शनिवार, 27 अगस्त 2011

आदमखोर (कहानी संकलन) संपादक - डॉ. दिनेश पाठक शशि - 7- उमाशंकर दीक्षित की कहानी : असली सोना

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कहानी संग्रह

आदमखोर

(दहेज विषयक कहानियाँ)

संपादक

डॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’

संस्करण : 2011

मूल्य : 150

प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन

विवेक विहार,

शाहदरा दिल्ली-32

शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा

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असली सोना

पं. उमाशंकर दीक्षित

 

सेठ करोड़ीमल गुस्से में पागल थे। उन्होंने उन्हें धक्का देकर घर से बाहर धकेल दिया। उनके वहाँ से चले जाने के बाद भी वे बहुत देर तक उन्हीं के बारे में बक्-बक करते रहे। कम्बख्त, बेअकल चले आते हैं, बिना सोचे समझे। आखिर समाज में हमारी भी अपनी प्रतिष्ठा है’ हमारा अपना स्टेटस है। वह फटीचर की औलाद स्कूल का मामूली सा मास्टर। उस बेबकूफ ने अपने अन्दर झाँक कर भी नहीं देखा कि अपनी औकात क्या है? अरे, कहाँ राजा भोज कहाँ कंगला तेली। हमारी बराबरी करने चला है।

सेठ करोड़ीमल बैठे-बैठे तैश में अकेले बड़बड़ा रहे थे। तभी मैं आवश्यक कार्य से उनके पास पहुँच गया। मैंने देखा कि सेठ जी का मूड कुछ खराब है। उनके होंठ क्रोध के मारे अभी तक हिल रहे हैं। मैंने राम-राम करते हुए कहा-‘‘ताऊजी क्या बात है? सुबह-सुबह ताई जी से कुछ कहन-सुनन हो गई है क्या?’’

तब वे मेरी ओर पलट कर बोले-‘‘ना बेटा ना-तेरी ताई ने तो कुछ नहीं कहा। मेरा दिमाग तो वह मास्टर खिलाड़ीराम ने खराब कर दिया है।’’

यह सुनकर मैंने सीधे-सीधे लहजे में कहा-‘‘क्या बात हो गई ताऊजी। मास्टर साहब तो निहायत शरीफ और नेक इंसान हैं। जरूर आपकेा उनके बारे में कोई गलत फहमी हुई है।’’

हाँ-हाँ नेकी जैसे उसी में कूट-कूट कर भरी है। दुनिया में केवल वही नेक है और तो दुनिया में नेकी किसी में नहीं! वह तो बड़ा नासमझ और नालायक आदमी है। अरे, आदमी अपनी औकात को देखकर तो बात करे।’’

मैंने फिर कहा-‘‘ताऊजी, आखिर हुआ क्या है?’’

‘‘अरे बेटा रामू! वह फटीचर की औलाद अपनी बेटी का सम्बन्ध हमारे बेटे प्रवीन के संग करना चाहता है। कह रहा था कि उसकी बेटी कोमल और हमारा प्रवीन एक दूसरे से प्यार करते हैं। यहाँ गिड़गिड़ा रहा था बिल्ली की तरह। मुझे उसकी बात पर क्रोध हो आया। मैंने उसे धक्का मारकर बाहर निकाल दिया। उसमें जरा सी भी समझ होगी तो इधर पैर भी नहीं रखेगा।’’

मैं जैसे ही कुछ कहने को उद्यत हुआ तभी ताई दो गिलासों में चाय ले आईं और बोलीं- ‘‘देख रामू बेटा! तेरे ताऊजी तो बेकार गर्म हो रहे हैं। ये सब पुरानी दकियानूसी की बातें करते हैं। समय की नजाकत को नहीं पहचानते। ये नहीं सोचते समय कहाँ से कहाँ पहुँच गया है। गम्भीरता से किसी बात को लेते ही नहीं। देख भैया! हमारे एक ही तो बेटा है। हम उसके मन की न करें तो हमारा माँ-बाप होना ही बेकार है।’’

सेठजी गरज उठे-‘‘अरे लक्ष्मी-तू बिना सोचे समझे बोलने लगती है। उस फटीचर मास्टर की हैसीयत ही क्या है? वह दहेज में हमें क्या दे देगा? फिर सम्बन्ध बराबर वालों में किए जाते हैं। तू ही देख मनोहर लाल के लड़के की सगाई में ही दस लाख कैश और एक सेन्ट्रो कार आई है। उसका लड़का तो हमारे प्रवीन के बराबर पढ़ा लिखा भी नहीं है। हमारे प्रवीन ने तो एम.बी.ए. प्रथम श्रेणी में पास की है। फिर हमारे क्या कमी है जो बिना विचारे अपने इकलौते बेटे को कुएँ में धकेल दूँ। कोठी, दो, दो कारें, कारखाना ऊपर से करोड़ों की सम्पत्ति का वही अकेला वारिस है। वह घटिया दो कौड़ी का मास्टर मेरी क्या बराबरी करेगा। यदि मै उसकी लड़की का विवाह अपने बेटे के साथ कर भी दूँ तो क्या दुनिया मुझ पर थूकेगी नहीं? उस मास्टर के बच्चे में इतनी सामर्थ है कि शादी में बीस लाख रूपये खर्च कर सके!’’

