शनिवार, 27 अगस्त 2011

आदमखोर (कहानी संकलन) संपादक - डॉ. दिनेश पाठक शशि - 13 - मंजुला गुप्ता की कहानी : नीड़ के पंछी

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कहानी संग्रह

आदमखोर

(दहेज विषयक कहानियाँ)

संपादक

डॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’

संस्करण : 2011

मूल्य : 150

प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन

विवेक विहार,

शाहदरा दिल्ली-32

शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा

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श्रीमती मंजुला गुप्ता

नीड़ के पंछी

दिन के तीन बजने को थे। फाइलों पर झुकी-झुकी काम करती हुई सुनीता थककर निढाल हो चुकी थी। उसने पैन को बंद कर एक तरफ रख दिया। बंद कर बैठ गई। हाथों के साथ-साथ जैसे उनकी आँखों ने भी काम करने से इनकार कर दिया हो! छः घंटों तक लगातार फाइलों में दर्ज एकाउंट्स को चैक करते-करते उसकी समझ में यह नहीं आ पा रहा था कि फाइनल चैकिंग के बावजूद भी उनमें इतनी सारी गलतियां कैसे रह गई? वे त्रुटियां उसकी पैनी निगाहों से किसी भी तरह नहीं बच पा रहीं थीं।

बैंक के इस उच्च पद पर आसीन हुए सुनीता को दस वर्ष हो गए हैं। इस सीढ़ी पर पहुँचने के लिए बैंक की परीक्षा उत्तीर्ण करना उसके लिए इतनी कठिन बात न थी जितनी कि पुरुष सहकर्मियों की कलुषित मानसिकता के बीच अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखना। आज नारी-शिक्षा, नारी-पुरुष समानता पर कितने भाषण, नारे और लेख अपनी बुलंदियों पर छाए हुए हैं! परंतु वास्तविकता क्या है? आज भी पुरुष की मानसिकता क्या है? वह या उसके समान ही कार्य करने वाली महिलाएं ही यह अधिक समझ सकती हैं। क्या घर, क्या बाहर कहीं भी तो स्थिति भिन्न नहीं है। यह बात आज भी उसकी समझ में नहीं आ पा रही है। मल्होत्रा और शर्मा के व्यंग्य-बाण आज भी उसके कानों में जब-तब गूंजने लगते हैं।

सुनीता के प्रमोशन की खबर लगते ही मल्होत्रा ने पान की पीक उगल कर शर्मा के कंधे पर हाथ रखकर हँसते हुए कहा था, ‘‘अब तो सब जगह इंदिरा गांधी ही छाने वाली हैं।’’

प्रत्युत्तर में शर्मा ने भी सिगरेट सुलगाकर, अश्लील भाव से भर कर कहा था, ‘‘अब तो अपने हिस्से में रोटियाँ सेंकने का काम ही रह गया है समझो!’’

उनके उन घटिया संवादों को सुनकर वह कट कर ही रह गई थी। दूषित मानसिकता को इतनी जल्दी बदलना भी तो सरल नहीं होता।

सुनीता ने बेल बजाई। चपरासी को एक प्याली चाय लाने को कहकर वह विचारों में खोने लगी। मल्होत्रा और शर्मा उसके चरित्र पर आरोप लगाने से भी न चूके थे। उन्होंने कैसी-कैसी बातें फैलाई थीं!’’ बॉस को खुश करने की कला काश! हमें भी आती!’’ ‘‘काश! खुदा ने हमें भी ऐसी कमसिन नारी बनाया होता!’’

अपने कार्य के प्रति सच्ची लगन और निष्ठा के साथ-साथ सुनीता ने उस चुनौती को कैसे संभाला, यह उसकी उत्तरोत्तर सफलता ने आज सिद्ध कर दिया है।

चपरासी चाय के साथ-साथ एक स्लिप लेकर अंदर आया। आगंतुका के कॉलम में सासू माँ का नाम पढ़कर सहसा ही उसे विश्वास नहीं हो पाया। सवालों के सैकड़ों फन उसके मस्तिष्क में फैले डंक मारने लगे। ‘‘आज दस वर्ष बाद सासू माँ का इस तरह अचानक उसके ऑफिस में आना।’’ अंदर के जजबातों को सहज बनाते हुए उसने चपरासी से कहा, ‘‘उन्हें अंदर भेज दो और हाँ एक प्याली चाय और कुछ नाश्ता भी भेज देना। सूनो! यह दरवाजे का पर्दा अच्छी तरह से लगाकर जाना!’’

