शनिवार, 27 अगस्त 2011

आदमखोर (कहानी संकलन) संपादक - डॉ. दिनेश पाठक शशि - 17 - चरण सिंह जादौन की कहानी : दहेज के लिए

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कहानी संग्रह

आदमखोर

(दहेज विषयक कहानियाँ)

संपादक

डॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’

संस्करण : 2011

मूल्य : 150

प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन

विवेक विहार,

शाहदरा दिल्ली-32

शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा

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दहेज के लिए

श्री चरण सिंह जादौन

अमृत विला आज जगमगा रहा है। हजारों बल्बों के जाल से कोठी ढकी हुई है। कोठी का कोई भी ऐसा भाग नहीं है जो न जगमगा रहा हो। अकेली रोशनी का ठेका ‘‘राजहन्स इलैक्ट्रिकल्स’’ ने 10 हजार में लिया है। आज राय साहब सेठ अमृतलाल के इकलौते पुत्र् जगमोहन लाला का दूसरा विवाह है। आज से डेढ़ वर्ष पूर्व भी ठीक इसी ङ्क्तकार से अमृत विला जगमगाया था जब जगमोहन लाल का पहला विवाह गौरधन दास की पुत्र्ी सरला के साथ हुआ था। अपने क्वार्टर में ही सेठ अमृतलाल का घरेलू नौकर सूखा अमृत बिला की जगमगाहट को देख रहा है।

जगमोहनलाल के ङ्क्तथम विवाह पर वह बड़ा खुश था। विवाह में शामिल हुआ था। परन्तु आज उसे कोई खुशी नहीं है। हो भी कैसे? उसी के सामने ठीक एक माह पूर्व ही तो जगमोहन की पहली पत्नी का देहान्त हुआ था और आज दूसरा विवाह रचाया जा रहा था। बूढ़ा सूखा सब कुछ जानता है। उसने अमृतविला की हर बात को देखा है उसे मालूम है।

जब गौरधनदास सरला का रिश्ता तय करने आये थे। और राय साहब ने दहेज में 20 हजार रुपये व फिएट कार माँगी थी। गौरधनदास के एक पुत्र् व एक पुत्र्ी कुल दो सन्तानें थी। काफी सम्पत्ति तथा नगद उसके पिता छोड़ गये थे। वे स्वयं भी सोने-चांदी का कारोबार करते थे, वे सरला को अच्छे घर में व्याहना चाहते थे। गौरधनदास ने 20 हजार रुपये तथा फिएट कार की शर्त पर रजा मन्दी दे दी।

दिन गुजरते रहे विवाह की तिथि नजदीक आयी तैयारियाँ आरम्भ हो गई थीं कि तभी एक दिन गौरधनदास चांदी का एक बड़ा फायदे का सौदा कर बैठे परन्तु स्थिति आशा के विपरीत बनी और उन्हें कुल डेढ़ लाख का घाटा हुआ। घर का सारा नगद तथा पत्नी के आभूषण एवं अन्य कई चीजें बेचकर भुगतान तो पूरे कर दिए परन्तु अब सरला की सादी के लिए तो रुपया चाहिये था। अब केवल रहने की कोठी ही बची थी। उन्होंने उसे भी सेठ कुण्डामल को बेचकर 35 हजार ङ्क्ताप्त कर लिए। शादी की सारी तैयारियां पूरी की हुईं। अब दहेज के रुपये तथा कार देने के केवल 20 हजार रुपये बचे थे। फिएटकार और चाहिए थी। विवाह की रस्में पूरा होते ही रायसाहब ने दहेज के रुपये तथा फिएट कार माँगी तो गौरधनदास 20 हजार रुपये देते हुए बोले थे ‘‘कार नहीं है शीघ्र ही दे दूंगा,’’ परन्तु रायसाहब 20 हजार रुपया ब्रीफकेश में डाल कर बिगड़ने लगे और तुरन्त कार देने को कहा। गौरधनदास ने हाथ जोड़कर असमर्थता ङ्क्तकट की परन्तु राय साहब कहाँ मानने वाले थे वे और अधिक बिगड़ने लगे फिर गौरधनदास ने अपने व्यापार में घाटे की सारी कहानी कह डाली थी। परन्तु रायसाहब को इससे क्या उन्हें तो फिएट कार चाहिए थी। वे लड़की को कभी न भेजने की धमकी देकर लड़की को विदा कर ले गये।

