रचनाकार में खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

आदमखोर (कहानी संकलन) संपादक - डॉ. दिनेश पाठक शशि - 13 - मंजुला गुप्ता की कहानी : नीड़ के पंछी

SHARE:

कहानी संग्रह आदमखोर (दहेज विषयक कहानियाँ) संपादक डॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’ संस्करण : 2011 मूल्य : 150 प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन विवेक व...

kahani sangraha aadamkhor dahej vishyak kahaniya dinesh pathak shashi

कहानी संग्रह

आदमखोर

(दहेज विषयक कहानियाँ)

संपादक

डॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’

संस्करण : 2011

मूल्य : 150

प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन

विवेक विहार,

शाहदरा दिल्ली-32

शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा

----

श्रीमती मंजुला गुप्ता

नीड़ के पंछी

दिन के तीन बजने को थे। फाइलों पर झुकी-झुकी काम करती हुई सुनीता थककर निढाल हो चुकी थी। उसने पैन को बंद कर एक तरफ रख दिया। बंद कर बैठ गई। हाथों के साथ-साथ जैसे उनकी आँखों ने भी काम करने से इनकार कर दिया हो! छः घंटों तक लगातार फाइलों में दर्ज एकाउंट्स को चैक करते-करते उसकी समझ में यह नहीं आ पा रहा था कि फाइनल चैकिंग के बावजूद भी उनमें इतनी सारी गलतियां कैसे रह गई? वे त्रुटियां उसकी पैनी निगाहों से किसी भी तरह नहीं बच पा रहीं थीं।

बैंक के इस उच्च पद पर आसीन हुए सुनीता को दस वर्ष हो गए हैं। इस सीढ़ी पर पहुँचने के लिए बैंक की परीक्षा उत्तीर्ण करना उसके लिए इतनी कठिन बात न थी जितनी कि पुरुष सहकर्मियों की कलुषित मानसिकता के बीच अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखना। आज नारी-शिक्षा, नारी-पुरुष समानता पर कितने भाषण, नारे और लेख अपनी बुलंदियों पर छाए हुए हैं! परंतु वास्तविकता क्या है? आज भी पुरुष की मानसिकता क्या है? वह या उसके समान ही कार्य करने वाली महिलाएं ही यह अधिक समझ सकती हैं। क्या घर, क्या बाहर कहीं भी तो स्थिति भिन्न नहीं है। यह बात आज भी उसकी समझ में नहीं आ पा रही है। मल्होत्रा और शर्मा के व्यंग्य-बाण आज भी उसके कानों में जब-तब गूंजने लगते हैं।

सुनीता के प्रमोशन की खबर लगते ही मल्होत्रा ने पान की पीक उगल कर शर्मा के कंधे पर हाथ रखकर हँसते हुए कहा था, ‘‘अब तो सब जगह इंदिरा गांधी ही छाने वाली हैं।’’

प्रत्युत्तर में शर्मा ने भी सिगरेट सुलगाकर, अश्लील भाव से भर कर कहा था, ‘‘अब तो अपने हिस्से में रोटियाँ सेंकने का काम ही रह गया है समझो!’’

उनके उन घटिया संवादों को सुनकर वह कट कर ही रह गई थी। दूषित मानसिकता को इतनी जल्दी बदलना भी तो सरल नहीं होता।

सुनीता ने बेल बजाई। चपरासी को एक प्याली चाय लाने को कहकर वह विचारों में खोने लगी। मल्होत्रा और शर्मा उसके चरित्र पर आरोप लगाने से भी न चूके थे। उन्होंने कैसी-कैसी बातें फैलाई थीं!’’ बॉस को खुश करने की कला काश! हमें भी आती!’’ ‘‘काश! खुदा ने हमें भी ऐसी कमसिन नारी बनाया होता!’’

अपने कार्य के प्रति सच्ची लगन और निष्ठा के साथ-साथ सुनीता ने उस चुनौती को कैसे संभाला, यह उसकी उत्तरोत्तर सफलता ने आज सिद्ध कर दिया है।

चपरासी चाय के साथ-साथ एक स्लिप लेकर अंदर आया। आगंतुका के कॉलम में सासू माँ का नाम पढ़कर सहसा ही उसे विश्वास नहीं हो पाया। सवालों के सैकड़ों फन उसके मस्तिष्क में फैले डंक मारने लगे। ‘‘आज दस वर्ष बाद सासू माँ का इस तरह अचानक उसके ऑफिस में आना।’’ अंदर के जजबातों को सहज बनाते हुए उसने चपरासी से कहा, ‘‘उन्हें अंदर भेज दो और हाँ एक प्याली चाय और कुछ नाश्ता भी भेज देना। सूनो! यह दरवाजे का पर्दा अच्छी तरह से लगाकर जाना!’’