सुनीता को लगने लगा कहीं मल्होत्रा और शर्मा की दो जोड़ी आँखें उसकी गतिविधि की टोह न ले रही हों!

चों-चुर्र के साथ दरवाजा खुला। सुनीता उन्हें देखते ही चौंक पड़ी, ‘‘मांजी, आप?’’ दस वर्ष का अंतराल जैसे उन्हें बीस-पच्चीस वर्ष आगे खींच ले गया है। दुर्बल काया आगे की ओर कमान-की तरह झुक आई थी। चेहरा स्याह और झुर्रियों से भर गया था। केश सन की तरह सफेद और लगभग झड़ चुके थे चेहरे के दीनहीन भाव और अधमैले साधारण वस्त्र, जो उनकी व्यथा-कथा स्वंय कही कह रहे थे।

सासू माँ का अचानक ही ऑफिस में इस तरह से बिना किसी पूर्व सूचना के चले आना उसे अटपटा लगने लगा। उसने सीट से उठकर उनका अभिवादन किया। वह उनकी कुशलक्षेम पूछने को ही थी कि वे इधर-उधर चोर निगाहों से देख, खिड़की, दरवाजे पर पड़े पर्दों को देख आश्वस्त हो याचित स्वर में कहने लगीं, ‘‘बहुत आस लेकर आई हूँ बहू तेरे दरवाजे पे! तेरे ससुर की जीवन और मेरी लाज अब तेरे हाथ में’’ सासू माँ का गला भर्रा आया। एक ही सांस में वे अपने तीन वर्षों से चले आ रहे दुर्दिनों की कहानी कह गईं, ‘‘आज तीन बरस हो गए हैं तेरे ससुर को टी.बी. हुए। एक फेफड़ा तो बिल्कुल खराब ही हो गया है। दूसरे के लिए डॉक्टर ऑपरेशन को बोलते हैं। पांच हजार का खर्चा है। सारे जेवर और नकदी बीमारी की भेंट चढ़ गए।’’ वे अपनी सूनी कलाइयां दिखला कर सुबकने ही लगीं।

‘‘सब ठीक हो जाएगा। आपने पहले क्यों नहीं बताया?’’ सुनीता उन्हें ढांढस बंधाने लगी।

‘‘किस मुँह से बताती? जिस घर की लक्ष्मी को धक्का देकर बाहर निकाल दिया हो, उसके दरवाजे।’’ सासू माँ की आवाज आँसुओं में भीगी होने के साथ-साथ पश्चाताप से भरी हुई थी।

‘‘रेखा और सुधीर कैसे हैं?’’ उसने पूछा।

‘‘कुछ न पूछ बहू! रेखा तो सारे समाज में मुँह काला करके चली गई भेजा था कॉलेज पढ़ने और वह........।’’ वे फिर से आँसू बहाने लगीं।

उसने जीवन के विषय में भी जानना चाहा। उसके अंदरुनी मन ने पति के बारे में उन्हें अधिक कुरेदना ठीक नहीं समझा।

सुनीता की आर्थिक स्थिति इन दिनों सुदृढ़ है। उसने तुरंत ही सात हजार रुपए का चेक काट कर चपरासी से रकम लाने का आदेश दिया।

उधर, कुर्सी पर बैठी हुई सासू माँ जैसे पश्चाताप की आग में भस्मीभूत हुई जा रही थीं। आज वे बहू से आँखें नहीं मिला पा रही थीं। सुनीता को उन पर तरस आने लगा। वह उन्हें फिर से धीरज बंधाने लगी, ‘‘सब ठीक हो जाएगा। चिंता की ऐसी कोई बात नहीं है।’’

