गुरुवार, 11 अगस्त 2011

चिरंजीलाल 'चंचल' के दोहे

प्रस्तुत है डॉ० चिरंजीलाल 'चंचल' की पुस्तक - दोहांजिली से चुने हुए 10 दोहे -

दोहांजिली - दोहे

अंक दे भी न कह सके, दिल में थी जो बात।

विवश अधिक थे कर रहें, जिनको निज हालात॥-१

 

अंग-अंग ढीला किया,मेहनत ने भरपूर।

गिर के फिर कब उठ सके, बनते थे जो शूर॥-२

 

अंग-अंग उल्लास भरा, फूला नहीं समाय।

फूल देख कचनार के, भौंरा रहा मुस्काय॥-३

 

अंग को नहीं लग रहा, चाहे कुछ भी खाय।

सब पेड़ों को हो गया, पतझड़ बुरी बलाय॥-४

 

अंगारों को उगलता, अब सूरज हर ओर।

लगता मौसम गर्मी का, होने लगा किशोर॥-५

 

अंगारे बरसा रहे, छोड़ शब्दों के बाण।

उनको अनुचित दीखते, शायद अपने प्राण॥-६

 

अंगारे सिर पर रखे, हमने देखे लोग।

बोल न मुख से निकलते, जब लगते हैं रोग॥-७

 

अंगारों पर लेट के, काटी सारी रात।

चैन किसी करवट नहीं, साथ हुआ जब घात॥-८

 

अंगुलियाँ उठने लगे, देखें अनुचित काम।

किसी जीभ पर फिर कहाँ, लगती यहाँ लगाम॥-९

 

अगुलियाँ उठाने से, ले सच कहाँ विराम।

उसको तो हर हाल में, जाना अपने धाम॥-१०

 

डॉ० चिरंजीलाल 'चंचल'

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