मंगलवार, 9 अगस्त 2011

उमेश मोहन धवन की लघु-कथा - अंततः

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"यार इस लड़के का तुम्हीं कुछ करो आवारा लड़कों की सोहबत में कुछ ऐसा पड़ा कि हाईस्कूल भी नहीं कर पाया. आज भी वही सब हरकतें हैं. सारा दिन आवारागर्दी दादागीरी बस. आखिर यह सब कब तक चलेगा. तुम इसे कहीं चपरासी की ही नौकरी लगवा दो तो बड़ा अहसान होगा."

मेरे पुराने मित्र नन्दलाल जी अपने पुत्र नरेश के लिये काफी चिंतित थे.

"क्यों नरेश कहीं प्रयास तो किया होगा ?"

मैने पूछा तो नरेश ने उत्तर दिया "जी हां अंकल जी कई जगह गया. वे कहते हैं कि मैं योग्य नहीं हूँ. मुझे काम का कोई अनुभव भी नहीं है और मेरे चरित्र की गारण्टी कौन देगा."

" नन्दलाल जी मेरे यहाँ तो कोई जगह नहीं है पर अन्य जगह प्रयास करूंगा." एक झूठा आश्वासन देकर मैने उन्हें दरवाजे तक छोड़ा.

शहर में स्थानीय निकायों के चुनाव घोषित हो चुके थे. अचानक मेरी नजर दीवार पर चिपके एक पोस्टर पर पड़ी जिसमें नरेश की तस्वीर थी.

"आवारा लड़का बाप का पैसा ऐसे बर्बाद कर रहा है. इसी पैसे से कोई चाय या पान की दुकान खोल लेता तो अपने साथ-साथ अपने बाप का भी भला करता" मैं बुदबुदाते हुये दफ्तर चला गया.

एक दिन सुबह कई लड़कों के साथ नरेश हाथ में मिठाई का लिये मेरे दरवाजे पर खड़ा था. मेरे पैर छूकर वह बोला "अंकल जी मैं चुनाव जीत गया. अब आपको अगले पांच साल तक मेरे लिये नौकरी ढूंढने की कोई जरूरत नहीं है."

मैं हैरानी से उसे देख रहा था. मैं सोच रहा था, जो व्यक्ति एक छोटी सी नौकरी के भी योग्य नहीं समझा गया, जिसे काम का कोई अनुभव भी नहीं था तथा जिसका चरित्र प्रमाणपत्र कोई देना नहीं चाहता था वह आज प्रशासन का एक अंग बन गया है. आज वह दूसरों को नौकरी पर रखवा भी सकता है तथा चरित्र प्रमाणपत्र भी दे सकता है. शायद वह सही जगह पहुँच गया है.

पास ही ट्राँजिस्टर पर गाना बज रहा था 'अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों.'

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उमेश मोहन धवन
(एक परिचय)

नाम                      : उमेश मोहन धवन
जन्म                    : 14.02.1959
शिक्षा                    : एम. काम.
प्रकाशन    :अनेक उच्चस्तरीय पत्रों पत्रिकाओं में लघुकथाओं का अनवरत  प्रकाशन
कृतियां    : लघुकथा संग्रह पीर परायी (प्रकाशनाधीन)
संप्रति    : यूनियन बैंक आफ इंडिया में प्रबंधक के पद पर कार्यरत
संपर्क    : 13 / 134, परमट, कानपुर 208001 (उ.प्र)

e-mail                 um.dhawan@yahoo.com
                          umdhawan@gmail.com  

5 blogger-facebook:

  1. sakshi dixit1:10 am

    satya to yahi hai par koi padha likha vyakti aage bhi to nahi aata.....

    उत्तर देंहटाएं
  2. कटु सत्य को उजागर करती लघु रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बिल्कुल सही बात है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत अच्छी रचना है। आज के समाज की यही सच्चाई है। राजनीति के लिए कोई योग्यता (qualification) की भी आवश्यकता नहीं होती और न ही किसी चरित्र प्रमाण-पत्र की। बस केवल चुनाव जीतना ही सब कुछ है।

    उत्तर देंहटाएं

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