गुरुवार, 25 अगस्त 2011

दिनेश पाठक शशि का व्यंग्य - सावन बीता जाय...

दिनेश पाठक शशि

लीजिए साहब सावन भी बीत गया। सावन यानि हरियाली। कहावत है न कि सावन के अंधे को हरा ही हरा दीखता है लेकिन जिसका सावन ही बीत गया हो उसे कैसे हरा-हरा दिखाई दे सकता है?

आजकल कई लोगों के सावन बीते जा रहे हैं या जबरदस्ती बिता दिए जा रहे हैं। आप नहीं भी चाहें तो भी आपका सावन बिता दिया जायेगा यदि आप प्रेम मिलाप की जगह गड़े मुर्दे उखाड़ने या फिर ‘‘तू कौन ? मैं खाँ में खाँ’’ की भाँति किसी के फटे में अपनी टांग अड़ायेंगे तो। फिर चाहे आप कोई बाबा-फकीर हों या फिर कोई बिजारे-पजारे।

आप कितना भी कहिए लेकिन फिर भी कुछ लोगों की आदत ही ऐसी होती है कि वे किसी के फटे में अपनी टांग अड़ाने से बाज आते ही नहीं।अब देखिए, सब कुछ अमन-चैन से बीत रहा था।‘‘चैन से सो रहा था मैं... की स्टाइल में देश भी चैन की बंसी बजा रहा था कि देश-विदेश में लोग अपने-अपने स्वास्थ्य को बनाने में लगे थे और टायलेट क्लीनर से मंद-मंद मुस्कराते हुए अपने-अपने टायलेट को क्लीन कर रहे थे। चलो यहाँ तक तो ठीक था पर कहते हैं न कि जब गीदड़ की मौत आती है तो वह गाँव की ओर भागता है। ऐसी ही हरकत जब कुछ लोग कर बैठते हैं तो उनकी बुध्दि पर तरस आता है। अब ये अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा ही हुआ न?

सेाते शेर को आप जगायेंगे तो आपका सावन बिता देने में उसे कितनी देर लगनी है, मौका लगते ही आपकी टें बुलवा देने से उसे कौन रोक सकता है? आखिर वह शक्तिशाली है तभी तो वनराज कहलाता है यानि सारी पावर उसके पास है वह चाहे जिस तरह आपका सावन बिता दे, जरा सी देर में। क्योंकि इस बात को तो बरसों पहले बाबा तुलसीदास जी भी लिख गये हैं कि-‘‘समरथ को नहि दोष गुंसाईं’’ यानि समरथ जो करे वह सब सही और कमजोर जो करे सो सब गलत। चाहे झरने का पानी मैंमने ने पीया हो या फिर मैंमने की माँ ने, भेड़िए को तो मैंमना खाना है, वह खायेगा। समरथ को नहि दोष गुंसाईं।

कहावत है न कि कमजोर की जोरू सबकी भौजाई।’’। लेकिन भौजाई ने अपने को कमजोर न समझने की भूल कर दी और मजाक-मजाक में चलती टायलेट क्लीनर से भेड़िए को सही रास्ता दिखाने की भूल कर दी। कभी-कभी मजाक-मजाक में कही गई बात भी कितने घाव कर देती है इसलिए कितने ही भेड़िए, कितने ही दिन से मौके की तलाश में कितनी तरह से घात लगाये थे मजाक की बातों पर, इसका भी जरा सा ख्याल नहीं किया और घुसेड़ दिया ततैया के छत्ता में अपना हाथ। फिर क्या होना था? सावन तो बीतना ही था।

प्रजातंत्र का मतलब ये थोड़ा ही है कि तुम वनराज को भी गीदड़ बताने लगो। फिर तो तुम बिल्कुल ही स्वतंत्र हो गये। आखिर हम भी तो मुखिया हैं। हमारे पास भी तो कुछ अधिकार सुरक्षित हैं जब तक हम चाहेंगे तुम्हारी आँखों को हरा-हरा दिखायेंगे और जब नहीं चाहेंगे तो सावन बीतते कितनी देर लगेगी। माना कि तुम जनता के बड़े हितैषी हो पर भैया जल में रहकर कभी मगर से बैर किया जाता है?

