सोमवार, 22 अगस्त 2011

नये पुराने - मार्च 2011 - 9 : बुद्धिनाथ मिश्र की रचनाधर्मिता पर समीक्षाएँ


नये पुराने

(अनियतकालीन, अव्‍यवसायिक, काव्‍य संचयन)

मार्च, 2011

बुद्धिनाथ मिश्र की रचनाधर्मिता

पर आधारित अंक

कार्यकारी संपादक

अवनीश सिंह चौहान

संपादक

दिनेश सिंह

संपादकीय संपर्क

ग्राम व पोस्‍ट- चन्‍दपुरा (निहाल सिंह)

जनपद- इटावा (उ.प्र.)- 206127

ई-मेल ः abnishsinghchauhan@gmail.com

सहयोग

ब्रह्मदत्त मिश्र, कौशलेन्‍द्र,

आनन्‍द कुमार ‘गौरव', योगेन्‍द्र वर्मा ‘व्‍योम'

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समीक्षा

जाड़े में पहाड़

इतनी छोटी-सी पुर्जी पर कितनी बात लिखूँ

श्यामसुन्दर निगम

नवगीत-संग्रह ‘जाड़े में पहाड़’ के यशस्वी गीतकार हैं बुद्धिनाथ मिश्र। वह ऐसे गीतकार हैं, जिनका परिचय ही कभी दो पृष्ठों से कम में समेटा न जा सके। भ्रम होने ही लगता है कि यह गीतकार बड़ा है या इसके गीत। यहाँ-वहाँ कहाँ नहीं है यह। ये भी, वो भी। यानी कि क्या नहीं लिखता है यह गीतकार। सो मैंने ‘जाड़े में पहाड़’ संकलन की सैंतीस रचनाओं में अपनी अर्थपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराती गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र की ‘कहन’ से अपने मन को जोड़ने की कोशिश की और तब मैंने पाया कि इसमें रचनाओं का चयन इतना पुष्ट और वैविध्यपूर्ण है कि गीतकार के कई शेड्स सामने आते हैं। जिससे लगता है कि रचनाकार ने ‘ग्रामदेवता’ के समान ही ‘विष पीकर अमृतदान किया है।’ तभी तो आम आदमी की आँखें खोलने की कोशिश में गीतकार निडर होकर सीधे सत्ता पर चोट करता है-

पतझड़ चारों ओर/ सिर्फ इस नगरी बसे बसन्त।

जमींदार है दिल्ली/ बाकी रैयत सारा देश।

आज शिक्षा के प्रसार एवं राजनैतिक-सामाजिक चेतना के चलते ‘दो बैलों की जोड़ी’ और झोपड़ी को पीछे छोड़कर आगे बढ़ आई जनता का दिमाग इतना ट्यूण्ड है कि वह सत्ताधारियों के सारे हथकण्डे पहचानने लग गयी है- "संसद है अय्याशों का घर, जनता कहती/ इसमें रहते तीनों बन्दर, जनता कहती।" इतना ही नहीं, यह जनता अब उन्हें आगाह भी करने लगी है कि-

लेकर नाम देश सेवा का जाने क्या-क्या करते हो जी

फट जायेगा पेट तुम्हारा, इतना काहे भरते हो जी?

गीतकार एक सजग और ईमानदार साहित्यकार का फर्ज भी निभाता है। इन भकोसुओं की संवेदनहीनता को नंगा करता है। क्या है कि पूरा गाँव जल कर राख हो जाता है। राहत की आस लगाये बड़ वृक्ष के नीचे बैठे-बैठे न जाने कितना समय कट जाता है। रचनाकार चिन्ता करता है- "टी॰वी॰ आया, पेपर आया/ जिसने सुना, दौड़कर आया/ केवल अपनी रजधानी से/ कोई नहीं देखने आया।" वह आने वालों को भी पैनी नजर से देखता है। देखता है कि जो आये हैं वे सब व्यापारी हैं। प्रकारान्तर से अपने- अपने हित साधने आये हैं। और हित साधन भी एक ही- टका धर्म, टका कर्म। यह चिन्ता तो शायद मिश्रजी जैसे गीतकार को ही करनी है कि-

दीनाभद्री, आल्ह, चनैनी/ विहुला लोरिक भूत हुये।

नये प्रेत के सौ-सौ चैनल/ बोलें बोली सड़कों पर।

हम अपनी जड़ों से कट रहे हैं। लोक साहित्य लुप्त हो रहा है। हमारी सांस्कृतिक विरासत के सामने आ खड़ी हो रही चुनौतियाँ बेढंगा उद्वेलन पैदा कर रही हैं। लोक-लाज नये ढंग से परिभाषित हो रही है। कवि की चिन्ता में यह खटका भी पैठा हुआ है-

नामर्दी के विज्ञापन से/ पटी पड़ी दीवारें

होड़ लगी है कौन रूपसी/ कितना बदन उघारे।

पिछड़ेपन की बात/ कि लज्जा नारी का गहना है।

मुझे लगता है कि कवि ने आज के परिवेश में बड़ी साधारण-सी हो चली बातों को पूरी गम्भीरता से अपने पाठक तक सम्प्रेषित किया है। किन्तु इस गीतकार ने लोक संस्कृति, लोक चित्रण और गवई जीवन तथा वहाँ की माटी-हवा-पानी से रचे-बसे आत्मीय सम्बन्धों की उष्मा की अभिव्यक्ति में अपेक्षाकृत ज्यादा स्वाभाविक उपस्थिति दर्ज करायी है। यहाँ से जुड़ी रचनाओं के पाठ से लगने लगता है कि गीतकार ने इन्हें कोई प्रयास करके या योजना बनाकर नहीं लिखा है बल्कि यह उसके खुद के जीवन का हिस्सा है। वह स्वयं शब्द-शब्द में उपस्थित है और ये गीत इसका प्रमाण हैं। कुंठा, निराशा, तृप्ति, अतृप्ति, खोना-पाना आदि सब के सब वहीं आस-पास फदर-फदर करते घूम रहे हैं। यह गीतकार का कौशल नहीं, अन्तर्ज्योति है जहाँ घटाटोप अन्धेरे में उनके अभीष्ट स्वयमेव दिपदिपाते हैं। और ऐसे ही क्षणों में कवि के भीतर टीस उठती है- "पेड़ जिनकी छाँह में/ सुख-दुख सभी काटे/ अब सलीबों की तरह/ दिखते पठारों पर।" साथ ही यह भी कि- "भरी दुपहरी/ पानी-पानी चिल्लाती है/ बेपर्दा हो नदिया गहरी/ भरी दुपहरी।" पेड़, नदी मात्र प्रतीक हैं। इनका मानवीकरण सुधी पाठकों को करना होगा। उनसे जुड़ना होगा। उनकी बेपर्दगी को महसूस करना होगा, वह भी भरी दुपहरी में।

आत्मीय संबन्धों में दिखती किसी खोट को मिश्रजी अपने ढंग से निरावृत करने में नहीं चूकते। समर्पित बीज-सा धरती में गड़े-गड़े ही अपनी सार्थक भूमिका अदा करते हैं आप। नव संस्कृति के पुजारी बेटों पर तंज ही तो है यह-

इतनी छोटी-सी पुर्जी पर/ कितनी बात लिखूँ?

काबिल बेटों के हाथों/ हो रहे अनादर का।

पर माँ तो माँ ही है। वह तो लघुता में विराट और विराट रूप में छोटी-सी पुलकन बन कर आस-पास रहती है। उसकी अपनी गरिमा है, अपना स्थान है, उसके पास है ममता का अक्षय पात्र-

फूलों से भी कोमल/ शब्दों से सहलाती है

मुझे बिठाकर राजहंस पर/ सैर कराती है।

मिश्रजी ने बड़ा कोमल चित्त पाया है। मौसम की बेरहमी-बदमिजाजी उन्हें झिंझोड़ती है। वे नदी की बाढ़ को, उसकी विभीषिका को अपने स्पेशलाइज्ड अंदाज में व्यक्त करते हैं, जिसमें चेहरे और चित्र साफ दिखते हैं। यथा-

बेजुबान झोपड़ियाँ/ बौराये नाले/

बरगद के तलवों में/ और पड़े छाले।

अँखुआये कुठलों में/ मडुवा के दाने

कमला को भेंट हुए/ ताल के मखाने।

बालो पंडितजी की मड़ई/ डुबो गयी।

अबकी फिर बागमती/ घर आँगन धो गयी।

अतिवृष्टि में घर-बार डूबता है, फसल बह जाती है, अनाज सड़ जाता है। कवि पीड़ित हो उठता है। जबकि अनावृष्टि उसे बहुत अधिक विचलित कर देती है-

सुन्नर बाभिन बंजर जोते/ इन्नर राजा हो!

आँगन-आँगन छौना लोटे/ इन्नर राजा हो!

कितनी बार भगत गुहराये/ देवी का चौरा?