मैंने बात काटते हुए उन्हें टोका- ‘‘ताऊजी, आप यह तो सब सच कह रहे हो। परन्तु लड़के लड़की दोनों सममुच आपस में प्यार करते हों तो? हो सकता है हमारे प्रवीन ने ही मास्टर जी को समझा-बुझाकर आपके पास भेजा हो। अभी तो मास्टर साहब ने यह बात आपके सामने रखी है, कल को आपसे स्वयं प्रवीन यही सब कहे तक क्या करोगे आप? आपके द्वारा अधिक प्रतिबन्धित होकर यदि वे दोनों कोर्ट-मैरिज करके और आपसे अलग होकर रहने लगें तो आपकी यह शानवान, कोठी बंगला और करोंड़ों की सम्पत्ति कहाँ रह जायेगी। कहाँ रह जायेगा आपका यह ऊँचा स्टेटस? एक कौड़ी भी दहेज में मिलेगी नहीं, लड़का भी हाथ से निकल जायेगा। बदनामी मुफ्त में मिलेगी। मेरी तो राय यही है कि आप समझदारी से काम लें। मास्टर जी को बेइज्जत करके भी आपने अपनी ही इज्जत पर दाग लगाया है। मास्टर साहब की लड़की कोमल ने भी पूरी यूनिवर्सिटी में एम.ए. में टॉप किया है। उसने हमारे प्रवीन के साथ एम.बी.ए. भी किया है। हो सकता है वे एक दूसरे को प्रेम करते हों। इस बात से तो प्रवीन को भी आन्तरिक क्लेश पहुँचेगा।’’ ताई ने भी मेरी बात का पूर्ण समर्थन किया।

मेरी बात सुनकर करोड़ीमल बोले-‘‘बेटा-तेरी बात सोलह आने सच है, परन्तु ये प्रेम-विवाह अक्सर असफल ही होते हैं। भावुकता में बंधे ये सम्बन्ध शीघ्र ही तलाक में बदल जाते हैं। ऐसे में लाखों को दहेज पर तो पानी फिर जाता है। और अन्त में दुलहिन भी चली जाती है। रही मेरे बेटे प्रवीन की बात सो वह ऐसा नहीं है। वह मेरी मर्जी के विरूद्ध शादी नहीं करेगा।’’

रामू और सेठानी वहाँ से उठकर चले गये। कुछ देर बात सेठ जी भी शान्त हो गये। शनैः शनैः कुछ समय और व्यतीत होता गया। प्रवीन को अपने पिता से मास्टर साहब के साथ इतने अभद्ब व्यवहार की आशा कदापि न थी। वह अब अधिक उदास रहने लगा। उसने शर्म के कारण मास्टर साहब के घर जाना भी छोड़ दिया। अब उसे हर पल कोमल की चिन्ता सताने लगी। कहीं ऐसा न हो कि वह अपने पिता के व्यवहार के कारण अपना इरादा बदल दे।

चिन्ता और फिक्र के कारण उसका स्वास्थ्य भी बिगड़ने लगा। बहुत ही कमजोर और पीला पड़ गया। आँखें गड्डों में घुस गईं। उसका किसी काम में मन नहीं लगता था। उसके यौवन का बसंत असमय ही पतझड़ में परिवर्तित होने लगा। उसके मन में हर समय कोमल का ही ध्यान बना रहता।

पुत्र की यह हालत देखकर सेठ-सेठानी भी चिन्तित होने लगे। सेठजी ने बेटे को लाख तरह से समझाया पर प्रवीन के समक्ष उसकी एक न चली। आखिर बेटे की दशा पर तरस खा कर सेठ करोड़ी मल ने अपने नौकर के द्वारा मास्टर साहब को संदेश पहुँचाया कि आप 20 तोले सोने के आभूषण, एक मारूति कार और पाँच लाख रूपये नकद दहेज में देने की व्यवस्था करलें, सेठजी आपकी बेटी को अपनी पुत्रवधू बनाने को राजी हैं।

