशेषज्ञ डॉक्‍टर कुछ भी तय नहीं कर पाते । कुछ उम्रदराज होने पर महिलाओं में कुछ ऐसे परिवर्तन होने लगते हैं कि व्‍यक्‍तियों को अजीब लगने लगता है । इस अजीबोगरीब स्‍थिति में आजकल गर्भाशय निकालने के काम को अंजाम दिया जाने लगा है । आवश्‍यकता हो या न हो डॉक्‍टर लोग शरीर के अंग को निकाल बाहर करने को बेताब हो जाते हैं । एक ऐसे ही मामले में मैंने दो लेडी डॉक्‍टरों की राय एक-दूसरे के सामने रख दी । पर्चे भी दिखाये, दोनों डूाक्‍टरों ने जिन स्‍थानों पर टेस्‍ट करवाये थे, उनकी रिपोर्टों में भयानक अन्‍तर था । वे डॉक्‍टरों की मर्जी के मुताबिक रपट बना कर देते हैं ताकि मरीज पर अनावश्‍यक ऑपरेशन का बोझ डाला जा सके। मैंने ऐसे मामलों से पत्‍नी को आगाह किया और समझदारी यह रही कि हम लोग टेस्‍टों के चक्‍कर में ही नहीं पड़े ।

हकीकत तो यह है कि कई बार पत्‍नी की बीमारी का ढोल पीटा जाता है ताकि उनकी तरफ घर-परिवार विशेषकर पति महोदय का ध्‍यान जाये। वे तबज्‍जो चाहती हैं और पति व्‍यस्‍त हैं, ऐसी स्‍थिति में बीमारी का बहाना बनाना, ‘डॉक्‍टर के यहां ले चलो।' ‘मुझे चेक-अप के लिए जाना है, आप भी साथ चलिये । पता नहीं अस्‍पताल में क्‍या हो ।' जैसे वाक्‍यों से पति महोदय को नवाजा जाता है। बेचारे पति महाराज ने जो गलती शादी करके की थी उसे सुधारने के लिए अस्‍पताल जाते हैं और आते हैं और जाते हैं । डॉक्‍टरों के नुस्‍खों और बीबी की बीमारियों में एक सीधा अनुपात होता है । डॉक्‍टर की भारी फीस, जांचों के बिलों और दवा के बिलों को देख देखकर कई बार पति स्‍वयं बीमार हो जाते हैं । एक बार तो मैं स्‍वयं जनाना अस्‍पताल के बाहर गिर गया था । यह अलग बात है कि मेरे बीमार होने के समाचार-मात्र से पत्‍नी स्‍वस्‍थ हो गयी थी ।

पति-पत्‍नी की बीमारी की चर्चा में एक और चीज महत्‍वपूर्ण होती है-बच्‍चे । बच्‍चे जब तक छोटे होते हैं, पत्‍नी और पति की आंखों के तारे होते हैं । मगर बाद में वे पति-पत्‍नी की बीमारी के कारण भी बन जाते हैं । कई बार बीवी की बीमारी की सुन कर मायके वाले आ जाते हैं । तीमारदारी के नाम पर मोहल्‍लेवालियां आती है और आपको बता दूं कि तब जो आपसी संवाद होते हैं वे लिखना मुमकिन नहीं है ।

बीबी अपनी बीमारी के दौरान भी घर-व्‍यवस्‍था पर बड़ी चौकन्‍नी निगाह रखती है। कौन सी चीज कहां रखी जाये, दूध को फ्रिज में रखा था या नहीं तथा दही, सब्‍जी को ढकना है आदि आदेश को खाट पर पड़ी-पड़ी ही दे देती है ।

पत्‍नी की बीमारी का समाचार जंगल की आग की तरह चारों तरफ फेल जाता है । कई बार मैंने देखा है कि मैं बीमार रहूं तो कोई जिक्र तक नहीं । मगर उनकी बीमारी का जिक्र बहुत जल्‍दी होता है । रोज फोन, पत्र आते हैं।

बीवी की बीमारी झेलने वाले पति वास्‍तव में दया और सहानुभूति के पात्र हैं । खासकर वे पति जिनके घर में कोई असाध्‍य बीमारी है । मगर कुछ उदाहरण ऐसे भी देखें कि इधर पूर्व पत्‍नी का निधन हुआ और उधर पति महोदय ने सेहरे की तैयारी कर ली ।

पत्‍नी की बीमारी दाम्‍पत्‍य जीवन में एक आवश्‍यक घटना या दुर्घटना है । इसे हर एक को झेलना ही पड़ता है । बहादुरी से इस को झेलना ही सच्‍चे पति की निशानी है ।

कभी-कभी सोचता हूं, क्‍या ऐसा नहीं हो सकता कि घर परिवार से बीमारी नाम की चीज ही उठ जाये । मगर ऐसा असंभव है क्‍योंकि बीवी ही नहीं सब बीमार होते हैं बल्‍कि औसत भारतीय पत्‍नियां तो अपने स्‍वास्‍थ्‍य की परवाह किये बिना घर परिवार को सजाती संवारती हैं । ऐसी ही बीवियों के कन्‍धों पर टिका है सुखी दाम्‍पत्‍य का रहस्‍य ।

यह आलेख पढने के बाद शायद आप सोच रहे होंगे कि इस विषय को कहां खत्‍म किया जायेगा तो साहब सक शेर अर्ज है-

उनके देखे से आ जाती है चेहरे पर रौनक ।

वो समझते हैं बीमार का हाल अच्‍छा है ॥

0 0 0

यशवन्‍त कोठारी

86, लक्ष्‍मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर

जयपुर 302002

फोन 2670596

image

उसने भी चाहा था

उड़ना नील गगन में
चलना समंदर की लहरों पे

भर लेना खुशियों को अंक में

दौड़ लगाना मखमली घास पर

खुशबू को समेट लेना सांसों में

पर --

उसे कहाँ मालूम था ?

वह तो एक बिछोना भर है

बिछना और बिछना भर ही

उसकी नियति है

वह एक स्त्री है |

--------

---

manthan (Custom)

चण्‍डीगढ़ । साहित्‍य संस्‍था मंथन' के सौजन्‍य से आज रविवार, दिनांक 28 अगस्‍त, 2011 को महावीर मुनी जैन मन्‍दिर, सैक्‍टर 23-डी, चण्‍डीगढ़ में भ्रष्‍टाचार विषय को लेकर एक कवि दरबार का आयोजन सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार व समालोचक डॉ. कैलाश आहलूवालिया की अध्‍यक्षता में हुआ, जिसमें मुख्‍यातिथि के रूप में कहानीकार अनन्‍त शर्मा अनन्‍त' ने शिरकत की। मंच संचालन ग़ज़लकार सुशील हसरत' नरेलवी ने किया।

भ्रष्‍टाचार मुक्‍त राष्‍ट्र के संघर्ष को समर्पित इस कवि दरबार का शुभारम्‍भ कवि पवन बतरा की कविता ग़रीबी की मार' भ्रष्‍टाचार' से हुआ। तत्‍पश्‍चात सुशील हसरत' नरेवली ने राजनैतिक भ्रष्‍टाचार पर वार करते हुए अपनी ग़ज़ल में कहा कि ‘‘इस क़दर बदतर हुए हालात मेरे देश में/लोग अनशन पे, सियासत ठाठ से सोती रही'', कवि दीपक खेतरपाल ने व्‍यंग्‍य कविता अवलोकन' के ज़रीये कहा कि ‘‘कितनी कुर्बानियाँ, कितने सत्‍याग्रह, कितने अनशन'', कवि राजेश पंकज ने कविता मूल्‍य वृ़द्धि' में कहा कि ‘‘रेट बढ़ जाएंगे घूस के, सोमवार से'' तो राजन ग़रीब ने कविता भ्रष्‍टाचार' सुनाकर खूूब वाह-वाही बटोरी।

कवि सतनाम सिँह ने गीत होंठों को सी लिया है/अब न मुझे बुलाना, नरेन्‍द्र नाज़ ने गीत अन्‍ना हज़ारे जी हम साथ हैं तुम्‍हारे', कवयित्री उर्मिला कौशिक सखी' ने अपनी कविता में बच्‍चे के माध्‍यम से कहा कि ‘‘मैं भ्रष्‍टाचार से मुक्‍त समाज व संस्‍कार चाहता हूँ/देश में आपसी भाइर्-चारा व प्‍यार चाहता हूँ, कवयित्री पुनीता बावा ने कविता दुस्‍वप्‍न' में कहा कि ‘‘पिछले बारह दिन से देख रही हूँ दुस्‍वप्‍न', कवि हरीश ने भ्रष्‍टाचार को निशाना बनाते हुए गीत सच कहता हूँ पेट नहीं भरता' सुनाकर खूब तालियाँ बटोरी।

तदुपरान्‍त उर्दू के सुविख्‍यात शायर जनाब जय गोपाल अश्‍क़' ने एक नज़्‍म रिश्‍वत' पढ़ी जिसमें आज़ादी से अब तक की रिश्‍वतखोरी की दास्‍तां निहित थी तत्‍पश्‍चात ग़ज़ल कुछ अन्‍दाज़ में कही ‘‘वो पहले राजा पुशतैनी, हैं अब नेता भी पुश्‍तैनी/टिकी है नींव तन्‍त्र की कुछ इक ही खानदानों पर'', इसके अलावा कवियित्री ललिता पुरी ने कविता ने कविता कलयुग', कवयित्री परमजीत परम ने पंजाबी कविता कोई नहीं', कवि अश्‍विनी ने कविता बरखा शराब', कवि विजय कपूर ने कविता पता नहीं', कहानीकार व कवि अनन्‍त शर्मा अनन्‍त ने कविता अण्‍णा में नहीं जानता था', युवा कवि सन्‍नी चंदेल ने कविता में कहा कि ‘‘इक नीली सी पहाड़ी पर छोटा सा चाँद घूमता है'', तो डॉ. कैलाश आहलूवालिया ने कविता में ‘‘कुछ इस तरह की बातें, कुछ उस तरह की बातें, देर रात तक की बातें'' सुनाकर माहौल को खुुशग़वार बनाकर ढेरां तालियाँ बटोरीं।

अध्‍यक्षीय भाषण में सुप्रस़िद्ध साहित्‍यकार डॉ. कैलाश आहलूवालिया ने अपने व्‍यक्‍तव्‍य में कहा कि ‘‘अनुभवी कवियों ने सार्थक कविताओं के माध्‍यम से भ्रष्‍टाचार पर पैना निशाना साघा व अण्‍णा जी की मुहिम की मुक्‍तकण्‍ठ से प्रशंसा की। नये कवियों की रचनाओं में भी शब्‍द-शक्‍ति के अच्‍छे प्रयोग देखे।

अन्‍त में, संस्‍था की ओर से सभी मंचासीन महानुभावों, पधारे हुए साहित्‍यकार, साहित्‍य प्रेमियों व श्रोतागणों का आभार कवि दीपक खेतरपाल ने प्रकट किया गया।

सुशील ‘हसरत' नरेलवी अध्‍यक्ष ‘मंथन' (अवैतनिक)

इक धूप का टुकड़ा भी मेरे पास नहीं है,
पर अहले जहां को कोई संत्रास नहीं है।

मंझधार से लड़ने का मज़ा कुछ और है यारो,
मुरदार किनारों को ये अहसास नहीं है।

कल के लिये हम पैसा जमा कर रहे हैं ख़ूब,
कितनी बची है ज़िन्दगी ये आभास नहीं है।

मासूम चराग़ों की ज़मानत ले चुका हूं,
तूफ़ां की वक़ालत मुझे अब रास नहीं है।

मैं हुस्न के वादों की परीक्षा ले रहा हूं,
वो होगी कभी पास ये विश्वास नहीं है।

अब सब्र के दरिया में चलाऊंगा मैं कश्ती,
पहले कभी भी इसका गो अभ्यास नहीं है।

ग़ुरबत का बुढापा भी जवानी से कहां कम,
मेहनत की लड़ाई का कभी फ़ांस नहीं है।

आज़ादी का हम जश्न मनाने खड़े हैं आज,
बेकार ,सियासी कोई अवकाश नहीं है।

अब भूख से मरना मेरी मजबूरी है दानी,
हक़ में मेरे रमज़ान का उपवास नहीं है।
---

लोकपाल की निगरानी

चला अकेला अन्‍ना लेकिन नहीं अकेला रह जाए
जनता की बातों को जनमत के जोर से कह जाए
है देष गरीबों का, लेकिन सरकार यहाँ पूँजीवादी
लोकतंत्र में जनता की आँखों से आँसू बह जाए

यह देष वही भारत है जिसके गांधी नेहरू आजाद थे
था कर रहा गुलामी देष किन्‍तु उनके सपने आजाद थे
सरकार विदेशी थी, फिर भी नारे स्वदेश के चलते थे
गांधी के पीछे अनगिनत पाँव साथ-साथ पर चलते थे

ढूंढो अपराधी कौन यहाँ यह जनता है या है सरकार
अन्‍ना माँग रहा हक अपना मिला उसे क्‍यूँ कारागार
अपनी बात कहे जनता क्‍या उसको है अधिकार नहीं
है अभी यहाँ जनतंत्र, चाहिए हमको ये सरकार नहीं


क्‍यों सत्ता और शासन एक हुए भ्रष्‍टाचार में लिप्‍त हुए
है देष करोड़ों का फिर भी यह भ्रष्‍टाचारी संक्षिप्‍त हुए
हैं कौन, कहाँ से आए हैं ? जनता इनकी पहचान करे
इस लोकपाल की निगरानी देखो, न कोई संदिग्‍ध करे

---

अन्‍ना

होने वाली है क्रान्‍ति दिख रही जन-गण मन में,
अधिनायक अन्‍ना सा होगा भारत-भाग्‍य विधाता।
है स्वदेशी सरकार भेजती जन-नायक को कारा,
आश्चर्य है! जिस अन्‍ना को गांधी राग है भाता।


भ्रष्‍टाचारी हो सरकारी, कोई बात नहीं क्‍यों ?
मंत्री जी से नातेदारी, कोई बात नहीं क्‍यों ?
मँहगाई, बाजारों पर हो कोई बात नहीं क्‍यों ?
जनता के अधिकारों पर हो कोई बात नहीं क्‍यों ?


अन्‍न यहाँ पैदा करने को हम खेतों में मरते,
संसद में तुम बैठे-बैठे ही रूपए पैदा करते।
था भेजा चुनकर हमने तुमको करो देष समृद्ध,
नोंच-नोंच कर मांस देश का खा जाओगे गिद्ध।

लेकतंत्र है जहाँ, जनता का उच्‍चासन होता है,
भूल गए जनतंत्र में जनता का शासन होता है।
नहीं चीर है पांचाली का जनता का अधिकार,
राजनीति वह नहीं, यहाँ पर दुःशासन रोता है।

पहन मुखौटा तुम जनहित का जनता को छलते हो,
जनता को निर्वासित करके तुम सुख से पलते हो।
स्‍वतंत्र देष की जनता अपने माँग रही अधिकार,
अन्‍ना है इस युग का गांधी मान ले अब सरकार।
--
के. नन्‍दन ‘अमित'


image

निर्माण तेरा बुदबुदा, अस मानुस की जात
रात बनत उखड़ जात है, ये सड़क प्रभात

सड़क में गड्ढे गड्ढे में सड़क, भीतर बाहर है मिट्टी
मिट्टी गिट्टी में मिली, गुमी निगम की सिट्टी पिट्टी

काल गिरे सो आज गिर, आज गिरे सो अब
डामर ठंडा बिछ जाएगा, तू बहुरि गिरेगा कब?