भरी जवानी जरई सूखे/ इन्नर राजा हो।

कवि के अवचेतन में जहाँ एक ओर भावात्मक चिन्तन की यह तस्वीर टँकी है- "वक्त कभी माटी का, वक्त कभी सोने का/ पर न किसी हालत में/ यह अपना होने का।", वहीं वह कटु यथार्थ के पृष्ठ भी खेलता है- "घर की बात करें वे, जो घर वाले हैं/ हम फुटपाथों पर बैठे, क्या बात करें।" मूलभाव के रूप में कवि के अन्तस में अवस्थित आशावादी सोच इन रचनाओं में कई जगह सहज ही उभर जाती है। संतालियों का भोलापन, छल-फरेब से उनकी दूरी, उनका सहज विश्वासी स्वभाव, उन्हें सुखी और सन्तुष्ट बनाये रखता है। वे जहाँ रहते हैं उनके लिए वही काशी है। काशी वस्तुतः कवि के मन में भी स्थान बनाये हुए है। और इसीलिए कवि का भरोसा एवं विश्वास बना हुआ है- "भोर के गये पंछी/ संझा को लौटे घर/ अंधकार से लड़कर/ ज्योति की ऋचा बनकर/ बन्दन कर बापू का/ माँ का पाँलागन कर/ हल्दी के लेप से/ निशा का मुख चर्चित कर/ मन का आकाशदीप जल उठा।"

कुल मिलाकर मिश्रजी की रचनाएँ सामाजिक सरोकारों, मानवीय मूल्यों, प्रकृति एवं प्रेम की मधुर अभिव्यक्तियाँ हैं।

 

समीक्षा

शिखरिणी

बरगद की छाँव है शिखरिणी

भारतेन्दु मिश्र

जैसे किसी बटोही को भरी दुपहरी में चलते-चलते बरगद की छाँव मिल जाये, बुद्धिनाथ मिश्र की गीत पुस्तक ‘शिखरिणी’ कुछ ऐसी ही लगी। एक से एक नायाब गीत अपनी समकालीनता से ‘शिखरिणी’ को पठनीय बनाते हैं, छांदसिक गठन और भाषा का लालित्य यहाँ देखते ही बनता है। इन गीतों में घर-परिवार दाम्पत्य तथा लोकजीवन की मार्मिक छवियाँ हैं, गाँव जवार और प्रकृति के स्वाभाविक बिम्ब कवि की पैनी सम्वेदना से टकराकर नयी अर्थलय का निर्माण करते हैं। समकालीनता इन सभी गीतों की पहली शर्त है। उदारीकरण शीर्षक गीत में बुद्धिनाथ मिश्र कहते हैं-

काट लेना पेड़ बरगद का खुशी से

नाश या निर्माण कर अधिकार तेरा

तू चला बेशक कुल्हाड़ी, किन्तु पहले

पाखियों को ढूँढने तो दे बसेरा।

आज जहाँ छोटे-छोटे मंचों पर पहुँचने के लिए लोग लगातार साजिशें करने में लगे हुए हैं वहीं कुछ ऐसे भी रचनाकार हैं जो स्वयं को स्थापित करने के लिए समझौते नहीं करते। बुद्धिनाथ मिश्र भी ऐसी ही ‘शिवेतरक्षतये’ वाली परम्परा के सिद्ध गीतकार हैं। ऐसे रचनाकार को अपनी अस्मिता का बोध होता है। कवि कहता है-

जिन्दगी यह एक लड़की साँवली-सी

पाँव में जिसने दिया है बाँध पत्थर

दौड़ पाया मैं कहाँ उनकी तरह ही

राजधानी से जुड़ी पगडंडियों पर।

मैं समर्पित बीज-सा धरती गड़ा हूँ

लोग संसद के कंगूरे चढ़ गये हैं।

नकली प्रगति और नकली प्रगतिवादियों से कवि बखूबी परिचित है। असल में गीत रचना हँसी खेल नहीं है। इन शताधिक गीतों की रचनाधार्मिता संस्कृत के महान कवियों से लेकर विद्यापति के लोक गीत वाले संस्कार से परिपूर्ण होकर आज के समय की विसंगतियों पर हस्तक्षेप करती है। यही कारण है कि कवि के इन गीतों में अनुभवों की एक समृद्ध सांस्कृतिक परम्परा दिखायी देती है। इन गीतों के पाठ अनेक स्तरों पर व्याख्यायित किये जा सकते हैं। कई दशकों का कालखंड कवि ने अपने गीतों में जिया है। छन्दोबद्ध कविता में सपाट ढंग से वैचारिक यथार्थ नहीं झलकता किन्तु अच्छे गीत में वैचारिक आन्दोलन खड़े करने की क्षमता अवश्य विद्यमान रहती है। इसीलिए बुद्धिनाथ मिश्र पुस्तक की भूमिका में कहते हैं- "गीत ही कविता का शिखर है।" श्रेष्ठ गीतकार पारम्परिक विषयों में पुनराविष्कार करते हुए नयी छन्द योजना से कविता को नया संस्कार देता है। कभी नवीनतम विषय वस्तु के बेहद पारम्परिक बिम्बों-छन्दों के माध्यम से प्रकट करता है। छन्द नया हो या पुराना कवि का उद्देश्य तो आधुनिक जीवन की सम्वेदना को नयी भाषा देना है। इस नयी काव्य भाषा की लय को साध पाना सबके बस की बात नहीं है। शिखरिणी के गीत इस रूप में सफल हैं। संस्कृत के प्राचीन कवियों ने शिखरिणी छन्द में श्रेष्ठ कविताई की है। शिखरिणी छन्द माधुर्य गुण का पर्याय माना जाता है। दूसरी दृष्टि से सिर पर चढ़कर बोलने वाली कविता को शिखरिणी कहा जा सकता है। कवि के अनेक गीतों में माधुर्य की व्यंजना सिर चढ़कर बोलती है-

मेरे कन्धों पर सिर रखकर

तुम सो जाओ

ओ मेरी मंजरी आम की।

ञ्ञ् ञ्ञ्

रात हुई है चुपके-चुपके

इन अधरों से उन अधरों की

बात हुई चुपके-चुपके।

प्रणय की सम्वेदना शाश्वत है भले ही उसकी अभिव्यक्ति भाषा और भंगिमा नयी क्यों न हो। कवि अपने समय को भी लगातार अपने रागात्मक काव्यानुभवों से रेखांकित करता चलता है। चूँकि ये गीत कवि ने अनेक दशकों में रचे हैं इसलिए सम्वेदना की सूक्ष्म दृष्टि के अनेक रूप यहाँ साफ दिखायी देते हैं। इन्हीं गीतों में बाजारवाद और भौतिकता के विज्ञापन का विरोध भी साफ देखा जा सकता है।

यह कैसा विनिमय था

पगड़ी दे कौपीन लिया

शहरी विज्ञापन ने हमसे

सब कुछ छीन लिया।

आज के दौर में कवि सम्मेलनों का रूप अत्यन्त घृणित हो गया है। कवि के अनुसार कवि सम्मेलनों में कविता ही नहीं बेची जाती बल्कि जिस्मफरोशी के धन्धे और हथकंडे भी अपनाये जाने लगे है। सार्थक कविता का चेहरा कवि सम्मेलनों में बेमानी हो गया है-

बोटी-बोटी कविता बिकती

इस बस्ती की दूकानों पर

मंचों पर परदे के पीछे

जिस्म बेच पगुराये कोई।

सार्थक कविता की खोज में कवि समकालीन विसंगतियों को कुरेदकर जाँचते-परखते हुए आगे बढ़ता है। गीतकार के लिए यह यात्रा तलवार की धार पर चलने से कम कठिन नहीं है। इस दृष्टि से बुद्धिनाथ मिश्र अपने समय के सफल गीतकार हैं। जनतन्त्र की चिन्ता में ‘जनता कहती’ जैसे गीत में कवि कहता है-

संसद है अय्याशों का घर/ जनता कहती।

इसमें रहते तीनों बन्दर/ जनता कहती।

एक दूसरी कविता है-

खुली-खुली राहें थीं जिन पर

मिलते थे हम गले कभी

अब तो कर्फ्यू है, दंगे हैं

मिलती गोली सड़कों पर।

उल्लेखनीय है कि ऐसे कुछ बन्दर ही इस समय देश के भाग्य विधाता हैं। बुद्धिनाथ मिश्र जिस मिथिलांचल से आते हैं वहाँ विकास का प्रश्न जिस घिनौनी जातीय राजनीति के चक्रव्यूह में खो गया है कवि को उसका भी पता है। इसीलिए वह ओजस्वी स्वर में राष्ट्रीय महत्व के प्रश्न उठाने से नहीं चूकते। यह अलग बात है कि हमारे समाज के ठेकेदार सब कुछ जानते हुए भी कुछ करने की स्थिति में नहीं है या सजग नहीं है और राष्ट्रीय नेतृत्व का चरित्र पतन के गर्त में डूब गया है।

आज राजनीतिज्ञ जिस विकास की बात करते हैं वह कहीं दिखायी नहीं देता। पिछड़े-दलित और निरक्षर लोगों का जीवन कठिन से कठिनतर होता जा रहा है। ज्यादातर नवधनाढ्य वर्ग विकसित हुआ है। ‘शिखरिणी’ के गीत ओज-उत्साह, माधुर्य गुणों द्वारा व्यापक दृष्टि से जनहित की वकालत करते हैं। कवि अपनी खोजी दृष्टि से सम्वेदना की गिलहरी को खोजने में सफल रहा है-