अब तुम ही बताओ, जिनके पैसों के दम पर या जिनके दम के दम पर हम वनराज बन पाये, उन्हीं से पंगा लेकर क्या हमें अपनी प्रति ठा और पद गंवाना है। आखिर उनका भी हमारे उपर उतना ही अधिकार है क्योंकि हमें वनराज बनाने में असली भूमिका तो उन्हीं की होती है। फिर आप तो जानते ही हो कि बिना खाये-पीए कौन हुआ-हुआ...करता है? तो फिर अपनी सात पीढ़ियों को तारने और बार-बार जायज-नाजायज पद ग्रहण करने के लिए हमें भी तो उनके लिए कुछ करना पड़ेगा क्योंकि भैंस भी तो युगों-युगों से लाठी वाले के ही पास रहती आई है वरना कोई भी हांक ले जायेगा।
तो भैया अब सावन बीत गया चुपचाप चक्की चलाओ और पीसो आटा वरना साइलेंसर लगे खिलौना से पिट्ट होने में कितनी देर लगती है। वो तो अपने उपर हमारा बहुत बड़ा अहसान मानो कि प्रजातंत्र की बदौलत आपको सांस लेने की और बोलने की इजाजत दे दी गई है पर भैया मेरे, पुरानी कहावतों का भी तो ध्यान रखो। कैसी अच्छी-अच्छी बातें लिख गये हैं हमारे पूर्वज,-‘सत्यं ब्रूयात, प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात सत्यं प्रियम्’ ’’सत्य बोलो, प्रिय बोलो, अप्रिय लगने वाला सत्य भी मत बोलो।’’

अब बताइये कितने बरस पहले की बात है ये? कैसे समझदार हुआ करते थे हमारे पूर्वज? कम से कम अपने पूर्वजों की ही बात की लाज रखो, अप्रिय सत्य बोलकर अपना और अपने पूर्वजों के नाम का सावन बिताने पर क्यों तुले हुए हो?

आजकल तो वैसे ही अन्न और जल इतना प्रदूषित हो गया है कि जिसे खाकर नई जैनेरेशन भी संकर बाजरा सी पैदा हो रही है जो न अपने माँ-बाप का लिहाज कर रही और न सास-ससुर का। उनकी नजर में बुजुर्ग अब बुर्जुआ हो गये हैं। सठिया गये हैं या फिर दकियानूस हो गये हैं जो नई जैनेरेशन की कद्र ही नहीं करते। हर समय उन्हें अपने समय के किस्से सुनाते रहते हैं कि हम तो रात को रोजाना अपने माँ-बाप के पैर दबाते थे। सास-ससुर की सेवा करते थे। मजाल है कभी सास-ससुर या जेठ-जिठानी की आज्ञा के बिना घर की ड्यौढ़ी से एक कदम भी बाहर निकाला हो या उँचे स्वर में बोला हो।
अब इनसे पूछिए कि कौन सा बड़ा काम कर दिया इन्होंने? अरे, पढ़े नहीं। लिखे नहीं। उँचे स्वर में किस बात पर बोलते? या फिर घर की ड्योढ़ी से बाहर निकल कर ,रास्ता भी ढ़ूढ़ पाते क्या कहीं का?

आज नई जैनेरेशन पढ़ी है। लिखी है। गुनी है और धुनी है। वह जानती है कि बुर्जुआ बुजुर्गों के पास उनके बराबर ज्ञान कहाँ और कहाँ है इतना अनुभव?सारा ज्ञान और सारे अनुभव तो ये को-एजूकेशन में बखूबी प्राप्त कर चुके हैं। इन्हें पता है कि घर की ड्योढ़ी से निकलते ही कितने रास्ते कहाँ-कहाँ को जाते हैं । फिर ये एक ही खूँटे से क्यों बँधे रहें? और पैर-फैर दबबाने का ज्यादा ही शौक है तो आजकल विज्ञान ने हर चीज मुहैया करा दी है। पैर दबबाने वाली एक मशीन खरीद लो अपने पैसों से या फिर रख लो कोई नौकर जो रोजाना चप्पी कर जाया करे । आखिर युवावस्था में इनका सावन बीत जाय , ऐसा रंग में भंग करने पर क्यों तुले हुए हो?