सुनीता को लगने लगा कहीं मल्होत्रा और शर्मा की दो जोड़ी आँखें उसकी गतिविधि की टोह न ले रही हों!

चों-चुर्र के साथ दरवाजा खुला। सुनीता उन्हें देखते ही चौंक पड़ी, ‘‘मांजी, आप?’’ दस वर्ष का अंतराल जैसे उन्हें बीस-पच्चीस वर्ष आगे खींच ले गया है। दुर्बल काया आगे की ओर कमान-की तरह झुक आई थी। चेहरा स्याह और झुर्रियों से भर गया था। केश सन की तरह सफेद और लगभग झड़ चुके थे चेहरे के दीनहीन भाव और अधमैले साधारण वस्त्र, जो उनकी व्यथा-कथा स्वंय कही कह रहे थे।

सासू माँ का अचानक ही ऑफिस में इस तरह से बिना किसी पूर्व सूचना के चले आना उसे अटपटा लगने लगा। उसने सीट से उठकर उनका अभिवादन किया। वह उनकी कुशलक्षेम पूछने को ही थी कि वे इधर-उधर चोर निगाहों से देख, खिड़की, दरवाजे पर पड़े पर्दों को देख आश्वस्त हो याचित स्वर में कहने लगीं, ‘‘बहुत आस लेकर आई हूँ बहू तेरे दरवाजे पे! तेरे ससुर की जीवन और मेरी लाज अब तेरे हाथ में’’ सासू माँ का गला भर्रा आया। एक ही सांस में वे अपने तीन वर्षों से चले आ रहे दुर्दिनों की कहानी कह गईं, ‘‘आज तीन बरस हो गए हैं तेरे ससुर को टी.बी. हुए। एक फेफड़ा तो बिल्कुल खराब ही हो गया है। दूसरे के लिए डॉक्टर ऑपरेशन को बोलते हैं। पांच हजार का खर्चा है। सारे जेवर और नकदी बीमारी की भेंट चढ़ गए।’’ वे अपनी सूनी कलाइयां दिखला कर सुबकने ही लगीं।

‘‘सब ठीक हो जाएगा। आपने पहले क्यों नहीं बताया?’’ सुनीता उन्हें ढांढस बंधाने लगी।

‘‘किस मुँह से बताती? जिस घर की लक्ष्मी को धक्का देकर बाहर निकाल दिया हो, उसके दरवाजे।’’ सासू माँ की आवाज आँसुओं में भीगी होने के साथ-साथ पश्चाताप से भरी हुई थी।

‘‘रेखा और सुधीर कैसे हैं?’’ उसने पूछा।

‘‘कुछ न पूछ बहू! रेखा तो सारे समाज में मुँह काला करके चली गई भेजा था कॉलेज पढ़ने और वह........।’’ वे फिर से आँसू बहाने लगीं।

उसने जीवन के विषय में भी जानना चाहा। उसके अंदरुनी मन ने पति के बारे में उन्हें अधिक कुरेदना ठीक नहीं समझा।

सुनीता की आर्थिक स्थिति इन दिनों सुदृढ़ है। उसने तुरंत ही सात हजार रुपए का चेक काट कर चपरासी से रकम लाने का आदेश दिया।

उधर, कुर्सी पर बैठी हुई सासू माँ जैसे पश्चाताप की आग में भस्मीभूत हुई जा रही थीं। आज वे बहू से आँखें नहीं मिला पा रही थीं। सुनीता को उन पर तरस आने लगा। वह उन्हें फिर से धीरज बंधाने लगी, ‘‘सब ठीक हो जाएगा। चिंता की ऐसी कोई बात नहीं है।’’

चपरासी रुपऐ ले आया था। सुनीता ने वे रुपये उन्हें थमा दिए, ‘‘और भी जरुरत हो तो आकर ले लें। ‘‘सासू माँ साड़ी के छोर से आँखें पोंछने लगीं। सुनीता ने ड्राइवर को बुलवा कर उन्हें घर छोड़ने के आदेश दिए।

