मंगलवार, 23 अगस्त 2011

योगेन्‍द्र वर्मा ‘व्‍योम' के कुछ नवगीत

नवगीत

क्‍या चचा तुमको पता है,

लोग ऐसा कह रहे

एक दहशत है अजब-सी,

आज अपने गाँव में

खुश बहुत होकर सुबह,

कोई मुझे बतला रहा

बेचकर गेंहूँ शहर से,

गाँव वापस आ रहा

आज हरिया भी नया,

रंगीन टी.वी. ला रहा

क्‍या चचा तुमको पता है,

लोग ऐसा कह रहे

अब न दिखलाई पड़ेगी,

लाज अपने गाँव में

आपदाओं से सदा,

करता रहा जो सामना

गाँव के बाहर पुराना,

पेड़ पीपल का घना

अब उसे ही काटने की,

बन रही है योजना

क्‍या चचा तुमको पता है,

लोग ऐसा कह रहे

लग रहा कोई गिरेगी,

गाज अपने गाँव में

-

नवगीत

अपठनीय हस्‍ताक्षर जैसे

कॉलोनी के लोग

सम्‍बन्‍धों में शंकाओं का

पौधारोपण है

केवल अपने में ही अपना

पूर्ण समर्पण है

एकाकीपन के स्‍वर जैसे

कॉलोनी के लोग

महानगर की दौड़-धूप में

उलझी ख़ुशहाली

जैसे गमलों में ही सिमटी

जग की हरियाली

गुमसुम ढ़ाई आखर जैसे

कॉलोनी के लोग

ओढ़े हुए मुखों पर अपने

नकली मुस्‍कानें

यहाँ आधुनिकता की बदलें

पल-पल पहचानें

नहीं मिले संवत्‍सर जैसे

कॉलोनी के लोग

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गीत

धीरे-धीरे सूख रही है

तुलसी आँगन में

पछुवा चली शहर से, पहुँची

गाँवों में घर-घर

एक अजब सन्‍नाटा पसरा

फिर चौपालों पर

मिट्टी से जुड़कर बतियाना

रहा न जन-जन में

स्‍वांग, रासलीला, नौटंकी,

नट के वो करतब

एक-एक कर हुए गाँव से

आज सभी गायब

कहाँ जा रहे हैं हम, ननुआ

सोच रहा मन में

नये आधुनिक परिवर्तन ने

ऐसा भ्रमित किया

जीन्‍स टॉप में नई बहू ने

सबको चकित किया

छुटकी भी घूमा करती नित

नूतन फ़ैशन में

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गीत

मुश्‍क़िल भरे कँटीले पथ पर

युवा स्‍वप्‍न घायल

मात्र एक पद हेतु देखकर

लाखों आवेदन

मन को कुंठित करती रहती

भीतर एक घुटन

बढ़ता जाता घोर निराशा का

दलदल पल-पल

मेहनत से पढ़कर, अपनाकर

केवल सच्‍चाई

बुधिया के बेटे को कहाँ

नौकरी मिल पाई

अपने-अपने स्‍वार्थ सभी के

अपने-अपने छल

रोज़गार के सिमट रहे जब

सभी जगह अवसर

और हो रहा जीवन-यापन

दिन-प्रतिदिन दुश्‍कर

समझ न आता निकले कैसे

समीकरण का हल

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गीत

नित्‍य आत्‍महत्‍या करती हैं

इच्‍छाएँ सारी

आय अठन्‍नी खर्च रुपैया

इस महँगाई में

बड़की की शादी होनी है

इसी जुलाई में

कैसे होगा ? सोच रहा है

गुमसुम बनवारी

बिन फोटो के फ्रेम सरीखा

यहाँ दिखावा है

अपनेपन का विज्ञापन-सा

सिर्फ़ छलावा है

अपने मतलब की ख़ातिर नित

नई कलाकारी

हर पल अपनों से ही सौ-सौ

धोखे खाने हैं

अंत समय तक फिर भी सारे

फ़र्ज़ निभाने हैं

एक अकेला मुखिया घर की

सौ ज़िम्‍मेदारी

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गीत

किसको चिन्‍ता किस हालत में

कैसी है अब माँ

सूनी आँखों में पलती हैं

धुंधली आशाएँ

हावी होती गईं फ़र्ज़ पर

नित्‍य व्‍यस्‍तताएँ

जैसे खालीपन काग़ज़ का

वैसी है अब माँ

नाप-नापकर अंगुल-अंगुल

जिनको बड़ा किया

डूब गए वे सुविधाओं में

सब कुछ छोड़ दिया

ओढ़े-पहने बस सन्‍नाटा

ऐसी है अब माँ

फ़र्ज़ निभाती रही उम्र-भर

बस पीड़ा भोगी

हाथ-पैर जब शिथिल हुए तो

हुई अनुपयोगी

धूल चढ़ी सरकारी फाइल

जैसी है अब माँ

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गीत

ढूँढ रहे हम पीतलनगरी

महानगर के बीच

यहाँ तरक़्‍क़ी की परिभाषा

यातायात सघन

और अतिक्रमण, अख़बारों में

जैसे विज्ञापन

नहीं सुरक्षित कोई भी अब

यहाँ सफ़र के बीच

हर दिन दूना रात चौगुना

शहर हुआ बढ़कर

और प्रदूषण बनकर फैला

कॉलोनी कल्‍चर

कहीं खो गया लगता अपना

घर नम्‍बर के बीच

ख्‍याति यहाँ की दूर-दूर तक

बेशक फैली है

किन्‍तु रामगंगा भी अपनी

बेहद मैली है

कोशिश भी कुछ नहीं दीखती

किसी ख़बर के बीच

--

 

नाम : योगेन्‍द्र कुमार वर्मा

साहित्‍यिक नाम : व्‍योम'

पिता का नाम : स्‍व0 श्री देवराज वर्मा

जन्‍मतिथि : 09ण्‍09ण्‍1970

शिक्षा : बी.कॉम.

सृजन : गीत, ग़ज़ल, मुक्‍तक, दोहे, कहानी, संस्‍मरण आदि

कृति : इस कोलाहल में (काव्‍य-संग्रह)

प्रकाशन : प्रमुख राष्‍ट्रीय समाचार पत्रों, साहित्‍यिक पत्रिकाओं

तथा अनेक काव्‍य-संग्रहों में रचनाओं का प्रकाशन

प्रसारण : आकाशवाणी रामपुर से अनेक बार कविता कार्यक्रम

प्रसारित

सम्‍प्रति : लेखाकार (कृषि विभाग, 0प्र0)

विशेष : संयोजक - साहित्‍यिक संस्‍था अक्षरा' , मुरादाबाद

सम्‍मान : काव्‍य संग्रह इस कोलाहल में' के लिए भाऊराव देवरस सेवा न्‍यास

लखनऊ द्वारा पं0 प्रताप नारायण मिश्र स्‍मृति सम्‍मान-2009'

पत्राचार एवं स्‍थायी पताः ।स्‍.49, सचिन स्‍वीट्‌स के पीछे, दीनदयाल नगर फेज़-प्रथम्‌,

काँठ रोड, मुरादाबाद-244001 (0प्र0)

ई-मेल :

vyom70@yahoo.in

(योगेन्‍द्र वर्मा व्‍योम')

1 blogger-facebook:

  1. व्योम जी की रचनाएँ सारगर्भित और सुन्दर हैं। हार्दिक बधाइयाँ।

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