शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

साक्षी दीक्षित की कहानी - निर्णय

चिंटू

दफ्तर से छुट्टी मिलते ही शिवानी लम्बे - लम्बे डग भरते हुए बस स्टॉप की ओर बढ रही थी| शायद उसे बड़ी जल्दी थी घर जाने की.

तभी पीछे से किसी ने आवाज दी-

शिवानी , ऐ शिवानी... ! रुक तो जरा , कहां भागे जा रही है यार! आज मुझे छोड़कर |"

आवाज जानी पहचानी थी,  शिवानी ने पीछे मुड़कर देखा तो मानसी दौड़ती हुई आ रही थी |

शिवानी बिना रुके मानसी से कहने लगी -"मानसी जल्दी चल ना आज देर हो गई है अगर ये बस चली गई ना! तो बस ... तुझे तो पता है ना फिर घंटे भर तक बस नही मिलती, घर पर चिंटू रो - रो के माँ की जान खा रहा होगा |शाम को मेरा घर पर देर से पहुंचना उसे बिल्कुल पसन्द नही |तभी तो रोज जल्दी निकल जाती हूं ऑफिस से , तू तो जानती ही है , तुझसे क्या छुपा है. चल-चल जल्दी वो देख... बस आ भी गई |"

दो ए. जी . कालोनी की टिकिट देना -  मानसी ने पर्स में हाथ डालते हुए कंडक्टर से कहा|

शुभेन्द्र, भी इसी बस में था. सांवला सा, ऊंचा कद, जैसे हर लड़की का मिस्टर परफेक्ट हो और शिवानी तो सुन्दरता की जीती जागती तस्वीर थी ही .शिवानी के व्यक्तित्व में जहां सरलता और सौम्यता कूट कूट कर भरी थी वही दूसरी ओर सादगी की जैसे जीती जागती तस्वीर थी वह. शिवानी के इसी रूप को देख शुभेन्द्र अनायास उसकी ओर आकृष्ट होने लगा था.  जब कभी बस में आते जाते उसे अवसर मिलता क्षण भर निहार लेता. उसकी सादगी मे अत्यन्त सहजता थी,लगता था जैसे एक खुली किताब के कुछ पृष्ठ, पढने को उतावले कर रहे हो. .

शुभेन्द्र रोज इसी बस में आता - जाता. शिवानी को देखते ही मन रोज जैसे कुछ पूछने को आतुर हो जाता, पर जैसे बस की सामूहिक मर्यादायें उसे रोक देती. इतने दिनो के सफर मे केवल एक ही बार तो बात हो पायी थी, वह भी केवल नाम तक सिमट कर रह गयी.

उस दिन मानसी ऑफिस नहीं आई थी,  शिवानी अकेले ही खड़ी बस का इंतजार कर रही थी. तभी एक चमचमाती कार सामने आकर रुकी.

शिवानी कुछ समझ पाती इसके पहले ही कार का दरवाजा खुला, देखी तो शुभेन्द बैठा हुआ था. उसने उतरकर सामने का दरवाजा खोला और थोडा हिचकिचाते हुये कहा - " हेल्लो शिवानी जी ! आपने मुझे पहचाना ? हम रोज एक ही बस में आते जाते हैं!

शिवानी ने हल्की सी मुस्कुराहट होठों पर बिखेर जैसे औपचारिकता निर्वाह करने की यत्न की.

ये कार मैंने कल ही खरीदी है .बस उसी की ख़ुशी बांटने आया हूं. आप मेरी ख़ुशी में शामिल नही होंगी ...? यदि एतराज ना हो तो प्लीज!... और ऐसा कहते हुये शुभेन्द्र ने जैसे शिवानी को अन्दर बैठने का इशारा किया .

शिवानी संकोच में पड़ गयी, लेकिन शुभेन्द्र के इस विनम्रतापूर्ण आग्रह को चाहकर भी ठुकराने का साहस ना कर सकी.

शुभेन्द्र और शिवानी में कोई परिचय नहीं था और ना ही आज से पहले सिवाय एक बार नाम पूछने के, कभी विस्तार से बात ही हुई थी .

बस आते-जाते दोनों की नज़रें मिलती और आंखों ही आंखों में दोनों एक दूसरे के भावों को समझने की कोशिश कर लेते.  शुभेन्द्र , शिवानी के करीब आना चाहता था पर प्यार के इंकार से जैसे डरता था.

शुभेन्द्र आज कार में शिवानी को अकेली पा अपने मन के भावों को उंडेल देने जैसे व्यग्र हो उठा लेकिन शब्द होंठों पर आकर रूक गये.

