शनिवार, 27 अगस्त 2011

आदमखोर (कहानी संकलन) संपादक - डॉ. दिनेश पाठक शशि - 14 - प्रेम दत्त मिश्र मैथिल की कहानी : आत्मदाह

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कहानी संग्रह

आदमखोर

(दहेज विषयक कहानियाँ)

संपादक

डॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’

संस्करण : 2011

मूल्य : 150

प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन

विवेक विहार,

शाहदरा दिल्ली-32

शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा

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आत्मदाह

डॉ. प्रेम दत्त मिश्र मैथिल

‘‘अरे भाई लड़कियों को पढ़ाने-लिखाने और उन्हें योग्य बनाने से क्या लाभ है? खर्च बढ़ाना और हत्या मोल लेना है।’’ ठाकुर दास ने तर्क पूर्ण प्रश्न ‘नारीशिक्षा’ की वकालत करने वाले महानुभावों की मण्डली में किया।’’

ठाकुरदास के प्रश्न को सुनकर ‘नारी-शिक्षा‘ के प्रचार-प्रसारक प्रबुद्धजनों के माथे पर एकदम बल पड़ गया? लोग सोचने लगे कि शिक्षित एवं विचारक प्रगतिशीलता के पक्षधर ठाकुरदास को क्या हो गया है? अभी कल तक घर-घर जाकर कहते-फिरते थे कि फलाने तू अपनी लड़की को स्कूल में पढ़ने क्यों नहीं भेजता है। देख गेंदा ने तो अपनी छोरी का सरस्वती शिशु मन्दिर में नाम लिखा दिया। उसकी देखा-देखी चेता ने भी अपनी बेटी चित्रा को पाठशाला में प्रवेश दिलाने के लिये राजी हो गया है।

‘‘भाई ठाकुरदास! जमाना बदल गया है। लड़का-लड़की सभी समान हैं। सबको पढ़ने-लिखने का समान अधिकार है। पढ़ी-लिखी लड़कियाँ घर का दीपक होती हैं। लड़कों से वे किसी भाँति न्यून नहीं है। लड़कियाँ घर-समाज तथा राष्ट्र उठाने वाली होती है। अतः उनकी अब उपेक्षा करना समाज तथा राष्ट्र की हानी करना है। यदि लड़कियाँ सुशिक्षित होंगी तो समाज तथा राष्ट्र भी सुसम्पन्न होगा। भाई देश एवं समाज में लड़के शिक्षित हों तथा लड़कियाँ अशिक्षित रहें तो सामाजिक विकास नहीं हो सकता। लड़कियों की शिक्षा के बिना विकास अधूरा है।’’ देवीदयाल ने तर्क दिया।’’

‘‘बन्धुवर देवीदयाल जी, आज कल की शिक्षा जैसी है उससे आप भली भाँति परिचित हैं। उससे हमारे परिवार बिखरते जा रहे हैं। घर-घर से सुख-शान्ति पलायन करने लगे हैं जितनी शिक्षित लड़की होती है, वैसा उसके योग्य वर नहीं मिलता, यदि भाग्य से मिल भी जाये तो उसका मूल्य आकाश स्पर्शी होता है। अतः बहुत सी लड़कियाँ असमानों के साथ बंध जाती हैं, जिसका परिणाम गृहकलह है सम्बन्ध विच्छेद, मुकदमेंबाजी, असामाजिक .त्य, भागा-भूगी, जला-जली प्रत्यक्ष देखने में आ रहे हैं, ठाकुरदास ने लम्बी तकरीर दी।’’

‘‘मित्रवर ठाकुर जी, शिक्षा कभी हानिकरी नहीं होती। वह तो सबको सुधारती है, उससे बिगाड़खाते का कोई संबन्ध नहीं। उससे तो लोक कल्याण होता है। हमारी संस्.ति-धर्म-दर्शन नारी पूजा, शिक्षा, समानता समर्थक हैं।

मैत्रायणी, गार्गी, सीता, सावित्री, अनसूया लोपमुद्रा, आदि विदुषी महिलाएँ थीं, जो अद्यावधि हमारे समाज तथा राष्ट्र में आदर्श मानी जाती हैं।’’ गंगा राम ने भाषण दिया।

भैया गंगाराम आप ठीक कह रहे हो, परन्तु आज की शिक्षा सुसंस्कार विहीन है। अन्धी नकल और फैशनी भूत है। जिसके कारण अनाचार यौनाचार, क्रय-विक्रय, उच्छृंखलता, उद्ण्डता आदि की बाढ़ आ गयी है। शिष्टाचार का लोप सा हो गया है। बेटा-बेटी अनुशासन हीन तथा बेलगाम हो गये हैं। घर-घर में ताण्डव हो रहे हैं। इस सब का कारण कौन है? क्या शिक्षा नहीं?’’ ठाकुरदास ने कहा।