चपरासी रुपऐ ले आया था। सुनीता ने वे रुपये उन्हें थमा दिए, ‘‘और भी जरुरत हो तो आकर ले लें। ‘‘सासू माँ साड़ी के छोर से आँखें पोंछने लगीं। सुनीता ने ड्राइवर को बुलवा कर उन्हें घर छोड़ने के आदेश दिए।

सासू माँ उसके ऑफिस से चल दी थीं। सुनीता फिर से अपने एकाकी जीवन में सिमट आई। उनकी उपस्थिति ने उसके सारे घाव हरे कर दिए थे। उसके आगे उसका सारा अतीत उजागर होने लगा।

रुपया! रुपया! रुपया! रुपया ही सारे सामाजिक रिश्तों की जड़! रुपया सारे मानवीय संबन्धों की धुरी! रुपया ही सारे आत्मीय सम्बन्धों का गठबन्धन! रुपया है तो सारे बिखरे हुए रिश्ते फिर से जुड़ने लगते हैं। रुपए का खनखनाता स्वर सुनीता अपने इर्द-गिर्द समूचे अस्तित्व के साथ महसूस करने लगी। इस रुपए के भीतर कितनी ही चीत्कारें, रुदन और कारुणिक प्रसंग भी उससे जुड़े हुए थे। वह सब जैसे एक-एक कर उसके सामने सजीव ही होने लगे।

रुपये के अभाव से ही तो माँ, दवा न मिलने से इस दुनिया से असमय ही तिल-तिल कर मरी थी। वह तो जाते-जाते मानो पिताजी को भी जैसे अपने साथ ही चलने का भी निमंत्रण दे गई थी। पिताजी भी दो महीने बाद हृदयाघात से ईश्वर को प्यारे हो गए थे।

चाचा-चाची ने ही तब अपने तीन बच्चों के साथ-साथ उसके भी तीन भाई-बहनों की जिम्मेदारी का भार वहन किया था। चाची बढ़े हुए खर्चे और काम को देख झुंझला कर जब-तब क्रोध में कह बैठतीं, ‘‘अपना परिवार छोटा रखने से क्या फायदा हुआ जब तीन बिना मांगे ही भगवान ने और भेज दिए! ईश्वर जब देता है तो छप्पर फाड़ कर ही देता है।’’ उनके कथन में जैसे क्रोध और घृणा का सैलाब उनके मन की भड़ांस को उंड़ेल देता।

सुनीता दिनभर घर के काम-काज में चाची का हाथ बटाती। वह छोटे भाई-बहन को संभालती। बचे-खुचे समय में जो भी पुस्तक लेकर बैठती तो आधा पृष्ठ पढ़ते-न-पढ़ते वह निद्रा के आगोश में चली जाती। चाचा-चाची अब जल्द-से-जल्द उसका विवाह कर अपने गुरुत्तर ऋण से उऋण हो जाना चाहते थे। परन्तु उस जैसी साधारण रुप-रंग की लड़की की शिक्षा की कमी जैसे नीमचढ़े करेले जैसी थी। कठिन परिश्रम के बाद आखिर चाचा ने जीवन को ढूँढ ही लिया था। उसके पूरे परिवार को जैसी लड़की की आवश्यकता थी। ‘‘रुखा-सूखा खा कर भी घर का सारा काम खुशी से करेगी! ससुराल वालों के चार बोलों को भी इसलिए हँस कर सहेगी क्योंकि शिकायतें सुनने वाला भी उसका इस संसार में कोई नहीं है।’’ चाचा ने उसकी विशेषताएं बताई थीं।