भरी दुपहरी/ मारी-मारी फिरे डाल पर।

पतछाँही के लिए गिलहरी।

‘शिखरिणी’ बुद्धिनाथ मिश्र का दूसरा काव्य संग्रह है। संग्रह के गीत जीवन, अतीत व विसंगतियाँ अनुभव एवं सोच के साथ गहराई से शब्द पकड़ते हैं। कवि मानता है कि कविता स्वयं एक वक्तव्य होती है इसलिए उसने पहले संग्रह (जाल फेंक रे मछेरे!) में आग्रहों के बावजूद कोई वक्तव्य नहीं लिखा था लेकिन विज्ञापन युग ने एक अजीब-सी हवा बाँध दी है जिसका समर्थन और खंडन अनिवार्य हो जाता है। मैथिल होकर भी उनकी कविताएँ हिन्दी में हैं इसके पीछे एक कारण है कि हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है जो अंग्रेजी को टक्कर दे रही है। वे मानते हैं कि समय किसी का इन्तजार नहीं करता, मगर आज का विकास एक ऐसी सड़क है जो मंजिल तक नहीं पहुँचाती। सुनामी लहर के रूप में विकास आम आदमी को बरबादी का सपना दिखाता है और उसका सबसे बड़ा कारण है नकारात्मक राजनीति का जीवन के पोर-पोर में प्रवेश-

मेरे सुख से वह दुखी है/ मेरे दुख से वह सुखी है

मुझे देख मुस्कुराया/ कोई राजनीति होगी।

कवि का मानना है कि कविता दर्शन या ज्ञान की अहंकारी संरचना नहीं है। गीत काव्याभिव्यक्ति का चरम उत्कर्ष है क्योंकि मानस और नियम दोनों ही इसकी संरचना में शामिल होते हैं और कवि को सर्जक के सिंहासन पर आरूढ़ कराते हैं। कविता सिर्फ पुस्तक के पृष्ठों पर फैलकर सम्पूर्ण नहीं हो जाती है। उसमें जीवन का लोक अयस्क होता है जो इसे धातु का रूप मन के अवचेतन में प्रदान करता है। अलंकृति शब्द-भाव को सम्प्रेषित करते हैं और कविता जीवन की जरूरत से जुड़ जाती है। ...जीवन से मरण तक की यात्रा में साथ रहती है। कवि का मानना है कि गीत और नवगीत में फर्क सिर्फ नये और पुराने का होता है।

‘अक्षरों के शांत नीरव द्वीप पर’ शीर्षक से अपनी भूमिका में कवि कविता, अतीत, विसंगतियोें, साहित्य की वर्तमान स्थिति, बाजारवाद और जीवन सम्बन्धी अनेक सरोकारों को समेटता है। अपनी एक कविता में तो ईश्वर को भी चुनौती देने लगता है-

कभी-कभी जब भूल/ विधाता की मुझको छेड़े

मुझे मुरझता देख/ दिखाती सपने बहुतेरे

कहती-तुम हो युग के सर्जक/ बेहतर ब्रह्मा से

नीर-क्षीर करने वाले/ हो तुम्हीं हंस मेरे।

मगर कविता में एक दुधमई मुस्कान भी गीत बनके जन्म लेती है-

अपनी चिट्ठी बूढ़ी माँ/ मुझसे लिखवाती है

जो भी मैं लिखता हूँ/ वो कविता हो जाती है।

बेहद पठनीय और संग्रहणीय गीतों के लिए कवि को बधाई। सचमुच अकविता के समय में बरगद की छाँव है शिखरिणी। जब गीत वनवास में डोल रहा है उसे राम के रूप में अयोध्या लौटाना साहस की बात है।

समीक्षा

शिखरिणी

गीतविधा का अभिनव शिखर

रामजी तिवारी

श्री बुद्धिनाथ मिश्र का नया गीत संग्रह ‘शिखरिणी’ एक सौ दो प्रतिनिधि गीतों का संकलन है। ‘शिखरिणी’ शीर्षक श्री मिश्र की बहुआयामी सृजनशीलता का सार्थक प्रतीक है। ‘शिखरिणी’ जहाँ एक ओर नारी सृष्टि के श्रेष्ठतम सौन्दर्य का बोध कराती है, वहीं स्वादिष्ट खाद्य और पेय भी है, जहाँ हृदय को छूनेवाली रोमावली है, वहीं गंधवती सुकोमल नव मल्लिका और रस पूरित द्राक्षा भी है। एक प्रतिष्ठित वर्णवृत्त तो है ही। इसका प्रत्येक गीत एक स्वतंत्र चेतना चक्र का परिणाम है और अपनी शब्द संपदा, संप्रेष्य वस्तु, अभिव्यक्ति शैली तथा प्रभावान्विति में दूसरों से भिन्न है। अपनी रचना प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए मिश्र जी लिखते हैं-

अपनी चिट्ठी बूढ़ी माँ/ मुझसे लिखवाती है

जो भी मैं लिखता हूँ/ वह कविता हो जाती है।

यह माँ और कोई नहीं माँ सरस्वती है, जिनकी अदृश्य प्रेरणा से कविता रूपाकार ग्रहण करती है। श्री मिश्र की दृष्टि में कविता वही है जो जिंदगी में रंग भर दे, बाज को कबूतर बना दे, अपने सान्निध्य में कठोर को कोमल बना दे, हँसी के दूधवाले वृक्षों से छंदों के हरे पत्ते तोड़े। बहस के पत्ते उड़ाना उसका काम नहीं है, उसे तो ज्योति की ऋचा बनकर मानव मन के आकाशदीप को प्रकाशित करना है- "अंधकार से लड़कर/ ज्योति की ऋचा बनकर/ मन का आकाशदीप जल उठा।"

‘शिखरिणी’ के सभी गीतों में सांगीतिक समृद्धि की प्रचुरता है। मिश्रजी संगीत के ज्ञाता और मर्मी अभ्यासक हैं। संगीत की सत्ता और व्याप्ति से उनका निकट परिचय है। इसलिए उनके गीतों में संगीत का अपरिचित निर्वाह है। ‘शिखरिणी’ में अनेक स्थलों पर भारतीय संस्कृति की विकास-यात्रा में संगीत अवदानों और विभिन्न राग-रागिनियों का सांकेतिक उल्लेख किया गया है।

मिश्रजी स्पष्ट शब्दों में स्वीकार करते है कि "कविता तभी चिरस्थायी हो सकती है, जब वह छंदोबद्ध हो।" इस नादात्मक जगत में सब कुछ प्रकृत्या लयबद्ध है, तो संगीत का केन्द्रीय तत्व गीत अनर्गल कैसे हो सकता है? लक्षणीय यह है कि ‘शिखरिणी’ के गीत किसी संगीत व्याकरण के निर्देश पर किया गया शब्दों का तोड़-जोड़ नहीं हैं। इनमें कवि अन्तर्जगत का भाववोध, अपनी ऊर्जास्वित त्वरा से समुच्छसित होकर स्वर-लय के सार्थक संयोग से गीत रचता है। इनमें भावित रसोद्रेक की तरलता ही छांदस स्वर धारा बन गई है। इनमें जीवन की लय शब्दों की लय से एकाकार होकर अभिव्यक्त हुई है। इनमें व्यथाबोध की मधुमय सृष्टि अथवा शोक का श्लोकत्व है। श्री मिश्र का छंदबोध प्रयत्नसाध्य न होकर उनकी कलात्मक अभिरुचि, सघन अनुभूति और उद्दाम भावोन्मेष का परिणाम है। इसीलिए ‘शिखरिणी’ के गीतों में वैविध्य, नवता और मौलिकता है। आपने अपने सफल काव्य गीतों के साथ अनेक लोक शैलियों में गीत लिखे हैं जो अपनी प्रभावान्विति में उतने ही श्रेष्ठ हैं। ‘शिखरिणी’ की एक चैती का अंश देखें-

साँसों के गजरे कुम्हलाये, आप न आये।

टेसू बन दहके अंगारे/ झुलस झुलस बाँसुरी पुकारे

बॉहों के गुदने अकुलाये, आप न आये।

वियोगजन्य व्यथाबोध, परिवेश के दंश, प्रतीक्षा में आंतरिक छटपटाहट, निराश मन की विषादग्र पीड़ा का यह बिंबात्मक चित्र अल्पतम शब्दों में गहनतम अनुभूति की मार्मिक अभिव्यक्ति का श्रेष्ठतम उदाहरण है।

‘शिखरिणी’ में श्री मिश्र के कुछ आरंभिक गीत भी संकलित हैं। इस दृष्टि से ‘शिखरिणी’ उनकी काव्ययात्रा का प्रमाणिक विकास-क्रम भी प्रस्तुत करती है। श्री मिश्र ने छठे दशक के उत्तरार्द्ध से गीत-लेखन आरंभ किया। यह कालखण्ड प्रायः मोहभंग का काल था। देश की भ्रष्ट राजनीति ने स्वतंत्रता से जुड़े सपनों पर पानी फेरना आरम्भ कर दिया था। चतुर्दिक व्याप्त भ्रष्टाचार, स्वार्थ, मूल्यहीनता, सांस्कृतिक क्षरण, पाश्चात्य प्रभाव, अवसरवादिता के कारण एक संवेदनशील कवि का व्याकुल होना स्वाभाविक था। इस त्रासद वातावरण में श्री मिश्र का मन बार-बार आहत होता है। सारा परिवेश उन्हें परिवर्तित दिखाई पड़ता है-