मास्टर साहब ने नौकर के साथ ही कहला भेजा कि इतना सब दहेज में देने को मेरे पास कुछ नहीं है। मेरे पास तो केवल कन्या रूपी असली धन है बस, वही दे सकूँगा। हाँ, बरातियों का आदर सत्कार अच्छी तरह कर दिया जायेगा। वैसे मैं दहेज लेने और देने के सर्वथा विरूद्ध हूँ। मैंने तो कोमल और प्रवीन की भावनाओं का सम्मान करते हुए सेठजी से इस विवाह का प्रस्ताव किया था। सेठजी इसे मेरी कमजोरी न समझें।

जब नौकर ने यह समाचार सेठजी को सुनाया तो सेठ जी फिर आग-बबूला हो उठे। उस पर दहेज का जो भूत सवार था वह सिर चढ़कर बोलने लगा और पूरे घर को अधर करके रख दिया। फिर कुछ दिन पहले नगर के एक बड़े नामी गिरामी सर्राफ दिनेशचन्द्र जो अपनी बेटी का रिश्ता लेकर उनके पास आये थे वे दस लाख नकद, एक मारूती कार देने की कह गये थे- यद्यपि उनकी लड़की कुछ काली और मोटी थी- उनको फोन करके कह दिया कि हमें आपका रिश्ता स्वीकार है। आप बसन्त पंचमी के दिन सगाई करने आ जायें।

प्रवीन उनकी मर्जी के खिलाफ दहेज के लोभ में फँसे अपने पिता से रुष्ट होकर घर से निकल पड़ा। वह अपनी कार को स्वयं ड्राइव करते हुए कोमल से मिलने मास्टर साहब के घर की ओर चले जा रहा था। घोर-निराशा के कारण उसका मानसिक सन्तुलन बिगड़ने लगा और अचानक उसकी कार का सामने खड़े एक ट्रक से एक्सीडेन्ट हो गया। कार का आगे का हिस्सा ट्रक की बौडी में घुसकर चकना-चूर हो गया। बेचारा प्रवीन ड्राइविंग सीट पर बैठा हुआ उसमें बुरी तरह फँस गया। ट्रैफिक पुलिस ने बड़ी कठिनाई से उसे निकाला। लेकिन उसके शरीर से इतना रक्त निकल चुका था कि वह बेहोश हो गया था।

पुलिस ने उसे तुरन्त सी.एफ.सी. हास्पीटल में लेजाकर भर्ती करा दिया। उसकी तलाशी लेने में उसके पर्स से उसके घर का एड्रेस और टेलीफोन नम्बर मिल गया। पुलिस ने फोन द्वारा सेठ करोड़ीमल को यह सब सूचित कर दिया।

सेठ और सेठानी के तो जैसे होश ही उड़ गये। उनके पैरों से जमीन खिसकने लगी। वे दूसरी गाड़ी में बैठकर तुरन्त सी.एफ.सी. हास्पीटल पहुँचे। वहाँ देखा कि प्रवीन इमरजैन्सी में है और उसकी हालत अत्यन्त गम्भीर है। उसके शरीर से अत्यधिक खून निकल चुका है। वह उस समय पूर्ण रूप से अचेत पड़ा था। डॉक्टर लेग उसके ग्रुप का खून तलाशने में लगे थे। मगर उसके ग्रुप का खून नहीं मिल पा रहा है। न तो वह खून अस्पताल में है और न पूरे शहर के कैमिस्टों की दुकानों में। रात्रि के लगभग बारह बज चुके थे। आगरा तक जाने-आने में और विलम्ब ही होगा। इधर प्रवीन की जान खतरे में है, उसे तुरन्त ही खून मिलना चाहिए। सेठ-सेठानी और उनके सभी हितैषियों ने अपने-अपने खून टेस्ट करवा दिए, परन्तु किसी का खून प्रवीन के खून से मैच नहीं कर पा रहा था।

इसी ऊहापोह में काफी समय व्यतीत हो चला था। सेठ जी पागलों की तरह चिल्ला उठे-‘‘अरे, कोई मेरे बच्चे को बचा लीजिए। मैं ही इसका हत्यारा हूँ। मैंने स्वयं उसे दहेज की बलि पर चढ़ा दिया। डाँक्टर! मुझसे चाहे जितना धन ले लो परन्तु मेरे बेटे को कैसे भी बचा लीजिए।’’

उत्तर में डॉक्टर ने कहा-‘‘सेठजी, अब हम कर ही क्या सकते हैं। अब तो इसका ईश्वर ही रक्षक है।’’-यह सुनते ही सेठानी पछाड़ खाकर रोने लगी। लोग उन्हें सान्त्वना देने लगे।