आनन-फानन में चट मंगनी, पट ब्याह की बात तय हो गई थीं। उसके ससुर को मालूम था कि उसके स्वर्गीय पिताजी की जायदाद का काफी हिस्सा बेटी के नाम होगा और भला चाचा भतीजी का हक क्यों मारने लगे? परंतु उनका भ्रम बड़ी निर्ममता से उस समय टूट गया, जब बारात ऐन वक्त पर दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई थी। लेन-देन के ऊपर अच्छा-खासा विवाद ही छिड़ गया था। ससुरजी बार-बार बारात वापस ले जाने की धमकी दे रहे थे। चाचा उनके पांव पर पड़े गिड़गिड़ा रहे थे। विवाह की भाग-दौड़ और कोलाहल के बीच चाचा के कुछ अस्पष्ट शब्द उसके कानों में भी पड़े थे। ‘‘देखिए समधीजी, मेरी हैसियत इससे अधिक नहीं है। सुनीता जैसी बहू आपको कहीं नहीं मिलेगी। साक्षात् लक्ष्मी है। वह आप लोगों को किसी तरह का कष्ट न होने देगी। जिस दिन भी इसने शिकायत का मौका दिया, आपसे पहले ही मैं इसकी गर्दन मरोड़ दूंगा।

काश! चाचा-चाची उस दिन से पहले ही उसकी गर्दन मरोड़ देते तो शायद उसे इस तरह मर-मर कर न जीना पड़ता!

ससुराल में सुबह पांच बजे से रात के ग्यारह बजे तक घर का सारा काम निपटाते-निपटाते सुनीता चूर हो जाती थी। कई बार बुखार होने पर भी वह चुपचाप इसलिए काम निपटाती जाती कि सासू माँ बेरोजगार पति जीवन का क्रोध भी उसी पर उडेलने लगीं। एक ओर कठोर श्रम और दूसरी ओर पौष्टिक भोजन का अभाव-ससुराल में उसे दो वक्त की रोटी के भी लाले पड़े रहते। दूध और फल की कल्पना तो जैसे आकाश कुसुम के समान थी। कई बार जीवन को उसके ऊपर करुणा भी उपजी थी। परंतु बेरोजगार पति कुछ भी करने में असमर्थ अपनी हीन भावना और निराशा को किसी-न-किसी रुप में झल्ला कर उसके सामने व्यक्त करता।

सासू माँ का ईश्वर-भक्ति में अगाध विश्वास था। उनका विश्वास था कि जीवन के सभी काम ईश्वर की .पा से ही पूरे होंगे। जीवन की जब नौकरी लगती तो वे इष्टदेव की .पा मानतीं और छूट जाती तो वे उसे ‘‘कुलच्छनी सुनीता के ऐसे अभागे पांव’’ कह कर सारा दोष उसके सिर पर ही मढ़ देती थीं।

कई बार मूक पशु की तरह से सब कुछ सहती-सहती अंत में सुनीता का धीरज चुकने लगता था। परंतु वह शिकायत भी करती तो किससे? बेरोजगार दब्बू पति जीवन निर्दोष है, मात्र सबकी निगाहों में अपने को ऊंचा दिखाने की भावना से आक्रांत वह उसी पर सारा दोषारोपण कर बैठता था। रेखा कॉलेज जाने लगी थी। सो उसके नखरे कुछ अलग ही किस्म के थे। वह अशिक्षित माँ और अर्ध शिक्षित भाभी पर अपनी शिक्षा का झूठा अहंकार जतला कर नित नये फैशन की मांग किया करती थी। उसका ध्यान पढ़ाई से अधिक अपने ही बनाव-श्रृंगार पर रहने लगा था। ‘‘उम्र का भी यही तकाजा है!’’ कह कर सासू माँ उसी की तरफदारी करने लगती थीं। परंतु छुप-छुप कर ब्यूटी पॉर्लर जाने और नख-शिख श्रृंगार के लिए धन का जुगाड़ बिठलाने के लिए किस तरह के हथकंडे अपनाती थी इस ओर किसी का भी ध्यान न था। हाँ, एक दिन एकांत पाकर पड़ोस की कौशल्या काकी ने कहा था, ‘‘शाम सात बजे से झुटपुट में पड़ोस के मोहन के साथ देख लेना। रमा से दोस्ती भी इसी मतलब से कर रखी है रेखा ने।’’