सूर्य लगे अब डूबा तब डूबा

जमीन लगती है धँसती-सी

भोर : हिंस्र पशुओं की लाल आँखें

साँझ : बेगुनाह जली बस्ती-सी।

मेघों से टकराते महलों की

छाँहों में और अभी जलना है।

ऐसे वातावरण में जिन्दगी ‘काले नाग’ की तरह भयावह हो जाती है। यह दुनिया ‘जिंदा लाशों की दुनियाँ’ बन जाती है। ऐसी दुनियाँ का भविष्य और भयावह दिखाई पड़ता है। कवि अनुभव करता है कि यह पूरी सदी विवेकहीन प्रवाह से आवेशित है। इसमें कोई भी अनर्थ असंभव नहीं है। इसका एक कारण यह भी है कि मुक्त सृजन अभिव्यक्ति या प्रतिरोध क्रूरतापूर्वक दमित कर दिया गया है-

हर कलम की पीठ पर/ उभरी हुई साटें

पूछती-हयमेध का/ यह दिन कहाँ काटें।

मंत्र जो जयघोष में पिछड़े/ हुए गुमनाम

यह हँसी चिढ़कर घुटन हो जाय/ मुमकिन है।

इस युग में तमाम विडंबनाओं और विपरीतताओं को झेलता कवि ‘गांधारी जिंदगी’ जीने के लिए विवश है। सरकार विमाता की तरह द्वेषपूर्ण पक्षपात करती है। आज का नेतृत्व इतना भ्रष्ट है कि "जनसेवा है मकड़जाल और देशभक्ति है ढोंग।" भूख-प्यास से मरती जनता के प्रति उदासीन नेतृत्व अपने-अपने स्वार्थो की पूर्ति में लगा है। ईमान धर्म को बेचकर शासक वर्ग क्रूर आंतक के सहारे सर्वतंत्र स्वतंत्र होकर अपनी जमीदारी चला रहे हैं और प्रजा का निर्भय शोषण कर रहे हैं। भारतीय जनतंत्र की घोर विफलता का मर्मांतक चित्र खींचते हुए मिश्रजी लिखते हैं- "स्तब्ध हैं कोयल कि उनके स्वर/ जन्मना कलरव नहीं होंगे/ वक्त अपना या पराया हो/ शब्द ये उत्सव नहीं होंगे/ गले लिपटा अधमरा यह साँप/ नाम जिसपर है लिखा गणतंत्र/ ढो सकेगा कब तलक यह देश/ जबकि सब हैं सर्वतंत्र स्वतंत्र/ इस अवध के भाग्य में राजा/ अब कभी राघव नहीं होंगे।" अधमरे साँप का यह बिंब जहाँ मन में वितृष्णा पैदा करता है, वहीं अपनी आहत और अवशिष्ट जीवनशक्ति से आतंकित भी करता है। ऐसी अवांछित वस्तु को ढोने की विवशता अपने आप में एक त्रासदी है। राघव के कभी राजा न होने की निराशा इस संत्रास को असीम कर देती है। राघव का मिथकीय संकेत भी ध्यातव्य है। रघुवंशी राजाओं के बारे कहा गया है कि उनकी जीवन शैली सामान्य व्यक्ति की होती थी। केवल छत्र और चँवर ही उन्हें सामान्य जन से अलग करते थे। इतनी व्यापक, विशाल और संदर्भगर्भ व्यंजना, इतने अल्प शब्दों में कर पाना गीतकार की चरम सिद्धि है।

‘शिखरिणी’ में सौन्दर्यबोध और स्वस्थ मानवीय प्रेमानुभूति की विलक्षण अभिव्यंजना हुई है। मिश्रजी इन्हें यथार्थ मानवीय बोध से जुड़ी उपकारक जीवनी शक्ति मानते हैं। आप न तो इनका आदर्शीकरण करते हैं और न ही गलदश्रु भावुकता से प्रेरित मानसिक विकृति बनने देते हैं। आप इन्हें सामाजिक संदर्भों में यथार्थ के धरातल पर चित्रित करते हैं। श्री मिश्र के गीतों में प्रेमानुभूति वासनात्मक आसक्ति न होकर जीवन को गतिशील करने वाली प्रेरक शक्ति है। प्रेम संस्कारशील हृदय की पावन अनुभूति है जिसमें बिना किसी प्रतिदान की आकांक्षा किए आत्मदान में तृप्ति का बोध होता है। प्रेमानुभूति का एक क्षण भी आत्मानन्द और आत्मविकास का कारण बन जाता है। मिश्रजी लिखते हैं-

एक प्रतिमा के क्षणिक संसर्ग से/ आज मेरा मन स्वयं देवल बना

मैं अचानक रंक से राजा हुआ/ छत्र-चामर जब कोई आँचल बना।

इस प्रकार का प्रेम निंदित न होकर दिव्य गुणों का प्रदाता होता है। उसकी एकनिष्ठ स्मृति भी व्यक्ति में भव्यता का भाव भर देती है, निष्कलुष और दिव्य बना देती है। श्री मिश्र का अनुभव है-

नये कदली पत्र पर नख से/ लिख दिया मैंने तुम्हारा नाम

और कितना हो गया जीवन/ भागवत के पृष्ठ-सा अभिराम।

‘शिखरिणी’ के गीतों में जनबोध बड़ी प्रबलता से व्याप्त है। इनमें संपूर्ण भारतीय परिवेश अनुस्यूत है। इनमें आम आदमी की विभिन्न भाव-दशाओं का प्रामाणिक अंकन हुआ है। आज का आदमी काँचों की किरचें बिछी सड़कों पर नंगे पाँव चलने के लिए विवश है। वह खुले डाँगर की तरह सबका साधन बन रहा है। हमारे शासक मुँह में कालिख पोतकर होली खेल रहे हैं। यह दुनियाँ जिंदा लाशों की दुनियाँ बन गई है। हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी किसान गरीबी की रेखा के नीचे हैं। जिंदगी का कटु यथार्थ व्यक्त करते हुए मिश्रजी लिखते हैं-

मणिहारे तक्षक-सी/ बस्ती की है नींद हराम

अर्थहीन पैबंद जोड़ते/ बीते सुबहो शाम।

कितना कठिन यहाँ जी पाना/ गिनके चार पहर।

नागफनी का काँटा जब नागफनी को ही चुभने लगे तो भावुक कवि की आँखों का पथरा जाना स्वाभाविक ही है। नगरों में गाँव के सीधे-सादे लोग नरक की यातना भोग रहे हैं, भूख-प्यास से मर रहे हैं, देश का नेतृत्व थोथी बहस में लगा है। मिश्रजी जनभावना को वाणी देते हुए कहते हैं- "लहलहाती नहीं फसलें/ बतकही से/ कह रहे हैं लोग गाँव-गिराँव में।"

श्री मिश्र को गाँवों से गहरा लगाव है। गाँव के ताल-पोखर, खेत-खलिहान, धान-ऊख, सरसों के फूल, उत्सव, संस्कार, सादगी भरा जीवन, गाय, भैंस, बछड़े, वर्षा, शीत, ग्रीष्म, अमराइयाँ, टेसू, मंजरियाँ उन्हें अपनी ओर खींचते रहते हैं और उनके गीतों में अनायास ही अपनी जगह बना लेते हैं। ‘दीनाभद्री, आल्ह, चनेनी, बिहुला, लोरिक जैसी लोक गाथाओं और कजरी, लोरी, चैती, फाग जैसे लोक गीतों के क्रमशः लुप्त होने से मिश्रजी को हार्दिक आघात पहुँचता है। इसीलिए जनशक्ति में क्रान्ति की चेतना भरना चाहते हैं। दुराचार के सागर में डूबती लोकतंत्र की नाव बचाने के लिए जड़ व्यवस्था से बगावत करने का आग्रह करते हैं। ग्राम देवता से आपका आग्रह है-

मुखरित कर अनल राग/ सफलित हो कर्मयाग।

शत शत तुमको प्रणाम/ जय हे जन देवता।

‘शिखरिणी’ के गीतों में श्री मिश्र का प्रकृति प्रेम सर्वत्र उदग्र है। आपके लिए प्रकृति कोई जड़ वस्तु न होकर एक संवेदनशील सत्ता है जो अपनी प्रतिक्रियाओं, मुद्राओं, भंगिमाओं और लीलाओं से मनुष्य के साथ संवाद करती रहती है। मिश्रजी के लिए प्रकृति प्रेयसी, प्रेरणा, सहचरी और स्वामिनी, शिक्षिका सब कुछ है। ‘गंगासागर’, ‘भरी दुपहरी’, ‘पर्वत पर खिला बुराँस’, ‘हवा पहाड़ी’, ‘आर्द्रा’, ‘यह तपन’, ‘नीम तले’, ‘एक किरन भोर की’ जैसे अनेक गीत हैं जिनमें प्रकृति की बहुविध भंगिमाओं का सफल अंकन किया गया है। ‘बागमती’ गीत में प्रकृति के रौद्र रूप का शालीन विवेचन है। भारत के प्राकृतिक ऐश्वर्य को मिश्रजी अन्यतम मानते हैं, उन्हीं के शब्दों में-

यह उल्लास अमृत पर्वों का/ वेणु गुंजरित यह वेतस-वन

कहाँ सुलभ ऐसा ऋतु संगम/ हिम का हास जलधि का गर्जन

मलयानिल सी मंद-मंद बह/ श्रांति थके पथिकों की हरती।

कितनी सुन्दर है यह धरती।

श्री बुद्धिनाथ मिश्र आस्तिक आस्था संपन्न भारतीय संस्कृति के निष्ठावान उपासक हैं। उनकी सांस्कृतिक निष्ठा ही राष्ट्रीय निष्ठा है। वैदिक काल की अविरल गति से प्रवहमान भारतीय संस्कृति की उज्जवल परंपराओं से मिश्रजी आत्मिक स्तर पर जुड़े हैं। पाश्चात्य संस्कृति के हस्तक्षेप से होने वाली विकृतियों से वे मर्माहत होते हैं। ‘शिखरिणी’ के गीत हमारे वर्तमान जीवन का व्यापक परिदृश्य प्रस्तुत करते हैं। इसमें कवि का मूल स्वर आशावादी है। मानव की सृजनशीलता और दैवी विधान में उसकी अटूट आस्था है। कवि का विश्वास है-

