मंगलवार, 23 अगस्त 2011

एस के पाण्डेय का व्यंग्य : दबने-दबाने के फायदे और नुकसान

 

जुर्बेकार बताते हैं कि कई काम दबाव में आसानी से हो जाते हैं। बस ढंग से दबाना या दबवाना आना चाहिए। अनुभवी कहते हैं कि अगर कहीं दाल आसानी से न गले तो दबाव डालने पर गलने लगती है। इससे कौन इंकार कर सकता है। प्रेशर कूकर में भी दाब के कारण ही दाल जल्दी गल जाती है। ऊँचाई (जैसे किसी पहाड़ ) पर दाल जल्दी नहीं गलती। वहाँ पतेली-बटुली कारगर नहीं रह जाती। वहाँ अधिक दाब चाहिए होता है। इसलिए वहाँ बिना प्रेशर कूकर के दाल गलाना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसी तरह ऊँचे लोगों के यहाँ सबकी दाल जल्दी नहीं गलती वहाँ जादा दाब की जरूरत जो होती है। यही कारण है कि वहाँ पतेली-बटुली वाले यानी आम आदमी की दाल बिल्कुल नहीं गलती।

कोई दबाता है। कोई दबता है। जो ज्यादा से ज्यादा लोगों को दबा ले जाता है। उसका दबदबा हो जाता है। जो दबता जाता है, उसे हर कोई दबाता है। कुछ लोग दबाकर सुख पाते हैं और कुछ लोग दबकर। सास सोचती है कि बहू को दबाकर रखूँ वरना यह सिर पर चढ़ जायेगी। इसलिए सासुएँ बहुओं को दबाना शुरू कर देती हैं। लेकिन बहुएं नहीं दबती क्योंकि ये सास के बेटे यानी अपने पति को दबाना शुरू कर देती हैं और वह दबता जाता है। इसलिए बहुएँ सोचती हैं कि यहाँ तो सब दब्बू हैं। जब सास के जवान बेटे की यह दशा है तो बूढ़ी सास की दुर्दशा होगी ही। नाहक में लोग कहते रहते हैं कि जरा सा भी अदब नहीं करती।

कुछ विद्वानों का कहना है कि दबाने वाले का फायदा और दबने वाले का नुकसान होता है। लेकिन यह बिल्कुल सच नहीं है। सच तो यह है कि कभी दबाने से फायदा तो कभी दब जाने में ही फायदा होता है। इसी तरह कभी-कभी दबाने पर नुकसान तो कभी दब जाने पर नुकसान होता है। कब, किसका, कहाँ, क्या और कौन दबाता है ? इन सब बातों का गहरा असर होता है।

कई लोग भीड़ में मौका देखकर दबा जाते हैं। कभी-कभी लेने के देने भी पड़ जाते हैं। लेकिन अक्सर सफलता ही हाथ लगती है।

कई लोग सुरंग में काम करते-करते दब जाते हैं। कई लोग भवनों आदि के मलबे में दब जाते हैं। कई लोग असावधानी बस सड़क पर दब जाते हैं। अथवा असावधानी बस दबा दिए जाते हैं। कई लोग भगदड़ में दब जाते हैं। अक्सर ऐसी घटनाएँ सुनने को मिलती रहती हैं। इन स्थितियों में भी कई लोग फायदा निकाल लेते हैं। कुछ तो जेब टटोल कर काम चला लेते हैं। कई लोग राहत के नाम पर चंद रूपये देकर अपने फर्ज से पल्ला झाड़ते हैं और ऊपर से वाहवाही लूटते हैं।

बड़ी-बड़ी विकास-योजनाएं दब जाती हैं। क्योंकि लोग पैसा दबा लेते हैं। हत्या व रेप जैसे कांड दबा दिए जाते हैं और आसानी से दब भी जाते हैं। दबने-दबाने का किस्सा अजीब है। कोई चोर तो कोई पुलिस से दबा हुआ है। कोई नेता से तो कोई अभिनेता से दबा हुआ है। कोई महात्मा से तो कोई आत्मा से तो कोई परमात्मा से दबा हुआ है। कोई पति से, कोई पत्नी से तो कोई सास-ससुर से तो कोई बेटे से तो कोई बेटी से दबा जा रहा है।

बड़े-बड़े राजनेता भी, जो देश चलाते हैं, दबे होते हैं। कई नेता अपने ही देश के नहीं बल्कि दूसरे देश के दबाव में काम करते हैं। प्रधानमंत्री तक स्वतंत्र नहीं होते। उन्हें भी दबाव में काम करना पड़ता है। खिचड़ी सरकार की तो यही नीयति होती है।

कई लोग दाम से दब जाते हैं। पहले भले ही बड़बड़ाते रहें कि ऐसा नहीं हो सकता, यह नहीं हो सकता, वह नहीं हो सकता। लेकिन दाम देखते ही बड़बड़ाना बंद। जो नहीं भी करना अथवा कराना होता है। वह भी कर देते अथवा करा लेते हैं।

दाम से जबान भी दब जाती है। कितनों की सांस तक दबा दी जाती है। एक दरोगा जी का बड़ा नाम था। गए किसी चोर को दबाने और चले आये जेब दबाकर। पहले फायदा हुआ बाद में नुकसान। क्योंकि किसी ने जेब दबाते समय उनका चित्र ले लिया था।