सुनीता तो सुन कर सुन्न पड़ने लगी थी। उसका मन हुआ था जीवन से कह कर उन्हें आगाह करे। लेकिन परिणाम जान कर वह चुप लगा गई थी। अकर्मण्य जीवन अंत में रेखा के ऊपर चढ़ा क्रोध भी उसी के ऊपर ही निकालेगा। लेकिन वह राज अधिक दिन तक राज न रह पाया था। एक दिन मोहन की माँ सड़क पर चिल्ला-चिल्ला कर कहने लगी थी, ‘‘अच्छे चालाक निकले तुम सब! दहेज में पाई रोकड़ भी न खर्च करना पड़े इसलिए फांस लिया मेरे सीधे-साधे सुशील बेटे को! परंतु मैं भी अपने बाप की बेटी नहीं जो एक भी चलने दूँ उसकी।’’ और वह न जाने कितनी देर तक अपशब्दों से उनके परिवार वालों को लानत-मलानत भेजती रही थी।

उस समय भी सुनीता को अकारण दोषी मान नितांत अकेली कठघरे में खड़ा कर दिया गया था। यह कह कर कि ‘‘बूढ़ी लाचार, बेबस माँ ने बेटी पर ध्यान न दिया था तो घर की जवान बहू ने भी आँखों पर पट्टी बांध रखी थी क्या?’’

और, जीवन के बेरोजगार होने का दोष, सुधीर के आवारागर्द होने का क्रोध, रेखा का कहीं विवाह न हो पाने का आक्रोश, गाहे-बगाहे किसी-न-किसी रूप में सुनीता के ऊपर ही निकलता था। दुनिया की बड़ी-से-बड़ी अदालत थी जैसे उसके ऊपर हो रहे उस अन्याय-अनाचार को देख, मानो चुप रहती थी क्योंकि जिस पतिरुपी पुरुष को उसने संबल माना था वह कोई दीमक खाया एक खोखला, सूखा-निर्जीव दरख्त था। उसे यदि वह और अधिक थामे रहती तो उसके नीचे दब कर दम तोड़ते देरी न लगती।

हाँ! उस दिन की घटना ने तो मानो सब कुछ हिला कर ही रख दिया था। चाची की दोनों बेटियाँ उस दिन सुनीता से मिलने आई हुई थीं। वह उनके लिये चाय बनने लगी थी। जीवन सामने की दुकान से कुछ बिस्कुट खरीद लाया था। सासू माँ जीवन के सामने सामान्य बनी रही थीं। परंतु उसके जाते ही वे रणचंडी का रूप ही धारण कर बैठी थीं। बात कुछ भी तो न थी। बस-वह छत पर उन्हें भोजन के लिए कहने गई थी। अत्यन्त विनम्र स्वर में उसने कहा था, ‘‘मांजी, नीचे चलिए। खाना ठंडा हो रहा है।’’

‘‘खाना! खाना! खाना!!! मुझे खिलाने आई है या मुझे ही खाने आई है? अरे! खिला अपने उन लग्गू मनूखों को जो इस घर में खाने के बहाने घुसे चले आते हैं। बड़ा रोकड़ धर गया है न तेरा बाप-जो-!’’ सासू माँ तो दहाड़ें मार-मार कर वहीं विष वमन करने लगी थीं, ‘‘कितना अरमान था-जीवन का अमीर घर में ब्याह होगा। दहेज से घर भर जाएगा। घर के दलिद्दर दूर होंगे!’’ वे जोर का फुक्का मार कर रो पड़ी थीं।

सासू माँ के उस नाटक पर सभी परिजन उन्हें संभालने लगे थे। सब की सहानुभूति उन्हीं के साथ थी क्योंकि उस दिन उन्होंने भोजन नहीं किया था। सुनीता ने खाया भी या नहीं, इसकी चिंता किसी को भी नहीं थी।

उस दिन सुनीता ने स्वयं को नितांत अकेला और अत्यंत असहाय अवस्था में महससू किया था। एक कप चाय-चाय न होकर वह पूरे परिवार के लिए विष ही बन गई थी। और उसके लिए अभिशाप! वह घंटों अकेली ही छत पर बैठी रोती रही थी। दिवंगत माता-पिता की भी उसी समय उसे याद आने लगी थी। विवशता की मूर्ति बने चाचा भी याद हो आए थे। उसे स्त्रियों के बीच रोती-बिलखती हुई चाची की भी याद आयी थी। उसे याद आने लगा था अपना निर्धन, जर्जर, कष्टप्रद बचपन!