किन्तु करती धर्म को आहत/ अनादृत मूढ़ता जब

फूटता ज्वालामुखी/ दिक्काल के आक्रोश का तब।

जल मरा करते/ शिखा को छेड़ने वाले पतिंगे।

इन सभी गीतों में काव्यत्व एक संग्रंथक सूत्र है जो भाव, भाषा, छंद आदि की विविधताओं में भी नित्य अस्तित्ववान रहता है। काव्यत्व इन गीतों का अमृतत्व है जो इन्हें प्राणवान बनाता है। इन गीतों में धरती की गंध, आकाश का खुलापन, नदी का प्रवाह, पर्वत की एकाग्रता, बिंबों की मुक्त लीला और यथार्थ जीवन के अनावृत सत्य को काव्यत्व की शर्त पर कलात्मक संयम के साथ प्रस्तुत किया गया है। इनमें ‘संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदन’ का मणि-कांचन योग है। अपनी बहुविध उपलब्धियों में ‘शिखरिणी’ गीत विधा का अभिनव शिखर सिद्ध होगी।

 

समीक्षा

शिखरिणी

अक्षरों के शान्त नीरव द्वीप पर शिखरिणी

मनमोहन मिश्र

चर्चित और लोकप्रिय गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र के एक सौ दो गीतों के संकलन ‘शिखरिणी’ पर यह टिप्पणी संकलन के समर्पण, आत्मवक्तव्य के शीर्षक और आत्मस्वीकृति के अंश पर आधारित है। समर्पण में बुद्धिनाथजी ने ‘उदात्त, अनुदात्त और स्वरित गीतों के उत्तर फाल्गुनी संग्रह’ वाक्य-पद इस्तेमाल किया है। अर्थात् इस संकलन में उदात्त गीत भी हैं और अनुदात्त गीत भी। पाठक और आलोचक अपनी रुचि और सुविधा के अनुसार अपने काम की चीज इसमें से निकाल सकते हैं। आत्मवक्तव्य का शीर्षक है- ‘अक्षरों के शान्त नीरव द्वीप पर।’ यह शीर्षक उत्तरछायावादी शब्दावली और पद-विन्यास की याद दिलाता है। कवि का आशय यह है कि ये गीत अक्षरों और उनसे बने शब्दों की चुप्पी को तोड़ने के रचनात्मक अभियान हैं। नीरवता को भंग कर जीवन और समाज की हलचलों की गूंज इन गीतों में सुनायी देती है और ये गीत जनता से संवाद बनाते है। बुद्धिनाथ मिश्र के अनुसार "आधुनिकता की लहर और कृत्रिम विकास ने भारतीय समाज की ऋजुता छीनकर उसे जटिल जीवन जीने और उकताकर आत्महत्या करने के लिए बाध्य कर दिया है। साहित्य-संगीत और कला की त्रिवेणी जो उसे आतंरिक शक्ति, आत्मविश्वास और जीवन्तता देती थी, उदारीकरण, बाजारवाद और भूमंडलीकरण के इस प्रथम चरण में ही सूख गयी है। ...साहित्य से रिक्त समाज संवेदनहीन यंत्र-मानवों का हुजूम होता है।" अंतिम वाक्य से किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी, किन्तु पहले वाक्य के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि आधुनिकता की एक ही धारा नहीं है। भारतीय नवजागरण और स्वाधीनता संघर्ष के साथ आधुनिकता की एक धारा जुड़ी हुई है, तो स्वाधीनता के बाद लोकतांत्रिक संघर्षों के साथ दूसरी धारा। तीसरी धारा निराशा और पराजयग्रस्तता की है और चौथी धारा प्रकृति-संहारक विकास की है। इन धाराओं के साथ एक साथ एक ही तरह का ‘ट्रीटमेन्ट’ नहीं किया जा सकता। अब इसके पूर्व कि यह देखा जाय कि बुद्धिनाथ मिश्र ने आधुनिकता की किस धारा के साथ अपने गीतों में किस तरह का ‘ट्रीटमेन्ट’ किया है, उनकी एक और आत्मस्वीकृति पर नजर डाल लेना आवश्यक है- "मेरे अन्दर दो शख्स अपनी विफलताओं से क्षुब्ध होकर हमेशा एक-दूसरे से लड़ते रहते है। एक शख्स वह है जो तीस वर्षों से अधिकारी होकर भी अधिकारी होने का लुत्फ नहीं उठा सका और दूसरा वह शख्स जो प्रतिभाशाली रचनाकार होते हुए भी समय के अभाव में अपनी मंजिल से काफी दूर रह गया। अक्सर एकान्त में अपने रचनाकार की उपेक्षा कर देने के लिए मेरी आत्मा मुझे कोसती है।" इस आत्मस्वीकृति से श्री मिश्र ने अपने पाठकों को असमंजस से उबार लिया है। जहां उन्होंने अपने रचनाकार की उपेक्षा नहीं की है। वहाँ उनके गीतों में उदात्त बिम्ब स्वतः उभरते दिखायी देते हैं। वहाँ कोई चमत्कार नहीं है, कोरी भावुकता या मंच-रिझाऊ कौशल नहीं है। वहाँ जनयथार्थ का स्वाभाविक चित्र है। यद्यपि इन चित्रों में भी रचनाकार का मध्यवर्गीय लोक स्पष्ट है। फिर भी यह लोक अपनी प्रामाणिकता और विश्वसनीयता के कारण वरेण्य है। मसलन, ‘सड़कों पर शीशे की किरचें हैं/ औ’ नंगे पांव हमें चलना है/ सरकस के बाघ की तरह हमको/ लपटों के बीच से निकलना है।" जैसी पंक्तियों को देख सकते हैं। सरकस के बाघ को लपटों के बीच से निकलने के लिए ट्रेनिंग दी जाती है। मास्टर के हाथ का चाबुक या हण्टर सब सिखा देता है। शीशे की किरचों पर नंगे पाँव चलना भी व्यवस्था का अदृश्य मास्टर ही सिखाता है। दोनों स्थितियों का मूल स्वर गहन विवशताभरा है। इसी गीत में बुद्धिनाथजी पूछते हैं, "मन के सारे रिश्ते पलभर में/ बासी क्यों होते अखबारों से/ पूजा के हाथ यहाँ छू जाते/ क्यों बिजली के नंगे तारों से।" दरअसल, बाजारवाद ने सारी सामाजिक परिस्थितियों को उलट दिया है। समस्या यह है कि इसे छोड़ने पर दौड़ में पिछड़ जाने का खतरा है और न छोड़ने पर मनुष्यता की धारा के सूख जाने का भय है। इसलिए वे सचेत रचनाकार की तरह आह्वान करते हैं कि "जीने के लिए हमें इस उलटी/ साँसों के दौर को बदलना है।" इस बदलाव के लिए अपने समय की हलचलों और रास्ते के टीले-पहाड़ों को जानना जरूरी है। श्री मिश्र के कुछ गीत इस ओर स्पष्ट इशारा करते है : "बंसबिट्टी में कोयल बोले/ महुआ डाल महोखा/ आया कहाँ बसन्त इधर है/ तुम्हें हुआ है धोखा।" देशज प्रतीकों के माध्यम से यहाँ विदेशी वर्चस्व का संकेत है जो गीत के शिल्प में व्यंग्यात्मक भी है : "नयाकाबुली वाला आया/ सोनित तक खींचेगा / पानी में तेजाब घोलकर / पौधों को सीचेगा / झाड़-फूँक सब ले जायेगा / आन गाँव को सोखा।" झाड़-फूँक की स्थितियाँ अवैज्ञानिक हैं और अक्षमता तथा अंधविश्वासों पर आधारित हैं। वैज्ञानिक चेतना और समझदारी से उन्हें हल किया जा सकता है। किन्तु जो परिदृश्य है, उसमें अज्ञानता और अंधविश्वासों की स्थितियाँ नहीं है। बस झाड़-फूँक कर ठगने वाला सोखा बदल गया है-देशी की जगह विदेशी सोखा आ गया है।

बुद्धिनाथ मिश्र अपने गीतों में सर्वश्रेष्ठ रंग में वहाँ दिखायी देते हैं, जहाँ लोकराग का बहाव है। जहाँ लोक-संदर्भों का गुंथाव है और जहाँ अपनी जानी-पहचानी धरती की गंध है। बादल, जंगल, आकाश, नदी, मोर, आदि का खूबसूरत इस्तेमाल उनके गीतों को समृद्ध बनाता है। प्रेम कविताएँ मांसलता लिए हुए हैं और उनमें निहित आलम्बन वायवीय नहीं है। बुद्धिनाथजी के गीतों में किसान और मजदूर-जीवन के संदर्भ अपेक्षाकृत कम हैं। लेकिन जहां हैं, वहां ध्यान खींचते हैं। ऐसे स्थलों पर उनकी बिम्ब-योजना में निखार आ जाता है : "धान जब भी फूटता है गाँव में/ एक बच्चा दुधमुँहा/ किलकारियाँ भरता हुआ/ आ लिपट जाता हमारे पाँव में।" यह किसान-जीवन का यथार्थ अनुभव है। धान का फूटना-किसानों के लिए नयी उम्मीदों का फूटना होता है। इन उम्मीदों के विविध संदर्भ हैं। किरण-सी बिटिया चाँदनी का पेड़ रोप देती है, जिसके तले बुढ़ापा विश्राम करता है। किसान जीवन जांगरतोड़ मेहनत का जीवन है। किसानों का जीवन अंतहीन संघर्षों का जीवन है। बुद्धिनाथजी इसे लक्ष्य करते हुए कहते हैं- "धान-खेतों में हमें मिलती/ सुखद नवजात शिशु की गंध/ ऊख जैसी यह गृहस्थी/ गांठ का रस बाँटती निर्बन्ध/ यह गरीबी और जांगरतोड़ मेहनत/ हाथ दो, सौ छेद जैसे नाव में।" दो हाथों से पानी उलीचने और सौ छेदों से नाव में पानी आने के दृश्य की कल्पना कितनी दारुण है।

‘शिखरिणी’ में लोकराग का मुकम्मल गीत है- ‘आर्द्रा’ जिसमें प्राकृतिक संभावनाओं को बड़े ही सलीके से विन्यस्त किया गया है-

घर की मकड़ी कोने दुबकी/ वर्षा होगी क्या?