इधर शिवानी कार में तो बैठ तो गई पर घबरा रही थी कि कही कोई देख न ले और एक अनजाना रिश्ता यू ही बदनाम न हो जाए.

रास्ते भर दोनों ने कोई बात नहीं की थी पर जैसे मन ही मन दोनों को एक दूसरे का सान्निध्य अच्छा लग रहा था .

दूसरे दिन शुभेन्द्र ने फिर बस स्टॉप पर कार रोकी और शिवानी को कार में बैठने का इशारा किया . शिवानी उस दिन फिर अकेली थी, लेकिन इस बार उसने आमंत्रण सहजता से स्वीकार कर लिया।  इशारा पाते ही वह मुस्कुराते हुए कार में बैठ गई. लग रहा था जैसे वह भी शुभेन्द्र के मोहपाश में खींची चली जा रही है। .

अचानक शुभेन्द्र ने गाड़ी पास के रेस्तरां में रोक दी और कार से उतरते हुए शिवानी से कहा - आइये ना एक - एक कप काफी हो जाए. " और दोनों रेस्तरां के अंदर जाकर बैठ गए. दो कप कॉफ़ी का ऑर्डर देकर शुभेन्द्र ने चुप्पी तोड़ी - देखिये ना हम पिछले कुछ दिनों से एक - दूसरे को बस में आते जाते देख रहे है और  दो दिनों से तो साथ में घूम भी रहे है, पर अभी भी हम एक - दूसरे से कितने अनजान है जैसे जमीं और आसमां हो. है ना?

शिवानी ने इस बार भी बजाय कुछ बोलने के मुस्कुराना ही बेहतर समझा.

चलिये मैं खुद के परिचय से शुरुआत करता हूं. मेरा नाम शुभेन्द्र शर्मा है, मैं ३० साल का हूँ . एक मल्टीनेशनल कंपनी में सोफ्ट्वेयर इंजिनीयर हूँ . गाँव में माँ - पिताजी है. तीन बहनें हैं जिनकी शादी हो चुकी है. लगभग अब मेरी जिम्मेदारियां पूरी हो चुकी है और अब मेरे जीवन साथी की तलाश भी आपके साथ खत्म होती है ."


शिवानी ने अचरज से शुभेन्द्र को देखा. शुभेन्द्र ने फिर कहना शुरू किया - हां ! शिवानी मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं पर इसमे तुम्हारी हां भी जरुरी है. लेकिन याद रखो अगर तुमने ना की तो मैं जीवन भर शादी नहीं करूँगा.

थोड़ी देर ख़ामोशी छाई रही .

शुभेन्द्र ने फिर कहा - मैं तुम्हारा जवाब चाहता ंहू शिवानी! कुछ तो बोलो ?

शिवानी गीली आंखों से बस इतना ही कह पाई  - आप मेरे अतीत से शायद परिचित नही है.

शुभेन्द्र ने कहा - मैं जानना भी नहीं चाहता ? शिवानी मुझे तुमसे प्यार है, तुम्हारे अतीत से मुझे कोई सरोकार नहीं है.

शिवानी ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा - मुझे थोड़ा वक्त चाहिए और वह वहां से जाने लगी.

शुभेन्द्र ने उसे रोकते हुए कहा - मुझे तुम्हारे जवाब का इंतजार रहेगा.

दफ्तर में शिवानी ने सारी बातें मानसी को बताई.

मैं अब क्या करू मानसी, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा, बहुत परेशान हूं. शिवानी ने दोनों हाथों से अपना सर थामे कहा .

इसमे सोचना क्या शिवानी, हां कर दो. मानसी ने पास बैठते हुए कहा.

ये तू क्या कह रही है मानसी?  तुझे तो मेरा सारा अतीत पता है न. शुभेन्द्र को जब पता चलेगा तो वह मुझे नहीं अपनाएँगे. शिवानी ने परेशान होते हुए कहा.

नहीं शिवानी ! मैं ये दावे के साथ कह सकती हूँ कि शुभेन्द्र तुमसे प्यार करता है और प्यार करने वालो को उसके अतीत से कोई फर्क नही पड़ता और रही बात तुम्हारे उससे २ साल बड़े होने की तो उम्र का बंधन भी प्यार में कोई मायने नहीं रखता है  और हां जब एक आदमी कोई गलती करके भी खुले आम घूम सकता है, अपने प्यार का गला घोंट सकता है पैसे की लालच में अपने पहले प्यार को भुला सकता है, उसे धोखा देकर आराम की जिन्दगी जी सकता है, तो तुम्हारा कोई दोष न होते हुए भी तुम दुःख क्यों सहोगी ? क्या इसलिये कि तुम एक औरत हो ?  ... नहीं शिवानी ! तुम्हें अपनी खुशियों के साथ यूं खिलवाड़ करने का कोई हक़ नहीं है . और फिर चिंटू के बारे में तो सोचो. उम्र के इस पड़ाव में उसे अपने पिता की जरुरत है और  तुम्हें शुभेन्द्र से अच्छा जीवन साथी नहीं मिल सकता.मानसी ने द्ढ़़ता के साथ कहा.