सासू माँ उसके ऑफिस से चल दी थीं। सुनीता फिर से अपने एकाकी जीवन में सिमट आई। उनकी उपस्थिति ने उसके सारे घाव हरे कर दिए थे। उसके आगे उसका सारा अतीत उजागर होने लगा।

रुपया! रुपया! रुपया! रुपया ही सारे सामाजिक रिश्तों की जड़! रुपया सारे मानवीय संबन्धों की धुरी! रुपया ही सारे आत्मीय सम्बन्धों का गठबन्धन! रुपया है तो सारे बिखरे हुए रिश्ते फिर से जुड़ने लगते हैं। रुपए का खनखनाता स्वर सुनीता अपने इर्द-गिर्द समूचे अस्तित्व के साथ महसूस करने लगी। इस रुपए के भीतर कितनी ही चीत्कारें, रुदन और कारुणिक प्रसंग भी उससे जुड़े हुए थे। वह सब जैसे एक-एक कर उसके सामने सजीव ही होने लगे।

रुपये के अभाव से ही तो माँ, दवा न मिलने से इस दुनिया से असमय ही तिल-तिल कर मरी थी। वह तो जाते-जाते मानो पिताजी को भी जैसे अपने साथ ही चलने का भी निमंत्रण दे गई थी। पिताजी भी दो महीने बाद हृदयाघात से ईश्वर को प्यारे हो गए थे।

चाचा-चाची ने ही तब अपने तीन बच्चों के साथ-साथ उसके भी तीन भाई-बहनों की जिम्मेदारी का भार वहन किया था। चाची बढ़े हुए खर्चे और काम को देख झुंझला कर जब-तब क्रोध में कह बैठतीं, ‘‘अपना परिवार छोटा रखने से क्या फायदा हुआ जब तीन बिना मांगे ही भगवान ने और भेज दिए! ईश्वर जब देता है तो छप्पर फाड़ कर ही देता है।’’ उनके कथन में जैसे क्रोध और घृणा का सैलाब उनके मन की भड़ांस को उंड़ेल देता।

सुनीता दिनभर घर के काम-काज में चाची का हाथ बटाती। वह छोटे भाई-बहन को संभालती। बचे-खुचे समय में जो भी पुस्तक लेकर बैठती तो आधा पृष्ठ पढ़ते-न-पढ़ते वह निद्रा के आगोश में चली जाती। चाचा-चाची अब जल्द-से-जल्द उसका विवाह कर अपने गुरुत्तर ऋण से उऋण हो जाना चाहते थे। परन्तु उस जैसी साधारण रुप-रंग की लड़की की शिक्षा की कमी जैसे नीमचढ़े करेले जैसी थी। कठिन परिश्रम के बाद आखिर चाचा ने जीवन को ढूँढ ही लिया था। उसके पूरे परिवार को जैसी लड़की की आवश्यकता थी। ‘‘रुखा-सूखा खा कर भी घर का सारा काम खुशी से करेगी! ससुराल वालों के चार बोलों को भी इसलिए हँस कर सहेगी क्योंकि शिकायतें सुनने वाला भी उसका इस संसार में कोई नहीं है।’’ चाचा ने उसकी विशेषताएं बताई थीं।

आनन-फानन में चट मंगनी, पट ब्याह की बात तय हो गई थीं। उसके ससुर को मालूम था कि उसके स्वर्गीय पिताजी की जायदाद का काफी हिस्सा बेटी के नाम होगा और भला चाचा भतीजी का हक क्यों मारने लगे? परंतु उनका भ्रम बड़ी निर्ममता से उस समय टूट गया, जब बारात ऐन वक्त पर दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई थी। लेन-देन के ऊपर अच्छा-खासा विवाद ही छिड़ गया था। ससुरजी बार-बार बारात वापस ले जाने की धमकी दे रहे थे। चाचा उनके पांव पर पड़े गिड़गिड़ा रहे थे। विवाह की भाग-दौड़ और कोलाहल के बीच चाचा के कुछ अस्पष्ट शब्द उसके कानों में भी पड़े थे। ‘‘देखिए समधीजी, मेरी हैसियत इससे अधिक नहीं है। सुनीता जैसी बहू आपको कहीं नहीं मिलेगी। साक्षात् लक्ष्मी है। वह आप लोगों को किसी तरह का कष्ट न होने देगी। जिस दिन भी इसने शिकायत का मौका दिया, आपसे पहले ही मैं इसकी गर्दन मरोड़ दूंगा।

काश! चाचा-चाची उस दिन से पहले ही उसकी गर्दन मरोड़ देते तो शायद उसे इस तरह मर-मर कर न जीना पड़ता!