उदासी में डूबी छत पर बहुत देर तक बैठी रही थी वह। नीचे सड़कों पर आने-जाने वालों को देखती रही थी। उसके सामने से पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी स्कूटर, गाड़ी चलातीं फर्र-फर्र से निकल जाते। उसकी स्थिति इतनी दयनीय कैसे हो आई? उसकी आत्मा ने उससे पूछा था। ‘दयनीय’ शब्द बार-बार उसके हृदय, मस्तिष्क पर झं.त होने लगा था। आखिर वही क्यों इतना दयनीय है? क्या अपनी इस स्थिति के लिए वह स्वयं तो उत्तरदायी नहीं? यदि आज वह उच्च शिक्षिता होती, आर्थिक रुप से संपन्न तो कौन उसका अपमान करता? ‘‘मुझे कुछ करना चाहिए! स्वयं के पैरों पर खड़ी मुझे आत्मनिर्भर बनना है। इस प्रकार मर-मर कर मैं और अधिक नही जी सकती।’’ सोचती रही थी।

एक दिन सुनीता ने अपनी सोने की दो चूड़ियां जो उसकी माँ की अन्तिम निशानी थी, जीवन को सौपते हुए कहा था, ‘‘इन्हें बाजार में बेच कर मेरे लिए कोर्स की पुस्तकें खरीद लाओ! मैं अब आगे पढूंगी।’’

वह बात घर में आग की तरह से फैल गई थी, सासू माँ ने जम कर उसकी पढ़ाई का विरोध किया था, ‘‘अरे! इतना ही पढ़ने-लिखने का शौक था तो माँ-बाप के घर से क्यों न पढ़ कर आ गई? ये पढ़ेगी तो क्या घर का काम हम लोग करेंगे? पढ-लिख कर अफसरानी बनेगी क्या? हम लोगों पर हुकूमत करेगी? रुआब झाड़ेगी?’’

न जाने किन-किन अपशब्दों, उलझनों, तानों के बीच आँसुओं का नैवद्य चढ़ा-चढ़ा कर उसने माँ सरस्वती की आराधना की थी। कठोर श्रम, सहनशीलता, दृढ़ संकल्प उसके लक्ष्य को उत्तरोत्तर सुदृढ़ बनाते चले गए थे।

तब सुनीता प्रगति के सोपानों पर उत्तरोत्तर चढ़ती ही गई और आज वह इस ऊंचे ओहदे पर आसीन है।

दूसरे दिन सुनीता नित्य की भांति फिर से अपने कार्य में व्यस्त थी। संध्या के चार बजे थे। बैंक का चपरासी उसके आगे एक पर्ची रख गया। जीवन का नाम देखकर वह धक-से रह गई। उसने आगंतुक को अपने पास बुलवा लिया।

झिझकता हुआ दबे पांव जीवन, सुनीता के पास चला आया। सुनीता को लगने लगा जैसे असमय ही बूढ़ा हो गया हो। तो क्या अब भी वह बेरोजगारी से जूझ रहा है? उसने कहीं दूसरा विवाह तो नहीं कर लिया? किसी प्रकार उसने उसकी ओर फीकी मुस्कान फेंकी, ‘‘कैसे हो?’’

‘‘ठीक हूँ।’’ जीवन का बुझा हुआ स्वर था।

सुनीता ने चपरासी के लिए घंटी बजाते हुए जीवन से पूछा, ‘‘पिताजी कैसे हैं?’’