लिस्ट जो देखन में चला, ब्लैक न मिलिया कोय
दुर्भाग्य जो खोजा आपना, उस-सा ब्लैक न कोय

टेंडर का टुकड़ा बुरा, दो दो आंगुल दाँत
फिक्सिंग करे तो पास हो, नारद मारे लात

ठेकेदार इतना दीजिए, जामे डिपार्टमेंट समाय
इंजीनियर भूखा न रहे, अफसर न भूखा जाए

नेता अफसर दोऊ खड़े, पहले काके लागू पाए
बलिहारी नेता आपकी अफसर दियो बताए

(संत कवि कबीर से क्षमा याचना सहित)

(साभार - पत्रिका, इंदौर संस्करण - 29-8-11 )

गाँधी की नयी तस्वीर

image

कुछ यूं किसी ने आस जगाई है

न कोई दल न मजहब

न जाती की लड़ाई  है

अन्ना तेरी जिद ने

गाँधी की नयी तस्वीर बनाई है

 

भ्रष्टाचारी नेताओं ने

हर बाजी मुंह की खाई है

पर तेरी सच्ची निष्ठा से

सत्ता भी शरमाई  है

अन्ना तेरी जिद ने

गाँधी की नयी तस्वीर बनाई है

 

भारत की कुछ रस्मों पर
जीवन फिर से मुस्काई है
लोकपाल न आये फिर भी
युवा लोकतंत्र की अंगड़ाई है
बुझ चुके एहसासों में
फिर तूने चिंगारी भड़काई है
अन्ना तेरी जिद ने
गाँधी की नयी तस्वीर बनाई है

जनता है, जूझती घेरे महंगाईहै
पर सत्ता को कैसी चिंता
उनके पास तो सारी मलाई है
पर हम मालिक वो नौकर हैं
यह अधिकारों की लड़ाई है
लोकतंत्र में लोगो की महता
आज तूने समझाई है
अन्ना तेरी जिद ने
गाँधी की नई तस्वीर बनाई है

है कैसा ये लोक.... तंत्र
बिच में गहरी खाई है
हिन्दू मुस्लिम अलग नहीं हैं
वो तो भाई -भाई हैं
एक तिरंगे के नीचे
अहिंसा की ताक़त तूने समझाई है
अन्ना तेरी जिद ने
गाँधी की नयी तस्वीर बनाई है

…………………………………

image

राहुल तिवारी
c /o बाल्मीकि तिवारी
नमना कला (पानी टंकी के पास )
अंबिकापुर
जिला - सरगुजा . पिन - 497001
(छत्तीसगढ़)

E-mail – rahultiwari131985@gmail.com

image

जज्बात

भ्रष्टाचार के विरुद्ध हो रहे प्रदर्शनों को देख-सुनकर रामू से भी नहीं रहा गया। अपने कुछ दोस्तों को साथ लेकर शहर के भगत सिंह चौराहे पर पहुँचकर जोर-जोर से नारे लगाने लगा। देखते ही देखते कई सो लोग इकट्ठा हो गए।

रामू ने बोलना शुरू किया। भ्रष्टाचार! भ्रष्टाचार! भ्रष्टाचार! आखिर यह जनतंत्र है कि भ्रष्टतंत्र। क्या शहीदों ने इसी भारत के लिए कुर्बानी दी थी कि हम विश्व के भ्रष्टतम देशों में शुमार हो जाएँ ?

जनतंत्र में जनहित और देशहित से सर्बोच्च कुछ भी नहीं हो सकता। न कोई परम्परा, न कोई पदाधिकारी, न कोई व्यक्ति, न कोई नियम, न कोई कानून और न ही कुछ और। यदि इनसे देश हित में बाधा पहुँचती है, देश के विकास का मार्ग अवरुद्ध होता है, देश की एकता और अखंडता अक्षुण्ण नहीं रह सकती तो हमें अवश्य बदलना होगा।

अतः हमें एक सख्त पारदर्शी कानून की जरूरत है, जिसके दायरे से कोई भी अछूता न रहने पाए, जिससे भ्रष्टाचार पर अकुंश लगाया जा सके और भ्रष्टाचारियों को कटघरे में खड़ा करके उनकी अकूत सम्पत्ति जब्त करके देश हित में लगाया जा सके।

रामू बोलता जा रहा था। विधायक जी ने आके उसकी पीठ थपथपाई और बोले मैं तुम्हारे जज्बात की कद्र करता हूँ और तुम लोगों के साथ हूँ।

---------

डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर(उ. प्र.)।
URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

********

जन लोकपाल: अन्ना और सरकार


अनशन पर बैठ गए अन्ना हजारे
बोले भ्रष्टाचार मिटाने को
भ्रष्टाचारियों को सजा दिलाने को
जन लोकपाल कानून बनाये सरकारें|

सरकार पहले तो तमतमायी फिर भड़की
और देने लगी अंदर कर देने की धमकी
लेकिन जब देखे सड़कों के नज़ारे
हर तरफ उठ रही थी लोकपाल की माँग
और लग रहे थे अन्ना जिंदाबाद के नारे|

देखकर वो जन सैलाब
सरकार इतनी हिल गयी
की मंजूर है सारी माँगे
ये एग्रीमेंट भी साइन कर गयी |

इस पर राजनेता और मंत्री सरकार से भिड़ गये
बोले यदि देश में लोकपाल कानून बन जायेगा
तो हमारा एक बड़ा तबका जेल में नजर आएगा
फिर इस देश को कौन चलायेगा ?
 
यदि राजनेता करप्शन नहीं करेगा
लाखों करोड़ों से घर नहीं भरेगा
तो ये ऐशो आराम कहाँ से करेगा ?
फिर आम-आदमी और नेता में
फर्क ही क्या रहेगा ?
और कोई कैसे तो चुनाव लड़ेगा
और कैसे जीतेगा ?
ऐसे में राजपाट सब छुट जायेगा
और हर राजनेता
बेरोजगार हो सड़कों पर नजर आएगा |

वो भयानक भविष्य सोचकर
भ्रष्ट नेताओ की आत्मा बुरी तरह से डर गई 
वो बोले नहीं-नहीं ये सब नहीं चलेगा
हमारे रहते इस देश में कोई
जन लोकपाल कानून नहीं बनेगा|

आखिर हम चुने हुए राजा है
इस देश पर हम अपना ही हुक्म चलायेंगे
जो हमारे हाथो की कठपुतली होगा
ऐसा ही लोकपाल बनायेंगे |

इस पर जनता बोली
अब जाग चुके है हम
अब तक सहा है आगे नहीं सहेंगे हम 
अब तो भ्रष्टाचार को मिटा के रहेंगे हम
जरूरत पड़ी तो जेल भी भरेंगे हम
आगे बढ़ो अन्ना अभी तक साथ रहे है हम
आगे भी साथ रहेंगे हम |

-----
 
 

अन्ना का आन्दोलन: बापू गाँधी से नागरिक का वार्तालाप 

नागरिक -
बापू गाँधी तेरे देश में
ये कैसी मज़बूरी है
अनशन के लिए भी यहाँ
अनुमति क्यों जरुरी है ?
बापू गाँधी तेरे देश में
ये कैसी मज़बूरी है ?

बापू गाँधी तेरे देश में
ये कैसी तानाशाही है
सत्य अहिंसा पर भी अब
पाबन्दी क्यों लगायी है ?
बापू गाँधी तेरे देश में
ये कैसी तानाशाही है ?

बापू गाँधी तेरे देश में
ये कैसी लाचारी है ?
संसद में भी अब
क्यों छाये भ्रष्टाचारी है ?
बापू गाँधी तेरे देश में
ये कैसी लाचारी है ?

बापू गाँधी तेरे देश में
ये कैसी आजादी है ?
संविधान का गला घोटकर
जनता के मूल अधिकारों पर भी अब
लगी क्यों फांसी है ?
बापू गाँधी तेरे देश में
ये कैसी आजादी है ?

 

बापू गाँधी -
बंद करो ये शिकायत करना
इससे कुछ नहीं हासिल होगा 
अगर सही आजादी पाना है तो
अब तुम को भी सड़कों पर आना होगा
सत्य अहिंसा से आंदोलन चलाना होगा
अन्ना बनकर आया हूँ में
अब तुमको भी साथ निभाना होगा
हो चला हूँ बूढ़ा अब मैं
अब तुमको ही भ्रष्टाचार मिटाना होगा|

नागरिक –
नहीं करगे शिकायत अब
भूल हुई हम से भारी है
भ्रष्टाचार मिटाना अब हमारी मेरी जिम्मेदारी है
डर नहीं किसी बात का अब 
अन्ना बना हर नर-नारी है
भ्रष्टाचार मिटाना अब हमारी मेरी जिम्मेदारी है |

नव चैतन्य आया सड़क पर
यौवन ने ली अंगडाई है
अब मशाल उठायेंगे
भ्रष्टाचार जलायेंगे
ये कसम अब हम सब ने खायी है
देश भक्ति का जज्बा दिलो में
इन भ्रष्टों पर भारी है
भ्रष्टाचार मिटाना अब हमारी जिम्मेदारी है |

----


शंकर लाल इंदौर मध्यप्रदेश

गधे के सींग
डा० कान्ति प्रकाश त्यागी

अदालत में एक विशेष केस पेश हुआ,
केस सुनकर न्यायाधीश बेहोश हुआ।

हूज़ूर ! फ़रज़ू का कहना है,
धरमू उसका गधा मांगने आया,
काम के बाद, जब गधा लौटाने आया,
वह बिना सींग का गधा लौटाने लाया।
फ़रज़ू के साथ न्याय किया जाय,
उसके गधे के सींघ लौटये जाय
धरमू का कहना है,
जो गधा वह ले गया था,
उस गधे के सींग नहीं थे,
अतः सींगवाला गधा, कहां से लौटाय
फ़रज़ू को झूठ की सज़ा दी जाय।

दोनों पक्ष के वकील बहस शुरु करें,
अपना पक्ष विस्तार से प्रस्तुत करें।

हूज़ूर ! गर्धभराज हैं, हमारे बैशाखनंदन,
घास खाकर करते रहते नित क्रन्दन।
हमारा गधा बहुत काम का है,
यह बहुत ही बड़े नाम का है।
अल्ला ने इसे बहुत अवसर दिये,
परन्तु  सब के सब ठुकरा दिये।
तुम गधा छोड़ कर, हाथी घोड़ा कुछ भी बन जाओ,
प्रभु ! इसी जीवन से खुश हूँ, अधिक ना ललचाओ।
हूज़ूर! इसके पास नैतिकता है, जो किसी के पास नहीं है,
इसकी वाणी में पवित्रता है, जो किसी की वाणी में नहीं है।
बेचारे ने बिना घास खाए, धरमू का काम किया ,
धरमू ने क्या किया, उसे बिना सींग वापिस किया।
जनता में, एक दूसरे से विश्वास उठ जायेगा,
फिर भी गधा ही, आदमी के काम आयेगा।

दूसरे पक्ष के वकील को बुलाया जाय,
अपनी बात कहने का मौका दिया जाय।
हूज़ूर ! मेरे मुवक्किल ने जो गधा लिया,
उसके सींग नहीं थे, वैसे भी गधे के सींग नहीं होते,
वह गधा ही नहीं होता, अगर उसके सींग होते।
शेर जंगल का राजा होता है, उसके सींग नहीं होते,
गधा शहर का राजा होता है, उसके सींग नहीं होते।
शेर को किसी का डर नहीं, वह सींग नहीं रखता है
गधा भोला है, किसी को डर नहीं, सींग नहीं रखता है

वादी पक्ष के गवाह बुलाओ,
उनकी गवाही दिलवाओ।
फ़रज़ू ने, धरमू को गधा दिया,
हां हूज़ूर!  गधा मेरे सामने दिया।
उस समय गधे के सींग थे,
हूज़ूर ! गधे के सींग थे।
अगर थे, तो कितने थे ?.
नहीं मालूम,  कितने थे
रात का समय था,  घन घोर अंधेरा था
हूज़ूर ! मुझे रतौंधी आती है,
आँख की रोशनी भाग जाती है।
ठीक ठीक नहीं कह सकता,
कितने और कैसे सींग थे ?.
यह दावे के साथ कह सकता हूँ,
कि फ़रज़ू के गधे के सींग थे।

दूसरे गवाह को बुलाया जाय,
उसकी भी गवाही ली जाय।
क्या फ़रज़ू के गधे के सींग थे,
माई बाप !, उसके गधे के सींग थे।
अगर सींग, गधे के सर पर नहीं होगें,
हूज़ूर सींग क्या, आपके सर होगें।
कितने सींग थे, और कितने लम्बे थे,
चश्मा नहीं था, कैसे बताऊं, कितने लम्बे थे।
लम्बाई, मैं दावे के साथ नहीं पता सकता,
भगवान के डर से, ईमान नहीं बेच सकता।

तीसरे गवाह को  अभी बुलाओ,
अदालत का समय ना गंवाओ।
क्या धरमू सींगवाला गधा लाया था,
हां, हूज़ूर मेरे कुए पर पानी पिलाया था।

दो सिपाही अभी तुरन्त जायें,
कुआ देख कर फौरान बतायें।
हूज़ूर ! कुआ तो चोरी हो गया,
यह क्या, नया ग़ज़ब हो गया।
सींगों का फ़ैसला से देने पहले, चोरी हुए कुए को ढूढ़ा जाय,
पता लगाने के लिए यह केस, सी बी आई को दिया जाय।
सी बी आई ने केस में तीन साल लगाये,
कुए की चोरी के ,कुछ यूं तथ्य बतलाये।
कुआँ बनाने सरकारी ऋण लिया गया,
सरकारी दफ़्तर से नक्शा पास किया गया।
ऋण कागज़ों पर गवाहों के हस्ताक्षर हैं ,
कुआँ उदघाटन पर मंत्री के हस्ताक्षर हैं।
बहुत ढूढ़ा गया , परन्तु कुआँ ना मिला,
मिला तो फ़ालतु काग़ज़ों का पुलिंदा मिला।
अतः इस केस को बन्द किया जाय,
कुआ चोरी हो गया, मान लिया जाय।

केस ने देश में भयानक रूप धारण कर लिया,
देश को हिंसा-आगज़नी की चपेट में लपेट लिया।
विपक्ष ने संयुक्त संसद कमेटी की मांग उठाई,
सरकार ने यह बात बिलकुल निराधार बताई।
सरकार, यह तय करने में सक्षम है,
गधे के सींग होते हैं अथवा नहीं,
अगर होते हैं, तो कितने होते हैं,
अगर नहीं होते, तो क्यूं नहीं होते।
 
विपक्ष ने संसद को चलने ही नहीं दिया,
सरकार ने विपक्ष की मांग को मान लिया।
सभी पार्टियों के सांसदों को प्रतिनिधित्व मिला,
सभापति का पद, सरकारी सांसद को ही मिला।
जे पी सी, विदेशों में जायेगी ,
वहां जाकर अध्ययन करायेगी।
गधे विकसित होते हैं, विकसित देशों में
अथवा आधुनिक विकासशील देशों में
उनके सींग के रंग और लम्बाई में कुछ अन्तर है,
यदि अन्तर है, तो वह औसतन कितना अन्तर है।
सभी सांसद अपने साथ में पैमाना लेकर जायेगें
  गधे के सींग की ठीक से लम्बाई नाप कर आयेगें

सभी सांसदों ने अपनी अपनी रिपोर्ट दी,
कमेटी ने रिपोर्ट की पूरी तरह समीक्षा की।
रिपोर्ट से लोग संतुष्ट नहीं हुए,
देश में और अधिक दंगे हुए।
संसद में हल्ला हुआ,
सड़कों पर हल्ला हुआ।
सरकार ने अनेक कमीशन बिठाये,
कोई ठोस तथ्य सामने नहीं आये।
कमीशनों के कार्यकाल भी बढ़ते रहे,
लोग अपनी बात पर अडिग अड़ते रहे।

धरमू इस ग़म से परलोक सिधार गया कि,
उस पर गधे के सींग चुराने का आरोप लगा।
गधा भी इस दुख में परलोक सिधार गया कि,
उस निर्दोष पर सींग रखने का आरोप लगा।
फ़रज़ू मस्त है, हृष्ट पुष्ट है, खुश है
उसे पूर्ण विश्वास है, सरकार एक दिन
उसकी बात मानेगी,अगर न्याय पालिका नहीं मानेगी,
तो सरकार कानून में संशोधन करके बिल लायेगी।
इस देश में गधे के सींग होते हैं,
मूर्ख़ हैं, जिनके सींग नहीं होते हैं।
जिनके सींग नहीं है, देश छोड़ कर चले जाओ
सींग वालो, बिना सींगवालों से देश मुक्त कराओ

kahani sangraha aadamkhor dahej vishyak kahaniya dinesh pathak shashi

कहानी संग्रह

आदमखोर

(दहेज विषयक कहानियाँ)