ससुराल में सुबह पांच बजे से रात के ग्यारह बजे तक घर का सारा काम निपटाते-निपटाते सुनीता चूर हो जाती थी। कई बार बुखार होने पर भी वह चुपचाप इसलिए काम निपटाती जाती कि सासू माँ बेरोजगार पति जीवन का क्रोध भी उसी पर उडेलने लगीं। एक ओर कठोर श्रम और दूसरी ओर पौष्टिक भोजन का अभाव-ससुराल में उसे दो वक्त की रोटी के भी लाले पड़े रहते। दूध और फल की कल्पना तो जैसे आकाश कुसुम के समान थी। कई बार जीवन को उसके ऊपर करुणा भी उपजी थी। परंतु बेरोजगार पति कुछ भी करने में असमर्थ अपनी हीन भावना और निराशा को किसी-न-किसी रुप में झल्ला कर उसके सामने व्यक्त करता।

सासू माँ का ईश्वर-भक्ति में अगाध विश्वास था। उनका विश्वास था कि जीवन के सभी काम ईश्वर की .पा से ही पूरे होंगे। जीवन की जब नौकरी लगती तो वे इष्टदेव की .पा मानतीं और छूट जाती तो वे उसे ‘‘कुलच्छनी सुनीता के ऐसे अभागे पांव’’ कह कर सारा दोष उसके सिर पर ही मढ़ देती थीं।

कई बार मूक पशु की तरह से सब कुछ सहती-सहती अंत में सुनीता का धीरज चुकने लगता था। परंतु वह शिकायत भी करती तो किससे? बेरोजगार दब्बू पति जीवन निर्दोष है, मात्र सबकी निगाहों में अपने को ऊंचा दिखाने की भावना से आक्रांत वह उसी पर सारा दोषारोपण कर बैठता था। रेखा कॉलेज जाने लगी थी। सो उसके नखरे कुछ अलग ही किस्म के थे। वह अशिक्षित माँ और अर्ध शिक्षित भाभी पर अपनी शिक्षा का झूठा अहंकार जतला कर नित नये फैशन की मांग किया करती थी। उसका ध्यान पढ़ाई से अधिक अपने ही बनाव-श्रृंगार पर रहने लगा था। ‘‘उम्र का भी यही तकाजा है!’’ कह कर सासू माँ उसी की तरफदारी करने लगती थीं। परंतु छुप-छुप कर ब्यूटी पॉर्लर जाने और नख-शिख श्रृंगार के लिए धन का जुगाड़ बिठलाने के लिए किस तरह के हथकंडे अपनाती थी इस ओर किसी का भी ध्यान न था। हाँ, एक दिन एकांत पाकर पड़ोस की कौशल्या काकी ने कहा था, ‘‘शाम सात बजे से झुटपुट में पड़ोस के मोहन के साथ देख लेना। रमा से दोस्ती भी इसी मतलब से कर रखी है रेखा ने।’’

सुनीता तो सुन कर सुन्न पड़ने लगी थी। उसका मन हुआ था जीवन से कह कर उन्हें आगाह करे। लेकिन परिणाम जान कर वह चुप लगा गई थी। अकर्मण्य जीवन अंत में रेखा के ऊपर चढ़ा क्रोध भी उसी के ऊपर ही निकालेगा। लेकिन वह राज अधिक दिन तक राज न रह पाया था। एक दिन मोहन की माँ सड़क पर चिल्ला-चिल्ला कर कहने लगी थी, ‘‘अच्छे चालाक निकले तुम सब! दहेज में पाई रोकड़ भी न खर्च करना पड़े इसलिए फांस लिया मेरे सीधे-साधे सुशील बेटे को! परंतु मैं भी अपने बाप की बेटी नहीं जो एक भी चलने दूँ उसकी।’’ और वह न जाने कितनी देर तक अपशब्दों से उनके परिवार वालों को लानत-मलानत भेजती रही थी।

उस समय भी सुनीता को अकारण दोषी मान नितांत अकेली कठघरे में खड़ा कर दिया गया था। यह कह कर कि ‘‘बूढ़ी लाचार, बेबस माँ ने बेटी पर ध्यान न दिया था तो घर की जवान बहू ने भी आँखों पर पट्टी बांध रखी थी क्या?’’

