संजय दानी की ग़ज़ल - कोई हुस्न कोई जाम की बाहों में, जिसकी जो औक़ात ज़माने को क्या...

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

हम दोनों गर साथ ज़माने को क्या,
दिन हो या रात ज़माने को क्या।

आज चराग़ों और हवाओं की गर,
निकली है बारात ज़माने को क्या।

बरसों हुस्न की मज़दूरी कर मैंने,
पाई है ख़ैरात ज़माने को क्या।

साहिल से डरने वाले गर लहरों,
को देते हैं मात ज़माने को क्या।

कोई हुस्न कोई जाम की बाहों में,
जिसकी जो औक़ात ज़माने को क्या।

मैं ग़रीबी में भी ख़ुश रहता हूं,ये
है ख़ुदाई सौग़ात ज़माने को क्या।

ग़ैरों का जंग छुड़ाये ठीक अगर
अपने करें आघात ज़माने को क्या।

शाम ढले घर आ जाया करो बेटे,
ये समय है आपात ज़माने को क्या।

चांद वफ़ा का शौक़ रखे दानी पर,
चांदनी है बदज़ात ज़माने को क्या।

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "संजय दानी की ग़ज़ल - कोई हुस्न कोई जाम की बाहों में, जिसकी जो औक़ात ज़माने को क्या..."

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.