बुधवार, 31 अगस्त 2011

गंगा प्रसाद शर्मा गुणशेखर की कविता - अब और नहीं बरगला पाओगे सरकार!

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  तुम्हारे आलीशान बंगले की 

रखवाली करता हुआ मेरा चाचा 

केवल तुम्हें अच्छी लगने के कारण

तुम्हारे हरम में आजन्म कुँआरी बैठी मेरी बुआ 

गली-गली तुम्हारी विरुदावली 

गाता हुआ मेरा मामा 

तुम्हारी आलीशान कोठी 

और कोठे का मुनीम 

मेरा मौसिया

तुम्हारी मीठी-मीठी  बातों में आकर 

बेगार कर रहे नौकर-चाकर हों या 

वसीयत करके घर बैठे हुए मेरे पिता

लगता है सब के सब बौरा गए हैं 

सबकेसब सड़क पर हैं मेरे आका!

और,

पूरा कापूरा हरम खाली पड़ा है सरकार!

 

तुम्हारे बहादुर सिपाही बेहद डरे हुए हैं 

उनके मुगलिया पाजामे गीले 

और नाड़े ढीले हो गए हैं 

उनकी संगीनें गमगीन हैं 

इक्कीस तोपों की एक साथ सलामी देने वाले 

तुम्हारे बड़के तोपची तोपोंमें गोलों की ज़गह

अपने-अपने मुँह तोपे पड़े हैं 

तुम्हारे पाले हुए सारे तोते 

या तो खुद उड़ गए हैं या उड़ा दिए गए हैं

'तू कौन है बे! दीवाने खास में..' 

मैं... मैं..! 

 

आपके पवित्र पैरों की गंदी जूती 

बेहद आम से बना खास 

दासानुदास..

सरकार!! 

गुलाम से सूबेदार  

'अच्छा...अच्छा!! 

 

जाओ डराओ,बहलाओ, फुसलाओ चुग्गा डालो   

कुछ भी करो   

पर उन्हें उनकी अपनी पुरानी जगहों पर पहुँचाओ' 

'स्वामी' ! ये पागल हाथी हो रहे हैं 

इतनी ज़ंज़ीरें कहाँ धरी हैं अपने पास  

अब और लंबा नहीं चल पायेगा यह व्यापार 

अब और नहीं बरगला पाओगे सरकार!

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