कई लोग नाम से दब जाते हैं। नाम सुनकर तो कई लोग घरों में दुबक जाते हैं। रुपया-पैसा तक निकालकर सौंप देते हैं। कई काम जो नहीं होने वाले होते। वे नाम सुनते ही आनन-फानन में सम्पन्न हो जाते हैं। लेकिन कोई ऐरा-गैरा नाम नहीं कोई वजनी नाम होना चाहिये। जिससे खासा दबाव पड़ सके। अन्यथा काम बनने के बजाय बिगड़ भी सकता है।

कई लोग काम से दबे होते हैं। कहते रहते हैं कि इतना काम है कि सांस लेने की भी फुर्सत नहीं है। खैर सांस लेना कहाँ पड़ता है ? यह तो अपने आप चलती रहती है। अगर सांस लेने पर मिलने लगे तो लोग मरें ही न और जैसे अन्य लेने वाली चीजों के लिए भीड़ लगती है वैसे ही सांस लेने के लिए भी भीड़ लगी रहे। जैसे कोई कंजूस, चाहे उसके घर में कुबेर का खजाना ही क्यों न हो, कहता रहता है कि एक एक पैसे को मोहताज हूँ। ठीक इसके विलोम तर्ज पर काम चोर हमेशा काम से दबे होने का रोना पीटते रहते हैं। चाहे करने के लिए कुछ भी न हो।

कई लोग कर्ज से, कई मर्ज से, कई फर्ज से तो कई लोग गर्ज से दबे होते हैं। आजकल फर्ज से दबने वाले बिरले ही होते हैं। कई तो फर्ज शब्द से ही चिढ़ते हैं। उन्हें कोई बताना चाहे कि आपका भी कुछ फर्ज है तो लड़ने को तैयार हो जाते हैं। गर्ज से दबने वाले तो अनेकों हैं। वैसे तो चाहे हमेशा सीना तान कर चलें और कभी भी सीधे मुँह बात न करें। लेकिन गर्ज आते ही दब जाते हैं। सीने की चौड़ाई भी कम हो जाती है। और मुँह भी सीधा हो जाता है। रही कर्ज और मर्ज से दबने की बात तो यह आम आदमी, मजदूरों और किसानों के हिस्से में ज्यादा आता है।

कई लोग मँहगाई से दबे जा रहे हैं। दो जून की रोटी पर भी खतरा मड़रा रहा है। महँगाई डाइन दबाती चली जा रही है। लोग दबते जा रहे हैं। दबते-दबते कहाँ जाकर पहुँचेगें कहना मुश्किल है। शुक्र है कि बड़े लोगों की ओर देखती नहीं है। नहीं तो खुद दबा दी जाती। उन्हें ज्यादा देखती है, जिनकी ओर कोई नहीं देखता। मतलब उन्हें ही ज्यादा दबाती है, जो पहले से ही दबे हैं।

कई लोग टैक्स से दबे जा रहे हैं। इतने दबे हुए हैं कि बैंक में पैसा रखते हुए घबराते हैं। कई लोग इतना घबरा जाते हैं कि अपने देश से परे विदेश में ले जाकर जमा कर देते हैं।

कई लोग शरम से दबे होते हैं। लाज-शरम न होती तो क्या-क्या न होता ? धीरे-धीरे होना शुरू भी हो गया है। क्योंकि शरम के भरम में पड़ने वाले कम होते जा रहे हैं।

कई लोग धर्म से दबे होते हैं तो कई लोग धर्म के नाम पर दबाते भी हैं।

कई लोग प्यार से दबे होते हैं। प्यार न हो तो पता नहीं क्या कर डालें ? कई लोग प्यार करने वालों से दबे होते हैं। खास कर लड़कियाँ। जब कई लोग एक ही लड़की से प्यार का जंगे-एलान कर रहे हों तो दबना लाजिमी ही है। वहीं कितने ही लोग प्यार करते समय नहीं दबते। जब प्यार हो जाता है अथवा जब प्यार का फल आने को होता है तो दबने लगते हैं। ऐसी स्थिति में कितने ही इतने दब जाते हैं अथवा दबा दिए जाते हैं कि पता ही नहीं चलता कि कहाँ दब गए ?

कितने ही लोग मार से दबे होते हैं। कहते हैं कि मार के डर से भूत भी भागते हैं। कई लोग मार से भागते हैं तो कई लोग मारकर भागते हैं। कई लोग मार से जागते भी हैं। मार के डर से दबे न होते तो अब तक कितने ही लोग क्या-क्या न कर गुजरते ? कहाँ तक यह किस्सा जारी रखा जाय ?

कुल मिलाकर यह कहना झूठ नहीं होगा कि हर कोई दबा हुआ है अथवा किसीका या किसीको दबाए हुए है। जहाँ एक ओर कोई किसी को दबाकर फायदा कमा रहा है तो कोई दबकर ही अपना चाँदी कर रहा है। वहीं दूसरी ओर कोई दबकर रो रहा है तो कोई दबाकर। आप भी सोच कर देखिये या तो दबे होंगे अथवा किसी ना किसी का दबाए होंगे। भले ही थोड़ा ही सही।

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डॉ एस के पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।

BLOG: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

URL: https://sites.google.com/site/skpandeysriramkthavali/

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