बुधवार, 24 अगस्त 2011

शंकर लाल की कविता - पर्वत, सूरज, चाँद और तारे इतने ऊँचे कैसे सारे...?

 

र्वत, सूरज, चाँद और तारे
सोचो तो कभी
ये पर्वत
ये सूरज, चाँद और तारे
इतने ऊँचे कैसे हैं
ये सारे के सारे ?
सोचो तो कभी ...

देखो तो  लगता है 
ये नि:स्वार्थ और सच्चे हैं
इसीलिए शायद
ये इतने ऊँचे हैं।

देखो तो ये पर्वत
बर्फ सीने पर सहता है
पानी मिले जीवों को
इस के लिए ये
बादल से टक्कर लेता है।

देखो तो ये चाँद और तारे
दिखते है कितने प्यारे
जीवों को गहरी नींद मिले
इस के लिए ये
रात भर पहरा देते हैं सारे।

देखो तो ये सूरज प्यारा
लगता है कितना न्यारा
जीवों को उजियारा मिले 
इस के लिए ये
कब से खुद को 
जला रहा बेचारा।

सोचो तो कभी ये सारे 
बिना शिकायत  
जनसेवा में लगे हुए हैं
अपने जन्म से 
देखो तो ये कितने
नि:स्वार्थ और सच्चे हैं
इसीलिए शायद
ये इतने ऊँचे हैं।
       ---- शंकर लाल इंदौर (मध्यप्रदेश)

..Shankar Lal Kumawat
140/4 Sukhsagar Apartment
Indore
MSc. Physics

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------