गुरुवार, 11 अगस्त 2011

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की कविताएँ

रखी रजाई बिस्तर पर

जाड़े में फिर धूप दिखाई रखी रजाई बिस्तर पर

बिटिया की है गोद भराई रखी रजाई बिस्तर पर्|

 

शोर शराबा हल्ला गुल्ला सुनकर मां भी खुश होती

बच्चे करते हाथापाई रखी रजाई बिस्तर पर|

 

बिजली बंद हुई तो बच्चे अम्मा अम्मा चिल्लाते

अम्मा ढूंढ़े दिया सलाई रखी रजाई बिस्तर पर|

 

कई दिनों से थे बाहर तो याद आज घर की आई

आये हैं भैया भौजाई रखी रजाई बिस्तर पर|

 

घर की चिल्ल चिल्ल पों सुनकर दादाजी के कान पके

ढूंढ़ रहे हैं अब तनहाई रखी रजाई बिस्तर पर|

--

भीतर की तन्हाई

थपकी दे दे हाथ थके

बच्चे को सुला नहीं पाया

उसका रोना उसके आँसू

मैं अब तक भुला नहीं पाया|

 

जो कई सदियों से गुमसुम सी

चुपचाप अकेली बैठी है

उस भीतर की तन्हाई का

मुँह अब तक खुला नहीं पाया|

 

आमंत्रण तो कई लिखे

लिखकर फाड़े फिर लिख डाले

सब व्यर्थ जेब में पड़े रहे

पर कभी डाक में न डाले

बस इसी अनिश्चितता से ही

सुधियों को बुला नहीं पाया|

 

अपने ही लोग कहा करते

यह जीवन एक भुलावा है

जो आँखों से दिखता हमको

सब का सब झूठ दिखावा है

माटी के खेल खिलौनों से

मन कभी नहीं बहला पाया|

 

ऐसे भी ढेरों लोग मिले

जो चढ़े हिमालय की चोटी

पर दिखे सेंकते सब अपनी

औरों की भट्टी पर रोटी

चेतन तो होते रहे लक्ष्य‌

जड़ता को हिला नहीं पाया|

---

2 blogger-facebook:

  1. वाह बहुत ही सुन्दर
    रचा है आप ने

    उत्तर देंहटाएं
  2. sakshi dixit1:40 pm

    bahut badhiya abhivyakti....

    उत्तर देंहटाएं

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