और, जीवन के बेरोजगार होने का दोष, सुधीर के आवारागर्द होने का क्रोध, रेखा का कहीं विवाह न हो पाने का आक्रोश, गाहे-बगाहे किसी-न-किसी रूप में सुनीता के ऊपर ही निकलता था। दुनिया की बड़ी-से-बड़ी अदालत थी जैसे उसके ऊपर हो रहे उस अन्याय-अनाचार को देख, मानो चुप रहती थी क्योंकि जिस पतिरुपी पुरुष को उसने संबल माना था वह कोई दीमक खाया एक खोखला, सूखा-निर्जीव दरख्त था। उसे यदि वह और अधिक थामे रहती तो उसके नीचे दब कर दम तोड़ते देरी न लगती।

हाँ! उस दिन की घटना ने तो मानो सब कुछ हिला कर ही रख दिया था। चाची की दोनों बेटियाँ उस दिन सुनीता से मिलने आई हुई थीं। वह उनके लिये चाय बनने लगी थी। जीवन सामने की दुकान से कुछ बिस्कुट खरीद लाया था। सासू माँ जीवन के सामने सामान्य बनी रही थीं। परंतु उसके जाते ही वे रणचंडी का रूप ही धारण कर बैठी थीं। बात कुछ भी तो न थी। बस-वह छत पर उन्हें भोजन के लिए कहने गई थी। अत्यन्त विनम्र स्वर में उसने कहा था, ‘‘मांजी, नीचे चलिए। खाना ठंडा हो रहा है।’’

‘‘खाना! खाना! खाना!!! मुझे खिलाने आई है या मुझे ही खाने आई है? अरे! खिला अपने उन लग्गू मनूखों को जो इस घर में खाने के बहाने घुसे चले आते हैं। बड़ा रोकड़ धर गया है न तेरा बाप-जो-!’’ सासू माँ तो दहाड़ें मार-मार कर वहीं विष वमन करने लगी थीं, ‘‘कितना अरमान था-जीवन का अमीर घर में ब्याह होगा। दहेज से घर भर जाएगा। घर के दलिद्दर दूर होंगे!’’ वे जोर का फुक्का मार कर रो पड़ी थीं।

सासू माँ के उस नाटक पर सभी परिजन उन्हें संभालने लगे थे। सब की सहानुभूति उन्हीं के साथ थी क्योंकि उस दिन उन्होंने भोजन नहीं किया था। सुनीता ने खाया भी या नहीं, इसकी चिंता किसी को भी नहीं थी।

उस दिन सुनीता ने स्वयं को नितांत अकेला और अत्यंत असहाय अवस्था में महससू किया था। एक कप चाय-चाय न होकर वह पूरे परिवार के लिए विष ही बन गई थी। और उसके लिए अभिशाप! वह घंटों अकेली ही छत पर बैठी रोती रही थी। दिवंगत माता-पिता की भी उसी समय उसे याद आने लगी थी। विवशता की मूर्ति बने चाचा भी याद हो आए थे। उसे स्त्रियों के बीच रोती-बिलखती हुई चाची की भी याद आयी थी। उसे याद आने लगा था अपना निर्धन, जर्जर, कष्टप्रद बचपन!

उदासी में डूबी छत पर बहुत देर तक बैठी रही थी वह। नीचे सड़कों पर आने-जाने वालों को देखती रही थी। उसके सामने से पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी स्कूटर, गाड़ी चलातीं फर्र-फर्र से निकल जाते। उसकी स्थिति इतनी दयनीय कैसे हो आई? उसकी आत्मा ने उससे पूछा था। ‘दयनीय’ शब्द बार-बार उसके हृदय, मस्तिष्क पर झं.त होने लगा था। आखिर वही क्यों इतना दयनीय है? क्या अपनी इस स्थिति के लिए वह स्वयं तो उत्तरदायी नहीं? यदि आज वह उच्च शिक्षिता होती, आर्थिक रुप से संपन्न तो कौन उसका अपमान करता? ‘‘मुझे कुछ करना चाहिए! स्वयं के पैरों पर खड़ी मुझे आत्मनिर्भर बनना है। इस प्रकार मर-मर कर मैं और अधिक नही जी सकती।’’ सोचती रही थी।