शिवानी उस दिन जल्दी घर आ गई. रात भर उसे नींद नहीं आई. नींद उसकी आंखों से कोसों दूर थी. आधी रात को वह कागज कलम लेकर लिखने बैठ गई . शायद उसने कोई निर्णय ले लिया था . सुबह उसने मानसी को फोन लगा घर बुलाया .

मानसी के आते ही शिवानी ने उसे दो लिफाफे दिए और कहा . मानसी तू मेरी सबसे अच्छी सहेली है. मानसी तुमसे मेरा अतीत और वर्तमान कुछ भी छिपा नहीं है। हर सुख - दुख में तेरा साथ मिला, जिसने हर कदम पर मेरा हौसला बढ़ाया। आज फिर मुझे एक कठोर निर्णय लेने पर विवश होना पड़ रहा है और हमेशा की तरह आज फिर तेरा साथ चाहिये। बोल देगी न मेरा साथ. मानसी इन दोनों लिफाफों में से एक में मेरा त्याग पत्र है और दूसरे  में एक ख़त है, शुभेन्द्र जी के नाम. और उनसे कहना मुझे सदा के लिये भूल जाये।


शिवानी के चेहरे में उस समय तनाव के भाव थे। माथे पर प्रतिबिंबित आड़ी तिरछी रेखायें उस समय उसके क्रेाध को अभिव्यक्त कर रही थीं।

ये अचानक क्या हुआ तुझे ? मानसी ने भौंचक्के होकर कहा।

और ये बता! क्या तू उसे भूल पायेगी शिवानी ? मैंने तुम्हारे चेहरे पर उन खुशियों को बहुत नजदीक से देखा है जो शुभेन्द्र से मिलने के बाद दोबारा दिखायी पड़ा है ...। फिर यह तेरा कैसा निर्णय है ? नौकरी छोड़कर कहां जायेगी ? चिंटू और मां का क्या होगा ? क्या इस तरह बचकाना फैसला लिया जाता है ? तू भूल गई माँ और चिंटू की जिम्मेदारी को, आखिर तूने सोच क्या रखा है अपने बारे में? मानसी ने चिल्लाते हुए शिवानी से कहा.

तुझे याद है मानसी, कुछ दिनों पहले इंदौर में मैंने एक नौकरी के लिए आवेदन किया था, अभी दो दिन पहले ही वहां से फोन आया था, जोइनिंग के लिए मै वहीं जा रही हूं. इत्तफाक से उस कंपनी वालों ने आज शाम की ट्रेन की टिकिट्स भी भेजी है और रहा सवाल उन्हें भूल पाने का तो मानसी इस दिल को ठोकर खाने की आदत हो गई है कुछ दिनों में मैं फिर सम्हल जाउंगी।


मानसी की आंखों में आंसू थे, उसके पांव आगे नहीं बढ़ रहे थे.

बसस्टॉप पर पहले से ही शुभेन्द्र शिवानी का इंतजार करते खड़ा था.

मानसी को देखते ही उतावले पन से पूछने लगा . मानसी तुम अकेली ! शिवानी कहां है? तुम्हारा चेहरा क्यों उतरा हुआ है ? सब ठीक तो है न ?

मानसी उदास थी, उसने बिना कोई प्रत्युत्तर दिये वे दोनों पत्र शुभेन्द्र को देते हुये कहा-ये शिवानी ने दिये हैं।

शुभेन्द्र ने उत्सुकता से पत्र खोला और पढ़ने लगा जिसमे शिवानी ने अपने अतीत में छुपी अपनी पीड़ा का संक्षेप में लिखा था।


शुभेन्द्र जी. नमस्ते

मेरी कहानी कुछ अजीब है. आपसे, मैंने कहा भी था, मगर आपने सुनने से इंकार कर दिया. पर अब मैं आपको धोखे में नहीं रख सकती. शुभेन्द्र जी सबसे पहली बात तो यह कि मैं आपसे २ साल बड़ी हूं, हिन्दू रीति रिवाज के अनुसार, समाज हमारा रिश्ता स्वीकार नहीं करेगा और मुझमें इतनी शक्ति अब बची भी नहीं कि मैं इस समाज से लड़ सकूं. मैं बहुत मुश्किल से कहीं जाकर अपने जीवन में अब स्थाई हो पाई हूं और दूसरी सबसे अहम् बात जो हमारे रिश्ते के मध्य दीवार के रूप मे है वह है मेरा अतीत जो मैं तुम्हे बताने जा रही हू-

