शनिवार, 27 अगस्त 2011

आदमखोर (कहानी संकलन) संपादक - डॉ. दिनेश पाठक शशि - 11 - सुशीला शील की कहानी : महात्वाकांक्षा की पराकाष्ठा

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कहानी संग्रह

आदमखोर

(दहेज विषयक कहानियाँ)

संपादक

डॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’

संस्करण : 2011

मूल्य : 150

प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन

विवेक विहार,

शाहदरा दिल्ली-32

शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा

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डॉ. सुशीला शील

महत्वाकांक्षा की पराकाष्ठा

‘‘दहेज दानव के मुख से विवाहिता बाल-बाल बची’’ इस समाचार और उससे जुड़े फोटो पर नजर जाते ही मैं चौंक पड़ी। फोटो नीलिमा का था। नीलिमा मेरे पिछले शहर की पड़ोसन थी। खूबसूरत,अकल की तेज और बेहद महत्वा कांक्षिणी। कभी भी उसकी बातें लाखों-करोड़ों से नीचे की नहीं होती थीं। कॉलिज जाना शुरू किया तो कई अमरीजादों से दोस्ती गाँठने की कोशिश करती रही। ‘नौकरी’ जैसा लफ्ज तो उसकी शाही डिक्शनरी में था ही नहीं। घरवालों की नजरों में घर बैठी लड़की खटकती है। अतः उन्होंने उसके लिए घर का इंतजाम करना चाहा। प्रारम्भ में तो वे उसकी इच्छानुसार बड़े-बड़े घरों में जाते रहे। जब एक-दो घरों में उसकी औकात दिखाई गई तब उन्होंने अपने स्तर के घर ढूँढने शुरू कर दिए। सुनते ही बिदक गई नीलिमा। ‘मेरे लिए क्लर्क ढूँढा जा रहा है। या साधारण सा मास्टर मेरा पति बनेगा।! उहू..कहे देती हूँ कि मैं ऐसे घर में शादी नहीं करूँगी नहीं तो तैयार रहना बाद में हमेशा यहीं रखने के लिए।’’

सुनकर सबको साँप सूँघ गया सबने यह फैसला वक्त पर छोड़ दिया।

संयोग से नीलिमा परिवार सहित एक रिश्तेदार के यहाँ शादी में गई। वहाँ पुष्पा की उस पर नजर पड़ गई। पुष्पा के पति अच्छे व्यवसायियों में से थे। हरदम काम व दाम में व्यस्त। घर की, बच्चों की, रिश्ते-नातों की सार-सँभाल पुष्पा की जिम्मेदारी थी। पुष्पा के तीन बेटे थे। दो बेटे तो पढ़-लिखकर नौकरी पर चले गए। उन्होंने पढ़ी लिखी व नौकरीशुदा लड़कियों से शादी करना पसन्द किया। बेचारी पुष्पा बेटों का क्या बहुओं का सुख भी नहीं भोग पाई। उसका तीसरा बेटा नितिन पापा के साथ ही हाथ बँटाता था। पुष्पा उसके लिए सुन्दर, कम पढ़ी लिखी बहू लाना चाहती थी जो नौकरी का बहाना बना ही न सके। पैसों की कोई बात न थी, पैसा भगवान की दया से उनके यहाँ खूब था।