‘‘पढ़ी लिखी हजारों लड़कियों के समाज-कुटुम्ब विरोधी कारनामें प्रतिदिन देख रहे हैं। परन्तु शिक्षा का इस में कोई दोष नहीं।’’ धनीराम बोले।

‘‘तो दोष फिर किस का है? क्या माता-पिता का दोष है अथवा समाज का दोष है?’’ ठाकुर लाल ने प्रश्न किया।

नहीं भैया ठाकुर जी, कोई अभिभावक नहीं चाहेगा कि उसका बेटी-बेटी बिगड़े, परिवार टूटे, मर्यादा का लोप होवे, उच्छृंखल अचारहीनता पसरे, साचार पलायन करे, पं. चेता ने समर्थन किया।

आज दहेज व्यापार बन गया है जिसके कारण फूल सी पढ़ी-लिखी लड़कियों की कुगति हो रही है। उन्हें दहेज की बजह से आत्महत्या करनी पड़ती है। देह के व्यापार के लिए बाध्य होना पड़ता है। अमुक की लड़की जला दी गई। फलाने की लड़की दहेज के कारण क्वारी रह गई। तोताराम की लड़की एम.फिल. है, उसे योग्य पति नहीं मिला है, अतः तलाक् हो गया। देवधर की लड़की डीलिट् है, उसको कोई समकक्ष वर नहीं रुचता इत्यादि’’ बुद्धू से बुद्धू मोटर साइकिल, कार, सोना, की माँग करता है। लडके का पिता सामान की बेटीवाले के हाथ में लम्बी सूची थमा देता है। ‘‘लड़का विदेश पढ़ने जायेगा। आप उसका खर्च वहन कर लें, तब हम सम्बन्ध करने की सोचेंगे ऐसी-ऐसी धूर्तता पूर्ण शर्तें लड़के का पिता रखते हैं।

दहेज रुपी भूत जिस से एकबार लग गया, फिर कितने ही ओझा, सयाने तान्त्रिक आदि छुड़ाने की चेष्टाएँ करें वह छूटने का नाम नहीं लेता। हमारे भारतीय समाज की यह विशेषता है कि एकबार कोई कुप्रथा अथवा कुरीति को वह अपना लेता है, तो उसे अपना वह धर्मबना लेता है फिर उसे छोड़ना पाप समझता है। उसे परम्परा मानकर बिना गुण-दोष समय का विचार किये उस पर आँख मूँदकर चलता रहता है। भेड़ चाल है न? कहें भ्राता जोरावर जी ठीक है न?’’ ठाकुरदास ने दलील दी।

‘‘सत् शिक्षा अथवा सद् विद्या कभी बुरी नहीं होती, यह सर्वमान्य सत्य है, किन्तु स्वार्थी धर्म ठेकेदार मौत के सौदागर सही वस्तु (शिक्षादि) को अपने घृणित स्वार्थ सिद्ध के लिये, धर्म आदि के नाम पर, उसकी आढ़ लेकर अपना नि.ष्ट सिद्ध करते हैं भले ही समाज की उनके उस असत् से कितनी ही बड़ी हानि क्यों न हो जाय? पर क्या मजाल कि वे उससे बाज आयें।’’ साधूराम ने अनुमोदन भरे लहजे में समर्थन किया।

‘‘दद्दा साधुराम। देखा आज हमारे देश में दहेज कुप्रथा दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही है। उसके घातक एवं विषैले कुत्सित परिणाम समाज को भोगने भी पड़ रहे हैं। सम्प्रति दहेज एक परम्परा बन चुकी है। उसकी जड़ें लाखों बालिकाओं के बलिदानों से इतनी गहरी तथा पुष्ट हो चुकी है कि उन्हें समाज से उखाड़ फेंकना तो दूर, उन्हें हिलाना भी दुष्कर है।’’

दहेज में दहेज का कारण स्त्रियाँ भी हैं। वे सीता-सावित्री सी बनें तो दहेज दानव देश में नहीं रह सकता। किन्तु हमारा देश लकीर का फकीर है। अतः दहेज की शिकार प्रतिवर्ष हमारी किशोरियाँ होती रहेंगीं। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। जो बीज हमने बोया है उसका फल भी हमें भोगना होगा। ’’’

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68/655, सरस्वती भवन,,

धौली प्याऊ मथुरा।

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