मैं एक साधारण परिवार से थी और माता - पिता की इकलौती संतान होने के कारण मेरी हर जरुरत पूरी की जाती रही, बहुत लाड़ प्यार में पली बढ़ी. बदलते मौसम की तरह युवावस्था कब दहलीज पर आ पहुंची पता नहीं चला.

मुझे याद है मेरे कालेज का वह पहला दिन था, जवानी की मदहोशी और आंखों में रंगीन सपने लिए मैंने कालेज की दहलीज पर कदम रखा. आते जाते हुए मुझे शिवम् से प्यार हो गया. वो ईन्जीनियरिंग के ३ रे  सेमेस्टर में था, माता . पिता का इकलौता संतान. बड़े घर का बेटा मगर कोई लाग लपेट नहीं थी उसमे, हमारा प्यार पेड़ से लिपटी बेल जैसे बढ़ता गया. माँ ने बड़ी मुश्किल से हमारे रिश्ते को स्वीकृति दी थी, इस शर्त पर कि पहले शिवम अपनी पढ़ाई पूरी करके नौकरी कर अपने पैरों पर खड़ा हो जाए. शिवम् ने भी हां कर दी थी.

हालांकि शिवम् के ऊंची नाक वाले माँ . पिता को हमारा ये रिश्ता पसंद नहीं था, एक साधारण परिवार की लड़की उनकी बहू बने, यह उन्हे कतई पसन्द नही था फिर भी शिवम् ने मुझे आश्वासन दिया था कि अगर उसे नौकरी मिल जाए तो वे अपने माता . पिता को मना लेंगे.

दिन बीतने लगे और वो दिन भी आ गया जब शिवम् को एक अच्छी कंपनी में नौकरी भी लग गई, मैं बहुत खुश थी, हम हमेशा - हमेशा के लिए एक होने वाले थे, पर इधर कुछ दिनों से शिवम् मुझसे कुछ उखड़ा-उखड़ा रहने लगा था. मैं कुछ समझ ही नहीं पा रही थी कि शिवम् को ये अचानक क्या हो गया है. एक दिन शिवम् ने मुझे फोन करके एक पार्क में बुलाया, उसकी आवाज में कम्पन था, मैं किसी अनहोनी की आशंका से सिहर उठी, शिवम मेरे पास आया और कहने लगा - शिवानी, मेरी शादी तय हो चुकी है, मेरी होने वाले ससुर बहुत प्रतिष्ठित लोग है, उन्होने मुझे विदेश में आगे पढाने का जिम्मा लिया है, जहां मेरी प्लेस्मेन्ट भी हो जायेगी.शिवानी मैं इतनी अच्छी अपोर्चुनिटी नहीं छोड़ सकता था, हो सके तो मुझे माफ़ कार देना,आखिर हमे यथार्थ को समझना होगा.


शिवम् के जाने के बाद मैं कई घंटों तक बेसुध बैठी रही, जब मुझे होश आया तब मैं   अस्पताल में थी और मेरे माँ - बाबूजी मुझसे लिपट - लिपट के रो रहे थे. डाक्टर ने मुझे गर्भवती घोषित कर दिया था. मुझ पर गर्भपात का भारी दबाव पडा लेकिन मैं हिम्मत नहीं हारी, समाज के सामने स्त्री के चरित्र को इस तरह कमजोर साबित नहीं होने देना चाहती थी, सो मैंने उसे जन्म देने का निर्णय ले लिया और आज वह चिन्टू के रूप में मेरे सामने है.

मैं और मेरा परिवार अपनी जिन्दगी में अभी जाकर स्थायी हुये हैं, अतीत की काली परछाई ने कहीं अब जाकर पीछा छोड़ा है। बापू के देहांत के बाद चिंटू और मेरी माँ ही मेरी दुनिया है.

शुभेन्द्र जी! मैं ये सब आपको पहले ही बता देना चाहती थी पर मौका ही नहीं मिला, जाने - अनजाने मुझसे भूल हुई है और सच कहूं तो मैं कुछ क्षणों के लिये स्वार्थी हो गई थी, लेकिन जब बात शादी तक पहुंची तो मैं खुद को सच बताने से नहीं रोक पाई.