बायीं आँख दिशा की फड़की/ वर्षा होगी क्या?

लोक विश्वास का ही नहीं, वैज्ञानिक तथ्य का भी यह सुन्दर दृश्य-बिम्ब है। यह पूरा गीत ही संभावनाओं और लोकविश्वासों का समुच्चय है। जीव-जंतुओं में मौसम को सूंघने और पहचानने की प्राकृतिक शक्ति होती है। लेकिन बुद्धिनाथजी पशु-पक्षियों का जब युग-संदर्भ में प्रतीकीकरण करते हैं तब उनका यथार्थबोध अलग आकार लेने लगता है-

आंगन का पंछी चढ़ा मुड़ेरे पर

जंगल को अपना घर बतलाता है

कुछ ऐसी हवा बही जहरीली-सी

सारा का सारा युग हकलाता है।

इन पंक्तियों में कार्य-कारण सम्बन्ध है। जब आँगन का पंछी जंगल को अपना घर बतलायेगा, तब सारे संदर्भ बदल जाएंगे। इसी गीत में एक प्रश्न भी है और वास्तविकता का उल्लेख भी है-

जब इन्द्रधनुष झुककर माथा चूमे

तलवे धो जायें सागर की लहरें

जब शंख जगाये सुबह-सुबह हमको

बतलाओ कैसे हो जाएँ बहरे?

जीवन के व्याकरणों को दफनाकर

भाषा के भ्रम में वह तुतलाता है।

यहाँ अपनी परम्परा का बोध है। जीवन की भाषा और कविता की भाषा में जब भेद होगा, तब कविता ही नहीं, युग भी हकलायेगा।

समीक्षा

ऋतुराज एक पल का

विसंगतियों के बीच संगति की तलाश

रमाकान्त

बुद्धिनाथ मिश्र नवगीत की अब तक हुई यात्रा में एक मजबूत सहयात्री की तरह रहे हैं। वर्तमान शीर्षस्थ नवगीतकारों में उनका विशिष्ट स्थान है। नवगीत को अपना मौलिक शिल्प और सौन्दर्य प्रदान करने वाले श्री बुद्धिनाथ मिश्र की वस्तु भी जीवन जगत की यथार्थ भूमियों से आती है और यह भी कि उसकी प्रस्तुति को वे खुरदरेपन की परिधि से अक्सर बाहर रखते हैं। संभवतः इसी कारण उनके गीत पाठक को आन्दोलित भी करते हैं और विमुग्ध भी। भावों का रेशमीपन मुश्किल से जाता है उनके गीतों से।

श्री बुद्धिनाथ मिश्र के नये गीत संग्रह ‘ऋतुराज एक पल का’ के गीत समय की जड़ता, निरंकुशता और भयावहता के बीच सृजनात्मक संवेदना की प्रस्तुति करते हैं। जीवन को समझदारी के साथ कैसे जिया जाय कि पर्यावरण और सांस्कृतिक परिवेश बचा रहे, सामाजिक विसंगतियाँ दूर हों तथा प्राकृतिक रंगों-चित्रों की अनदेखी न हो- ‘ऋतुराज एक पल का’ के गीतों में मिश्रजी यही तलाशते नजर आते हैं। "सब कुछ अभी नष्ट नहीं हुआ है" के स्वर गीतों में जागृत हैं।

श्री मिश्र मानवीय भूलों और चूकों में भी सृजनात्मकता तलाशते हैं और इस तलाश में प्रकृति पूरा साथ देती है- "राजमिस्त्री से हुई क्या चूक गारे में/ बीज को संबल मिला रजकण तथा जल का।" मानव कितना भी विध्वंसक हो जाय, इस संबल को हटा पाना उसके वश में नहीं। संभवतः यह संबल प्रकृति का है। हम कितना भी थके-हारे या पीड़ित हों, एक पल का ही ऋतुराज सही, वह हमें जीवन्त कर देगा-

क्या हुआ जो धूप में तपता रहा सदियों

ग्रीष्म पर भारी पड़ा ऋतुराज इक पल का।

श्री मिश्र की आशा सदा उनके साथ चलती है। विसंगतियों को रचते हुए भी वे एक रास्ते की खोज में जुटे रहते हैं। उनके विश्वास का शिवाला कहीं भी किसी भी जमीन पर अपना अस्तित्व बनाये रखता है।

मुकुट नहीं है बाबा के सिर/ कांटेदार धतूरे के फल

या रग्घू के गले बताशे/ या फिर राघव के नीलोत्पल

सड़क किनारे बड़े जतन से/ विश्वासों पर टिका शिवाला।

मिश्रजी भोले बाबा की प्रवृत्ति के इसलिए पक्षधर हैं कि वे गरीबों और असहायों के खेवनहार हैं, वर्ना तो बुद्धिनाथ मूर्तिपूजा पाखण्ड और अज्ञान के खिलाफ जान पड़ते हैं। वह चाहते हैं कि धर्म का असली अर्थ सामने आये-

मैं गंगोत्री से गंगाजल/ ला उनका करता हूँ अर्चन

अपने खूंटे की गायों के/ घी से करता हूँ नीराजन।

फिर भी उनकी पलक न झपके/ आँखों से ना आँसू टपके

भक्तों की बेचैन भीड़ में/ मैं पिसता हूँ, वे पुलकित हैं।

ऐसे में श्री मिश्र अपना मनोरथ अच्छी तरह जानते हैं-

मुझ गृहस्थ को दाना पानी/ जुट जाए तो सफल मनोरथ।

तो बुद्धिनाथ बखूबी जानते हैं कि इस धरती पर बहुत से लोग दाना पानी के अभाव में भूख से मर जाते हैं। यह सभ्य और सम्पन्न समाज के लिए चिन्ता का विषय होना चाहिए। पर भरे पेट वाले लोग क्या-क्या करते हुए धन का अपव्यय करते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है।

किसी ईश्वर की तलाश मनुष्य में सदा से ही रही है। इस तलाश में पंडा- पुजारियों, मुल्ला-मौलवियों और पादरियों ने अपनी तरह की मूर्तियाँ गढ़ी हैं और करीब-करीब सारी दुनिया को अनुयायी बना रखा है। इन धार्मिक समूहों के बीच लड़ाई- झगड़े, वैमनस्य और खून-खराबा आये दिन होता ही रहता है। इस गीतकार को भी एक ईश्वर की तलाश है पर उनका ईश्वर ‘मनुष्यत्व’ में निहित है और इसकी उद्घोषणा वे साहस के साथ करते भी हैं-

मेरे समकक्ष न कोई साधू संन्यासी

मेरी स्पर्धा सर्वदा स्वयं ईश्वर से है

उनके दर्शन की जरा नहीं चाहत मुझमें

वह कहाँ नहीं है, यही सवाल इधर से है।

‘देवदार’ गीत के माध्यम से यह कवि पुरानी उपयोगिता के खात्मे के प्रति आगाह करता है। नये जमाने में नये का स्वागत है पर नये किस्म की अराजकता ने भी डरावना परिवेश रच दिया है-

घूम-घूम कह गये गड़ासे हैं

ठीक नहीं ज्यादा हिलना-डुलना

बाँसवनों ने तो दम साध लिया

बंद हुआ बरगद का मुँह खुलना।

जब आश्रय-दाता बरगद को भी मुँह खोलने से डर लगे तो समझा जाना चाहिए कि स्थितियाँ शुभ नहीं हैं। श्री मिश्र अन्याय अत्याचार और विषमता को अपनी पैनी आँखों से देख रहे हैं। दुश्चक्रों की एक लम्बी फेहरिस्त है। तमाम तरह के नारों के बाबजूद समता, समानता और न्याय के लिए अभी ईमानदार प्रयास कहाँ! चारों तरफ धोखा ही धोखा! अयोग्य, नासमझ और भ्रष्ट लोग अभी भी सर्वत्र काबिज हैं-