तभी एक जूनियर डॉक्टर ने आकर सूचना दी कि ‘‘अभी-अभी एक युवती का ब्लड प्रवीन के ब्लड से मैच कर गया है। वह स्वेच्छा से खून देने को तैयार है। शायद भगवान ने उसकी सुनली।’’

डाक्टर साहब-’’खून किसी का भी लो परन्तु मेरे बेटे को बचा लीजिए।’’ सेठ करोड़ीमल ने रोते हुए कहा।

अब कक्ष से सभी को बाहर कर दिया गया और प्रवीन के बैड के पास ही उस खून प्रदान करने वाली युवती का पलंग डाल दिया गया। डाँक्टरों ने शिरिंज लगाकर उसका खून प्रवीन के शरीर में चढ़ाना शुरू कर दिया।

लगभग चार घंटों की प्रतीक्षा के बाद आपरेशन थियेटर का दरवाजा खुला। डॉक्टर ने प्रसन्न मुद्बा में बताया-‘‘सब कुछ ठीक है, अब प्रवीन को होश आ चुका है। आप उससे मिल सकते हैं, परन्तु अभी उससे बातें न कीजिएगा।’’

यह सुनकर सेठ-सेठानी की जान में जान आई और वे तुरन्त प्रवीन के निकट जा पहुँचे। दोनों ने बेटे के सिर पर हाथ फिराया। उसके ठीक बराबर वाले पलंग पर खून दान देने वाली युवती पर जब सेठजी की दृष्टि गई तो एक दम सकते में पड़ गये। यह बहुत ही खूबसूरत और स्मार्ट लड़की आखिर है कौन? मर्द भी इतना साहस नहीं दिखा पाते जितना इस युवती ने दिखाया है। पूछने पर सेठजी को मालूम हुआ कि यह युवती और कोई नहीं, मास्टर खिलाड़ीराम की पुत्री कोमल है, जिसके पिता को उन्होंने अपमानित करके घर से भगा दिया था। आज उसी ने उनके एक मात्र बेटे को जीवन दान दिया है। जिसे करोड़ों रूपये देकर भी सेठजी नहीं खरीद सकते थे।

सेठजी की आँखें शर्म से झुक गईं। वे पश्चाताप करके धरती में गढ़े जा रहे थे। इसी बींच में कोमल वहाँ से उठकर चुपचाप न जाने कब चली गई; किसी को पता ही न चला। सेठ जी शर्म के कारण उससे वहाँ कुछ कह भी न सके।

दूसरे दिन प्रवीन को अस्पताल से छुट्टी मिल गई और वह घर पर आ गया। सेठ जी आज पैदल ही चल कर चुपके से मास्टर साहब के घर पहुँच गये। वहाँ कोमल का आभार व्यक्त करते हुए अनेक आशीर्वाद दे डाले-‘‘बेटी, मुझे माफ कर देना। मैंने तुम्हें पहचानने में बड़ी भूल की। फिर मास्टर जी की ओर रुख करके हाथ जोड़कर क्षमा माँगने लगे-‘‘मास्टर साहब-मुझे माँफ कर दीजिए। वास्तव में उस समय मेरी आँखों पर दहेज के लोभ का चश्मा लगा हुआ था, जिसको मैंने अब उतार कर फैंक दिया है। मैं अब आपकी बेटी को अपने घर की बहू बनाने के लिए आपसे भीख माँगता हूँ। मुझे आपका एक पैसा भी नहीं चाहिए। मेरे लिए आपकी बेटी ही असली सोना है।

उसी समय वहाँ प्रवीन की माँ भी आ पहुँचीं। उसने कोमल के सिर पर आशीर्वाद का हाथ रखते हुए कहा-‘‘जब ऊपर वाले ने ही तुम दोनों की जोड़ी मिला दी है तो उसे कौन नकार सकता है। प्रवीन की रग-रग में तुम्हारा खून समा चुका है फिर भला वह तुमसे अलग अब कैसे हो सकता है। नेकी और इन्सानियत की दौलत जो तुम्हारे और तुम्हारे माता-पिता के पास है, वह दौलतमंद लोगों के पास कहाँ है? सचमुच तुम्हारा स्टेटस हमसे बहुत ऊँचा है।’’ -यह कहकर उन्होंने एक हीरा से जड़ा सैट उसको अपने हाथों से पहना दिया और उसे अपनी बहू स्वीकार कर लिया। ’’’

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संपादक‘जमुना जल’

104-चन्द्रलोक कॉलोनी,

.कृष्णा नगर, मथुरा - 4

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