मैं आपको और अँधेरे में नहीं रख सकती, अब मैं ये शहर छोड़कर जा रही हू और इश्वर से मेरी ये प्रार्थना है कि वे आपको एक योग्य और अच्छा जीवन साथी दे. शुभेन्द्र जी, शादी एक या दो दिन का नहीं जन्मों का नाता है, मुझे बिना जाने- पहचाने, आप जो प्यार की दुहाई दे रहे है वह सिर्फ और सिर्फ एक आकर्षण है. और जब आपने दूसरी-तीसरी मुलाकात में ही शादी का प्रस्ताव मेरे सम्मुख रखा उसी समय मैं ये समझ गई थी,  मैं नहीं चाहती कि आप मुझ पर तरस खाकर कोई निर्णय ले या फिर मेरे आकर्षण में कोई फैसला कर लें  और जब खुमार उतर जाए तो तो आपको कोई पछतावा हो.

शुभेन्द्र जी ये रिश्ता न आपके घरवालों को, न आपके माता.पिता को और न ही समाज को ही मंजूर होगा. शुभेन्द्र जी 21वीं  सदी में अपने आपको मॉर्डन बताने वाला ये समाज आज भी कही न कही रुढ़िवादी है और मैं समाज के साथ लड़ना नहीं चाहती इसलिए नहीं कि इस समाज से  मैं डरती हूं बल्कि इसलिए की मैं अपना कीमती जीवन लड़ने में नहीं बिताना चाहती हूं.

मैं एक शिक्षित नारी हू, अकेले रहकर भी अपनी अस्मिता के साथ, ख़ुशी- खुशी अपना जीवन गुजार सकती हू, भूतकाल पर रोते रहने से अच्छा है भविष्य के सुनहरे सपने बुनना और वर्तमान को खुलकर जीना. शुभेन्द्र जी मैं अपने बेटे के समक्ष एक गलत  उदाहरण  प्रस्तुत नहीं करना चाहती.  किसी बच्चे को अपनाना अलग बात है, मगर उसे सच में पितृवत प्यार देना कठिन है,  मैं नहीं चाहती की मेरा बच्चा अपनी माँ को गलत समझे और कल को ग्लानि का अनुभव करे. वो जानता है उसकी माँ बहुत निडर और स्वाभिमानी स्त्री है और मैंने उसे पिता के बिना जीना सिखा दिया है.


शुभेन्द्र जी हमारे रिश्ते को यहीं विराम दीजिये और मुझे भूलकर अपने माता - पिता की मर्जी से विवाह कर लीजिये. एक बेहतर जिंदगी आप का इंतजार कर रही है, यही हमारे लिए अच्छा रहेगा और शुभेन्द्रजी मैंने तो प्यार कर लिया है वो एक ही बार होता है, यह बात अलग है कि शिवम् ने मुझे धोखा दिया. जो हुआ उसमे अकेला शिवम् ही जिम्मेदार नहीं है, मैं भी उतनी ही जिम्मेदार हू. उस पर जो आँख मूंदकर विश्वास किया उसकी सजा मुझे मिली पर चिंटू के रूप में भगवन ने मेरी झोली में खुशियां डाली है और वो मैं किसी के साथ नहीं बांटना चाहती.

दुनिया बहुत छोटी है शुभेन्द्र जी भाग्य में होगा तो फिर मिलेंगे, मगर एक अच्छे दोस्त की तरह.

यही मेरा निर्णय है.

शिवानी


शुभेन्द्र की आँखों में आंसू थे, वो आखिरी बार शिवानी से मिलना चाहता था. उसका दिल दुखाने के लिए माफ़ी मांगना चाहता था. स्टेशन पर पंहुचा तो ट्रेन छूट चुकी थी. वो जाती हुई ट्रेन को भीगी आँखों से देर तक देखता रहा और मन ही मन एक स्त्री के स्वाभिमान को सलाम कर रहा था, तत्क्षण वह उसके निर्णय पर नतमस्तक हो रहा था.

साक्षी दीक्षित

5 blogger-facebook:

  1. वाह स्त्री स्वाभिमान को सलाम्।

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  2. Sakshi ji bahut achhi kahani hai, isme samajik, aur marmik aur adhunik , teeno ki tikdi ne kamaal kar diya hai dhanyawad

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  3. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  4. मार्मिकता...आधुनिकता...को समेटी हुई कहानी.अच्छा लगा पढ़ कर.

    उत्तर देंहटाएं
  5. sakshi dixit1:20 pm

    aap sabhi ka bahut bahut aabhar ......

    उत्तर देंहटाएं

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