मंगलवार, 16 अगस्त 2011

उमेश काले की कविता - महानगर

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महानगर

सुबह से रात तक भागते और दौड़ते आदमी

बेनूर चेहरों के पसीने से तरबतर आदमी।

 

चिलचिलाती धूप में लम्बी-लम्बी सडकों पर

एक छाँव के टुकड़े को तरसते आदमी।

 

हर तरफ भीड़ है इतनी कि दम घुटता है

और उस भीड़ में अकेले ही भटकते आदमी।

 

ना जाने कहाँ से आते है और कहाँ जाते है

दिख जाते है भरी लोकल में लटकते आदमी।

 

लहू लाल से कुछ सफ़ेद हो गया है इनका

तभी इस शहर में आदमी को ही कुचलते आदमी।

 

बड़ी इमारतें है बड़े होटल और बड़े मैखाने

फिर भी फुटपाथों पे बसर उम्र कई करते आदमी।

 

गर चल जाये कही तमंचे, या फट जाये कही बम

फुरसत ही नहीं इतनी कि वहां घबराये आदमी।

 

नहीं कीमत कोई जान की पर महंगाई है बहुत

ऐ प्रभो!, क्या सोचकर तूने स्वर्ग से उतारे आदमी ?

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उमेश काले

सुखनिवास, राजेंद्र नगर

इन्दौर – ४५२०१३

1 blogger-facebook:

  1. शंकर6:03 pm

    बहुत सुंदर रचना| आजकल के शहरी जीवन का बहुत सुंदर चित्रण किया है जहा आजकल आदमी, आदमी नहीं रहा है बल्कि मशीन बन गया है जिसमे ना संवेदना है और नहीं प्यार|
    बधाई
    शंकर

    उत्तर देंहटाएं

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