धरती और गगन का मिलना/ एक भुलावा है

खरपतवारों का सारे/ क्षितिजों पर दावा है।

ये खरपतवार कौन हैं?- इन्हें चिन्हित करना पड़ेगा और इन्हें इनके पदों से बर्खास्त भी करना पड़ेगा। पर अभी यह सब होता नहीं दीखता। भय से सत्य का बुरा हाल है। योग्य, समर्थ चुप्पी साधे हैं। राजा इतना धोखेबाज है कि हर पाँच साल में सत्य और न्याय का चोंगा पहन कर आता है और सभी फँस जाते हैं उसके इन्द्रजाल में। लोकतंत्र में भी जादू की गरिमा कायम है- "हर चुनाव के बाद/ आम मतदाता गया छला/ जिसकी पूँछ उठाकर देखा/ मादा ही निकला।" ऐसे ‘मादाओं’ के सहारे यह देश चल रहा है और आम आदमी है सिर्फ उन्हें वोट देने के लिए, उन्हें चुनने के लिए। उसकी क्या बिसात कि मादा राजाओं से कोई प्रश्न पूछ सके! राजा की माया को समझना इतना आसान भी नहीं- "ऊपर ऊपर लाल मछलियाँ/ नीचे ग्राह बसे/ राजा के पोखर में है/ पानी की थाह किसे।" और यह लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही है कि जिसके जिम्मे सारी प्रजा की रक्षा, सुरक्षा और विकास का दारोमदार है, वह अपनी ही सुख-सुविधा और सनक की खातिर सब कुछ उजाड़े दे रहा है। छोटी कद वाला भी कुर्सी पर बैठने के बाद अजब बर्ताव कर रहा है-

कद छोटा है, ऊँची कुर्सी/ डैने बड़े-बड़े

एक महल के लिए न जाने/ कितने घर उजड़े।

और मजबूरी भी देखिये कि- "वयोबृद्ध भी माननीय कहने को हैं मजबूर।" स्त्री- विमर्श के इस युग में हालात काफी बदले हैं। स्त्रियों की पहले जैसी गुलामी अब नहीं रही, पर श्री मिश्र को उनकी स्वतंत्रता सही दिशा में जाती नहीं दिखती। बाजार के संचालकों की दृष्टि यहाँ भी है। वे स्त्री को भी एक ‘कमोडिटी’ बनाकर पेश कर रहे हैं। पर क्या स्त्री कम दोषी है इसके लिए? वस्तु बनने को वही तो राजी हुई है-

नाप रहा पेड़ों को आराघर/ कुर्सियाँ निकलती हैं इतराकर

बिकने को जायेंगी पेरिस तक/ नाचेंगी विश्वसुन्दरी बन कर।

विश्व सुन्दरी बनने की प्रक्रिया में स्त्री की स्वतन्त्रता का कब उपयोेग (दुरुपयोग) कर लिया गया, इसे शायद स्त्री भी नहीं जानती।

यह गीतकार ‘फटे हाल भारत में’ अपना दुखड़ा किससे कहे? ‘नई इण्डिया’ के तेवर अलग हैं। उसने अपने को ‘भारत’ से अलग-सा कर लिया है और बीच की दूरी बढ़ती ही जा रही है। गरीब भारत जब भी अपनी तंगहाली, बदहाली की बात करता है तो इण्डिया के मुखड़े पर ‘शाइनिंग’ आ जाती है। शाइनिंग इण्डिया की आंकड़ेबाजी भी अबूझ है शेयर मार्केट, सेन्सेक्स और मुद्रा स्फीति की दर से आम आदमी की भूख शान्त नहीं होती। ग्लोबल इण्डिया के अपने तमाशे हैं लुभाने के। अपने लिए रोटी, लंगोटी की मांग करो मल्टीनेशनल कंपनियाँ पेप्सी, कोकाकोला और ऐसी ही कुछ चीजें आपके हाथों को थमा देंगी। आप क्या करेंगे? अपनी गर्मी शान्त कीजिए और इण्डिया को धन्यवाद दीजिए- "चर्चा उसने जरा चलाई/ मंहगाई की थी/ लगे आँकड़े फूटी झाँझ/ बजाने उद्यम की/ उसने मुँह खोला ही था/ खेतों के बारे में/ सौ-सौ चैनल देने लगे/ पिछड़ने की धमकी।" इन पिछड़ने की धमकी देनेवालों की पहचान करके ही कोई भारत और भारतीयता को वापस ला सकता है। अन्धों का जंगलराज कायम है तभी तो श्री मिश्र हमें सावधान करते हैं। भूमण्डलीकरण के इस दौर में विकसित और कथित सभ्य समाज भी अक्सर ‘जंगलराज’ के पार्टनर कब बन जाते हैं, पता नहीं चलता। या पार्टनरशिप एक तरह से मौन होकर बैठने से भी आती है-

घटता जाये जंगल/ बढ़ता जाये जंगल राज

और हाथ पर हाथ धरे/ बैठा है सभ्य समाज

कभी इस देश में गंगो-जमन की संस्कृति की एक ताकत हुआ करती थी। हिन्दू और मुस्लिम प्रेम और भाईचारे के वातावरण में एक दूसरे के सुख-दुख के भागीदार होते थे, पर अब ऐसा नहीं है। बुद्धिनाथजी मुस्लिम आतंकवाद को इसके लिए दोषी मानते हैं। उन्हें लगता है कि यह आतंकवाद, वैचारिक घुसपैठ हिन्दू संस्कृति को नष्ट करने पर आमादा है। यहाँ पर बुद्धिनाथ मिश्र ने बहस के लिए एक मुद्दा उठाया है। पर उन्हें लगता है कि इस्लामी संस्कृति ने हिन्दू संस्कृति को सदा ही चोट पहुँचायी है और हम ‘गंगोजमन’ के नाम पर सदा ही उसका मूल्य चुकाते रहे-

हर तरफ फहरा रही/ तम की उलटबाँसी

पास काबा आ रहा/ धुंधला रही काशी।

इस कवि को हिन्दू संस्कृति की उत्कृष्टता से लगाव है और भारत को वे हिन्दू संस्कृति में रचा-बसा देश मानते है। भारतीय लोग जहाँ-जहाँ गये वहाँ-वहाँ अपने अस्तित्व का लोहा मनवाया। वे ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सूत को पकड़े हुए इस भारतीय भावना को महान मानते हैं। इसीलिए उनकी भारतीय संस्कृति एवं उसके मूल्यों में अगाध श्रद्धा है-

छोटा है भूगोल भले ही/ भारत का इतिहास बड़ा है

नहीं तख्त के लिए आज तक/ हमने सच के लिए लड़ा है।

प्रकृति के विभिन्न रूपों से श्री मिश्र को प्यार है। प्रकृति को देखने, महसूसने की उनकी मौलिक दृष्टि है। वे नदियों, पेड़ों, सूरज, चाँद और मरुथल से भी नाना प्रकार के दृश्य खींचते हैं। वे मस्कवा नदी की मोहक छवि देखकर अभिभूत होते है; परन्तु नदी के अन्दर जो चलता है उसका भी पता है उन्हें- "बहे मस्क्वा नदी/ बाहर मौन भीतर ज्वार।" वहीं ‘पीटर्सबर्ग में पतझर’ उन्हें कई अर्थ देता है। वे वृक्षों को देखकर एक मानव जाति के अस्तित्व की कल्पना में लीन हो जाते हैं-

वे नहीं थे भोजवृक्षों/ की तरह अभिजात

मानते थे वे वनस्पति की/ न कोई जात।

बाजारीकरण ने पूरा देश-काल बदल कर रख दिया है। अब सारे सम्बन्ध, रिश्ते-नाते निभाने के लिए नहीं, दिखावे भर को रह गये हैं। मूल्यों वाला जीवन गायब होता जा रहा है। सब कुछ बिकने को आतुर है। विकास के नाम पर केवल आर्थिक विकास के लिए ही मारामारी है। व्यक्तित्व के अन्य पहलू खोजने से नहीं मिलते। समय का दबाव इतना कि न चाहते हुए भी हम अपने पुराने आधारों को भूलकर कृत्रिम, झूठे व्यवहारों की जद में आ गये हैं। बेटे को बड़ा आदमी बनाना है, समय के साथ चलाना है तो नैतिक मूल्यों वाली कथाएँ बेमानी हैं। पिछड़ने और उपेक्षित होने का जोखिम कौन मोल ले? तभी तो दादी अपने बल्लू के लिए कुछ भी करने को तैयार है-

अपना क ख मिटा-मिटा कर/ ए, बी, सी लिखती

अनजाने फल-फूलों का/ अनुमानित रस चखती

नील कुसुम-सी फबती/ घोर निराशा में दादी।

दादी की निराशा तो स्वाभाविक है पर समय की चलन के आगे वह भी नतमस्तक है। इस प्रकार ‘ऋतुराज एक पल का’ के गीत व्यक्ति, समष्टि और समय की व्यापक पड़ताल करते प्रतीत होते हैं। बुद्धिनाथजी यथार्थ को जस का तस स्वीकार नहीं करते, बल्कि उसमें आवश्यक हस्तक्षेप भी करते जान पड़ते हैं। वे प्रगतिशीलता का नारा मात्र नहीं देते, जरूरी अवयवों की खोज भी करते हैं। उनकी चिन्ताओं में देश है, समय है, समाज है और अलग-थलग पड़ा आम आदमी भी, जिसकी आवाज को आज भी कोई सुनने वाला नहीं। वे धर्म और सम्प्रदाय के पाखण्ड से त्रस्त हैं और एक मानवीय रिश्ते की कमी उन्हें व्याकुल करती है।

