बुधवार, 17 अगस्त 2011

एस के पाण्डेय की लघुकथा - असर

 

एक दिन शाम के समय रामू के पिताजी मेरे घर आये। वे बहुत ही दुखी थे। कारण बड़ा बेटा यानी रामू ही था। उनके परिवार में कुल पाँच लोग हैं। पति-पत्नी, दो बेटे और एक बेटी। बड़ा बेटा जो ज्यादा बड़ा नहीं है। कुछ उद्दंड स्वभाव का था। और उसकी उद्दंडता धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी। उसकी उम्र दस-बारह साल से अधिक नहीं है । फिर भी वह परिवार के लिए परेशानी का कारण बनता जा रहा था। आये दिन उसको लेकर झगड़ा होता रहता था। बात मार-पीट तक भी पहुँच जाती थी। कभी-कभी बिना खाना खाये ही उसके पिता ड्यूटी पर चले जाया करते थे। वह जिद्दी भी था तथा कभी-कभार बाप की जेब से कुछ पैसे भी निकाल लेता था।

छोटा बेटा आठ-दस साल का था। यह उद्दंड नहीं था। ठीक-ठाक था। लेकिन इसके भी बिगड़ जाने का डर था। बड़ा वाला ऐसी-ऐसी बात कह देता था। जो कोई भी माता-पिता न अपने कम उम्र के और न ही अधिक उम्र के बेटे से सुनना चाहेंगे।

मेरे पास वे कुछ आशा लेकर ही आये थे। सब कुछ बताने के बाद उन्होंने कहा कि अब एक ही चारा है कि उसे गाँव भेज दूँ। मैंने कहा कि यह उचित नहीं है। इससे उसकी पढ़ाई पर भी असर पड़ेगा तथा सुधरने के बजाय वह और बिगड़ जायेगा। वे बोले कि मरता भी तो नहीं है। मर जाए तो झंझट से मुक्ति तो मिल जाए। एक दिन उससे कहा कि गांव भेज देंगे तो बोला कि भेज दो वहाँ मैं ज्यादा आराम में रहूँगा। कम से कम तुम लोग तो वहाँ नहीं होंगे। मैंने उन्हें समझाया कि चूँकि वह जिद्दी है। इसलिए जब आपने कहा होगा कि तुम्हें गांव भेज दूँगा। तब प्रत्युत्तर व क्रोध में ही उसने ऐसा कहा होगा। वह अपने फायदे और नुकसान दोनों से अनजान है।

उन्होंने आगे बताया कि एक दिन सुसाइड करने जा रहा था। मैंने कहा आप लोग थोड़ा सोच-विचार कर काम करिये। ज्यादा मारिये-पीटिये नहीं। समझाइये। नहीं तो किसी दिन वह ऐसा कुछ कर भी सकता है। उन्होंने कहा कि समझा-बुझाकर हार चुके हैं। उस पर कुछ भी असर नहीं पड़ता। बोले कल सबने खाना खाया और वह वैसे ही लेटा रहा। क्योंकि कल मीट नहीं बना था। कल उसे मछली खाना था। मैंने कहा कि मीट आप लोग भी खाते हैं। इसलिए वह भी खाता है। नहीं तो इस उम्र में मीट के लिए जिद नहीं करता। वह अभी मीट खाना छोड़ भी सकता है। बशर्ते आप लोग भी न खाएं और उसे सब बातें प्यार से समझाएं। उन्होंने बताया कि अभी कल ही कह रहा था कि क्या मैं तुम्हारा बेटा नहीं हूँ। मुझे पैदा नहीं किये हो, कहीं से पकड़ लाए हो। इतना ही नहीं अपने माँ को गाली भी दिया था । अब कुछ भी समझ में नहीं आता कि इसका क्या करूँ ? आप कल मेरे घर चले आइये और उसे कुछ समझा दीजिए। शायद आपकी बातों का ही कुछ असर पड़ जाए। हम-लोग तो समझा-बुझाकर थक चुके हैं। मैंने कहा घर पर तो नहीं आ सकूँगा। लेकिन जब वह कल स्कूल से घर आये तो छोटे लड़के के साथ यहीं भेज दीजियेगा।