एक दिन सुनीता ने अपनी सोने की दो चूड़ियां जो उसकी माँ की अन्तिम निशानी थी, जीवन को सौपते हुए कहा था, ‘‘इन्हें बाजार में बेच कर मेरे लिए कोर्स की पुस्तकें खरीद लाओ! मैं अब आगे पढूंगी।’’

वह बात घर में आग की तरह से फैल गई थी, सासू माँ ने जम कर उसकी पढ़ाई का विरोध किया था, ‘‘अरे! इतना ही पढ़ने-लिखने का शौक था तो माँ-बाप के घर से क्यों न पढ़ कर आ गई? ये पढ़ेगी तो क्या घर का काम हम लोग करेंगे? पढ-लिख कर अफसरानी बनेगी क्या? हम लोगों पर हुकूमत करेगी? रुआब झाड़ेगी?’’

न जाने किन-किन अपशब्दों, उलझनों, तानों के बीच आँसुओं का नैवद्य चढ़ा-चढ़ा कर उसने माँ सरस्वती की आराधना की थी। कठोर श्रम, सहनशीलता, दृढ़ संकल्प उसके लक्ष्य को उत्तरोत्तर सुदृढ़ बनाते चले गए थे।

तब सुनीता प्रगति के सोपानों पर उत्तरोत्तर चढ़ती ही गई और आज वह इस ऊंचे ओहदे पर आसीन है।

दूसरे दिन सुनीता नित्य की भांति फिर से अपने कार्य में व्यस्त थी। संध्या के चार बजे थे। बैंक का चपरासी उसके आगे एक पर्ची रख गया। जीवन का नाम देखकर वह धक-से रह गई। उसने आगंतुक को अपने पास बुलवा लिया।

झिझकता हुआ दबे पांव जीवन, सुनीता के पास चला आया। सुनीता को लगने लगा जैसे असमय ही बूढ़ा हो गया हो। तो क्या अब भी वह बेरोजगारी से जूझ रहा है? उसने कहीं दूसरा विवाह तो नहीं कर लिया? किसी प्रकार उसने उसकी ओर फीकी मुस्कान फेंकी, ‘‘कैसे हो?’’

‘‘ठीक हूँ।’’ जीवन का बुझा हुआ स्वर था।

सुनीता ने चपरासी के लिए घंटी बजाते हुए जीवन से पूछा, ‘‘पिताजी कैसे हैं?’’

‘‘उन्हें कल शाम टी.बी. सेनिटोरियम में भर्ती करवा दिया गया है।’’ जीवन ने बताया ‘‘कल तुमने माँ को जो........।’’

चपरासी अंदर चला आया। सुनीता ने जीवन से पूछा, ‘‘कॉफी के साथ और क्या लोगे?’’

‘‘कुछ नहीं।’’ जीवन तो हीन भावना में डूबता ही जा रहा था।

‘‘इन दिनों क्या कर रहे हो?’’

‘‘बुक बाइंडिंग का काम।’’

‘‘तुम्हारे लिए एक प्रिंटिंग प्रेस खोल दें?’’ सुनीता मुस्करा दी।

‘‘ये-ये तुम कह रही हो?’’ जीवन उसे अविश्वसनीय दृष्टि से देखने लगा। ‘‘इससे आश्चर्य की क्या बात है?’’ सुनीता उसे प्रोत्साहित करने लगी, ‘‘इस पर गहराई से सोच लेना!’’

कॉफी आ गई थी। वे दोनों कॉफी पीने लगे। जीवन की उस दयनीय दशा को देखकर सुनीता का मन पिघलता ही जा रहा था। अतीत में उसके साथ जो कुछ भी घटित होता रहा, उसमें जीवन का ही तो सारा दोष नहीं है! सच तो यह है कि पारिवारिक परिस्थितियों के कारण ही उसे वे बुरे दिन झेलने पड़े थे। उस दिन जब उसने उसके हाथों में सोने की चूड़ियाँ सौंपी थीं तो सारी रकम वह ईमानदारी के साथ उसे थमा गया था।

‘‘क्या सोचने लगीं?’’ जीवन ने उसकी तंद्रा भंग की।

‘‘सोचना क्या है, जीवन?’’ सुनीता ने गहरा उच्छवास भरा, ‘‘समय और परिस्थितियां हमें कहाँ-कहाँ उड़ाती रही हैं! मेरे विचार से तुम्हें प्रिंटिंग प्रेस खोल ही लेना चाहिए।’’