संपादक

डॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’

संस्करण : 2011

मूल्य : 150

प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन

विवेक विहार,

शाहदरा दिल्ली-32

शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा

----

एक और अभिमन्यु

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’

उसे लगा कि थोड़ी देर में उसके सारे शरीर का खून खुद-ब-खुद निचुड़ जायेगा और वह हड्डियों का कंकाल मात्र रह जायेगा। कैसे दिखाएगा वह समाज में अब मुँह, और क्या बताएगा लोगों को। सब थू-थू नहीं करेंगे क्या? यही सोच-सोचकर उसके चेहरे का रंग पतझड़ के पत्तों-सा पीला पड़ता जा रहा है। वह सोच-सोचकर हैरान है कि समय कितना बदल गया है।

पुत्री ने जैसे ही सोलह वसन्त पार किए, उनके लिए सुयोग्य वर की तलाश शुरु कर दी थी उसने। सुराही-सी गर्दन, तोते-सी पतली नाक और चंचल हिरनी-सी आँखों वाली गोरी-चिट्टी अपनी पुत्री की ओर एक नजर उठाकर जब वह देखता तो उसे लगता-भला इतनी सुन्दर पुत्री के विवाह में क्या अड़चन आयेगी। जिसे भी चुनकर एक बार लायेगा, वही उसकी पुत्री को देख खुश हो जायेगा। और बस, पुत्री का विवाह कर वह दायित्व से मुक्त हो जायेगा।

नारी-उत्थान एवं दहेज-विरोधी संस्था का सचिव होने के कारण, वह अब तक जाने कितने सामाजिक उत्थान के कार्य करा चुका था और कितनी ही गरीब, बेसहारा युवतियों के विवाह भी बिना किसी दान-दहेज के करा चुका था। अतः उसे गर्व था कि वह अब तक इतना नाम कमा चुका है कि कोई उसकी बात नहीं टाल सकेगा।

दहेज प्रथा के विरोध में जाने कितने भाषण वह अब तक दे चुका था तो नारी-उत्थान के कितने ही कार्यक्रमों का संचालन भी कर चुका था। जहाँ भी जाता, लोग जिन्दाबाद के नारे लगाना शुरु कर देते। ऐसे में उसे लगता कि वह बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति है। वह प्रसन्न हो उठता और मन में फूला न समाता।

पर उसकी यह प्रसन्नता अधिक दिन न टिक सकी, हवा-भरे गुब्बारे में पिन चुभो दी हो जैसे। पुत्री के सोलह वसन्त पूरे होते-होते उसने सुयोग्य वर की तलाश शुरु की थी। बहुत सारे परिचित हैं, उन्हीं में किसी के योग्य पुत्र को चुन वह हाथ पीले कर देगा। सोचकर सबसे पहले वह गंगाप्रसाद जी के घर पहुँचा। गंगाप्रसाद जी उसके घनिष्ठ मित्र और सहकर्मियों में से थे तथा समाज-सुधारक कार्यक्रमों में अग्रणी रहा करते थे।

गंगाप्रसाद जी उसके घर बहुत बार आ चुके थे। उनसे घर का कोई राज छिपा न था। जब उसने अपनी पुत्री सीमा से उनके पुत्र राहुल के सम्बन्ध में बात की तो गंगा प्रसाद जी एकदम से पैंतरा बदल गये-‘‘वह तो सब ठीक है, रामनाथ। सीमा बिटिया को मैंने अच्छी तरह देखा है और कोई कमी नजर नहीं आई उसमें मुझे। पर..........।

‘‘पर की गुंजाइश फिर कहाँ पैदा होती है, गंगाप्रसाद जी?’’

‘‘दसअसल, आप गलत समझ गए, रामनाथ जी। मेरा आशय था कि मैं आपसे ‘हाँ’ कहूँ, उससे पहले राहुल की राय भी जान ली जाए तो क्या हानि है?’’

‘‘ओहो, मैं तो डर ही गया था, जाने क्या सोचकर ‘पर’ कहा है आपने। लेकिन इसमें क्या बुराई है? पूछकर देखो राहुल से। कहते हैं न कि जब पिता के जूते में पुत्र का पैर आने लगे तो पुत्र के साथ मित्रवत् व्यवहार करना चाहिए। और फिर हम लोग ठहरे समाज-सेवक। बच्चों पर भी अपनी बात थोपना उचित नहीं समझते। क्यों गंगाप्रसाद जी?’’

‘‘हाँ, यही तो मैं भी कह रहा था।’’ मुस्कराते हुए उन्होंने राहुल को आवाज दी।

‘‘पिताजी, राहुल भैया घर पर नहीं हैं। कॉलेज से नहीं आए अभी।’’ नन्हीं अंकिता ने अंदर से ही आवाज दी।

‘‘कोई बात नहीं, आप विचार कर लीजिएगा। मैं फिर आकर पूछ लूंगा।’’ उठते हुए उसने कहा तो गंगाप्रसाद जी उसे दरवाजे तक आकर विदा कर गए।

तीसरे दिन ही उनका उत्तर आ गया था-‘‘राहुल ने कहा है कि वह तो सीमा को शुरु से ही बहन मानता है, अतः वहाँ शादी नहीं कर सकता।’’

उसके बाद वह दूसरे मित्र सहदेव के यहाँ गया था। वहाँ भी कुछ-कुछ उसी तरह का मिलता-जुलता-सा उत्तर मिला था तो उसे आश्चर्य सा हुआ। उसके बाद तो दहेज-विरोधी एवं नारी-उत्थान संस्था से जुड़े लगभग सभी मित्रों-परिचितों से उसे लगभग एक-जैसा ही उत्तर मिलता; जैसे हर जगह एक ही आवाज का कैसेट पहुँंचा दिया हो किसी ने। याकि पुराने रिकार्ड प्लेयर की सुई, रिकार्ड के एक ही स्थान पर अटक-अटककर एक ही वाक्य दुहरा रही हो बार-बार।

कुंठित मन लिये उसने सभी परिचितों, मित्रों और संस्था से जुड़े लोगों को भाड़ में झोंक, अन्य ही जगहों पर तलाश शुरु की। पर ये क्या! जो लोग सीमा को देखने आते वे देखकर पसन्द भी कर लेते, पर उसे कुछ दिन बाद ही अपने यहाँ से किसी-न-किसी माध्यम से मना करवा देते तो उसे लगता ये सारा ब्रह्माण्ड तेजी के साथ घूमने लगा है जिसके घूर्णन से उसका सिर चकरा रहा है।

ऐसी सुन्दर बेटी, जिसके रूप-गुणों पर उसे नाज था, आज बाईस बसन्त पार कर चुकी है। यानी पूरे छह वर्ष के अथक प्रयास और भाग-दौड़ के बाबजूद वह जहाँ से चला था वहीं लौटकर आ गया है आज। यानी उसके द्वारा किया गया कार्य शून्य हुआ। शून्य।

इतना बड़ा समाज-सेवक, जिसके नाम की चारों ओर तूती बोलती थी, जिसने जाने कितने ही असहाय, गरीबों के लड़के-लड़कियों के विवाह बिना दहेज के कराए थे; आज वही व्यक्ति गत छह वर्षों से जूते चटकाते-चटकाते हताश हो चला है, पर इकलौती पुत्री के लिए योग्य वर न खोज सका।

उसे लगने लगा कि इसमें कुछ राज है। शायद उसके परिचित ही मिलकर उसके साथ षड्यन्त्र रच रहे हैं। उसे कदम-कदम पर अब कुछ-न-कुछ राज छिपा लगता। क्यों, आखिर क्यों नहीं हो पा रही उसकी बेटी की शादी?

उसे लगा कि बेटी की शादी न हो पाने और उसके दहेज-विरोधी संस्था का सचिव होने के बीच कुछ सामंजस्य है शायद। जहाँ-जहाँ भी वह गया, लोगों ने बड़े आदर-भाव के साथ उसे बिठाया। उसका स्वागत किया। हाल-चाल पूछे। संस्था की प्रगति के बारे में जानकारी हासिल की। पर जब वह अपनी पुत्री के विवाह की बात करता तो लोग कन्नी-सी काटने लगे।

‘‘मुझे आपकी पुत्री पसन्द है। मैं उससे शादी करने को तैयार हूँ।’’ आगन्तुक युवक के मुँह से यह वाक्य सुन उसे लगा कि तेज लू की दोपहरी में किसी ने मीठे शर्बत का गिलास थमा दिया हो उसे और नीम की शीतल छाया में बैठाकर कह रहा हो कि इसे पी लो।

वह अपनी प्रसन्नता को संभाल भी न पाया था कि आगन्तुक के अगले वाक्य ने आसमान में उछालने के बाद क्षणभर में उसे जमीन पर ला पटका-

‘‘आपका एस्टीमेट क्या रहेगा? यानी आप कितना दहेज देंगे?’’

सुनकर उसका खून खौल उठा और क्रोध से उसकी आँखें लाल हो उठीं। इसकी यह मजाल कि एक समाज-सेवक से ऐसी बातें करे, जिनका वह पूरी उम्र विरोध करता रहा है! अपनी पुत्री के लिए अब तक की आदर्शवादिता को ढोंग सिद्ध कर दे! यानि कि ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ की कहावत को चरितार्थ करे।

लाल-लाल आँखों से उसने आगन्तुक युवक को घूरा तो वह सहमा नहीं, डरा भी नहीं; बल्कि उसकी लाल-लाल आँखों में, उसी दृढ़ता से घूरते हुए उसने जो कहा उसे सुनकर लगा कि कड़वा सच बोलने वाले आगन्तुक युवक के आगे वह अभी दूध-पीता नादान बच्चा है और वह युवक बहुत बड़ा बुजुर्ग।

‘‘ठीक है, मत बताइए, पर इतना याद रखिए-अभी तो बाईस वर्ष ही बीते हैं सीमा के। ऐसा न हो कि आपके आदर्शों की बलि उसकी सारी उम्र ही चढ़ जाए।’’ वापस जाने के लिए मुड़ते हुए उसने पूछा-

‘‘इतने वर्षों में आज तक आप जहाँ-जहाँ गए, क्या सभी लड़के सीमा को बहन ही मानते थे? या कुछ कमी थी सीमा में, जो अभी तक शादी नहीं हो पाई? जानते हैं क्यों, क्योंकि लोग आपके समाज-सेवक के चोले से डरते हैं। वे जानते हैं कि आप उनके लड़कों को मुफ्त में छीन लेंगे। खुलकर आपसे मांग सकें, इतनी हिम्मत जुटाकर समाज में बदनाम क्यों होने लगे वे।’’

आँखों में आँखें डालकर युवक ने एक-बार फिर से उसे घूरा और फिर पीछे मुड़कर जाने लगा।

उसे लगा कि अभी-अभी किसी ने सीसा गर्म करके उसके कानों में उड़ेल दिया हो। सच है, सत्य कितना कड़वा होता है।

परत-दर-परत, एक-एक बात उसकी समझ में आने लगी छह वर्ष की भाग-दौड़ के बावजूद सीमा की शादी न हो पाने का कारण भी, लोगों द्वारा दिया जाने वाला आदर और उसके बाद कन्नी काट जाने का कारण भी।

चक्रव्यूह में घुस जाना तो माँ के पेट से ही सीख गया था अभिमन्यु। पर उससे निकल पाना?

उसे लगा कि आज फिर से एक अभिमन्यु चक्रव्यूह में फँस गया है, जहाँ से निकल पाना आज भी उसके लिए उतना ही असम्भव लग रहा है, जितना उस समय लगा था। ’’’

--

28, सारंग विहार,

पोस्ट-रिफायनरी नगर, मथुरा-201006

-------------------------------.

kahani sangraha aadamkhor dahej vishyak kahaniya dinesh pathak shashi

कहानी संग्रह

आदमखोर

(दहेज विषयक कहानियाँ)

संपादक

डॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’

संस्करण : 2011

मूल्य : 150

प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन

विवेक विहार,

शाहदरा दिल्ली-32

शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा

----

मकड़ जाल

श्रीमती शशि पाठक

मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरे द्वारा बोये गये बीज का इतना दैत्याकार वृक्ष बन जायेगा जो अन्य नवपल्लवित वृक्षों को अपने अस्तित्व के नीचे दबा देगा और मैं मूक दर्शक बनी सब देखती रह जाऊंगी। आखिर इसे उखाड़कर फेंकू तो कैसे? उसकी जड़ें इतने गहरे तक समा गई हैं कि ऐसा असम्भव है। अब तो उस पर फल भी आने वाला है। एक ऐसा फल जिसे खाना तो दूर चखना भी जीवन के लिए घातक है।

पर अब क्या हो सकता है। मेरे लाख समझाने पर भी कोई यकीन नहीं करेगा। यकीन करे भी तो कैसे? मैंने ही तो कूट-कूट कर इन लोगों के मन में, मम्मी-पापा व समाज के बारे में, वह सब भर दिया था जिसे सत्य मान, अब ये किसी भी हालत में झुठला नहीं पा रहे हैं।

मेरी बात को एक भारतीय नारी की विडम्बना मान, मुझे लाचार व बेबस जान, मेरे सुसरालियों को दोषी मानते हुए बुरा-भला कह रहे हैं। जबकि हकीकत क्या है, इसका उन्हें पता नहीं।

बर्निंग वार्ड में पड़े-पड़े, साठ प्रतिशत से अधिक जला हुआ मेरा शरीर, पूर्व में लिखे गये मेरे पत्रों को सच सिद्ध करने के लिये पर्याप्त सबूत का कार्य कर रहा है। मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि आखिर ये सब हुआ कैसे?

‘‘मैडम, आपकी बैण्डएड करनी है।’’ नर्स की आवाज सुन मेरी विचार श्रृंखला टूट गई। थोड़ी देर में वह बैण्डएड करके चली गई। अस्पताल के नियमानुसार मरीजों से मिलने वालों का आना शुरु हो गया था।

मम्मी-पापा के आने के साथ ही मेरे सास-ससुर, पति व बच्चे भी आ गये। बच्चे दूर खड़े सहमे-से मुझे देख रहे थे। राउण्ड पर आये डॉक्टर ने मुझे देखा-भाला और ‘‘गुड, खतरे की कोई बात नहीं है।’’ कहकर चले गये।

मम्मी-पापा और मेरे सास-ससुर आपस में छत्तीस का आंकड़ा बने बैठे थे। दोनों अपनी-अपनी बात पर अडिग थे।

‘‘इस पर हस्ताक्षर कर दो’’-पापा द्वारा आगे बढ़ाये तलाक के कागजों को घूरते मैंने एक नजर अपने मासूम बच्चों व पति की ओर डाली।

‘‘नहीं, हरगिज नहीं। मैं ऐसा नहीं कर सकती।’’

‘‘मर तो सकती है।’’ पापा ने रुंआंसा होकर कहा। ‘‘अरे इस बार तो अपने नसीब अच्छे थे जो बच गई, वर्ना इन कसाइयों ने तो........।’’

‘‘बस-बस-पापा, इन्हें कुछ न कहें।’’ मैं लगभग चीख पड़ी। मन जाने कैसा-कैसा हो उठा। अपनी ओर निहारती पति की आँखों में देखा, इन आँखों में दूर-दूर तक मेरे अनिष्ट की छाया न थी। उनमें तो अनन्त गहरा सागर, प्यार की हिलोंरें मार रहा था।

सभी के जाने के बाद, मैं फिर अकेली रह गई। विचारों का बवण्डर फिर उठने लगा। पापा-मम्मी के दिलो-दिमाग में अपने पूज्यों के प्रति अविश्वास भरने वाली जड़ मैं ही हूँ। इसको खत्म होना पड़ेगा। पर इसके खत्म होने से क्या इनकी विचारधारा बदल जायेगी। फिर?