वे तो चले गए। लेकिन मेरा मन अशांत हो गया। मैं यह सोचने लगा कि माता-पिता अपने सन्तान से क्या-क्या उम्मीद रखते हैं ? और आज उन्हें क्या मिलता है ? दस साल का लड़का और उसके कारण इतनी पीड़ा। कौन जिम्मेदार है ? आज की शिक्षा ? आज का रहन-सहन ? वातावरण ? शायद यह जमाना ही।

अगले दिन शाम को दोनों लड़के आ गए। मैंने पहले उन्हें बिठाया। स्कूल के बारे में बात किया। टीचर के बारे में पूछा। कौन सा विषय अच्छा लगता है। आदि। धीरे-धीरे मुद्दे पर आ गए। मैंने उनसे पूछा कि पहले आप लोग गांव में रहते थे और वहीं पढ़ते थे। आपके पिताजी यहाँ क्यों बुला लिए ? यहाँ सीबीएसई के विद्यालय में पढ़ने के लिए भेजते हैं। उपर से कम वेतन के बावजूद ट्यूशन भी कर दिए हैं क्यों ? छोटा बोला मैं बताऊँ। मैंने कहा हाँ बताइये। वह बोला कि गांव में स्कूल बहुत दूर था। वहाँ पढ़ाई भी ठीक से नहीं होती थी। इसलिए ही ले आये ताकि हम लोग ठीक से पढ़-लिख सकें। मम्मी कहती हैं कि हम लोगों को भी पढ़-लिखकर आप की तरह बनना चाहिए। मैंने बड़े वाले से कहा कि आपसे छोटा है। फिर भी समझदार ज्यादा है।

मैंने उन्हें समझाया कि इसी तरह हर माता-पिता अपने-अपने बच्चों के लिए सोचते हैं। खुद परेशान रहकर भी अपने सन्तान को दुखी नहीं देख सकते। क्या-क्या नहीं करते ? भोजन, कपड़ा देते हैं। पढ़ने के लिए स्कूल भेजते हैं। बीमार पड़ने पर डॉक्टर के पास ले जाते हैं। यह सब किसलिए करते हैं। ईर्ष्या अथवा प्यार के कारण। वे बोले प्यार के कारण। तब मैंने बड़े वाले से कहा कि इस पर तुम अपने माता-पता से कहते हो कि मुझसे ईर्ष्या करते हो।

इसी तरह की ढेर सारी बातें मैंने उन्हें समझाई। उनसे कहा कि हमें अपने माता-पिता का सम्मान करना चाहिए। कल से नियम बना लो रोज सुबह उठकर प्रणाम किया करो। मैंने उन्हें श्रीरामचरितमानस से कुछ प्रसंग सुनाया। और पूछा कि गोस्वामी जी ने लिखा है कि अनुचित और उचित का बिचार छोड़कर जो माता-पिता कहें उसका पालन करना चाहिए। ऐसा उन्होंने क्यों लिखा ? इस बार भी छोटे वाले ने ही उत्तर दिया। बोला क्योंकि माता-पिता जो भी कहेंगे हमारी भलाई के लिए ही कहेंगे हमें भले ही अनुचित मतलब अच्छा न लगे। मैंने कहा बिल्कुल ठीक। इसीसे हमें माता-पिता का कहना मानना चाहिए।

आगे मैंने उनसे कहा कि आपके पिताजी से कह दिए हैं कि श्रीरामचरितमानस की एक प्रति ले आओ। वो आज ही ले आयेंगे। और आप लोग नियम बना लो कि रोज अथवा रविवार को श्रीरामचरितमानस जरूर पढ़ेंगे तथा अब आज के बाद मीट नहीं खायेंगे। इस प्रकार कई तरह से समझा बुझाकर हमने बच्चों को भेज दिया।

कुछ दिन बाद जब रामू के पिताजी से मेरी बात हुई तो उन्होंने बताया कि आपकी बातों का ऐसा असर हुआ कि लड़का ही नहीं बल्कि मेरा पूरा परिवार ही बदल गया है। अब हमारे यहाँ कोई मीट भी नहीं खाता और बड़ा बेटा भी छोटे की तरह परीक्षा में अव्वल आया है।

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डॉ एस के पाण्डेय,
समशापुर (उ.प्र.) ।
http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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