पुत्र्ी की विदा के बाद गौरधनदास ने दहेज की फिएट कार चुकाने की कसम खाई। परन्तु अब पुराना व्यवसाय फिर आरम्भ कराने के लिए तो पूंजी थी नहीं। अतः उन्होंने एक कपड़े की दुकान पर नौकरी कर ली, एक कमरे में किराये पर रहने लगे थे। 100 रु. वेतन से अपनी, पत्नी तथा बेटा श्याम तीनों का मुस्किल से पेट भर पाते थे। श्याम इस समय 9वीं कक्षा में पढ़ रहा था कि तभी श्याम को कैन्सर ने घेर लिया। कुछ दिन उपचार के बाद डाक्टरों ने बम्बई में आपरेशन कराने की सलाह दी। परन्तु गौरधनदास के पास तो कुछ भी नहीं था। अन्त में विवश होकर गौरधनदास ने सरला को श्याम के बारे में लिखा। परन्तु राय साहब ने आर्थिक सहायता देना तो दूर रहा सरला को आने भी न दिया। आखिर सरला बीमार भाई को देखने आने के लिए छटपटाती ही रह गई और एक दिन श्याम ने दम तोड़ दिया।

श्याम की माँ श्याम का गम न सह सकी और जोर की बीमार पड़ गई। दवा दारु होने का तो ङ्क्तश्न ही नहीं था। और एक दिन वह भी चल बसी। बेचारे गौरधनदास अपनी 70 वर्ष की उम्र में अब और कितना दुख सहते उनके जीने के लिए दुनिया में अब रह ही क्या गया था। उन्होंने एक दिन एक पत्र् सरला को लिखा, लिखकर उसे डाक में डाल दिया और स्वयं भारी मात्र में नींद की गोलियाँ खाकर आत्महत्या कर ली। पत्र् में उन्होंने लिखा था-

बेटी सरला।

हाँ बेटी में दोषी हूँ कि बाप होते हुए भी श्याम के इलाज के लिए पैसा न जुटा पाया और इलाज के अभाव में श्याम चल बसा। और एक सप्ताह बाद तुम्हारी माँ भी मुझे छोड़कर श्याम के पास चली गई। मैं अब जीकर क्या करुँगा। मैं भी तुम्हारी माँ तथा श्याम के पास जा रहा हूँ। तुम्हें पत्र् पढ़कर दुःख हुआ होगा। मुझे माफ कर देना।

तुम्हारा पिता, गौरधनदास।

पत्र् पढ़कर सरला पछाड़ खाकर गिर पड़ी और बेहोस हो गयी थी। उसे उठवाकर कमरे के कोने में पड़ी चारपाई पर डाल दिया गया। 4 दिन बाद होश आया तो उसे वही दहेज की कार के ताने जो डेढ़ बरस से सुनती आ रही थी फिर सुनने को मिले। रोना आता तो रोने भी नहीं दिया जाता था। आखिर बीमार पड़ गई। सारा काम कराया जाता। दवा की तो बात दूर रही पानी को भी पूछने वाला कोई नहीं था। हालत गिरती ही गई। आखिर एक दिन उसने भी आँखें हमेशा-हमेशा को मूंद लीं। पूछने वाले से कह दिया गया कि हार्ट की मरीज थी। हार्ट फेल हो गया। बहुत उपचार के बाद भी न बचाई जा सकी। बाद में सरला के कमरे में साफ करते समय सूखा को 2 पत्र् पड़े मिले थे। एक पत्र् तो सरला के पिता ने सरला को लिखा था तथा दूसरा सरला ने मृत्यु से कुछ दिन पूर्व अपनी किसी सहेली को लिखा था। परन्तु पत्र् डाक में न डाल सकी थी। पत्र् मे सरला ने अपनी शुरु से आखीर तक कहानी लिख डाली थी अन्त में लिखा था -

बहिन मैं एक अभागी नारी हूँ जिसकी खुशियों के लिए उसके माँ-बाप और भाई को अपनी जान की कुर्बानी देनी पड़ी परन्तु फिर भी जिसे पति तथा ससुराल वालों का प्यार न मिल सका। माँ-बाप अपनी लाड़लियों को बड़े घरों में सुख के लिए देते हैं परन्तु दहेज के भूखे इन मनुष्य रुपी भेड़ियों के यहाँ केवल पैसे को स्थान है। इन्सान को नहीं। यदि समाज में यह दहेज ङ्क्तथा इसी ङ्क्तकार रही तो बहन मेरे परिवार की भाँति अनेक परिवार दहेज की खातिर कुर्बान होते रहेंगे। बहिन विवाह से पूर्व जब हम लोग समाज सेवा के कार्य करते थे तब हम तुम दहेज ङ्क्तथा के विरुद्ध लड़ने के लिए गोष्ठियाँ किया करते थे। तब मुझे क्या पता था कि मुझे खुद इस कुङ्क्तथा का शिकार होना पड़ेगा। काश! यह दहेज कुङ्क्तथा न होती तो मैं भी आज माँ-बाप और भाई के साथ जीने का अधिकार रखती। खैर बहिन तुम इस सम्बन्ध में जरुर कार्य करना ताकि भविष्य में मेरे जैसी अन्य बहिनों के साथ अन्याय न हो सके।’’ तुम्हारी आभागी बहिन सरला।

और आज राय साहब सेठ अमृतलाल के पुत्र् जगमोहन लाल का दूसरा विवाह 31 हजार रुपये व फिएट कार के साथ हो रहा है.......। ’’’

युवा सुरभि,

जनरल गंज, मथुरा।

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