एक लम्बी साँस खींच, मैं उन दिनों को कोसने लगी जब यह बीज बोया गया था। छोटी बहन की शादी थी। लड़के वालों की माँग के अनुसार, पापा ने अपनी सामर्थ्य से ज्यादा दिया था। मेरी बहन, मुझसे नौ साल छोटी थी। नौ साल पहले जब मेरी शादी हुई थी तो इतना कुछ नहीं दिया गया था। बस, यहीं से शुरु हो गई मेरे मन की ईर्ष्या और बड़प्पन की होड़।

कभी पत्रों के माध्यम से तो कभी स्वयं पीहर जाकर, ससुराल वालों के नाम पर मैंने पापा-मम्मी को सताना प्रारम्भ कर दिया। कभी पति द्वारा स्कूटर की मांग तो कभी टी.वी. व फ्रिज की मांग बता-बता कर उनका दोहन शुरु कर दिया। न दिए जाने पर अपने सताए जाने की व प्रताड़ना देने की मनगढ़ंत बातें कहती तो पापा आक्रोश से भर उठते। तब वह अपने बच्चों का वास्ता देकर, माँग पूरी करने के लिए उन्हें विवश करती। पापा ने सामर्थ्य न होते हुए भी, कर्जा लेकर, धीरे-धीरे कलर टी.वी. फ्रिज और स्कूटर आदि मुझे खुश देखने की चाह में जुटा दिए। पति व सास-ससुर द्वारा ये सब लाने का कारण पूछे जाने पर, पापा इसे उनका दोहरा व्यवहार समझ कडुआहट भरी मुस्कुराहट से उन्हें देखते और फिर ‘‘अपनी बेटी की खुशी के लिये लाये हैं।’’ कह कर चले जाते।

पर अचानक ही एक दिन यह सब घटित हो गया। मैं सुबह की चाय बनाने के लिए रसोई में घुसी ही थी कि माचिस जलाते ही फूंक से आग की लपटों में घिर गई। पति अभी सो रहे थे तथा सासजी दैनिक कार्यों में व्यस्त थीं। मेरी चीख सुनते ही सभी दौड़े चले आये। मेरे पति तो मुझे बचाने के चक्कर में स्वयं ही झुलस गये।

बाद में पता चला कि गैस का पाइप चूहों ने कुतर दिया था और रेगुलेटर को बन्द न किए जाने के कारण गैस रसोई में भरती रही। उनींदी अवस्था में मैंने किसी भी बात पर ध्यान नहीं दिया था।

यह सब सोचते-सोचते सिर दर्द से बुरी तरह फटने लगा। फफोलों में दर्द की सिहरन-सी हो रही थी सो अलग। मुझे तो अपने किए का फल मिल गया लेकिन इन निर्दोर्षों को उस अपराध की सजा क्यों मिले जिसे करना तो दूर, कभी सपने में भी न सोचा होगा उन्होंने।

धीरे-धीरे मानस पटल पर उन दिनों की याद ताजा होने लगी जब मेरी शादी हुई थी। ससुराल में सभी के स्नेह पूर्ण व्यवहार से मैं अभिभूत हो उठी थी। इसी प्यार-दुलार में मायके की यादें एकदम से भुला बैठी थी। धीरे-धीरे दो वर्ष बीत गये। स्नेहा ने हमारी खुशियों में चार चाँद लगा दिए। यूँ ही हँसी खुशी में दिन बीते जा रहे थे कि इन खुशियों को जमाने की नजर लग गई। जमाने की क्यों? इसे खुद मेरी नजर लग गई। वर्ना ऐसा शैतानी कीड़ा मेरे दिमाग में क्यों कुलबुलाता?

पर अब क्या हो सकता है। इस भंवर से निकलने का कुछ तो रास्ता होगा। यही सब सोचते-सोचते जाने कब नींद ने आ घेरा।

‘‘नहीं, मैं इन कागजों पर हस्ताक्षर नहीं कर सकती।’’

‘‘पर बेटी, तू खुद ही सोच, इन जालिमों ने तेरे साथ कितना बुरा व्यवहार किया है। क्या तू दुबारा इस नर्क में जाना चाहेगी?

‘‘मेरी बात का आप यकीन क्यों नहीं करते, पापा। आप जो सोच रहे हैं वैसा बिलकुल नही है। यह सब गलत है। मुझे किसी ने नहीं सताया। मैं झूठ बोलती थी आपसे, ताकि आप मेरे ऊपर दया करके अधिक-से-अधिक सुविधाएं जुटाते रहें। सच पापा, मैं झूठ बोलती थी आपसे। इस सबकी जिम्मेदार तो मैं स्वयं हूँ।’’

‘‘नहीं, हम मान नहीं सकते। तू बेकार में इन जालिमों का पक्ष लेकर इन्हें बचाने का प्रयास कर रही है। लेकिन हम, इन्हें जेल की हवा खिलाकर ही रहेंगे। क्या हम मर गये हैं जो तू अपने को बेसहारा समझ रही है।’’

पापा की जिद देख अचानक मुझे अपना सारा शरीर सुन्न-सा लगने लगा और आँखों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी। अपनी दयनीय स्थिति पर खुद ही ग्लानि होने लगी। पर इस सबको मेरी भावुकता समझ, पापा मेरे सिरहाने बैठ गये व प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरने लगे। मेरी निगाहें चारों तरफ अपने पति व बच्चों को खोजने लगीं।

तभी देखा, बाहर यार्ड में मेरे पति स्नेहा की उंगली थामे व युगल को गोदी में उठाये शून्य में निहार रहे हैं।

---

28, सारंग विहार,

पोस्ट-रिफायनरी नगर, मथुरा-201006

------------------------------.

kahani sangraha aadamkhor dahej vishyak kahaniya dinesh pathak shashi

कहानी संग्रह

आदमखोर

(दहेज विषयक कहानियाँ)

संपादक

डॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’

संस्करण : 2011

मूल्य : 150

प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन

विवेक विहार,

शाहदरा दिल्ली-32

शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा

----

दहेज के लिए

श्री चरण सिंह जादौन

अमृत विला आज जगमगा रहा है। हजारों बल्बों के जाल से कोठी ढकी हुई है। कोठी का कोई भी ऐसा भाग नहीं है जो न जगमगा रहा हो। अकेली रोशनी का ठेका ‘‘राजहन्स इलैक्ट्रिकल्स’’ ने 10 हजार में लिया है। आज राय साहब सेठ अमृतलाल के इकलौते पुत्र् जगमोहन लाला का दूसरा विवाह है। आज से डेढ़ वर्ष पूर्व भी ठीक इसी ङ्क्तकार से अमृत विला जगमगाया था जब जगमोहन लाल का पहला विवाह गौरधन दास की पुत्र्ी सरला के साथ हुआ था। अपने क्वार्टर में ही सेठ अमृतलाल का घरेलू नौकर सूखा अमृत बिला की जगमगाहट को देख रहा है।

जगमोहनलाल के ङ्क्तथम विवाह पर वह बड़ा खुश था। विवाह में शामिल हुआ था। परन्तु आज उसे कोई खुशी नहीं है। हो भी कैसे? उसी के सामने ठीक एक माह पूर्व ही तो जगमोहन की पहली पत्नी का देहान्त हुआ था और आज दूसरा विवाह रचाया जा रहा था। बूढ़ा सूखा सब कुछ जानता है। उसने अमृतविला की हर बात को देखा है उसे मालूम है।

जब गौरधनदास सरला का रिश्ता तय करने आये थे। और राय साहब ने दहेज में 20 हजार रुपये व फिएट कार माँगी थी। गौरधनदास के एक पुत्र् व एक पुत्र्ी कुल दो सन्तानें थी। काफी सम्पत्ति तथा नगद उसके पिता छोड़ गये थे। वे स्वयं भी सोने-चांदी का कारोबार करते थे, वे सरला को अच्छे घर में व्याहना चाहते थे। गौरधनदास ने 20 हजार रुपये तथा फिएट कार की शर्त पर रजा मन्दी दे दी।

दिन गुजरते रहे विवाह की तिथि नजदीक आयी तैयारियाँ आरम्भ हो गई थीं कि तभी एक दिन गौरधनदास चांदी का एक बड़ा फायदे का सौदा कर बैठे परन्तु स्थिति आशा के विपरीत बनी और उन्हें कुल डेढ़ लाख का घाटा हुआ। घर का सारा नगद तथा पत्नी के आभूषण एवं अन्य कई चीजें बेचकर भुगतान तो पूरे कर दिए परन्तु अब सरला की सादी के लिए तो रुपया चाहिये था। अब केवल रहने की कोठी ही बची थी। उन्होंने उसे भी सेठ कुण्डामल को बेचकर 35 हजार ङ्क्ताप्त कर लिए। शादी की सारी तैयारियां पूरी की हुईं। अब दहेज के रुपये तथा कार देने के केवल 20 हजार रुपये बचे थे। फिएटकार और चाहिए थी। विवाह की रस्में पूरा होते ही रायसाहब ने दहेज के रुपये तथा फिएट कार माँगी तो गौरधनदास 20 हजार रुपये देते हुए बोले थे ‘‘कार नहीं है शीघ्र ही दे दूंगा,’’ परन्तु रायसाहब 20 हजार रुपया ब्रीफकेश में डाल कर बिगड़ने लगे और तुरन्त कार देने को कहा। गौरधनदास ने हाथ जोड़कर असमर्थता ङ्क्तकट की परन्तु राय साहब कहाँ मानने वाले थे वे और अधिक बिगड़ने लगे फिर गौरधनदास ने अपने व्यापार में घाटे की सारी कहानी कह डाली थी। परन्तु रायसाहब को इससे क्या उन्हें तो फिएट कार चाहिए थी। वे लड़की को कभी न भेजने की धमकी देकर लड़की को विदा कर ले गये।

पुत्र्ी की विदा के बाद गौरधनदास ने दहेज की फिएट कार चुकाने की कसम खाई। परन्तु अब पुराना व्यवसाय फिर आरम्भ कराने के लिए तो पूंजी थी नहीं। अतः उन्होंने एक कपड़े की दुकान पर नौकरी कर ली, एक कमरे में किराये पर रहने लगे थे। 100 रु. वेतन से अपनी, पत्नी तथा बेटा श्याम तीनों का मुस्किल से पेट भर पाते थे। श्याम इस समय 9वीं कक्षा में पढ़ रहा था कि तभी श्याम को कैन्सर ने घेर लिया। कुछ दिन उपचार के बाद डाक्टरों ने बम्बई में आपरेशन कराने की सलाह दी। परन्तु गौरधनदास के पास तो कुछ भी नहीं था। अन्त में विवश होकर गौरधनदास ने सरला को श्याम के बारे में लिखा। परन्तु राय साहब ने आर्थिक सहायता देना तो दूर रहा सरला को आने भी न दिया। आखिर सरला बीमार भाई को देखने आने के लिए छटपटाती ही रह गई और एक दिन श्याम ने दम तोड़ दिया।

श्याम की माँ श्याम का गम न सह सकी और जोर की बीमार पड़ गई। दवा दारु होने का तो ङ्क्तश्न ही नहीं था। और एक दिन वह भी चल बसी। बेचारे गौरधनदास अपनी 70 वर्ष की उम्र में अब और कितना दुख सहते उनके जीने के लिए दुनिया में अब रह ही क्या गया था। उन्होंने एक दिन एक पत्र् सरला को लिखा, लिखकर उसे डाक में डाल दिया और स्वयं भारी मात्र में नींद की गोलियाँ खाकर आत्महत्या कर ली। पत्र् में उन्होंने लिखा था-

बेटी सरला।

हाँ बेटी में दोषी हूँ कि बाप होते हुए भी श्याम के इलाज के लिए पैसा न जुटा पाया और इलाज के अभाव में श्याम चल बसा। और एक सप्ताह बाद तुम्हारी माँ भी मुझे छोड़कर श्याम के पास चली गई। मैं अब जीकर क्या करुँगा। मैं भी तुम्हारी माँ तथा श्याम के पास जा रहा हूँ। तुम्हें पत्र् पढ़कर दुःख हुआ होगा। मुझे माफ कर देना।

तुम्हारा पिता, गौरधनदास।

पत्र् पढ़कर सरला पछाड़ खाकर गिर पड़ी और बेहोस हो गयी थी। उसे उठवाकर कमरे के कोने में पड़ी चारपाई पर डाल दिया गया। 4 दिन बाद होश आया तो उसे वही दहेज की कार के ताने जो डेढ़ बरस से सुनती आ रही थी फिर सुनने को मिले। रोना आता तो रोने भी नहीं दिया जाता था। आखिर बीमार पड़ गई। सारा काम कराया जाता। दवा की तो बात दूर रही पानी को भी पूछने वाला कोई नहीं था। हालत गिरती ही गई। आखिर एक दिन उसने भी आँखें हमेशा-हमेशा को मूंद लीं। पूछने वाले से कह दिया गया कि हार्ट की मरीज थी। हार्ट फेल हो गया। बहुत उपचार के बाद भी न बचाई जा सकी। बाद में सरला के कमरे में साफ करते समय सूखा को 2 पत्र् पड़े मिले थे। एक पत्र् तो सरला के पिता ने सरला को लिखा था तथा दूसरा सरला ने मृत्यु से कुछ दिन पूर्व अपनी किसी सहेली को लिखा था। परन्तु पत्र् डाक में न डाल सकी थी। पत्र् मे सरला ने अपनी शुरु से आखीर तक कहानी लिख डाली थी अन्त में लिखा था -

बहिन मैं एक अभागी नारी हूँ जिसकी खुशियों के लिए उसके माँ-बाप और भाई को अपनी जान की कुर्बानी देनी पड़ी परन्तु फिर भी जिसे पति तथा ससुराल वालों का प्यार न मिल सका। माँ-बाप अपनी लाड़लियों को बड़े घरों में सुख के लिए देते हैं परन्तु दहेज के भूखे इन मनुष्य रुपी भेड़ियों के यहाँ केवल पैसे को स्थान है। इन्सान को नहीं। यदि समाज में यह दहेज ङ्क्तथा इसी ङ्क्तकार रही तो बहन मेरे परिवार की भाँति अनेक परिवार दहेज की खातिर कुर्बान होते रहेंगे। बहिन विवाह से पूर्व जब हम लोग समाज सेवा के कार्य करते थे तब हम तुम दहेज ङ्क्तथा के विरुद्ध लड़ने के लिए गोष्ठियाँ किया करते थे। तब मुझे क्या पता था कि मुझे खुद इस कुङ्क्तथा का शिकार होना पड़ेगा। काश! यह दहेज कुङ्क्तथा न होती तो मैं भी आज माँ-बाप और भाई के साथ जीने का अधिकार रखती। खैर बहिन तुम इस सम्बन्ध में जरुर कार्य करना ताकि भविष्य में मेरे जैसी अन्य बहिनों के साथ अन्याय न हो सके।’’ तुम्हारी आभागी बहिन सरला।

और आज राय साहब सेठ अमृतलाल के पुत्र् जगमोहन लाल का दूसरा विवाह 31 हजार रुपये व फिएट कार के साथ हो रहा है.......। ’’’

युवा सुरभि,

जनरल गंज, मथुरा।

--------------------.

kahani sangraha aadamkhor dahej vishyak kahaniya dinesh pathak shashi

कहानी संग्रह

आदमखोर

(दहेज विषयक कहानियाँ)

संपादक

डॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’

संस्करण : 2011

मूल्य : 150

प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन

विवेक विहार,

शाहदरा दिल्ली-32

शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा

----

सीढ़ियाँ चढ़ती धूप

श्रीमती माधुरी शास्त्री

‘‘कुलच्छनी इतना अधिक बोलना तुझे कैसे आ गया?’’ बाबा ने भरे मंडप में अपनी पोती पर हाथ उठा दिया लेकिन उनके मित्र् सामवेदी जी ने बढ़ता हाथ, फौरन जहाँ का तहाँ थाम लिया।

‘‘यह क्या तमाशा है पंडित जी? पढ़ी-लिखी बिटिया पर हाथ उठाते हो?’’ बाबा को कुछ तो समधी की धृष्टता पर और कुछ लक्ष्मी के बड़बोलेपन पर गुस्सा आ रहा था।

तभी मिसिर जी अपनी कुर्सी से उठकर इन दोनों के पास चले आये और समझौता कराने की मुद्रा में बोल उठे ‘‘पं. जी जरा बिटिया से भी तो पूछ कर देखलो, आखिर वह चाहती क्या है। उसने इस नये युग में आँख खोली हैं तो उसकी राय भी जान लेना जरुरी है।’’