सावन के महीने में अब शहर तो शहर गाँव की छोकरियाँ भी अपने गाँव नहीं जातीं। आखिर क्या धरा है गाँव में अब? ‘‘नींम की निब्बोरी सावन बेगि अइयो रे.....’’वाली मल्हार गाने के लिए नींम की निब्बोरी तो तब पकेगी जब नीम के पेड़ बचे हों गाँवों में या गाँव के चौराहे पर मिल बैठने की फुरसत हो किसी के पास, फिर -‘‘अजहू न आये बालमा, सावन बीता जाय...’’कहने की तो जरूरत ही नहीं, क्योंकि बिटिया के मम्मी-डैडी ने बड़ी मेहनत से ऐसा ‘घर’ और ‘वर’ खोजा होता है जिसमें वर के सब घर वाले बहुत ही सीमित संख्या में हों और हों भी तो वर ऐसा ‘सुवर’ हो कि व्याहते ही उनकी बिटिया को लेकर, अपने माँ-बाप को सिंगट्टा दिखाकर फुर्र हो जाये, जहाँ उनकी बिटिया का ही एकक्षत्र राज हो। उसका बालमा उसके इशारे पर ही उठे-बैठे और घर के काम के नाम पर उनकी बिटिया को हाथ भी न हिलाना पड़े। यहाँ तक कि दोनों वक्त के भोजन के लिए भी रोज होटल जिन्दाबाद रहे।

शहर में पिज्जा और बर्गर,इडली और मशाला डोसा, पावभाजी और मैगी, सबकुछ चाट-पकौड़ी उपलब्ध है फिर क्या धरा है गाँव में? सावन का हरा ही हरा जब शहर में उपलब्ध है वो भी बिना हाथ-पैर हिलाए तो फिर क्यों जाये वो सावन के महीने में गाँव के किचकंद में अपने पैर मैले करने?

गाँव की कच्ची और कीचड़युक्त गलियों में रेंगते कैंचुआ और गिजाइयों में अपने मखमली पैरों को गंदा करने? जबकि शहर में सब चीजों का हरा ही हरा नजर आता हो। सावन तो सास-ससुर का बीत रहा होगा गाँव में, जब बुढ़ियात में ठोकनी पड़ रही होंगीं अपने हाथ से रोटी । अब बहू तो बहू ही है कोई घर की नौकरानी तो है नहीं कि दिनभर सास-ससुर की सेवा में ,कोल्हू के बैल की तरह जुती रहे।

अब तो ससुराल भेजने से पहले माँ-वाप ही इतना समझदार बना देते हैं कि बिटिया सबके कान कुतरे। फिर भी कोई कमी रह जाये भूल-चूक से, तो थोड़े ही दिनों में एकता कपूर के टी.वी. सीरियल्स समझदार बना देते हैं कि कैसे ससुराल वालों की नींद हराम की जा सकती है।

इतने पर भी यदि सास-ससुर की बुध्दि कहीं चरने चली जाये और भूल-चूक से वो अपनी प्रिय पुत्र-वधू को प्यार जताने लगें, उसे छोटी-मोटी कोई सेवा बताकर, तो धारा ४९८ बी का सहारा बहुत है। आप लाख मना करते रहिए कि आप तो शुध्द शाकाहारी हैं। दहेज जैसी प्रथा से तो कोसों दूर भागते हैं। पर आपकी लाड़ली बहू ने आपसे जेल में चक्की न चलवाई तो असली माँ-बाप की नहीं । आखिर ये धारा किस दिन के लिए बनी है?

आप भले ही रिश्तों में सुगन्ध खोजते फिरें लेकिन यदि बहू से जरा सा भी काम कराने की भूल करदी तो समझो रिश्तों में खटास आने में और आपका सावन बीतने में देर नहीं लगेगी।

अब बहू पुराण से हटकर आइये, प्रकाशक एवं साहित्यकार पुराण पर भी चर्चा कर ली जाय। साहित्य से जुड़े जीवों का सावन बिताने में हमारे देश के महान प्रकाशक भी किसी से पीछे नहीं। एक से एक पहुँचे हुए कलाकार। बड़े से बड़े प्रकाशक के पास जाइये या फिर छोटे से छोटे के पास, एक बात की समानता दोनों में पाई जाती है। वह ये कि दोनों ही आपके आगे किताबों के बिक न पाने का रोना रोयेंगे,-‘बिकती ही नहीं । कोई खरीदता ही नहीं।’
बस एक ही रट आपके सामने लगायेंगे फिर भी उनपर लक्ष्मीजी की कृपा देखिए कि उनकी छापी किताबें न बिक पाने के बावजूद, उनकी कोठियों की मंजिलों व कारों की संख्या बढ़ती ही जाती है। जिस शहर में एक बड़े से बड़ा लेखक एक छोटा सा जमीन का टुकड़ा खरीदने की हिम्मत नहीं जुटा पाता वहाँ ये प्रकाशक महोदय, जो किताबें न बिकने का रोना रोते ही रहते हैं, आलीशान, गगनचुम्बी हवेलियाँ बनाकर रहते हैं जबकि किताबों की बिक्री के अलावा और कोई खेती नहीं करते ये। पर बेचारे साहित्यजीवी का सावन कैसा बिताते हैं ये प्रकाशक बन्धु, काबिले तारीफ है इनकी कला।बड़े से बड़े साहित्यकार को भी ऐसा उल्लू बनाते हैं कि बेचारा साहित्यकार, प्रकाशक को अपने से भी अधिक बिचारा समझ कर ,धोबी के गधे की तरह खूब सेवा करता है इनकी।