‘‘उन्हें कल शाम टी.बी. सेनिटोरियम में भर्ती करवा दिया गया है।’’ जीवन ने बताया ‘‘कल तुमने माँ को जो........।’’

चपरासी अंदर चला आया। सुनीता ने जीवन से पूछा, ‘‘कॉफी के साथ और क्या लोगे?’’

‘‘कुछ नहीं।’’ जीवन तो हीन भावना में डूबता ही जा रहा था।

‘‘इन दिनों क्या कर रहे हो?’’

‘‘बुक बाइंडिंग का काम।’’

‘‘तुम्हारे लिए एक प्रिंटिंग प्रेस खोल दें?’’ सुनीता मुस्करा दी।

‘‘ये-ये तुम कह रही हो?’’ जीवन उसे अविश्वसनीय दृष्टि से देखने लगा। ‘‘इससे आश्चर्य की क्या बात है?’’ सुनीता उसे प्रोत्साहित करने लगी, ‘‘इस पर गहराई से सोच लेना!’’

कॉफी आ गई थी। वे दोनों कॉफी पीने लगे। जीवन की उस दयनीय दशा को देखकर सुनीता का मन पिघलता ही जा रहा था। अतीत में उसके साथ जो कुछ भी घटित होता रहा, उसमें जीवन का ही तो सारा दोष नहीं है! सच तो यह है कि पारिवारिक परिस्थितियों के कारण ही उसे वे बुरे दिन झेलने पड़े थे। उस दिन जब उसने उसके हाथों में सोने की चूड़ियाँ सौंपी थीं तो सारी रकम वह ईमानदारी के साथ उसे थमा गया था।

‘‘क्या सोचने लगीं?’’ जीवन ने उसकी तंद्रा भंग की।

‘‘सोचना क्या है, जीवन?’’ सुनीता ने गहरा उच्छवास भरा, ‘‘समय और परिस्थितियां हमें कहाँ-कहाँ उड़ाती रही हैं! मेरे विचार से तुम्हें प्रिंटिंग प्रेस खोल ही लेना चाहिए।’’

‘‘लेकिन उसके लिए एक बड़ी रकम।’’

‘‘उसकी चिंता न करो।’’ सुनीता उसे धैर्य बंधाने लगी, ‘‘मैं बैंक से लोन ले लूंगी।’’

जीवन चुप हो गया। वह तो पछतावे की आग में दहक रहा था। तभी सुनीता उसे अपनेपन से समझाने लगी, ‘‘देखो जीवन! यह जरुरी नहीं है कि पति ही पत्नी का पालन-पोषण करे। कमाऊ पत्नी भी तो पति की ही नहीं, सारे परिवार की परवरिश कर सकती है।’’

‘‘ओह सुनीता!’’ जीवन की आँखों में आँसू ही भर आए, ‘‘मुझे मालूम न था कि........।’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं, जीवन!’’ सुनीता गंभीर हो आई, ‘‘मैं भी इस एकाकी जीवन से बेहद तंग आ गई हूँ। मेरे पंख भी तो नीड़ के लिए फड़फड़ाते रहते हैं।’’ सुनीता भी तो उसके आगे बर्फ-सी पिघलती ही गई।

संध्या के पांच बज चुके थे। सुनीता ने सीट से उठकर जीवन की ओर देखा, ‘‘चलें?’’

‘‘चलो!’’ जीवन भी कुर्सी से उठ गया।

आफिस से निकल कर सुनीता अपनी कार के पास आ गई। उसने जीवन के लिए कार का अगला दरवाजा खोल दिया। जीवन के बैठने पर वह कार स्वयं ही चलाने लगी। जीवन ने पूछा, ‘‘हम किधर जा रहे हैं?’’

‘‘नीड़ की ओर।’’ सुनीता उसे देख कर मुस्करा दी, ‘‘आखिर नीड़ के पंछी भी तो शाम घिरे उसी ओर उड़ा करते हैं न।’’

और वह सफेद एंबेसेडर कार सुनीता की ससुराल की दिशा में दौड़ने लगी। ’’’

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9-वी, एस रोड, बाई पास

गोदाम सर्किल, जयपुर (राज.)

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