अभी ये लोग आपस में बातचीत कर ही रहे थे कि तब तक लक्ष्मी ने धरती पर पड़ी बाबा की टोपी तथाकथित ससुर के पैरों के पास से उठा ली। वह उस टोपी को लेकर ऐसे खड़ी हो गई जैसे टोपी, टोपी न होकर बाबा का लहुलुहान सर ही हो। लक्ष्मी की आँखें, बाबा की विवशता और होने वाले ससुर की लालची ङ्क्त.ति को देखकर लाल हो उठीं।

अच्छा ही हुआ कि भांवरे नहीं पड़ीं, उससे पूर्व ही इन लोगों की असलियत का पता चल गया। वर्ना........। बाबा को अपनी ओर देखते, देख लक्ष्मी तपाक से बोल उठी...... बाबा, इन सबसे कह दीजिए की .पा करके अपने-अपने घरों को जाएं। मुझे शादी ही नहीं करनी। कम से कम इससे तो बिल्कुल नहीं। इनके घर में कदम रखने से पहले मैं आपकी देहरी पर ही मर जाना ज्यादा पसंद करुँगी।’’ पं. जी का क्रोध अब तक थोड़ा शांत हो चुका था। भरत और लक्ष्मण जैसे उनके दोनेां मित्र् दुःख-सुख में साथ जो थे।

‘‘बेटी, इतनी सब तैयारियाँ, और उस पर इतने मेहमान........।

बाबा और लक्ष्मी में थोड़ी देर तक विचार-विमर्श चलता रहा। लक्ष्मी जिद पर अड़ गई थी कि अब मैं इनके साथ हर्गिज शादी नहीं कर सकती। आप नहीं जानते बाबा, मुझे औरों की चिन्ता की बजाय अपना भविष्य अधिक प्यारा है।’’

.........आप यही चाहते हैं न कि मेरा इसी मुहूर्त में शादी हो, ठीक है, आप थोड़ा सा रुकिये मैं अभी आती हूँ।’’

लक्ष्मी वहाँ से उठकर किसी भी उचित पात्र् को तलाशती रात्रि भोज की तैयारी में व्यस्त किशन के पास जा खड़ी हुई। उसने विशन को आवाज दी। हाथ में दही का पीपा लेकर खड़े विशन ने जब लक्ष्मी को अपना नाम पुकारते सुना तो जल्दी से लक्ष्मी के पास आ खड़ा हुआ और बोला- ‘‘जी कहिए।’’

विशन लक्ष्मी के जान-पहचान का एक कुलीन युवक था। जिस स्कूल में वह एम.ए. बी.एड़ करके बच्चों को पढ़ाती थी उसी स्कूल में विशन अभी-अभी चपरासी लगा था। उसके आकर्षक व्यक्तित्व, उठने-बैठने का सलीका, बोल-चाल की भाषा, सभी उसके अच्छे संस्कार का बोध कराती थी। जिन्दगी में कुछ बन पाने की लालसा उसके रोम-रोम में समाई थी। फिर भी वह अपने वर्तमान से संतुष्ट था। लक्ष्मी ने थोड़ी देर उससे बातचीत की उसे समझाया-बुझाया। लक्ष्मी की बात सुन विशन अवाक् सा रह गया। न तो उससे हाँ कहते बना और न ना ही। वह लक्ष्मी की इज्जत करता था। इसलिये चुपचाप मौन, सिर झुकाए खड़ा रहा। उसे लगा जैसे उससे मजाक की जा रही हो।

लक्ष्मी ने पुनः पूछा ‘‘विशन तुम्हें कोई ऐतराज तो नहीं है?’’ विशन ने सिर हिला दिया। तो ठीक है चलो मेरे साथ। लक्ष्मी विशन का हाथ पकड़ कर पुरोहित जी के सामने आ खड़ी हुई और बोली-‘‘पुरोहित जी! शादी की रस्म शुरू करिए।’’

मंत्रेच्चार से विवाह मण्डल पुनः गूंज उठा। बाबा यह सब दृश्य देखकर दुःखी हो उठे। उन्होंने भर्राये गले से कहा-बेटी, यह तेरा कैसा निर्णय है? तू इतनी पढ़ी-लिखी और यह मैट्रिक पास। आज तेरा बाप जिन्दा होता तो क्या तेरी ऐसी मनमानी चलने देता?

‘‘दुःखी मत हो बाबा। मुझे मालूम है कि आगे की जिन्दगी में मुझे बहुत संघर्ष करने पड़ेंगे। लेकिन उन लालचियों के घर में मुझे जितनी अङ्क्तिय वेदनांए सहनी पड़तीं उससे तो इस ङ्क्तिय वेदना को सहना ज्यादा सरल रहेगा। मेरा उस तय किए रिश्ते से विश्वास उठ चुका है। मैं वहाँ किसी भी हालत में सुखी नहीं रह पाऊँगी, अच्छा ही हुआ कि फेरों से पहले ही उनका असली स्वरुप सबके सामने आ गया। वर्ना जीवन भर पछताना पड़ता और क्या पता मैं जिन्दा भी बच पाती या.....

‘‘ऐसी कुभाषा मत बोल बिटिया...........।’’

बाबा मैंने जो भी निर्णय लिया है वह भविष्य में समाज की कसौटी पर खरा ही उतरेगा। विश्वास कीजिये। आपकी बेटी कभी दुःखी नहीं रहेगी।

आपने इतना पढ़ाया-लिखाया है इसलिये बाजुओं में ताकत है। विशन में जो-जो गुण हैं वह सिर्फ मैं ही जानती हूँ, दूसरा कोई नहीं। आप निश्चित रहें। भविष्य की चिन्ता अब आपकी नहीं, मेरी है। मेरे इसी निर्णय को आप तन-मन से स्वीकारें।’’

अपने मित्रें, सामवेदी जी, पुण्डरीक जी और मिसिर जी के हस्तक्षेप में बाबा चुप बैठे रहे। हमेशा ङ्क्तसन्नचित रहने वाले बाबा आज अचानक अनहोनी घटनाओें को देखकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो रहे थे उनकी आँखों का बाँध पूरी तरह से टूट चुका था। बेटी दामाद के पैर उन्होंने जल से धोने के बजाय आँसुओं से धोये। विदाई की घड़ी आ गई। बाबा का कलेजा विछोह की पीड़ा से फटा जा रहा था।

विदा होकर लक्ष्मी विशन के घर आ गई। घर पर विशन की एक छोटी-बहन के अलावा और कोई नहीं था। बहिन केतकी मात्र् नौ साल की थी। भाभी को पा बहुत खुश हुई। लक्ष्मी ने उसे प्यार किया फिर पूरे कमरे का निरीक्षण करने लगी। कुछ विचार आ जाने पर उसने विशन को आवाज दी-‘‘सुनो!’’

दूसरी तरफ से आवाज आई-‘‘जी कहिए।’’

लक्ष्मी ने ज्योंही अपने लिए ‘‘जी’’ शब्द का संशोधन सुना उसका माथा ठनक उठा। सोच के सागर में डुबकियाँ लगाने लगी। उस सोच की तली में कर्मठता की सिपियां भरी पड़ी थीं जिन्हें धैर्य और विवेक के साथ एक-एक चुनकर उन्हें समाज के लिये चुनना था। विशन उसके सामने आ खड़ा हुआ। उसकी मुख मुद्रा से ऐसा भान हो रहा था। वर्षों से ऐसा ही अभ्यास जो पड़ा हुआ था। अपने सामने विशन को हाथ बांधे खड़ा देखकर लक्ष्मी ने मुस्कराते हुए कहा-‘‘मुझे आपसे कुछ विचार-विमर्श करना है। मैं चाहती हूँ कि मैंने जो भी कदम उठाया है उसके लिए मुझे भविष्य में लज्जित न होना पड़े। बस आपके सहयोग की आवश्यकता पड़ेगी, और हाँ-मुझे सहयोग देने की पहली शर्त यह है कि आज से ही मुझे ‘‘जी’’ कहना छोड़ दें। मैं अब स्कूल की मास्टरनी नहीं बल्कि आपकी व्याहता पत्नी हूँ और मेरा नाम लक्ष्मी है।’’ विषय को बदलते हुए उसने पूछा-आपने एक बार स्कूल में कभी जिक्र किया था कि आपका गाँव में एक अपना घर भी है।’’

विशन ने सकुचाते हुए कहा- ‘‘जी’’ है तो, लेकिन वह आपके रहने लायक नहीं है।

‘‘पुनः अपने लिए ‘‘जी’’ सम्बोधन को सुनकर लक्ष्मी समझ गई कि विशन के दिल से मास्टरनी वाली इमेज निकाल पाना शीघ्र संभव नहीं हो पाएगा उसके लिए समय लगेगा।

‘‘ठीक है, मकान तो अपना है, जैसा भी होगा गुजारा कर लेंगे। सोचती हूँ कि अब इस शहर को छोड़ देना चाहिए। लक्ष्मी की बात सुनकर विशन ने पूछा-‘‘वहाँ क्यों। यहाँ आपकी और मेरी नौकरी है, गाँव में तो कुछ भी नहीं। खाएंगे क्या?’’

लक्ष्मी के मन में एक हल्की सी कचोट थी, वह नहीं चाहती थी कि उसके इस निर्णय की तरफ कोई भूलकर भी अंगुली उठाए, समय एक ऐसी औषधी है जिससे बड़े-बड़े घाव भर जाते हैं। आँखों से दूर रहूँगी तो बाबा के मन की कसक भी धीरे-धीरे मिट जायेगी और कोई यह भी न कहेगा कि लक्ष्मी ने एक साधारण कर्मचारी से शादी कर ली। उसने मन में एक ङ्क्ततिज्ञा की कि जब तक वह विशन को ‘‘विष्णु कुमार शर्मा’’ नहीं बना लेती तब तक वह इस शहर में नहीं लौटेगी।

‘‘अरे भौजी, आज तो विशना के घर में बत्ती जल रही है, का विशना गाँव लौटि आवा?’’ रामदुलारी ने अपनी जिठानी सरबतिया से पूछा। इस पर सरबतिया ने कहा-तोहका पता नाहीं का बहुरिया, अरे अपना विशना शहर में मास्टरनी बहुरिया ब्याह के लावा है।

एक मुँहफट लड़की देवकी बोल उठी-‘‘दोनों में कोई परेम, अरेम का चक्कर चलिगा होई। नई तो ऐसन झेंपू और गूंगे से भला कौन बिहाय चलाई?’’ देवकी की बात कहने के अंदाज से सभी हँस पड़ीं तो कुछ अपने काम में लगीं रहीं।

तभी उनमें से एक बड़ी बूढ़ी औरत बोल उठी-‘‘अरी ओ लुगाइयों, बातों की ही कुचुर-कुचुर करती रहोगी या विशना की लुगाई का जा के हाल चाल भी पुछिहा? अरे मास्टरनी है तो का हुआ, है तो गाँव की बहुरिया जाके तनिक मिलो जाइ के, नई-नई आई है कुछ मदद वदद करो।’’

बुढ़िया की बात में दम था, इसलिये सभी की हँसी दिल्लगी थम गई। सब पानी भर-भर कर अपनी-अपनी राह होलीं। कुछ दिनों के अन्दर ही गाँव की बड़ी-बूढ़ियों से लेकर छोटी-मोटी तक विशना की बहुरिया से मिल आईं।

वर्षों से बंद उसे सूने घर में फिर से रोशनी लौट आने से जहाँ सभी कौतूहल से वशीभूत हो रहे थे, वहीं रामदेई बुढ़िया जो विशना और दादी के जमाने की थी, विशना के पिता को फलता-फूलता देख चुकी थी और धीरे-धीरे उजड़ता भी। आज उसी के घर पर फिर से रौनक देख उसके हृदय में खुशी फूली नहीं समा पा रही थी। इसी भावना के वशीभूत हो उसने गाँव की सभी औरतों को विशना की बहुरिया की मदद करने की बात कह डाली थी।

गाँव के कायदे के अनुसार लक्ष्मी ने सिर पर पल्लू डालकर मिलने आने वाली सब चाची ताइयों, जिठानियों और ननदों के पैर छूए। मिठाइयों से उनका स्वागत-सत्कार किया। लक्ष्मी मन में यह अच्छी तरह से जानती थीं कि अब मुझे इसी गाँव में रहना है तो सबसे पहले नारी जाति के मन को जीतना होगा तभी बेड़ा पार हो पायेगा। इन औरतों से मिलते मिलाते रहने से गाँव की सही स्थिति का भी पता चल जायेगा। इसलिये वह दिल खोल कर उन सबको आदम सम्मान देती रही। लक्ष्मी अब उस गाँव की चहेती बन गई थी। सभी उसके गुणों पर रीझते थे। उसने बाबा के घर (मंदिर) में गाये जाने वाले भजन-कीर्तन उसके बहुत काम आये। बड़ी बूढ़ियों के आग्रह पर वह कभी-कभी उन्हें भजन गाकर सुना दिया करती थी, सभी उसकी गायन कला पर मुग्ध थीं।

इसी ङ्क्तकार धीरे-धीरे समय खिसकता रहा। एक दिन रामाधीन की दाई (दादी) को साथ लेकर लक्ष्मी गांव के सरपंच और मुखिया के घर गईं। लक्ष्मी ने बड़ी ही विनम्रता के साथ सरपंच के पैर छूकर अपना मंतत्व ङ्क्तकट किया। शहर की बेटी की इतनी नम्रता, शालीनता और दबा ढकापन देखकर सरपंच भाव-विभोर हो उठे। मन में सोचने लगे-नाहक ही लोग मन में वहम पाले रखते हैं कि पढ़ाई लिखाई से आदमी उजड्ड गर्वीला और मुँहफट हो जाता है। आज समझ में आया कि पढ़ने से आदमी इंसान बनता है। लक्ष्मी से ङ्क्तभावित होकर सरपंच बोला-‘‘बेटी तू चाहती है न कि इस गांव में ङ्क्तौढ़ शिक्षा केन्द्र खुल जाये। ......समझो खुल गया ........मैं तेरी हर तरह से मदद करुँगा। ........तेरे पास गुण भी है साथ में अनुभव भी है। मुखिया और सरपंच दोनों से आश्वासन पा, खुशी-खुशी लक्ष्मी घर लौट आई। उस दिन उसका मन ङ्क्तसन्नता से आकाश की ऊँचाईयों को छूता रहा।

विशन के घर के आगे बहुत बड़ा मैदान पड़ा था, किसी जमाने में उसके पिता उस जमीन में साग-सब्जियां उगाकर छोटी सी गृहस्थी का अच्छी तरह से निर्वाह कर लिया करते थे। उसकी धाक पूरे गाँव में थी। सुख-दुःख में सबकी मदद करने के लिये वह सदा आगे से आगे रहते थे। ऐसे भावुक इंसान पर खुदा ने जब वज्र गिराया तो वह मानसिक संतुलन खो बैठे। केतकी के जन्मते ही राधिका के ङ्क्ताण पखेरु उड़ गये थे। उस नवजात कन्या को रोता छोड़ वह चली गयी। विशना के पिता की मनः स्थिति दिन पर दिन बिगड़ती चली गई। उसी पागलपन के दौरे में एक रात वह दस साल के विशना को और दो माह की केतकी को छोड़कर न जाने कहाँ चला गया। फिर विशना गाँव छोड़कर शहर चला आया। शहर में रहते-रहते वह इतना बड़ा हो गया था। हादसों ने उसे असमय ही गम्भीर और विवेकी बना दिया था। जिसके घर वह रहता था उसी ने विशना से भरपूर काम भी लिया और मेट्रिक तक पढ़ाकर अपने ही स्कूल में सरकारी नौकरी दिला दी थी।