रात-रात भर जागकर कागज काले करता है। कीमती समय के साथ टाइपिंग में पैसा खर्च करता है। दिमाग लगाता है और फिर उस दिन-रात की मेहनत, कागजों को चुपचाप प्रकाशक को लाकर सौंप देता है, मुफ्त में। इतना ही नहीं , लेखक के इतने श्रम की कमाई को मुफ्त में हथिया लेने के बावजूद प्रकाशक को सन्तुष्टि नहीं होती क्योंकि उस मुफ्त में हथियाई सामग्री को पुस्तक के रूप में लाने के लिए भी प्रकाशक को लेखक का ही पैसा चाहिए। सो भैया, येनकेन प्रकारेण, उल्टा-सीधा जोड़-घटाना बताकर लेखक से ही उस सामग्री को पुस्तक रूप में लाने के लिए भी पैसा हथिया लेता है, ठीक परजीवी अमरबेल की तरह। हर्र लगे न फिटकरी, रंग चोखा आये।

इतने पर भी प्रकाशक को सन्तुष्टि नहीं होती तो वह लेखक का सावन पूरी तरह ही बिता कर दम लेता है यानि लेखक से प्रकाशन सामग्री और पैसा ले लेने के बावजूद कई-कई बरस तक लेखक को आश्वासन की घुट्टी पिला-पिलाकर उसे पश्त करने के बाद ही उसकी पुस्तक प्रकाशित करके देता है।
इस सबके बावजूद निरीह साहित्यकार, अपने लिखे हुए को पुस्तक रूप में देखकर धन्य हो जाता है और प्रकाशक को धन्यवाद देते हुए अपनी पुस्तक को मित्रों में बांट-बांट कर प्रसन्न हो लेता है।

बड़े-बड़े साहित्यकारों को प्रकाशक द्वारा सताये जाने के किस्से उनकी जुबानी सुने हैं मैंने। ऐसे-ऐसे साहित्यकार जो साहित्याकाश में छाये हुए हैं। जिनकी कृतियों पर खूब चर्चाएँ हुई हैं और अनेक साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत व सरकार से पद्मश्री तक पाई है पर प्रकाशक नाम के जीव के अण्टे से वे भी नहीं बच पाते।

प्रकाशक एक ऐसा जीव है जो जोंक की भाँति, साहित्यकार के खून को चूस-चूस कर मोटा होता रहता है। इस पर भी मजेदार बात ये कि प्रकाशक द्वारा सरेआम सावन बिताने के बावजूद साहित्यकार दौड़-दौड़ कर प्रकाशक के पास जाता है कि आओ और हमसे चिपककर हमारा सारा खून पी जाओ क्योकि सारा खून चूस लेने के बाद जब प्रकाशक, साहित्यकार की पुस्तक को जन्म देता है तो साहित्यकार को उसी तरह के सुख की अनुभूति होती है जैसे प्रसव पीड़ा के बाद नन्हे शिशु के जन्म के साथ ही माँ को सुख मिलता है। इस बात से प्रकाशक नामधारी जीव भली-भाँति परिचित होता है इसलिए वह अनेक हथकंडों द्वारा साहित्यजीवी को मकड़ी के जाल की भाँति ही फांसने में सिध्दहस्त होता है।

साहित्यकार बेचारा सब कुछ समर्पण के बाद भी अपनी पुस्तक के इन्तजार में बस इतना ही गाता है-‘‘अजहू न आयी बुक मेरी, सावन बीता जाय।’’

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डॉ.दिनेश पाठक शशि
२८,सारंग विहार, मथुरा-२८१००६
ईमेल-drdinesh57@gmail.com

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