वाक्पटु नीलिमा से मिलकर सब मनचाहा मिलता दिखाई देखकर पुष्पा ने आगे बढ़कर नीलिमा के पिता से उसका हाथ माँगा। अन्धे को जैसे दो आँखें मिल गईं। चट मँगनी पट ब्याह भी हो गया। शादी में सब बहुत खुश थे और नीलिमा की मन की सब मुरादें पूरी हो गईं थीं। शादी के बाद वह एक बार पति के साथ घर आई थी, गुलाबसा खिला चेहरा व जेवरों से लदा फदा शरीर। बस, इसके बाद हमारा ट्रांसफर हो गया था , और हम यहाँ आकर व्यस्त हो गए, पर सालभर में ऐसा क्या हुआ कि नीलिमा...। मेरे दिलोदिमाग में यही विचार बार-बार साँप जैसी फुफकारें मार रहा था। जहाँ तक मेरी जानकारी थी दहेज की माँग शादी में ही नहीं की गई थी तो क्या पुष्पा बाद में औकात दिखाने पर आ गई थी? क्या दो बहुएँ इसीलिए उनके साथ नहीं रहती थीं? वैसे समाज में पुष्पा की इज्जत जैसी थी, उससे तो ये प्रश्न अस्तित्व खोने लगते थे। फिर..क्या नीलिमा ...नहीं, नहीं, नीलिमा को तो मचनाहा घर मिल गया था। तो हुआ क्या? बात यहाँ तक पहुँची कैसे? एक दो दिन तो मन बड़ा परेशान रहा। फोन की डायरी गलती से हसबैण्ड की अटैची में थी, जिसे वह अपने साथ टूर पर ले गए थे। उनके आने के बाद जब अपने पिछले मकान मालिक को फोन किया तो जो सच्चाई सामने आई मेरा तो कलेजा एकबारगी दहल ही गया कि महत्वाकांक्षा व्यक्ति को कहाँ से कहाँ पहुँचा देती है। हुआ यह कि शादी के बाद नीलिमा एक दो महीने तक तो पति के साथ हनीमून घूमने-घामने में मस्त रही। बाद में पति अपने व्यवसाय में व्यस्त रहने लगा और पुष्पा नीलिमा को घरेलू काम में ढालने का प्रयास करने लगी तो नीलिमा को बुरा लगना शुरू हुआ। घर के काम नौकर करें, मैं क्यों? इतना पैसा होकर भी रोज घर में खायें? होटल, क्लब, डांस ये किसके लिए हैं? पति नितिन को नीलिमा काबू में रखना चाहती थी, पर श्रवण जैसा न सही, समझदार नितिन पत्नी को भी अपने जैसा शिष्ट व आज्ञाकारी बनाना चाहता था। हारकर नीलिमा ने सास पुष्पा को इग्नोर करना प्रारम्भ कर दिया। पुष्षा के प्यार का, दुलार का और फटकार का उसके ऊपर असर न होता दिखाई देखकर नितिन को उसकी माँ को बुलाना पड़ा। वह रोज-रोज के नाटक से इतना परेशान हो गया था कि भूल गया कि हलक से निकली बातें सड़क पर चली जाती हैं। पड़ोसी भी मजे लेने लगे।

नीलिमा ससुराल वालों से लड़कर मायके चली गई। बींच-बचाव के बाद एक बार ससुराल आई तो लोगों को लगा कि वह सुधर गई है। परन्तु उसके कुछ महीनों बाद ही नाटक शुरु कर दिया। एक दिन तो हद ही हो गई। पुष्पा ने नाटकीय अंदाज में अपने ऊपर मिट्टी का तेल छिड़का व न्यूज चैनल वालों को फोन करके कमरा अन्दर से बन्दकर लिया। न्यूज चैनल वालों को आता देख जल्दी से आग लगाई व चिल्लाकर बचाओ, बचाओ की गुहार लगाने लगी। पत्रकारों ने जल्दी-जल्दी उसके फोटो खींचे और पानी डालकर उसकी आग बुझा दी।

कहने व करने के लिए कुछ बचा ही नहीं था। पत्रकारों ने जैसा देखा उसमें खूब मिर्च-मसाला मिलाकर चटपटी खबर जनता को परोस दी थी। कुछ दिनों बाद सुना कि नीलिमा मायके में है और उसने ससुराल वालों से एक लाख रु. अपने नाम यह कहकर करा लिए कि चलो दहेज का मुकदमा नहीं चलाऊँगी। ’’’

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45,जसवन्त की छतरी,

लोहिया नगर बल्केश्वर,

आगरा

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