उसी मैदान को लक्ष्मी ने साफ-सफाई करवाकर एक स्कूल का रूप दे दिया था। बड़ के वृक्ष पर काला बोर्ड टंग चुका था। गेट पर स्कूल का नाम ‘‘आपकी पाठशाला’’ एक मेज, चार कुर्सियाँ, पचासोें स्लेंटें। रंग-बिरंगी पुस्तकें और बड़ी-सी रंगीन दरी जमीन पर बिछी हुई थीं। रोज शाम को स्कूल लगता। कुछ दिनों तक तो लोग वहाँ आने में शरमाते लेकिन धीरे-धीरे ङ्क्तौढ़ शिक्षा केन्द्र अच्छी तरह से चल निकला। लक्ष्मी का सपना साकार हो उठा। मास्टर वी.के. शर्मा और मास्टरनी लक्ष्मीबाई दोनों ही मिलकर उस स्कूल को सफलतापूर्वक चलाने लगे। अब विशना को लोग मास्टर जी के ही नाम से जानने लगे थे।

स्कूल से अवकाश मिलते ही लक्ष्मी विशना की ओर भी ध्यान देती थी। लक्ष्मी की तपस्या और विशना की लगन धीरे-धीरे रंग लाती रही। आज विशना शहर से एम.ए. अर्थशास्त्र् की परीक्षा देकर लौट रहा था। लक्ष्मी का हृदय खुशी से बल्लियों उछल रहा था। वह भविष्य की ओर भी सुन्दर योजनाओं में खो गई। पति को अब किसी ऊँचे ओहदे पर बैठाने का आखिरी कार्य शेष बचा था। दो-दो स्कूल भी उस निरक्षर गाँव में चल निकले थे। अब तो केतकी भी अपने भाई-भाभी के कार्यों में हाथ बंटाने लगी थी। जिन्दगी की सारी शुरुआती परेशानियाँ लक्ष्मी ने हँसते-मुस्कुराते पार कर ली थीं। उसके सपनों को सत्य रूप देने में विशना ने भी पूरी-पूरी तपस्या की और अपना योगदान दिया। लक्ष्मी हृदय से उसका आभार मान रही थी।

आज उस गाँव का बच्चा-बच्चा तक साक्षर था। जो गाँव किसी जमाने में ‘‘अंगूठा छाप’’ के नाम से जाना जाता था आज उसी गाँव केा साक्षरता का पुरस्कार मिलने वाला था। सभी लक्ष्मी और विष्णु कुमार की तारीफों के पुल बाँध रहे थे। सबसे ज्यादा ङ्क्तफुल्लित सरपंच जी ही दिखाई दे रहे थे। खुशनुमा माहौल में भी लक्ष्मी का मन न जाने कहाँ चला गया। अचानक वह उदास हो उठी - ‘‘काश आज बाबा जिंदा होते।’’ उसकी डबडबाई आँखों की कोरों से टपके अश्रुबिन्दु धरा का चुम्बन कर श्रमबिन्दु में विलीन हो गए। ’’’

----

सी-8, पृथ्वीराज रोड,

जयपुर - 302 005

---------------------.

kahani sangraha aadamkhor dahej vishyak kahaniya dinesh pathak shashi

कहानी संग्रह

आदमखोर

(दहेज विषयक कहानियाँ)

संपादक

डॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’

संस्करण : 2011

मूल्य : 150

प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन

विवेक विहार,

शाहदरा दिल्ली-32

शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा

----

दहेज

श्रीमती राज चतुर्वेदी

रविवार की अलसाई-सुबह वह देर से सोकर उठी। वैसे भी कामकाजी महिलाओं का शनिवार से ही यह प्लान बनने लगता है - चलो भई कल तो इतवार है, देर से सोकर उठेंगे.........पूर्व में ही एक राहत का अहसास होने लगता है। रविवार के कार्यक्रम में सवेरे देर से सोकर उठने का अहसास सदैव शीर्ष स्थान पर रहता है। कारण रोजमर्रा, की भागती दौड़ती जिन्दगी में रविवार की सुबह की सुखद शैया जितनी ङ्क्तसन्नता का अहसास दिलाती है उसकी तुलना केवल देवता के ङ्क्तसाद से ही की जा सकती है। इसी सुखद अहसास के वशीभूत मैं भी देर से सोकर उठ पाई। एक प्याली चाय बनाकर आराम से बालकनी में जा बैठी। तभी देखा, मेरी बाई दौड़ती-भागती, जल्दी-जल्दी कदम उठाते हुए चली आ रही है। उसे इतनी जल्दी-जल्दी घर की तरफ आते हुए देखकर स्वभावतः मुझे आश्चर्य-मिश्रित ङ्क्तसन्नता हुई क्योंकि छुट्टी के दिन या तो वो काम पर आती ही नहीं है और अगर आती भी है तो दोपहर की दहलीज पर ठीक ग्यारह, साढ़े ग्यारह बजे। जानती हैं मैडम जी को तो घर पर ही रहना है। परन्तु आज उसने बरसों का रिकार्ड तोड़ दिया-उसने अल्सुबह आने की जहमत कैसे उठाली? पर उसे देखकर मैंने एक राहत की साँस ली। मैंने सोचा चलो अच्छा हुआ-सप्ताह की शुरुआत अच्छी हुई। असल में कुछ इस तरह की धारणा मेरे मन में बहुत पहले से समा गई है कि यदि सप्ताह का ङ्क्तारम्भ अच्छा गुजरता है तो पूरा सप्ताह ही अच्छा बीतता है......चलो मन को सुकून मिला। मैंने उसके घन्टी बजाने से पूर्व ही उसके स्वागत में दरवाजा खोल दिया। उसने आते ही बगैर कुछ भूमिका बांधे हॉफते हुए, भर्राये गले से कहना आरम्भ किया-मैडम जी, गजब हो गया, गौतम साहब के बेटे की बहू कल रात खाना बनाते हुए जल गई और रात को ही अस्पताल पहुँचने के दो घन्टे बाद ही खत्म हो गई।’’

मैं एकदम अवाक् रह गई......अन्दर तक हिल गई, कुछ वाक्य समझ ही नहीं आया, और जब सामान्य हुई तो विश्वास ही नहीं आया। आता भी कैसे अभी एक माह पूर्व ही मैं उनके बेटे निखिल के रिसेप्शन में गई थी.........दुल्हन बहुत सुन्दर, मासूम लग रही थी। मै तो उसे देखती की देखती रह गई, .......इतना सारा सौंदर्य.........लगा विधाता ने स्वयं उसे बैठकर रचपच कर गढ़ा है। मैंने तो श्री गौतम जी व श्रीमती गौतम जी से कह भी दिया था-अरे आप इतनी सुन्दर बहू कहाँ से ढूँढकर लाये? पर उनके चेहरे पर कोई ङ्क्तसन्नता के भाव नहीं आये। गौतम साहब की बहिन अवश्य बोल उठी, मानो वह इसी अवसर की तलाश में थी जरातुनक भरे अन्दाज में वे बोली - ‘‘बस गोरी चमड़ी ही चमड़ी है, बाकी तो सब खाली ही खाली है।’’

उनकी वृद्धावस्था को देखते हुए मैंने उनकी बात को नजर-अन्दाज कर दिया। पर उनकी बातों का अर्थ मेरी समझ में आ रहा है.......ये कहीं दहेज का मामला तो नहीं है। फिर बाई के वाक्य भी तो इसी आशंका की ओर इंगित कर रहे थे......बाई फिर बोली’’ मैडम जी वहाँ लोग अजीब-अजीब सी बातें कर रहे थे, बेचारी बहू को इन लोगों ने ही मिलकर जला दिया। ‘‘बाई ने ही बताया कि उसने उसके घर के सामने पुलिस भी खड़ी देखी थी।

गौतम जी के परिवार से हमारी दूर की रिश्तेदारी थी........हम लोग वैसे भी एक ही कॉलोनी में रहते थे। उनके सुख-दुख शोक में सहभागी बनने का दस्तूर तो निभाना ही था।

मेरे पति इन दिनों टूर पर गए हुए थे, सो मैंने अकेली ही उनके घर जाने का मानस बना लिया। वहाँ पहुँचकर जिस दारुण करुणदृश्य की मैने परिकल्पना की थी उससे भी अधिक हृदयद्रावक दृश्य था। बहू की माँ चीख-चीखकर विलाप कर रही थी - मेरी इकलौती बेटी मुझे वापिस कर दो.........वह जीना चाहती थी......तुम लोगों ने उस निर्दोष को मार डाला। उधर उसके भाई और पिता भी बहुत परेशान थे। वे पुलिस वालों से बार-बार कह रहे थे.......तुमने हमारी बेटी को शमशान क्यों ले जाने दिया...........हम देख तो लेते अपनी बिटिया को आखिरी बार .......हे भगवान कैसे हमारी फूल सी बच्ची ने जलन की पीड़ा सही होगी........उनका बहुत ही मार्मिक क्रन्दन था। पर गौतम जी व उनका परिवार उन दुखियों पर बुरी तरह बरस बरस पड़ रहा था। अब तक वो अपना शालीनता का नकाब उतार चुके थे और जोर-जोर से दहाड़ रहे थे - ‘‘क्या हम हत्यारे हैं.......... हमारा बेटा तो बराबर आपकी बेटी के पूरे नाज नखरे उठा रहा था.........हनीमून मनाने के लिए उसे गोवा ले गया था......’’

जब बहू के पिता ने भर्राये गले, डबडबाई आँखों से कहा- ‘‘जानता हूँ सब जानता हूँ, उसने इसके लिए भी मुझसे 20000/- रुपये मांगे थे और मैने अपनी बेटी की खुशी की खातिर उसकी मजबूरी ध्यान में रखकर उसे

दे दिये थे फिर ही हतभाग्य को आप लोगों ने जीने नहीं दिया दुनिया से विदा कर दिया....।

मैं आगे कुछ न सुन सकी और सुनने-जानने को बचा भी क्या था- सारा वाकया बेनकाब जो हो चुका था। ये सब सुनकर मुझे उल्टी, चक्कर सा आने लगा था। सांत्वना के दो शब्द कहे बगैर ही, मैं वहाँ से नीची गर्दन किए चुपचाप लौट आई। मेरी कुर्सी अभी भी बाल्कनी में मेरी ङ्क्ततीक्षा कर रही थी, बड़े भारी मन से मैं कुर्सी पे धम्म से धँस गई, कुछ भी सोचने समझने की मेरी शक्ति समाप्त हो चुकी थी।

तभी बाई आ गई, मुझे इस हाल में देखते हुए बोली-‘‘मैडम जी आपको एक कप गरम अदरख वाली चाय बना लाऊँ? मैं मना नहीं कर सकी, बस सर हिला भर दी पर विचारों की आँधी मेरे मन मस्तिष्क को बुरी तरह झकझोर रही थी........आखिर ऐसा क्यों हुआ? उनकी बहू ङ्क्ततिभा पढ़ी-लिखी लड़की थी। काफी सारी डिग्रियां थीं उसके पास......क्यों इतनी पीड़ा सहती रही.........विद्रोह भी कर सकती थी वो। क्यों वह वापिस पिता के घर नहीं जा सकती थी? वो समय अब बीत गया जब, बेटी को केवल उस अगरबत्ती के मानद बताते थे, जिसकी सुगन्ध केवल पति के घर अर्थात् ससुराल के लिए ही होती थी.....अपने पैरों पर वह खड़ी हो सकती थी, आखिर वह सुशिक्षित युवती थी। आधुनिक युग की नारी होते हुए भी क्यों उसने दूसरों को अपने ऊपर हावी होने दिया?......

.....ङ्क्तश्न दर ङ्क्तश्न मेरे मस्तिष्क को बराबर कौंध रहे थे। क्या उत्तर है इन सारे ङ्क्तश्नों, शंकाओं के? बहुत खोजने और माथा-पच्ची करने पर एक ही उत्तर मिला-हमारे समाज की गलत मान्यताएँ, परम्पराएँ आज भी नहीं बदली हैं, नारी आज भी उन झूठी मर्यादाओं, लक्ष्मण-रेखाओं से आबद्ध है।......पर इन जकड़न से उसे कौन निकालेगा? उसे, स्वयं को ही, इन झूठी बेड़ियों को काटना होगा.........स्वयं सिद्धा बनकर..........बाहर से उसे सहारा देने कोई नहीं आयेगा। अपने अन्दर के स्वाभिमान को जागृत करना होगा.......साहस का सम्बल ले कुण्ठाओं से बाहर निकलना होगा अन्यथा फिर वही त्रसदी का भयावह परिदृष्य.........कभी अनचाहे भोग्या बनकर और कभी अपमानित होकर-अकाल अग्नि-समाधि लेकर.......। ’’’

---

 

23, चन्द्रपथ, सूरजनगर पश्चिम,

जयपुर - 6

--------------------.

kahani sangraha aadamkhor dahej vishyak kahaniya dinesh pathak shashi

कहानी संग्रह

आदमखोर

(दहेज विषयक कहानियाँ)

संपादक

डॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’

संस्करण : 2011

मूल्य : 150

प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन

विवेक विहार,

शाहदरा दिल्ली-32

शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा

----

आत्मदाह

डॉ. प्रेम दत्त मिश्र मैथिल

‘‘अरे भाई लड़कियों को पढ़ाने-लिखाने और उन्हें योग्य बनाने से क्या लाभ है? खर्च बढ़ाना और हत्या मोल लेना है।’’ ठाकुर दास ने तर्क पूर्ण प्रश्न ‘नारीशिक्षा’ की वकालत करने वाले महानुभावों की मण्डली में किया।’’

ठाकुरदास के प्रश्न को सुनकर ‘नारी-शिक्षा‘ के प्रचार-प्रसारक प्रबुद्धजनों के माथे पर एकदम बल पड़ गया? लोग सोचने लगे कि शिक्षित एवं विचारक प्रगतिशीलता के पक्षधर ठाकुरदास को क्या हो गया है? अभी कल तक घर-घर जाकर कहते-फिरते थे कि फलाने तू अपनी लड़की को स्कूल में पढ़ने क्यों नहीं भेजता है। देख गेंदा ने तो अपनी छोरी का सरस्वती शिशु मन्दिर में नाम लिखा दिया। उसकी देखा-देखी चेता ने भी अपनी बेटी चित्रा को पाठशाला में प्रवेश दिलाने के लिये राजी हो गया है।

‘‘भाई ठाकुरदास! जमाना बदल गया है। लड़का-लड़की सभी समान हैं। सबको पढ़ने-लिखने का समान अधिकार है। पढ़ी-लिखी लड़कियाँ घर का दीपक होती हैं। लड़कों से वे किसी भाँति न्यून नहीं है। लड़कियाँ घर-समाज तथा राष्ट्र उठाने वाली होती है। अतः उनकी अब उपेक्षा करना समाज तथा राष्ट्र की हानी करना है। यदि लड़कियाँ सुशिक्षित होंगी तो समाज तथा राष्ट्र भी सुसम्पन्न होगा। भाई देश एवं समाज में लड़के शिक्षित हों तथा लड़कियाँ अशिक्षित रहें तो सामाजिक विकास नहीं हो सकता। लड़कियों की शिक्षा के बिना विकास अधूरा है।’’ देवीदयाल ने तर्क दिया।’’

‘‘बन्धुवर देवीदयाल जी, आज कल की शिक्षा जैसी है उससे आप भली भाँति परिचित हैं। उससे हमारे परिवार बिखरते जा रहे हैं। घर-घर से सुख-शान्ति पलायन करने लगे हैं जितनी शिक्षित लड़की होती है, वैसा उसके योग्य वर नहीं मिलता, यदि भाग्य से मिल भी जाये तो उसका मूल्य आकाश स्पर्शी होता है। अतः बहुत सी लड़कियाँ असमानों के साथ बंध जाती हैं, जिसका परिणाम गृहकलह है सम्बन्ध विच्छेद, मुकदमेंबाजी, असामाजिक .त्य, भागा-भूगी, जला-जली प्रत्यक्ष देखने में आ रहे हैं, ठाकुरदास ने लम्बी तकरीर दी।’’

‘‘मित्रवर ठाकुर जी, शिक्षा कभी हानिकरी नहीं होती। वह तो सबको सुधारती है, उससे बिगाड़खाते का कोई संबन्ध नहीं। उससे तो लोक कल्याण होता है। हमारी संस्.ति-धर्म-दर्शन नारी पूजा, शिक्षा, समानता समर्थक हैं।