इस कृति के गीत सहज, सरल और प्रवाहपूर्ण अभिव्यक्ति देने वाले है। भावों, बिम्बों और शब्दों की जटिलता इस गीत संग्रह में नहीं है। भाषा गीतों को अर्थ और प्रवाह देने वाली सरल और सुबोधगम्य है। ‘ऋतुराज एक पल का’ नवगीतों की शृंखला में अपना विशिष्ट स्थान बनायेगा, ऐसा विश्वास है।

समीक्षा

ऋतुराज एक पल का

दैनिक जीवन की संवेदनाओं का मधुर गायन

लवलेश दत्त

साहित्यकार संवेदनशील होता है। उसकी संवेदना उसकी रचनाओं में स्पष्टतः देखी जा सकती है। उपन्यास, कहानी, कविता जैसी विधाएँ रचनाकार की संवेदनशीलता का ही परिणाम होती हैं। प्रत्येक रचनाकार अपने आस-पास के परिवेश से प्रभावित होकर, संगति-विसंगति को झेलकर ही सृजन करता है। इसी क्रम में बुद्धिनाथ मिश्रजी का गीत-संग्रह ‘ऋतुराज एक पल का’ का नाम उल्लेखनीय है। मिश्रजी को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं। उनकी सशक्त रचनाधर्मिता ही उनकी पहचान है। वे अतिसंवेदनशील हैं। इसकी पुष्टि उनके नवीनतम गीत-संग्रह ‘ऋतुराज एक पल का’ से सहज ही की जा सकती है।

प्रस्तुत गीत संग्रह बुद्धिनाथ मिश्रजी के दैनिक जीवन की संवेदनाओं का मधुर गायन है। उनकी ये संवेदनाएँ राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आदि विभिन्न प्रकार की है। आस-पास के वातावरण से ये संवेदनाएँ पुष्ट होती हैं। अपनी अध्यात्मिक संवेदना का परिचय देते हुए मिश्रजी ने अपने गीत ‘भोले बाबा’ में भगवान् शिव के जीर्ण-शीर्ण मंदिर की व्यथा को अंकित किया है- "सड़क किनारे, बित्ते भर का/ टूटा फूटा खड़ा शिवाला/ उसमें कैसे करें गुजारा/ देवों के असुरों के बाबा।" भगवान् शिव विषपान करके संसार को भयानक संकट से मुक्त करने वाले देव हैं। यह कटु सत्य है कि जो अपना जीवन जनहित में अर्पित करता है, उसे प्रायः उपेक्षा ही सहनी पड़ती है। मिश्रजी का यह गीत इसका स्पष्ट प्रमाण है। आज सबको अन्नरूपी अमृत का पान कराने वाले किसानों की हालत भी शिव जैसी हो रही है। अपनी बदहाली में किसान अपने ही हाथों विष पीने को मजबूर है।

मिश्रजी ने अपने गीतों को जीया है। वे उनमें साँस लेते प्रतीत होते हैं। उनका हर गीत उनके हृदय का स्पंदन है। ‘गृहस्थ’ नामक गीत में वे एक मेहनतकश व्यक्ति की व्यथा को गाते हैं- "मुझ गृहस्थ को दाना-पानी/ जुट जाये तो सफल मनोरथ।" आज जबकि हर ओर झूठ, छल, प्रपंच, भ्रष्टाचार का साम्राज्य दिखाई देता है। ऐसे में मिश्रजी के गीतों के इस संसार में सत्य की प्रतिष्ठा को सर्वोपरि माना गया है। ‘मैं चलता’ गीत में वे लिखते हैं- "मैं चलता/ मेरे साथ चला करता पग-पग/ वह सत्य कि जिसको पाकर/ धन्य हुआ जीवन।" एक स्वस्थ साहित्यकार की यह पहचान है कि उसमें नैतिक आदर्शों का समावेश होता है। तभी तो मिश्रजी अपने काव्य में जीवन-मूल्यों को स्पष्ट अंकित करते हैं- "मैं पलता/ मेरे साथ पला करता मोती/ धर्म का, काम की सीपी में/ सम्पुटित नयन।" गीत के इस उपवन में मिश्रजी की प्राकृतिक संवेदना भी देखते ही बनती है। ‘देवदार’, ‘राजा के पोखर में’, ‘फागुन आया’, ‘पीटर्सबर्ग में पतझर’ जैसे गीत उनकी इसी संवेदना का गायन है-

देवदार हो गये पुराने हैं/ पेड़ नहीं, भुतहे तहखाने हैं

उन बूढ़ी आँखों को क्या पता/ पापलरों के नये छामाने हैं।

आज कम्प्यूटर के युग में व्यक्ति ने अपने आप को एक डिब्बे में बन्द कर लिया है। वह ए॰सी॰ की सुविधा से युक्त कमरे में ही अपनी दुनिया बसाए बैठा है। वह मौसम के आवागमन से बिल्कुल अंजान है। ऐसे में अपने गीत ‘राजा के पोखर’ के माध्यम से वह कहते हैं-

सूखें कभी जेठ में/ सावन में कुछ भीजें भी

बड़ी जरूरी हैं ये/ छोटी-छोटी चीजें भी।

राजनीति आज का सबसे बड़ा विषय है। आज राजनीति से प्रायः सभी प्रभावित हैं। ऐसे में मिश्रजी कहाँ चुप रहनेवाले हैं, वे भी अपनी राजनीतिक संवेदना व्यक्त करते हुए कहते हैं- "हर चुनाव के बाद आम/ मतदाता छला गया/ जिसकी पूँछ उठाकर देखा/ मादा ही निकला/ चुन जाने के बाद हुए/ खट्टे सारे अंगूर!" मिश्रजी मुख्य राजभाषा प्रबंधक रहे हैं। उन्हें मालूम है कि अभिनेताओं की तरह नेताओं का भी संवाद-लेखक कोई और होता है, जो घर चलाने के लिए भूतलेखन करता है। नेताजी का प्रभावशाली भाषण लिखने के लिए उसे चंद रुपये पार्टी से मिलते हैं। उनकी यह पीड़ा इन पंक्तियों में साफ झलकती है-

पूछ रहा है मुझसे प्रतिक्रिया/ अपने भाषण की

जिसको लिखकर पायी मैंने/ कीमत राशन की।

विदेशी कम्पनियों ने भारत में पैर क्या जमाने शुरू किये, यहाँ के उद्योग-धन्धे आदि सब बन्द हो गये, जो कुछ बाकी भी हैं वे भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में विलय होकर अपने अस्तित्व को रो रहे हैं। यहाँ तक कि भारत भी ‘भारत’ न रहकर ‘इण्डिया’ हो गया है। इस संवेदना को गीतकार कुछ यूँ व्यक्त करता है- "फटेहाल भारत ने जब भी/ अर्ज किया दुखड़ा/ नई इण्डिया ने गुस्साकर/ फेर लिया मुखड़ा।" इसी गीत में मिश्रजी ने यह भी दर्शाया है कि आज हिन्दी साहित्य के प्रति लोगों का रुझान कम होता जा रहा है। अंग्रेजी साहित्य पढ़ना व लिखना ‘स्टेटस सिम्बल’ बन गया है। मिश्रजी कहते हैं-

बहुत किया तप-त्याग/ धूप-वर्षा की खेती में

गयी पूस की रात न होगा/ अब गोदान नया।

श्री मिश्र हिन्दी नवगीत के एक चिरपरिचित हस्ताक्षर हैं। वे एक वरिष्ठ कवि होने के साथ-साथ संवेदनशील व्यक्ति भी हैं। यही कारण है कि उनकी दृष्टि बड़ी-बड़ी चीजों की ओर ही नहीं, बल्कि अपने चारों ओर छोटी-छोटी चीजों पर भी गहनता से पड़ती है। वे पीड़ा को देखते नहीं उसे भोगते हैं और तभी जन्म होता है ‘फटेहाल भारत’, ‘जंगलराज’, ‘गंगोजमन’ जैसे गीतों का।

देश में तुष्टीकरण की राजनीति से उत्पन्न सामाजिक असंतोष से व्यथित होकर मिश्रजी कह उठते हैं-

हर तरफ फहरा रही/ तम की उलट बाँसी

पास काबा आ रहा/ धुँधला रही कासी।

मंत्रणा समभाव की/ देते मुझे वे लोग

दीखता जिनको नहीं/ अल्लाह में ईश्वर।

नाव जर्जर खे रही/ टूटी हुई पतवार

अंग अपने ही कटे/ शिवि की तरह हर बार।

हम चुकाते रह गये/ गंगोजमन का मोल

रंग जमुना का चढ़ाया/ शुभ्र गंगा पर।

मिश्रजी ने अपने गीतों के माध्यम से अपनी संवेदना को प्रकट किया है। उन्होंने एक आम भारतीय नागरिक बनकर ये गीत रचे हैं। या यूँ कहा जाय कि ये गीत उनके कंठ से स्वतः फूट पड़े हैं। कहीं कोई बनावटीपन नहीं, जो जैसा है उसे वैसा ही रखा गया है न ही इन गीतों को किसी को प्रसन्न करने के लिए लिखा गया है। ये तो अन्तरात्मा के स्वर हैं, जिन्हें मिश्रजी ने गीतों का आवरण पहनाकर प्रस्तुत किया है। सीधे सरल शब्दों में बात कहना मिश्रजी की विशेषता है और इसलिए मिश्रजी की यह कृति संग्रहणीय एवं पठनीय है।

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