‘‘लेकिन उसके लिए एक बड़ी रकम।’’

‘‘उसकी चिंता न करो।’’ सुनीता उसे धैर्य बंधाने लगी, ‘‘मैं बैंक से लोन ले लूंगी।’’

जीवन चुप हो गया। वह तो पछतावे की आग में दहक रहा था। तभी सुनीता उसे अपनेपन से समझाने लगी, ‘‘देखो जीवन! यह जरुरी नहीं है कि पति ही पत्नी का पालन-पोषण करे। कमाऊ पत्नी भी तो पति की ही नहीं, सारे परिवार की परवरिश कर सकती है।’’

‘‘ओह सुनीता!’’ जीवन की आँखों में आँसू ही भर आए, ‘‘मुझे मालूम न था कि........।’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं, जीवन!’’ सुनीता गंभीर हो आई, ‘‘मैं भी इस एकाकी जीवन से बेहद तंग आ गई हूँ। मेरे पंख भी तो नीड़ के लिए फड़फड़ाते रहते हैं।’’ सुनीता भी तो उसके आगे बर्फ-सी पिघलती ही गई।

संध्या के पांच बज चुके थे। सुनीता ने सीट से उठकर जीवन की ओर देखा, ‘‘चलें?’’

‘‘चलो!’’ जीवन भी कुर्सी से उठ गया।

आफिस से निकल कर सुनीता अपनी कार के पास आ गई। उसने जीवन के लिए कार का अगला दरवाजा खोल दिया। जीवन के बैठने पर वह कार स्वयं ही चलाने लगी। जीवन ने पूछा, ‘‘हम किधर जा रहे हैं?’’

‘‘नीड़ की ओर।’’ सुनीता उसे देख कर मुस्करा दी, ‘‘आखिर नीड़ के पंछी भी तो शाम घिरे उसी ओर उड़ा करते हैं न।’’

और वह सफेद एंबेसेडर कार सुनीता की ससुराल की दिशा में दौड़ने लगी। ’’’

----

9-वी, एस रोड, बाई पास

गोदाम सर्किल, जयपुर (राज.)

--------------------.

COMMENTS

BLOGGER
---*---

-----****-----

|नई रचनाएँ_$type=complex$tbg=rainbow$count=6$page=1$va=0$au=0

विज्ञापन --**--

|कथा-कहानी_$type=complex$tbg=rainbow$au=0$count=6$page=1$src=random-posts$s=200

|हास्य-व्यंग्य_$type=blogging$au=0$count=6$page=1$src=random-posts

-- विज्ञापन --

---

|लोककथाएँ_$type=complex$tbg=rainbow$au=0$count=6$page=1$src=random-posts

|लघुकथाएँ_$type=list$au=0$count=5$com=0$page=1$src=random-posts

|काव्य जगत_$type=complex$tbg=rainbow$au=0$count=6$page=1$src=random-posts

-- विज्ञापन --

---

|बच्चों के लिए रचनाएँ_$type=complex$tbg=rainbow$au=0$count=6$page=1$src=random-posts

|विविधा_$type=complex$tbg=rainbow$au=0$va=0$count=6$page=1$src=random-posts

 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनमोल विचार अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम दोहे धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध नियम निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बालगीत बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोक लोककथा लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018 सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुविचार सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari undefined
नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3790,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,326,ईबुक,182,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2744,कहानी,2067,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,484,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,87,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,309,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,326,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,48,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,8,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,16,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,224,लघुकथा,806,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,306,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1882,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,676,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,52,साहित्यिक गतिविधियाँ,181,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,52,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: आदमखोर (कहानी संकलन) संपादक - डॉ. दिनेश पाठक शशि - 13 - मंजुला गुप्ता की कहानी : नीड़ के पंछी
आदमखोर (कहानी संकलन) संपादक - डॉ. दिनेश पाठक शशि - 13 - मंजुला गुप्ता की कहानी : नीड़ के पंछी
http://lh4.ggpht.com/-Qg4oWQT7a98/TleI0vN-isI/AAAAAAAAKiM/QumBJahlafI/aadamkhor1%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800
http://lh4.ggpht.com/-Qg4oWQT7a98/TleI0vN-isI/AAAAAAAAKiM/QumBJahlafI/s72-c/aadamkhor1%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800
रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2011/08/13.html
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2011/08/13.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