मैत्रायणी, गार्गी, सीता, सावित्री, अनसूया लोपमुद्रा, आदि विदुषी महिलाएँ थीं, जो अद्यावधि हमारे समाज तथा राष्ट्र में आदर्श मानी जाती हैं।’’ गंगा राम ने भाषण दिया।

भैया गंगाराम आप ठीक कह रहे हो, परन्तु आज की शिक्षा सुसंस्कार विहीन है। अन्धी नकल और फैशनी भूत है। जिसके कारण अनाचार यौनाचार, क्रय-विक्रय, उच्छृंखलता, उद्ण्डता आदि की बाढ़ आ गयी है। शिष्टाचार का लोप सा हो गया है। बेटा-बेटी अनुशासन हीन तथा बेलगाम हो गये हैं। घर-घर में ताण्डव हो रहे हैं। इस सब का कारण कौन है? क्या शिक्षा नहीं?’’ ठाकुरदास ने कहा।

‘‘पढ़ी लिखी हजारों लड़कियों के समाज-कुटुम्ब विरोधी कारनामें प्रतिदिन देख रहे हैं। परन्तु शिक्षा का इस में कोई दोष नहीं।’’ धनीराम बोले।

‘‘तो दोष फिर किस का है? क्या माता-पिता का दोष है अथवा समाज का दोष है?’’ ठाकुर लाल ने प्रश्न किया।

नहीं भैया ठाकुर जी, कोई अभिभावक नहीं चाहेगा कि उसका बेटी-बेटी बिगड़े, परिवार टूटे, मर्यादा का लोप होवे, उच्छृंखल अचारहीनता पसरे, साचार पलायन करे, पं. चेता ने समर्थन किया।

आज दहेज व्यापार बन गया है जिसके कारण फूल सी पढ़ी-लिखी लड़कियों की कुगति हो रही है। उन्हें दहेज की बजह से आत्महत्या करनी पड़ती है। देह के व्यापार के लिए बाध्य होना पड़ता है। अमुक की लड़की जला दी गई। फलाने की लड़की दहेज के कारण क्वारी रह गई। तोताराम की लड़की एम.फिल. है, उसे योग्य पति नहीं मिला है, अतः तलाक् हो गया। देवधर की लड़की डीलिट् है, उसको कोई समकक्ष वर नहीं रुचता इत्यादि’’ बुद्धू से बुद्धू मोटर साइकिल, कार, सोना, की माँग करता है। लडके का पिता सामान की बेटीवाले के हाथ में लम्बी सूची थमा देता है। ‘‘लड़का विदेश पढ़ने जायेगा। आप उसका खर्च वहन कर लें, तब हम सम्बन्ध करने की सोचेंगे ऐसी-ऐसी धूर्तता पूर्ण शर्तें लड़के का पिता रखते हैं।

दहेज रुपी भूत जिस से एकबार लग गया, फिर कितने ही ओझा, सयाने तान्त्रिक आदि छुड़ाने की चेष्टाएँ करें वह छूटने का नाम नहीं लेता। हमारे भारतीय समाज की यह विशेषता है कि एकबार कोई कुप्रथा अथवा कुरीति को वह अपना लेता है, तो उसे अपना वह धर्मबना लेता है फिर उसे छोड़ना पाप समझता है। उसे परम्परा मानकर बिना गुण-दोष समय का विचार किये उस पर आँख मूँदकर चलता रहता है। भेड़ चाल है न? कहें भ्राता जोरावर जी ठीक है न?’’ ठाकुरदास ने दलील दी।

‘‘सत् शिक्षा अथवा सद् विद्या कभी बुरी नहीं होती, यह सर्वमान्य सत्य है, किन्तु स्वार्थी धर्म ठेकेदार मौत के सौदागर सही वस्तु (शिक्षादि) को अपने घृणित स्वार्थ सिद्ध के लिये, धर्म आदि के नाम पर, उसकी आढ़ लेकर अपना नि.ष्ट सिद्ध करते हैं भले ही समाज की उनके उस असत् से कितनी ही बड़ी हानि क्यों न हो जाय? पर क्या मजाल कि वे उससे बाज आयें।’’ साधूराम ने अनुमोदन भरे लहजे में समर्थन किया।

‘‘दद्दा साधुराम। देखा आज हमारे देश में दहेज कुप्रथा दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही है। उसके घातक एवं विषैले कुत्सित परिणाम समाज को भोगने भी पड़ रहे हैं। सम्प्रति दहेज एक परम्परा बन चुकी है। उसकी जड़ें लाखों बालिकाओं के बलिदानों से इतनी गहरी तथा पुष्ट हो चुकी है कि उन्हें समाज से उखाड़ फेंकना तो दूर, उन्हें हिलाना भी दुष्कर है।’’

दहेज में दहेज का कारण स्त्रियाँ भी हैं। वे सीता-सावित्री सी बनें तो दहेज दानव देश में नहीं रह सकता। किन्तु हमारा देश लकीर का फकीर है। अतः दहेज की शिकार प्रतिवर्ष हमारी किशोरियाँ होती रहेंगीं। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। जो बीज हमने बोया है उसका फल भी हमें भोगना होगा। ’’’

--

68/655, सरस्वती भवन,,

धौली प्याऊ मथुरा।

--------------------.

kahani sangraha aadamkhor dahej vishyak kahaniya dinesh pathak shashi

कहानी संग्रह

आदमखोर

(दहेज विषयक कहानियाँ)

संपादक

डॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’

संस्करण : 2011

मूल्य : 150

प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन

विवेक विहार,

शाहदरा दिल्ली-32

शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा

----

श्रीमती मंजुला गुप्ता

नीड़ के पंछी

दिन के तीन बजने को थे। फाइलों पर झुकी-झुकी काम करती हुई सुनीता थककर निढाल हो चुकी थी। उसने पैन को बंद कर एक तरफ रख दिया। बंद कर बैठ गई। हाथों के साथ-साथ जैसे उनकी आँखों ने भी काम करने से इनकार कर दिया हो! छः घंटों तक लगातार फाइलों में दर्ज एकाउंट्स को चैक करते-करते उसकी समझ में यह नहीं आ पा रहा था कि फाइनल चैकिंग के बावजूद भी उनमें इतनी सारी गलतियां कैसे रह गई? वे त्रुटियां उसकी पैनी निगाहों से किसी भी तरह नहीं बच पा रहीं थीं।

बैंक के इस उच्च पद पर आसीन हुए सुनीता को दस वर्ष हो गए हैं। इस सीढ़ी पर पहुँचने के लिए बैंक की परीक्षा उत्तीर्ण करना उसके लिए इतनी कठिन बात न थी जितनी कि पुरुष सहकर्मियों की कलुषित मानसिकता के बीच अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखना। आज नारी-शिक्षा, नारी-पुरुष समानता पर कितने भाषण, नारे और लेख अपनी बुलंदियों पर छाए हुए हैं! परंतु वास्तविकता क्या है? आज भी पुरुष की मानसिकता क्या है? वह या उसके समान ही कार्य करने वाली महिलाएं ही यह अधिक समझ सकती हैं। क्या घर, क्या बाहर कहीं भी तो स्थिति भिन्न नहीं है। यह बात आज भी उसकी समझ में नहीं आ पा रही है। मल्होत्रा और शर्मा के व्यंग्य-बाण आज भी उसके कानों में जब-तब गूंजने लगते हैं।

सुनीता के प्रमोशन की खबर लगते ही मल्होत्रा ने पान की पीक उगल कर शर्मा के कंधे पर हाथ रखकर हँसते हुए कहा था, ‘‘अब तो सब जगह इंदिरा गांधी ही छाने वाली हैं।’’

प्रत्युत्तर में शर्मा ने भी सिगरेट सुलगाकर, अश्लील भाव से भर कर कहा था, ‘‘अब तो अपने हिस्से में रोटियाँ सेंकने का काम ही रह गया है समझो!’’

उनके उन घटिया संवादों को सुनकर वह कट कर ही रह गई थी। दूषित मानसिकता को इतनी जल्दी बदलना भी तो सरल नहीं होता।

सुनीता ने बेल बजाई। चपरासी को एक प्याली चाय लाने को कहकर वह विचारों में खोने लगी। मल्होत्रा और शर्मा उसके चरित्र पर आरोप लगाने से भी न चूके थे। उन्होंने कैसी-कैसी बातें फैलाई थीं!’’ बॉस को खुश करने की कला काश! हमें भी आती!’’ ‘‘काश! खुदा ने हमें भी ऐसी कमसिन नारी बनाया होता!’’

अपने कार्य के प्रति सच्ची लगन और निष्ठा के साथ-साथ सुनीता ने उस चुनौती को कैसे संभाला, यह उसकी उत्तरोत्तर सफलता ने आज सिद्ध कर दिया है।

चपरासी चाय के साथ-साथ एक स्लिप लेकर अंदर आया। आगंतुका के कॉलम में सासू माँ का नाम पढ़कर सहसा ही उसे विश्वास नहीं हो पाया। सवालों के सैकड़ों फन उसके मस्तिष्क में फैले डंक मारने लगे। ‘‘आज दस वर्ष बाद सासू माँ का इस तरह अचानक उसके ऑफिस में आना।’’ अंदर के जजबातों को सहज बनाते हुए उसने चपरासी से कहा, ‘‘उन्हें अंदर भेज दो और हाँ एक प्याली चाय और कुछ नाश्ता भी भेज देना। सूनो! यह दरवाजे का पर्दा अच्छी तरह से लगाकर जाना!’’

सुनीता को लगने लगा कहीं मल्होत्रा और शर्मा की दो जोड़ी आँखें उसकी गतिविधि की टोह न ले रही हों!

चों-चुर्र के साथ दरवाजा खुला। सुनीता उन्हें देखते ही चौंक पड़ी, ‘‘मांजी, आप?’’ दस वर्ष का अंतराल जैसे उन्हें बीस-पच्चीस वर्ष आगे खींच ले गया है। दुर्बल काया आगे की ओर कमान-की तरह झुक आई थी। चेहरा स्याह और झुर्रियों से भर गया था। केश सन की तरह सफेद और लगभग झड़ चुके थे चेहरे के दीनहीन भाव और अधमैले साधारण वस्त्र, जो उनकी व्यथा-कथा स्वंय कही कह रहे थे।

सासू माँ का अचानक ही ऑफिस में इस तरह से बिना किसी पूर्व सूचना के चले आना उसे अटपटा लगने लगा। उसने सीट से उठकर उनका अभिवादन किया। वह उनकी कुशलक्षेम पूछने को ही थी कि वे इधर-उधर चोर निगाहों से देख, खिड़की, दरवाजे पर पड़े पर्दों को देख आश्वस्त हो याचित स्वर में कहने लगीं, ‘‘बहुत आस लेकर आई हूँ बहू तेरे दरवाजे पे! तेरे ससुर की जीवन और मेरी लाज अब तेरे हाथ में’’ सासू माँ का गला भर्रा आया। एक ही सांस में वे अपने तीन वर्षों से चले आ रहे दुर्दिनों की कहानी कह गईं, ‘‘आज तीन बरस हो गए हैं तेरे ससुर को टी.बी. हुए। एक फेफड़ा तो बिल्कुल खराब ही हो गया है। दूसरे के लिए डॉक्टर ऑपरेशन को बोलते हैं। पांच हजार का खर्चा है। सारे जेवर और नकदी बीमारी की भेंट चढ़ गए।’’ वे अपनी सूनी कलाइयां दिखला कर सुबकने ही लगीं।

‘‘सब ठीक हो जाएगा। आपने पहले क्यों नहीं बताया?’’ सुनीता उन्हें ढांढस बंधाने लगी।

‘‘किस मुँह से बताती? जिस घर की लक्ष्मी को धक्का देकर बाहर निकाल दिया हो, उसके दरवाजे।’’ सासू माँ की आवाज आँसुओं में भीगी होने के साथ-साथ पश्चाताप से भरी हुई थी।

‘‘रेखा और सुधीर कैसे हैं?’’ उसने पूछा।

‘‘कुछ न पूछ बहू! रेखा तो सारे समाज में मुँह काला करके चली गई भेजा था कॉलेज पढ़ने और वह........।’’ वे फिर से आँसू बहाने लगीं।

उसने जीवन के विषय में भी जानना चाहा। उसके अंदरुनी मन ने पति के बारे में उन्हें अधिक कुरेदना ठीक नहीं समझा।

सुनीता की आर्थिक स्थिति इन दिनों सुदृढ़ है। उसने तुरंत ही सात हजार रुपए का चेक काट कर चपरासी से रकम लाने का आदेश दिया।

उधर, कुर्सी पर बैठी हुई सासू माँ जैसे पश्चाताप की आग में भस्मीभूत हुई जा रही थीं। आज वे बहू से आँखें नहीं मिला पा रही थीं। सुनीता को उन पर तरस आने लगा। वह उन्हें फिर से धीरज बंधाने लगी, ‘‘सब ठीक हो जाएगा। चिंता की ऐसी कोई बात नहीं है।’’

चपरासी रुपऐ ले आया था। सुनीता ने वे रुपये उन्हें थमा दिए, ‘‘और भी जरुरत हो तो आकर ले लें। ‘‘सासू माँ साड़ी के छोर से आँखें पोंछने लगीं। सुनीता ने ड्राइवर को बुलवा कर उन्हें घर छोड़ने के आदेश दिए।

सासू माँ उसके ऑफिस से चल दी थीं। सुनीता फिर से अपने एकाकी जीवन में सिमट आई। उनकी उपस्थिति ने उसके सारे घाव हरे कर दिए थे। उसके आगे उसका सारा अतीत उजागर होने लगा।

रुपया! रुपया! रुपया! रुपया ही सारे सामाजिक रिश्तों की जड़! रुपया सारे मानवीय संबन्धों की धुरी! रुपया ही सारे आत्मीय सम्बन्धों का गठबन्धन! रुपया है तो सारे बिखरे हुए रिश्ते फिर से जुड़ने लगते हैं। रुपए का खनखनाता स्वर सुनीता अपने इर्द-गिर्द समूचे अस्तित्व के साथ महसूस करने लगी। इस रुपए के भीतर कितनी ही चीत्कारें, रुदन और कारुणिक प्रसंग भी उससे जुड़े हुए थे। वह सब जैसे एक-एक कर उसके सामने सजीव ही होने लगे।

रुपये के अभाव से ही तो माँ, दवा न मिलने से इस दुनिया से असमय ही तिल-तिल कर मरी थी। वह तो जाते-जाते मानो पिताजी को भी जैसे अपने साथ ही चलने का भी निमंत्रण दे गई थी। पिताजी भी दो महीने बाद हृदयाघात से ईश्वर को प्यारे हो गए थे।

चाचा-चाची ने ही तब अपने तीन बच्चों के साथ-साथ उसके भी तीन भाई-बहनों की जिम्मेदारी का भार वहन किया था। चाची बढ़े हुए खर्चे और काम को देख झुंझला कर जब-तब क्रोध में कह बैठतीं, ‘‘अपना परिवार छोटा रखने से क्या फायदा हुआ जब तीन बिना मांगे ही भगवान ने और भेज दिए! ईश्वर जब देता है तो छप्पर फाड़ कर ही देता है।’’ उनके कथन में जैसे क्रोध और घृणा का सैलाब उनके मन की भड़ांस को उंड़ेल देता।

सुनीता दिनभर घर के काम-काज में चाची का हाथ बटाती। वह छोटे भाई-बहन को संभालती। बचे-खुचे समय में जो भी पुस्तक लेकर बैठती तो आधा पृष्ठ पढ़ते-न-पढ़ते वह निद्रा के आगोश में चली जाती। चाचा-चाची अब जल्द-से-जल्द उसका विवाह कर अपने गुरुत्तर ऋण से उऋण हो जाना चाहते थे। परन्तु उस जैसी साधारण रुप-रंग की लड़की की शिक्षा की कमी जैसे नीमचढ़े करेले जैसी थी। कठिन परिश्रम के बाद आखिर चाचा ने जीवन को ढूँढ ही लिया था। उसके पूरे परिवार को जैसी लड़की की आवश्यकता थी। ‘‘रुखा-सूखा खा कर भी घर का सारा काम खुशी से करेगी! ससुराल वालों के चार बोलों को भी इसलिए हँस कर सहेगी क्योंकि शिकायतें सुनने वाला भी उसका इस संसार में कोई नहीं है।’’ चाचा ने उसकी विशेषताएं बताई थीं।

आनन-फानन में चट मंगनी, पट ब्याह की बात तय हो गई थीं। उसके ससुर को मालूम था कि उसके स्वर्गीय पिताजी की जायदाद का काफी हिस्सा बेटी के नाम होगा और भला चाचा भतीजी का हक क्यों मारने लगे? परंतु उनका भ्रम बड़ी निर्ममता से उस समय टूट गया, जब बारात ऐन वक्त पर दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई थी। लेन-देन के ऊपर अच्छा-खासा विवाद ही छिड़ गया था। ससुरजी बार-बार बारात वापस ले जाने की धमकी दे रहे थे। चाचा उनके पांव पर पड़े गिड़गिड़ा रहे थे। विवाह की भाग-दौड़ और कोलाहल के बीच चाचा के कुछ अस्पष्ट शब्द उसके कानों में भी पड़े थे। ‘‘देखिए समधीजी, मेरी हैसियत इससे अधिक नहीं है। सुनीता जैसी बहू आपको कहीं नहीं मिलेगी। साक्षात् लक्ष्मी है। वह आप लोगों को किसी तरह का कष्ट न होने देगी। जिस दिन भी इसने शिकायत का मौका दिया, आपसे पहले ही मैं इसकी गर्दन मरोड़ दूंगा।

काश! चाचा-चाची उस दिन से पहले ही उसकी गर्दन मरोड़ देते तो शायद उसे इस तरह मर-मर कर न जीना पड़ता!

