मंगलवार, 23 अगस्त 2011

सतीश कसेरा की कविता : आग क्यूं उठती नहीं है!

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आग क्यूं उठती नहीं है!

वो तो बैठे हैं किलों में

घुट रहे हो तुम बिलों में

आग क्यूं उठती नहीं है

आपके मुर्दा दिलों में!

 

बन गए रक्षक ही भक्षक

आप केवलमात्र दर्शक!

हाथ पर बस हाथ रक्खे

तुम बने बैठे हो बेबस

अब तो उठ्ठो ऐसे जैसे

ध्रती कांपे जलजलों में

आग क्यूं उठती नहीं है.......!

 

देश सेवा के ये ध्ंधे

उजले कपड़ों में दरिंदे

भेड़ियों से नौचते हैं

भ्रष्ट नेता और कारिंदे

क्यूं नहीं तुम शेर बनते

रहना है गर जंगलो में

आग क्यूं उठती नहीं है.......!

 

बरसों से मिमिया रहे हो

कसमसाए जा रहे हो

वेदना को घोट अंदर

कैसे जीये जा रहे हो

क्यों नहीं अब चीखते हो

रूंध् चुके अपने गलों से

आग क्यूं उठती नहीं है.......!

 

कुरूक्षेत्र सज गया है

शंखनाद हो गया है

उठके अर्जुन युद्ध कर अब

निर्णय का वक्त आ गया है

मुक्त कर भारत की भूमि

भ्रष्टाचारी बंधनों से

आग क्यूं उठती नहीं है.......!

 

...सतीश कसेरा

अबोहर;पंजाब

1 blogger-facebook:

  1. वाकई शंखनाद हो गया है.....
    बहुत सुंदर....

    उत्तर देंहटाएं

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