सोमवार, 15 अगस्त 2011

आर.वी. सिंह की स्वतंत्रता-दिवस विशेष कविता : आज़ादी के क्या थे मानी

आज़ादी के क्या थे मानी

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आजादी के क्या थे मानी और हुए जाते हैं क्या

नए-नए आँकड़े जुटाकर साहब बतलाते हैं क्या

 

सात दशक की आजादी में कितना आगे आया देश

हरित क्रांति औ श्वेत क्रांति से खाया पिया अघाया देश

तीस कोटि लोगों को जुटती नहीं किन्तु रोटी अब भी

उनसे कोई जाकर पूछे भूख लगे खाते हैं क्या

 

अपराधों में लिप्त लोग शासनरत हैं राजन्य हुए

कोटि-कोटि जन भरत-भूमि के, पाकर उनको धन्य हुए

जन-प्रतिनिधि बस नाम मात्र के स्वार्थ-सिद्धि ही ध्येय बना

सत्ता मिल जाने पर जन-गण उन्हें याद आते हैं क्या

 

गहन अशिक्षा का अंधियारा फैलाए है अपने पाँव

पढ़-लिखकर सब शहर आ गए जाता नहीं है कोई गाँव

अध्यापक की मिली नौकरी वेतन मिलता है भरपूर

किंतु धूल में लोट के आए बच्चे भी भाते हैं क्या

 

पढ़-लिखकर कुछ बड़े हुए तो घृणित हो गया अपना ग्राम

दुबई, अमरीका, जरमनिया बसे, न अब आने का नाम

ठेल-ठेल कर अपना जीवन कैसे काटें माई-बाप

अनिवासी हो गए लोग जो कभी जान पाते हैं क्या

 

जोड़ रहे काला धन सब जन इधर-उधर कर भ्रष्टाचार

सदाचार रह गया कोश में, नहीं बचा उसका व्यवहार

दस्यु बने सत्ताधीशों से पूछेगा आखिर यह कौन

पुण्य-पवित पुरुषार्थ कमाया धन घर वे लाते हैं क्या

 

एक ओर बढ़ रही अमीरी, निर्धनता अतिशय इस ओर

सत्य-व्रती भूखों मरते हैं, मजे कर रहे डाकू-चोर

यही सुफल है आजादी का, इतना है स्वातंत्र्य सुलभ

लूट सकें तो प्रभो! लूट लें, नाहक शर्माते हैं क्या

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डॉ. आर.वी. सिंह, सी-1/509, सेक्टर जी, जानकीपुरम, लखनऊ

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