ससुराल में सुबह पांच बजे से रात के ग्यारह बजे तक घर का सारा काम निपटाते-निपटाते सुनीता चूर हो जाती थी। कई बार बुखार होने पर भी वह चुपचाप इसलिए काम निपटाती जाती कि सासू माँ बेरोजगार पति जीवन का क्रोध भी उसी पर उडेलने लगीं। एक ओर कठोर श्रम और दूसरी ओर पौष्टिक भोजन का अभाव-ससुराल में उसे दो वक्त की रोटी के भी लाले पड़े रहते। दूध और फल की कल्पना तो जैसे आकाश कुसुम के समान थी। कई बार जीवन को उसके ऊपर करुणा भी उपजी थी। परंतु बेरोजगार पति कुछ भी करने में असमर्थ अपनी हीन भावना और निराशा को किसी-न-किसी रुप में झल्ला कर उसके सामने व्यक्त करता।

सासू माँ का ईश्वर-भक्ति में अगाध विश्वास था। उनका विश्वास था कि जीवन के सभी काम ईश्वर की .पा से ही पूरे होंगे। जीवन की जब नौकरी लगती तो वे इष्टदेव की .पा मानतीं और छूट जाती तो वे उसे ‘‘कुलच्छनी सुनीता के ऐसे अभागे पांव’’ कह कर सारा दोष उसके सिर पर ही मढ़ देती थीं।

कई बार मूक पशु की तरह से सब कुछ सहती-सहती अंत में सुनीता का धीरज चुकने लगता था। परंतु वह शिकायत भी करती तो किससे? बेरोजगार दब्बू पति जीवन निर्दोष है, मात्र सबकी निगाहों में अपने को ऊंचा दिखाने की भावना से आक्रांत वह उसी पर सारा दोषारोपण कर बैठता था। रेखा कॉलेज जाने लगी थी। सो उसके नखरे कुछ अलग ही किस्म के थे। वह अशिक्षित माँ और अर्ध शिक्षित भाभी पर अपनी शिक्षा का झूठा अहंकार जतला कर नित नये फैशन की मांग किया करती थी। उसका ध्यान पढ़ाई से अधिक अपने ही बनाव-श्रृंगार पर रहने लगा था। ‘‘उम्र का भी यही तकाजा है!’’ कह कर सासू माँ उसी की तरफदारी करने लगती थीं। परंतु छुप-छुप कर ब्यूटी पॉर्लर जाने और नख-शिख श्रृंगार के लिए धन का जुगाड़ बिठलाने के लिए किस तरह के हथकंडे अपनाती थी इस ओर किसी का भी ध्यान न था। हाँ, एक दिन एकांत पाकर पड़ोस की कौशल्या काकी ने कहा था, ‘‘शाम सात बजे से झुटपुट में पड़ोस के मोहन के साथ देख लेना। रमा से दोस्ती भी इसी मतलब से कर रखी है रेखा ने।’’

सुनीता तो सुन कर सुन्न पड़ने लगी थी। उसका मन हुआ था जीवन से कह कर उन्हें आगाह करे। लेकिन परिणाम जान कर वह चुप लगा गई थी। अकर्मण्य जीवन अंत में रेखा के ऊपर चढ़ा क्रोध भी उसी के ऊपर ही निकालेगा। लेकिन वह राज अधिक दिन तक राज न रह पाया था। एक दिन मोहन की माँ सड़क पर चिल्ला-चिल्ला कर कहने लगी थी, ‘‘अच्छे चालाक निकले तुम सब! दहेज में पाई रोकड़ भी न खर्च करना पड़े इसलिए फांस लिया मेरे सीधे-साधे सुशील बेटे को! परंतु मैं भी अपने बाप की बेटी नहीं जो एक भी चलने दूँ उसकी।’’ और वह न जाने कितनी देर तक अपशब्दों से उनके परिवार वालों को लानत-मलानत भेजती रही थी।

उस समय भी सुनीता को अकारण दोषी मान नितांत अकेली कठघरे में खड़ा कर दिया गया था। यह कह कर कि ‘‘बूढ़ी लाचार, बेबस माँ ने बेटी पर ध्यान न दिया था तो घर की जवान बहू ने भी आँखों पर पट्टी बांध रखी थी क्या?’’

और, जीवन के बेरोजगार होने का दोष, सुधीर के आवारागर्द होने का क्रोध, रेखा का कहीं विवाह न हो पाने का आक्रोश, गाहे-बगाहे किसी-न-किसी रूप में सुनीता के ऊपर ही निकलता था। दुनिया की बड़ी-से-बड़ी अदालत थी जैसे उसके ऊपर हो रहे उस अन्याय-अनाचार को देख, मानो चुप रहती थी क्योंकि जिस पतिरुपी पुरुष को उसने संबल माना था वह कोई दीमक खाया एक खोखला, सूखा-निर्जीव दरख्त था। उसे यदि वह और अधिक थामे रहती तो उसके नीचे दब कर दम तोड़ते देरी न लगती।

हाँ! उस दिन की घटना ने तो मानो सब कुछ हिला कर ही रख दिया था। चाची की दोनों बेटियाँ उस दिन सुनीता से मिलने आई हुई थीं। वह उनके लिये चाय बनने लगी थी। जीवन सामने की दुकान से कुछ बिस्कुट खरीद लाया था। सासू माँ जीवन के सामने सामान्य बनी रही थीं। परंतु उसके जाते ही वे रणचंडी का रूप ही धारण कर बैठी थीं। बात कुछ भी तो न थी। बस-वह छत पर उन्हें भोजन के लिए कहने गई थी। अत्यन्त विनम्र स्वर में उसने कहा था, ‘‘मांजी, नीचे चलिए। खाना ठंडा हो रहा है।’’

‘‘खाना! खाना! खाना!!! मुझे खिलाने आई है या मुझे ही खाने आई है? अरे! खिला अपने उन लग्गू मनूखों को जो इस घर में खाने के बहाने घुसे चले आते हैं। बड़ा रोकड़ धर गया है न तेरा बाप-जो-!’’ सासू माँ तो दहाड़ें मार-मार कर वहीं विष वमन करने लगी थीं, ‘‘कितना अरमान था-जीवन का अमीर घर में ब्याह होगा। दहेज से घर भर जाएगा। घर के दलिद्दर दूर होंगे!’’ वे जोर का फुक्का मार कर रो पड़ी थीं।

सासू माँ के उस नाटक पर सभी परिजन उन्हें संभालने लगे थे। सब की सहानुभूति उन्हीं के साथ थी क्योंकि उस दिन उन्होंने भोजन नहीं किया था। सुनीता ने खाया भी या नहीं, इसकी चिंता किसी को भी नहीं थी।

उस दिन सुनीता ने स्वयं को नितांत अकेला और अत्यंत असहाय अवस्था में महससू किया था। एक कप चाय-चाय न होकर वह पूरे परिवार के लिए विष ही बन गई थी। और उसके लिए अभिशाप! वह घंटों अकेली ही छत पर बैठी रोती रही थी। दिवंगत माता-पिता की भी उसी समय उसे याद आने लगी थी। विवशता की मूर्ति बने चाचा भी याद हो आए थे। उसे स्त्रियों के बीच रोती-बिलखती हुई चाची की भी याद आयी थी। उसे याद आने लगा था अपना निर्धन, जर्जर, कष्टप्रद बचपन!

उदासी में डूबी छत पर बहुत देर तक बैठी रही थी वह। नीचे सड़कों पर आने-जाने वालों को देखती रही थी। उसके सामने से पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी स्कूटर, गाड़ी चलातीं फर्र-फर्र से निकल जाते। उसकी स्थिति इतनी दयनीय कैसे हो आई? उसकी आत्मा ने उससे पूछा था। ‘दयनीय’ शब्द बार-बार उसके हृदय, मस्तिष्क पर झं.त होने लगा था। आखिर वही क्यों इतना दयनीय है? क्या अपनी इस स्थिति के लिए वह स्वयं तो उत्तरदायी नहीं? यदि आज वह उच्च शिक्षिता होती, आर्थिक रुप से संपन्न तो कौन उसका अपमान करता? ‘‘मुझे कुछ करना चाहिए! स्वयं के पैरों पर खड़ी मुझे आत्मनिर्भर बनना है। इस प्रकार मर-मर कर मैं और अधिक नही जी सकती।’’ सोचती रही थी।

एक दिन सुनीता ने अपनी सोने की दो चूड़ियां जो उसकी माँ की अन्तिम निशानी थी, जीवन को सौपते हुए कहा था, ‘‘इन्हें बाजार में बेच कर मेरे लिए कोर्स की पुस्तकें खरीद लाओ! मैं अब आगे पढूंगी।’’

वह बात घर में आग की तरह से फैल गई थी, सासू माँ ने जम कर उसकी पढ़ाई का विरोध किया था, ‘‘अरे! इतना ही पढ़ने-लिखने का शौक था तो माँ-बाप के घर से क्यों न पढ़ कर आ गई? ये पढ़ेगी तो क्या घर का काम हम लोग करेंगे? पढ-लिख कर अफसरानी बनेगी क्या? हम लोगों पर हुकूमत करेगी? रुआब झाड़ेगी?’’

न जाने किन-किन अपशब्दों, उलझनों, तानों के बीच आँसुओं का नैवद्य चढ़ा-चढ़ा कर उसने माँ सरस्वती की आराधना की थी। कठोर श्रम, सहनशीलता, दृढ़ संकल्प उसके लक्ष्य को उत्तरोत्तर सुदृढ़ बनाते चले गए थे।

तब सुनीता प्रगति के सोपानों पर उत्तरोत्तर चढ़ती ही गई और आज वह इस ऊंचे ओहदे पर आसीन है।

दूसरे दिन सुनीता नित्य की भांति फिर से अपने कार्य में व्यस्त थी। संध्या के चार बजे थे। बैंक का चपरासी उसके आगे एक पर्ची रख गया। जीवन का नाम देखकर वह धक-से रह गई। उसने आगंतुक को अपने पास बुलवा लिया।

झिझकता हुआ दबे पांव जीवन, सुनीता के पास चला आया। सुनीता को लगने लगा जैसे असमय ही बूढ़ा हो गया हो। तो क्या अब भी वह बेरोजगारी से जूझ रहा है? उसने कहीं दूसरा विवाह तो नहीं कर लिया? किसी प्रकार उसने उसकी ओर फीकी मुस्कान फेंकी, ‘‘कैसे हो?’’

‘‘ठीक हूँ।’’ जीवन का बुझा हुआ स्वर था।

सुनीता ने चपरासी के लिए घंटी बजाते हुए जीवन से पूछा, ‘‘पिताजी कैसे हैं?’’

‘‘उन्हें कल शाम टी.बी. सेनिटोरियम में भर्ती करवा दिया गया है।’’ जीवन ने बताया ‘‘कल तुमने माँ को जो........।’’

चपरासी अंदर चला आया। सुनीता ने जीवन से पूछा, ‘‘कॉफी के साथ और क्या लोगे?’’

‘‘कुछ नहीं।’’ जीवन तो हीन भावना में डूबता ही जा रहा था।

‘‘इन दिनों क्या कर रहे हो?’’

‘‘बुक बाइंडिंग का काम।’’

‘‘तुम्हारे लिए एक प्रिंटिंग प्रेस खोल दें?’’ सुनीता मुस्करा दी।

‘‘ये-ये तुम कह रही हो?’’ जीवन उसे अविश्वसनीय दृष्टि से देखने लगा। ‘‘इससे आश्चर्य की क्या बात है?’’ सुनीता उसे प्रोत्साहित करने लगी, ‘‘इस पर गहराई से सोच लेना!’’

कॉफी आ गई थी। वे दोनों कॉफी पीने लगे। जीवन की उस दयनीय दशा को देखकर सुनीता का मन पिघलता ही जा रहा था। अतीत में उसके साथ जो कुछ भी घटित होता रहा, उसमें जीवन का ही तो सारा दोष नहीं है! सच तो यह है कि पारिवारिक परिस्थितियों के कारण ही उसे वे बुरे दिन झेलने पड़े थे। उस दिन जब उसने उसके हाथों में सोने की चूड़ियाँ सौंपी थीं तो सारी रकम वह ईमानदारी के साथ उसे थमा गया था।

‘‘क्या सोचने लगीं?’’ जीवन ने उसकी तंद्रा भंग की।

‘‘सोचना क्या है, जीवन?’’ सुनीता ने गहरा उच्छवास भरा, ‘‘समय और परिस्थितियां हमें कहाँ-कहाँ उड़ाती रही हैं! मेरे विचार से तुम्हें प्रिंटिंग प्रेस खोल ही लेना चाहिए।’’

‘‘लेकिन उसके लिए एक बड़ी रकम।’’

‘‘उसकी चिंता न करो।’’ सुनीता उसे धैर्य बंधाने लगी, ‘‘मैं बैंक से लोन ले लूंगी।’’

जीवन चुप हो गया। वह तो पछतावे की आग में दहक रहा था। तभी सुनीता उसे अपनेपन से समझाने लगी, ‘‘देखो जीवन! यह जरुरी नहीं है कि पति ही पत्नी का पालन-पोषण करे। कमाऊ पत्नी भी तो पति की ही नहीं, सारे परिवार की परवरिश कर सकती है।’’

‘‘ओह सुनीता!’’ जीवन की आँखों में आँसू ही भर आए, ‘‘मुझे मालूम न था कि........।’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं, जीवन!’’ सुनीता गंभीर हो आई, ‘‘मैं भी इस एकाकी जीवन से बेहद तंग आ गई हूँ। मेरे पंख भी तो नीड़ के लिए फड़फड़ाते रहते हैं।’’ सुनीता भी तो उसके आगे बर्फ-सी पिघलती ही गई।

संध्या के पांच बज चुके थे। सुनीता ने सीट से उठकर जीवन की ओर देखा, ‘‘चलें?’’

‘‘चलो!’’ जीवन भी कुर्सी से उठ गया।

आफिस से निकल कर सुनीता अपनी कार के पास आ गई। उसने जीवन के लिए कार का अगला दरवाजा खोल दिया। जीवन के बैठने पर वह कार स्वयं ही चलाने लगी। जीवन ने पूछा, ‘‘हम किधर जा रहे हैं?’’

‘‘नीड़ की ओर।’’ सुनीता उसे देख कर मुस्करा दी, ‘‘आखिर नीड़ के पंछी भी तो शाम घिरे उसी ओर उड़ा करते हैं न।’’

और वह सफेद एंबेसेडर कार सुनीता की ससुराल की दिशा में दौड़ने लगी। ’’’

----

9-वी, एस रोड, बाई पास

गोदाम सर्किल, जयपुर (राज.)

--------------------.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका